फिराक गोरखपुरी की एक दुर्लभ कहानी ‘दही का बर्तन’

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आज उर्दू के मशहूर शायर फिराक गोरखपुरी का जन्मदिन है. आज ही के दिन १९८२ में उनका देहांत हुआ था. उनके गज़लों, नज्मों, कतओं से तो हम सब बखूबी परिचित रहे हैं लेकिन उनकी कहानियों के बारे में हमारी मालूमात ज़रा कम रही है. उनकी नौ कहानियों का एक संकलन भी उनके मरने के बाद प्रकाशित हुआ था. वे कैसी कहानियां लिखते थे इस पर कुछ कहने का अधिकारी मैं खुद को नहीं समझता, लेकिन मेरा प्रिय शायर कहानियां भी लिखता था मुझे यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ. पेश है उनकी एक कहानी ‘दही का बर्तन’– जानकी पुल.
  
गोपाल एक लड़का था. उसकी माँ अत्यंत भली और सहृदय स्त्री थी. गोपाल का पिता भी बड़ा सज्जन पुरुष था. जब तक वह जीवित रहा रुपए पैसे के लालच को कभी मन में स्थान नहीं दिया. वह जो कुछ चाहता था वह बस इतना था कि लोगों के साथ भलाई करे, पवित्र ग्रंथों का पाठ करे और जहाँ तक हो सके अच्छी-अच्छी बातें सीखे और समझे और दूसरों को बताये और समझाए. गांव वाले उसे अपने गिरोह का विद्वान और पंडित समझते थे. गांव वालों ने उसे कुछ खेत दे रखा था जिसमें वह खाने भर को गल्ला पैदा कर लेता था. उसके घर के पास कुछ भूमि थी जिसमें कुछ फल और तरकारियां पैदा होती थीं और यह सब साल भर के लिए उसके घर भर को काफी था. जब वह मरने लगा तो उसने अपनी पत्नी से कहा, “प्यारी, मुझे तुम्हारी और गोपाल के लिए बहुत अधिक चिंता नहीं है. मुझे विश्वास है कि स्वयं भगवान तुम्हारी रक्षा करेंगे. इसके अतिरिक्त खेत से तुम्हारे लिए अनाज हो जाया करेगा और हमारे कृपालु पड़ोसी बगीचे की खेती तुम्हारे लिए किया करेंगे. यह तुम्हारे और गोपाल के खाने-पीने के लिए काफी होगा.”
गोपाल की माँ ने कहा- “तुम सच कहते हो, हमारी चिंता न करो. हम लोग अच्छी तरह निर्वाह कर लेंगे.” अपने इन बातों से उसने मरते हुए पति को सांत्वना दी जिससे कि मरते समय उसको शांति मिले और वह भगवान का ध्यान कर सके.
जब गोपाल के पिता की मृत्यु हो गई तब पड़ोसियों ने आकर उसका शव उठाया और शमशान पर ले जाकर चिता पर रखकर उसे आग की लपटों को सौंप दिया. शव जलने लगा और जब आग बुझ गई तो राख को उन लोगों ने नदी में बहा दिया और इस तरह गोपाल के पिता का अंत हुआ.
अब माँ-बेटे अकेले रहने लगे. माँ को केवल उस दिन का इंतज़ार था जब उसकी आँखें बंद हो जाएंगी और वह अपने पति से जा मिलेगी. इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए कि मरने के बाद वह अपने पति से अवश्य मिले, उसने कोई बात उठा नहीं रखी. वह बार-बार सच्चे जी से भगवान से प्रार्थना करती, दिन में तीन बार स्नान करती और मेहनती तथा नेक बनने का पहले से भी अधिक प्रयास करती थी. पड़ोसी भी अच्छी तरह पेश आते थे. उसका खेत गांव वाले अपनी खेती के साथ बो देते थे और काट देते थे और बगीचे के काम में भी उसका हाथ बंटाते थे. माँ-बेटे को खाने भर को अच्छी तरह मिल जाता.
