मनोहर श्याम जोशी से एक पुरानी बातचीत

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सन 2004 में आकाशवाणी के अभिलेखगार के लिए मैंने मनोहर श्याम जोशी जी का दो घंटे लंबा इंटरव्यू लिया था। उसमें उन्होंने अपने जीवन के अनेक अनछुए पहलुओं को लेकर बात की थी। यहां एक अंश प्रस्तुत है जिसमें उन्होंने अपनी मां, पिताजी को लेकर कुछ बातें की हैं और यह बताया है कि किस तरह उनकी रचनात्मकता मुखर हुई- प्रभात रंजन 
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प्रश्न- आपने उपन्यास-लेखन इतनी देर में क्यों शुरु किया? आपका पहला उपन्यास जब आया तब आप आप 47 के हो चुके थे…
जोशीजी- एक लंबे अरसे तक मैं सोचता रहा कि शायद जोशीजी एक ठो वार एंड पीस और एक ठो वेस्टलैंड हिन्दी साहित्य को दे सकेंगे आगे चलकर कभी। जब ऐसा लगा कि आगे तो जिन्दगी ही बहुत नहीं रह गई है तो लेखनी फिर उठा ली। पहले बहुत दिनों तक मैं सोचता रहा कि रचनाकार अपनी पैतृक विरासत, अपने संस्कार, अपने आरंभिक परिवेश को दरकिनार करते हुए कुछ रच सकता है। बहुत बाद में यह समझ आया यह लगभग असंभव है। मैं चाहे कुछ भी कर लूं अपने लेखन में बुनियादी तौर से एक खास कुमाउंनी ब्राह्मण के घर में, एक खास परिस्थिति में पैदा हुआ और पला-बढ़ा व्यक्ति ही रहूंगा। इस समझ के बाद लेखन शुरु किया।
प्रश्न- आपके उपन्यास हों चाहे सीरियल उनमें चरित्र-चित्रण भी जबर्दस्त होता है और किस्सागोई भी सशक्त होता है। भाषा पात्रों के अनुकूल होती है। यह किस तरह अर्जित किया आपने?
जोशीजी- माँ से। बल्कि मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि हालांकि मेरी माँ कभी स्कूल नहीं गई मुझे अपना बुनियादी साहित्य-संस्कार और तेवर उसी से विरासत में मिला है। उसे पढ़ने की इतनी ललक थी कि उसने भाइयों की किताबें देख-देखकर स्वयं को अक्षर ज्ञान कराया। धार्मिक ग्रंथ ही नहीं उपन्यास भी वह बहुत चाव से पढ़ती थी। शरत साहित्य, रवीन्द्र साहित्य, चंद्रकांता, सरस्वती सीरीज की किताबें ये सब हमारे घर में हुआ करती थी। प्रसंगवश, मेरे एक मामा लक्ष्मीदत्त जोशी को हिन्दी साहित्य के कुछ इतिहासों में बांग्ला साहित्य के हिन्दी में अनुवाद करने के लिए और जवाकुसुम नामक एक उपन्यास लिखने के लिए याद किया गया है। मतलब यह कि ननिहाल में अच्छा साहित्यिक माहौल था। मेरी माँ कुशल किस्सागो और नक्काल थी। हर घटना का वह बहुत ही सजीव वर्णन करती थी और उसके बीच-बीच में पात्रों के संवादों के हूबहू नकल उतारकर प्रस्तुत किया करती थी। हमारे यहां बारात के रवाना हो जाने के बाद रतजगे में मेरी माँ के आइटमों की धूम रहती थी। हम सब भाई-बहनों को घटनाओं का सजीव वर्णन करने का और उससे संबद्ध लोगों की नकलें उतार सकने का गुण अपनी माँ से विरासत में मिला है। मैं खुद ही कितनी ही आवाजें बदल करके और कितनी ही आवाजों में बोल सकता हूं। जवानी के नादानी भरे दिनों में इस क्षमता का मैंने टेलिफोन पर मित्रों को बेवकूफ बनाने में अक्सर दुरुपयोग किया। आज जब मेरा सबसे छोटा बेटा फोन पर इस तरह बेवकूफ बनाता है तो जबर्दस्त खीज होती है।
प्रश्न- आपकी रचनाओं हास्य-व्यंग्य का होता है। आपे नेताजी कहिन जैसा व्यंग्य का लोकप्रिय स्तंभ लिखा। तो दूसरी तरफ आपके उपन्यासों में इसी व्यंग्य के साथ एक त्रासदी भी चलती रहती है। यह नजरिया आपने कहां से पाया?
जोशीजी- अपनी मां से ही। उनका व्यक्तित्व विचित्र प्रकार का था। एक तरफ वह बहुत धर्मपरायण और धर्मभीरु महिला थीं। निहायत दबी-ढकी, नपी-तुली जिंदगी जीने वाली। हमें धर्मभीरुता का संस्कार भी उसी से मिला। उसी के चलते अपने तमाम तथाकथित विद्रोह के बावजूद, जनेऊ को कील पर टांग देने और मुसलमानों के घड़े से पानी पी लेने के बावजूद कर्मकांड को कभी पूरी तरह से अस्वीकार नहीं कर पाया हूं। और इस मामले में मेरी माननेवालों और न माननेवालों के बीच की स्थिति बन गई।एक ओर मेरी मां का व्यक्तित्व दबा-ढका था तो दूसरी ओर इतने जबर्दस्त ढंग से खिलंदड़ भी कि मध्यवर्गीय मानकों की ऐसी-तैसी कर जाए। खुद अपना और दूसरों का हास्यास्पद पक्ष उसे साफ नजर आता था। उस पर वह खिलखिलाकर हंस सकती थी और हंसा भी सकती थी।