कुछ दिनों बाद जब गोपाल चार-पांच बरस का हुआ तो उसकी माँ को ख्याल आया कि अब उसके बेटे को पाठशाला में जाना चाहिए. लेकिन उसके पहले यह ज़रूरी था कि उसके लिए नए कपड़े आयें और कुश की एक छोटी-सी चटाई की भी आवश्यकता थी जिसे गोपाल अपनी बगल में ले जाया करे और पाठशाला में अपनी जगह पर बिछाकर बैठा करे और कापी की जगह ताड़ के कुछ पत्तों की भी दरकार थी जिसे कुश की चटाई में लपेटकर ले जाया करे और एक कलमदान, नर्कट के कलम और दावात की भी आवश्यकता थी. स्लेट की आवश्यकता अभी नहीं थी क्योंकि बहुत छोटे बच्चों के लिये ज़मीन पर राख या बालू बिछा दिया जाता था और उस पर वे अपनी उंगलियों से अक्षर या अंक लिखते.
कल गोपाल को नए कपड़ों की आवश्यकता थी. प्यारा गोपाल, पांच वर्ष का बालक. हिन्दुस्तान गर्म देश है. एक बच्चे के लिए सूती कपड़े के दो छोटे-छोटे टुकड़े काफी हैं. एक टुकड़ा, जिसे चादर कहते हैं, बाएं कंधे पर डाल दिया जाता है और दूसरा टुकड़ा जिसे धोती कहते हैं, कमर के नीचे बाँध दिया जाता है. बस ऐसे चार टुकड़ों की आवश्यकता थी. दो आज के लिए और दो कल के लिए जब आज का कपड़ा पास बहने वाले नाले में धोकर घास या अलगनी पर सूखने के लिए फैला दिया जाएगा.
यह सच है कि इन कुल चीज़ों का दाम बहुत कम था किंतु गरीब माँ के लिए यह भार बहुत था और इतने पैसे पैदा करने के लिए उसने कई दिन तक बड़ी मेहनत से चरखा चलाया.
आखिर सब तैयारी हो गई और बहुत सोच-समझकर एक शुभ घड़ी निश्चित करके उसने अपने बेटे को आशीर्वाद दिया और झोपड़े के द्वार पर खड़ी होकर विद्यारंभ के लिए जंगल की ओर जाते हुए वह उसको देखती रही.
उधर गोपाल छोटे-छोटे पग उठता हुआ आगे बढ़ता जाता था. राह बहुत लंबी मालूम होती थी और उसे यह ख्याल भी होने लगा कि कहीं मैं मार्ग तो नहीं भूल गया. अंत में गुरूजी का आश्रम दूर से दिखाई दिया और बहुत से दूसरे लड़के भी उस ओर जाते दिखाई पड़े. यह देखकर वह यह बात भूल गया कि अभी कुछ देर पहले उसे कुछ डर मालूम हुआ था. वह तेज़ी से दूसरे लड़कों के साथ आगे बढ़ता हुआ अपनी कक्षा में चला गया.
आज का दिन सुहावना था. पढ़ाई-लिखाई हो चुकी तो लड़के आपस में खेलने लगे. जब गोपाल अंत में घर को रवाना हुआ तो दिन डूब चुका था और झुटपुटा हो चला था. जंगल से अकेले पहले-पहल गुज़रना गोपाल को बहुत दिनों तक याद रहा. अँधेरा बढ़ता जाता था और रह-रहकर जंगली जानवरों की डरावनी आवाजें सुनाई देने लगीं. अंत में वह इतना डर गया कि उसकी समझ में नहीं आता था कि क्या करे और इसलिए उसने जोर से दौड़ना शुरु किया और माँ की गोद में पहुँचने से पहले उसने दम नहीं लिया.
दूसरे दिन सवेरे वह पाठशाला जाने के लिए तैयार न होता था. उसकी माँ ने कहा- ‘बेटा, कल तो तुम बहुत खुश थे और बहुत सी अच्छी बातें सीखीं. तुम तो कहते थे कि पाठशाला का पढ़ना तुमको बहुत अच्छा मालूम होता है. फिर आज तुम क्यों नहीं जाना चाहते.’
गोपाल ने जवाब दिया- ‘अम्मा, पाठशाला तो बहुत अच्छी है, पर जंगल में अकेले जाते हुए डर मालूम होता है.’
गोपाल ने यह कहकर शर्म से सिर झुका लिया. किंतु माँ के ह्रदय पर जो बीती क्या उसका अनुमान भी कोई कर सकता है. उसके दिल पर एक चोट-सी लगी, क्योंकि वह इतनी गरीब थी कि कोई आदमी अपने बच्चे के साथ पाठशाला जाने के लिए नहीं रख सकती थी. किंतु उसकी यह दशा केवल कुछ क्षणों तक रही. उसे कृष्ण भगवान का ध्यान आया. वह कृष्ण को एक छोटे बालक के रूप में पूजती थी. कृष्ण के बचपन की तस्वीर उनके आँखों में फिर गई. अपने पुत्र गोपाल का नाम भी उसने कृष्ण के ही एक नाम पर रखा था क्योंकि गोपाल के माने भी गाय चराने वाले के हैं.
उसने अपने प्यारे बच्चे को एक कहानी सुनाई. उसने कहा- ‘बेटा, तुमको नहीं मालूम कि मेरा एक दूसरा बच्चा भी है जो उसी जंगल में रहता है और उसका नाम गोपाल है. वह जंगल में गायें चराता है और वह बराबर रास्ते के आसपास कहीं न कहीं रहता है. और यदि तुम उसे यह कहकर पुकारोगे कि भाई गोपाल मेरे साथ पाठशाला चलो, तो वह ज़रूर आएगा और तुम्हारे साथ हो लेगा. तब तो तुम नहीं डरोगे, कि डरोगे.?’
गोपाल ने झट कहा- ‘अम्मा, मैं पाठशाला खुशी से जाउंगा, मुझे पाठशाला जान बहुत अच्छा लगता है.’
गोपाल नन्हा-सा जी कड़ा करके चल पड़ा. वन बहुत घना था और बहुत अँधेरा, कुछ दूर जाने के बाद गोपाल डरने लगा. उसको अपने ह्रदय की धडकन सुनाई देने लगी. और वह चीख-चीख कर पुकारने लगा- ‘गोपाल भाई, भाई गोपाल! आओ मेरे साथ खेलो.’
झाडियों के पत्ते खडके. इसके बाद झाडियों के बीच से एक लड़के ने सिर उठाया. उसके सिर पर एक सोने का मुकुट था और मुकुट में मोर का एक पर लगा हुआ था. इसके बाद वह लड़का झाडियों से निकला और उसने गोपाल का हाथ पकड़ लिया और पाठशाला तक दोनों रास्ते में खेलते हुए गए.
जब पाठशाला के पास दोनों आ गए तब गाय चराने वाले लड़के ने गोपाल से कहा कि घर पलटते समय मुझे फिर पुकारना और यह कहकर वह घने जंगलों में गायब हो गया.
जब वह नित्य अपनी माँ से उस दोस्ती और प्रेम तथा इस तरह साथ खेलने का हाल कहता तो उसकी माँ की आँखें प्यार से भर आतीं और वह कुछ कह न सकतीं. किंतु उसको यह बात साधारण सी लगती थी कि कृष्ण जी एक बालक के रूप में एक माँ का दिल रखें और उसको तसल्ली दें.
इस देश में यह बात आरम्भ से चली आती है कि जो गुरु पाठशाला खोले उसको कोई तनख्वाह न दी जाए किंतु गुरु को खाने-पीने का कष्ट कभी न होता था. गांव के लोग मिलकर उसे कुछ खेत दे देते थे और उसकी खेती सब मिलकर कर देते थे और उसकी पैदावार गुरु को दे दी जाती थी. लेकिन विशेष अवसरों पर जैसे यज्ञ, भण्डार, भोज आदि पर सब लड़कों को सूचना दे दी जाती थी तब हर लड़का घर पर जाकर अपने माँ-बाप से कहता था कि गुरुदेव एक भोज देने वाले हैं. मैं गुरुदेव को क्या दूं?’
गोपाल ने भी और लड़कों की तरह उस दिन रात को अपनी माँ से कहा- ‘माँ, कल गुरूजी के यहाँ भोज है. मैं उनके पास क्या ले जाऊं?’
बालक की यह बातें सुनकर बेचारी माँ का मन थोड़ी देर के लिए उदास हो गया. वह बेचारी जानती थी कि उसके पास कुछ भी नहीं है जो वह अपने बेटे को गुरूजी के लिए भेंट दे सके. पर उसकी यह उदासी कुछ ही क्षणों के लिए थी और जब एक बालक के रूप में उसे कृष्ण जी का ध्यान आया तो उसका चेहरा फिर खिल गया और आशा की झलक उसके चेहरे पर दिखाई देने लगी.
उसने गोपाल से कहा, ‘बेटा, मैं तो गुरूजी को देने के लिए कोई चीज़ दे नहीं सकती, पर वनों में फिरने वाले अपने भाई से तू सुबह पाठशाला जाते समय कुछ मांग लेना.’