वे बहुत ऊंचे परिवार की थी। दीवान-राठ थे मेरे ननिहाल वाले। गोया उस परिवार के, जिसके सदस्य राजाओं के दीवान होते आए थे। मेरे मां के परदादा थे हर्षदेव जोशी जिनका कुमाऊं, गढ़वाल, हिमाचल प्रदेश और रूहेलखंड के ब्रिटिशकालीन इतिहास में जिक्र आता है- कहीं नायक और कहीं खलनायक के रूप में। वे पंडित, राजनीतिज्ञ कूटनीतिक और सेनापति सभी कुछ थे। वे बराबर इस जोड़-तोड़ में रहे कि कुमाऊं के शासन की बागडोर कुमाउंनियों हाथ में आ जाए। इसीलिए जीवन के अंतिम दौर में उन्होंने गोरखाओं से दगा करके अंग्रेजों का साथ दिया। उन्हें गोरखाओं को हराने की विधि बताई। लेकिन इससे कुमाऊं का राज कुमाउंनियों को मिलने के बजाय अंग्रेजों को मिला। उनकी गिनती गद्दारों में हुईं वे राजनीति से विरक्त होकर आध्यात्म की शरण में गए।
प्रश्न- आपने हर्षदेव जोशी के चरित्र का कोई आधार बनाया? कभी उनके बारे में कुछ लिखने के बारे में सोचा?
जोशीजी- मैं हर्षदेव जोशी को लेकर एक नाटक लिखना चाहता था लेकिन मैं उनके बारे में जानकारी इकट्ठा करने का काम ही पूरा नहीं कर सका। कहा जाता है कि हर्षदेव जोशी को किसी ने वंश-नाश का शाप दिया था। मेरे ननिहाल में पुत्र बहुत कम हुए और उस वंश का जो ताजातरीन इकलौता मर्द वारिस है-मेरे मामा का पोता- उसके कोई पुत्र नहीं है। इसलिए लोग कहते हैं श्राप पूरा हो गया। मिथकीय किस्म के कैरेक्टर थे लेकिन उन पर कुछ लिखना नहीं हो पाया।
प्रश्न- आपने अपने पिता के बारे में विस्तार से नहीं लिखा है। केवल कुरु कुरु स्वाहा में उनके बारे में कुछ सूचनाएं आती हैं?
जोशीजी- मैं कुल 7-8 बरस का था जब मेरे पिता गुजर गए। इसलिए मैं उन्हें एक अनुपस्थिति के रूप में ही जानता हूं। एक ऐसी अनुपस्थिति जिसे मैंने उनके बारे में अपनी चंद यादों से, घर में उपलब्ध उनके चित्रों से और दूसरी सुनी-सुनाई बातों से- जो अक्सर परस्पर विरुद्ध होतीं मैंने दूर करने की कोशिश की। अपने पिता के बारे में सबसे ज्यादा जानकारी मुझे अपने भाई साहब से प्राप्त हुई। विडंबना यह है कि हम भाइयों में पिता के बारे में लंबी बातचीत तब हुई जब वह गंभीर रूप से बीमार थे। उनका इरादा पिता और अन्य पूर्वजों को लेकर एक वृहद उपन्यास लिखने का था। दुर्भाग्य से उसी बीमारी में उनकी असमय मृत्यु हो गई।
प्रश्न- आपके भाई भी लेखक थे?
जोशीजी- उनकी कुछ रचनाएं प्रकाशित और प्रसारित भी हुई थीं। जिन्दगी में दो मर्तबा उन्होंने पत्रकार की हैसियत से काम किया था। मेरी बड़ी बहन भगवती दी की भी एक-दो रचनाएं प्रकाशित हुई थीं। आज भी वे अगर कोई भूले-भटके पत्र लिखती हैं तो सब लोग ले-लेकर पढ़ते हैं। मेरे ताऊजी और छोटे चाचा की रचनाएं भी प्रकाशित हुईं। पढ़ने-लिखने की हमारे परिवार में जबर्दस्त परंपरा थी और सो भी उस जमाने में जब फालतू किताबें पढ़ना उतना ही खराब समझा जाता था जितना आजकल टीवी देखते रहना।
प्रश्न- पिता की अनुपस्थिति को आप किस तरह से देखते रहे?
जोशीजी- इसके कारण मेरे जीवन में ही नहीं साहित्य में भी जबर्दस्त अनाथ काम्पलेक्स ढूंढा और दिखाया जा सकता है। मुझे खुद ही कभी-कभी आश्चर्य होता है मेरे लिए कोई व्यक्ति पिता प्रतीक बन जाता है और मुझे अपने बारे में उसकी राय अच्छी बनाने की, अपने किए पर उसकी दाद पाने की जरूरत महसूस होती है। कभी-कभी अपनी इस कमजोरी पर मैं इतना झुंझलाता हूं कि उसके द्वारा उपेक्षित किए जाने पर अपना आपा खो बैठते हुए उल्टा-सीधा कहने लगता हूं। मृत्युभय और असुरक्षा की सतत भावना भी मेरे अनाथ काम्पलेक्स के हिस्से हैं। भाई साहब की असमय मृत्यु और उनके जीवन में आए बेरोजगारी के अनेक दौर इस भावना को और भी दृढ़ कर गए।
प्रश्न- इसका आपके जीवन पर क्या असर पड़ा?
जोशीजी- इसकी वजह से मेरे भीतर का डर कुछ और बढ़ गया। कुछ पैदाइशी डर था और कुछ परिस्थितियों ने बना दिया। कोई विद्रोह करते हुए या बड़ा खतरा मोल लेते हुए मुझे यह डर सताता रहा कि कहीं भाई साहब की तरह मेरी जिन्दगी भी तबाह न हो जाए। मध्यवर्गीय मानकों के अनुसार जब छोटे-मोटे कुछ विद्रोह किए तब यही सुनने को मिला कि अपने भाई के नक्शे-कदम पर चल रहा है। यह भी उसी तरह लायक बाप का नालायक बेटा साबित होगा। इसी के चलते विशेष महत्वाकांक्षी न होते हुए भी मैंने महत्वपूर्ण गोया लायक बनने कर कोशिश की और अपने को बराबर नालायक ही पाता रहा। इसी तरह मुझे इस बात का भी अहसास रहा कि शराब और विलासिता मेरे पिता की कमजोरी बने। अगर उनमें परिवार के संस्कारों के विरुद्ध जाने वाली यह प्रवृत्ति न होती तो वे दीर्घायु होते और जीवन में कहीं अधिक सफलता पाते। इसके कारण मैं कभी पूरी तरह विद्रोही नहीं हो सका।
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3 COMMENTS