जब अगले दिन उसने अपने चरवाहे भाई से कहा. तो उस छोटे चरवाहे ने जवाब दिया- ‘मैं तुम्हें क्या दे सकता हूँ. मैं एक दीं चरवाहा हूँ. मेरे पास क्या है. लेकिन ठहरो….’ यह कहता हुआ वह थोड़ी दूर तक दौड़ता हुआ गया और जब पलटा तो मिटटी के एक छोटे-से बर्तन में कुछ दही लाया. उसने गोपाल को वह बर्तन दे दिया और कहा- ‘मेरे पास तो बस यही है. एक गरीब चरवाहे के पास और हो भी क्या सकता है. लेकिन तुम इसे अपने गुरूजी को दे देना.’
गोपाल ने समझा कि यह भेंट बहुत अच्छी है, विशेषकर इस कारण कि जंगल में रहने वाले भाई ने इसे दिया था. वह दौडकर गुरूजी के आश्रम में पहुंचा और दूसरे बालकों की पंक्ति के पीछे खड़ा हो गया. लड़के भाँति-भाँति की बहुमूल्य वस्तुएं गुरु जी को भेंट कर रहे थे. उस भीड़ में किसी ने बिन बाप के उस बालक की ओर देखा भी नहीं.
जब गोपाल की ओर किसी ने नहीं देखा तो उसका ह्रदय टूट गया और उसकी आँखों में आंसू आ गए. किंतु उसी समय संयोग से गुरुजी की दृष्टि उस पर पड़ गई. उन्होंने दही का वह छोटा-सा बर्तन उसके हाथ से ले लिया और जाकर एक बड़े बर्तन में उसे उड़ेल दिया. किंतु यह देख उनके अचरज का ठिकाना नहीं रहा कि छोटा बर्तन फिर दही से भर गया. उन्होंने फिर दही उडेला किंतु बर्तन ज्यों का त्यों भर गया. वे उडेलते रहे बर्तन भरता रहा. गोपाल, जिसका अचरज किसी से कम नहीं था अब पहली बार कुछ-कुछ समझा कि उसका दोस्त छोटा चरवाहा कौन था. अब तक उसने भूल कर भी नहीं सोचा था कि बालक के रूप में स्वयं कृष्ण भगवान उसके साथ रोज खेला करते थे इसलिए जब गुरु जी ने उससे पूछा कि यह दही तुम कहाँ से लाये तो उसने अत्यंत श्रद्धा के साथ कुछ कम्पित स्वर में कहा- ‘यह दही वान में गाय चराने वाले मेरे भाई ने मुझे दिया है.’
गुरूजी ने पूछा, ‘क्या तुम जंगल में रहने वाले अपने उस भाई को मुझे दिखा सकते हो?’
‘गुरूजी, यदि आप मेरे साथ चलें तो मैं उसे पुकार सकता हूँ.’
गुरूजी और गोपाल साथ-साथ उस रास्ते पर गए. जब उस विशेष स्थान पर पहुंचे तब लड़के ने आवाज़ दी- ‘चरवाहे भाई!  भाई चरवाहे! क्या न आओगे.’ पर जवाब में कोई आवाज़ न आई. गोपाल की समझ में न आता था कि वह क्या करे. उसे गुरूजी के चेहरे पर अपने प्रति कुछ संदेह के चिन्ह दिखाई पड़े. और उसने एक बार फिर जोर से कहा- ‘भाई चरवाहे! यदि तुम न आओगे तो लोग मुझे झूठा समझेंगे.’
तब एक आवाज़ आई जैसे जंगल में कहीं अदि दूर से आ रही हो- ‘नहीं प्यारे बच्चे, मैं अपना चेहरा नहीं दिखा सकता. तुम्हारे गुरु को अभी बहुत समय तक प्रतीक्षा करनी है. तुम्हारी माँ जैसी माँ बिरले ही किसी लड़के को मिलती है.’
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6 COMMENTS

  1. चर्चा मंच से आपके ब्लॉग का ज्ञान हुआ.बहुत अच्छा लगा आपकी पोस्ट पढकर .मेरे ब्लॉग 'मनसा वाचा कर्मणा'पर आपका स्वागत है .

  2. ठीक-ठीक याद नहीं कि ठीक यही या इस जैसी कोई कहानी मैं नंदन में पढा था, सौरभ सुमन में या बचपन या किशोर की किसी ऐसी ही पत्रिका में..

    मिथिलेश प्रियदर्शी

  3. अरसे बाद इतनी सरल सहज कहानी पढ़ी !आदत सी हो गई है दुरूह रचनाएँ पढ़ने की ऐसे में इस कहानी ने कुछ सुकून दिया …धन्यवाद प्रभात जी

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