  1. अभी पढ़ ही रहा था कि समाप्त हो गया. बड़ा हिस्सा या पूरा डालिए जिससे मन तृप्त हो सके

  2. लगातार जानकी पुल से गुजरता हूं। बस समझ लीजिए कि वैचारिकी का एक दरवाजा इस पुल से ही होकर जाना होता है। फेसबुक पर इंटरव्यू शब्द सुनकर बड़ी इत्मीनान से पढञने बैठा था लेकिन इतनी जल्दी खत्म हो जाएगा,टेम्पट बनी रह गयी। संभव हो तो आगे का हिस्सा भी डाल दें और जोशीजी की कुछ तस्वीरें भी। आजकल टेबल पर उनके लगभग सारे उपन्यास पड़े हैं,कुछ तो पहले से पढ़ा है,बाकी एक-एक करके पढ़ने।
    ब्लॉगिंग की दुनिया में आकर आपने इसे उसी अर्थ को औऱ मजबूत करने का काम किया है जिसे अक्सर लोग नजरअंदाज कर रहे हैं।.

  3. joshi ji ka interview bahut achha hai bahut bahut badhai. aap apne lagatar serious matter de rahe hain yah blog ki duniya ke liye achhi khabar v hai aur ek seekh v. madhyam koi kharab nahi hota hai bas uska use badhiya sandarv mein hona chahiye.

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