सत्ता की विद्रूपताओं के विरुद्ध विजय तेंदुलकर के नाटक

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विजय तेंदुलकर के नाटकों पर आज प्रज्ञा का लेख. प्रज्ञा दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में असोसिएट प्रोफ़ेसर हैं, नाटकों पर उन्होंने शोध किया है, समसामयिक जीवन से जुड़े मसलों को लेकर टिप्पणियां करती रहती हैं. उनके लेखन में गहरा सरोकार है, जो इस लेख में भी झलकता है- जानकी पुल.


‘‘ मुझे याद है कि छह या सात बरस की उम्र में मैं कागज और कलम लेकर कहानियां लिखा करता था जोकि मेरे स्कूल के काम का हिस्सा नहीं होती थीं। मैं अक्सर  जि़ंदगी की परिस्थितियों की ऐसी फैंटेसी में खो जाता जिसमें मेरी भूमिका वो नहीं होती जोकि मैं हूं बल्कि मैं जैसा होना चाहता हूं। …बचपन की यह आदत बाद तक भी मेरे साथ रही … बल्कि आज भी मैं किसी और जैसा होना पसंद करता हूं। ऐसा जैसा मैं वास्तविक जीवन में नहीं हो सकता, इसीलिए दिमाग में काल्पनिक परिस्थितियां गढ़कर मैं उनसे खेलता हूं।’’(‘द प्ले इज़ द थिंग श्रीराम मेमोरियल लेक्चर-1, )1। तेंदुलकर का यह कथन एक नाटककार के नज़रिए से जहां नाटक की रचना-प्रक्रिया की ओर संकेत करता है वहां एक रचनाकार के कला सरोकारों को भी उजागर करता है। उनके कथन ‘‘ जोकि मैं हूं बल्कि जैसा होना चाहता हूं ’’ का विस्तार करके देखें तो यथार्थवादी रचनाकार का रचनात्मक उद्देश्य एकदम साफ तौर पर उभरकर आता है कि जो है उससे बेहतर चाहिए।हिंसा, क्रूरता, अमानवीयता, अविश्वास की तमाम तहें दिखाते हुए , बहुत बार प्रकृतवाद के पाले में जाते हुए भी तेंदुलकर के नाटक इनसे परे एक मानवीय और बेहतर समाज चाहते हैं। तनावों की कई अंतर्धाराओं से रचे इनके नाटक सामाजिक, नैतिक, धार्मिक-सांस्कृतिक समस्याओं से जूझने के क्रम में अनेक सवाल खड़े करते हैं और अक्सर समाधानों से रहित मोड़ पर अपने दर्शकों को छोड़ जाते हैं। नाटक खत्म होने पर दर्शक सवालों की फेहरिस्त लिए हाल से बाहर निकलता है तो उसके चिंतन की दिशा खुद ब खुद जवाब ढूंढने की ओर अग्रसर होती है और दर्शक का यह अभ्यास उसे एक नयी फैंटेसी गढ़ने को मजबूर करता है । यह फैंटेसी जो है और जो हो सकता हैके अंतर को साफ करती चलती है। दर्शकों से यह अभ्यास करवा ले जाना बतौर नाटककार तेंदुलकर की उपलब्धि है।
                1928में जन्मे विजय धोडोपंत तेंदुलकर ने पचास से भी अधिक नाटकों की रचना की है। हिंदी में उनके तीस नाटकों का अनुवाद और मंचन किया जा चुका है। वर्ष 2007में भूतऔर वर्ष 2008 में विट्ठलाऔर एक जिद्दी लड़कीका हिंदी अनुवाद भी प्रकाशित हो गया है। आज विजय तेंदुलकर हमारे बीच नहीं हैं । जाहिर है यह केवल मराठी जगत की क्षति नहीं है और न ही हिंदी जगत की क्षति है, यह नाटक की क्षति है । खामोश अदालत जारी है’, ’ गिद्ध’ ‘,सखाराम बाइंडर’ ,‘जाति ही पूछो साधु की’,‘ घासीराम कोतवाल’,‘ कन्यादान’,‘ कमलाआदि नाटकों के जरिए तेंदुलकर की जो छवि नाट्य जगत में स्वीकृत हुई वह मराठी नाटककार की सीमा में बंधकर नहीं रह सकी। अपने नाटकों के माध्यम से जिन किरदारों को उन्होंने खड़ा किया वे केवल मराठी मानुषनहीं हैं और न ही इनकी समस्याएं , इनके अंतर्द्वन्द्वा मराठी जगत तक सीमित हैं। प्रिय भाषा मराठी में लिखते हुए एक हार्दिक प्रसन्नता अनुभव करने के बावजूद स्थानीयता बनाम राष्ट्रीयता तेंदुलकर के नाटकों की पहचान बनती है।
एक बड़े राष्ट्र के भीतर अनेक समूह, जातियां, भाषायी वर्ग होते हैं जो स्वयं में इतनी महत्ता रखते हैं कि राष्ट्रीयता भी उनसे परिभाषित होने लगती है। तेंदुलकर के नाटकों के व्यक्ति, विचार , मुद्दे किसी देश के छोटे भाषायी समूह के नहीं रहते बल्कि पूरे देश के ज्वलंत विचारों और मुद्दों के प्रतिनिधि बनकर आते हैं। ये स्थानीयता इतनी प्रगाढ़, इतनी सघन और उर्वर है कि इसमें भारतीय मनुष्य के संघर्षां को उगते हुए देखा जा सकता है। सखाराम बाइंडरका सखाराम हो या लक्ष्मी और चम्पा, ‘कमलाकी सरिता या कमला, खामोश अदालत जारी है की बेणारे , जाति ही पूछो साधु की का महिपत, घासीराम कोतवाल का घासीराम, पुन्य नगरी के पंडे-पुरोहित,पेशवा या घासीराम की बेटी गौरी- ये सभी किरदार क्या केवल महाराष्ट्र की चैहद्दी तक सीमित हैं? इन किरदारों के माध्यम से तेंदुलकर जिस समाज की कहानी कहते हैं वह स्थानीयता का अतिक्रमण करती हुई पूरे वेग के साथ भारतीय समाज में रूपांतरित हो जाती है। मराठी नाटककारों में अन्नासाहब क्रिलोस्कर, गोविंद बी. देवल , बी. वी. वारेकर, गोविंद देशपांडे ,सतीश आलेकर, जयंत पवांर आदि की व्यवस्था विरोधी नाट्य-लेखन की एक लंबी परंपरा है। इस कड़ी से जुड़ते हुए तेंदंुलकर के नाटक स्थानीयता की सीमा से निकलकर भारतीयता को परिभाषित करते हैं।
                यहां जिस भारतीय मनुष्य और उसके संघर्षां की बात की जा रही है उसे तेंदुलकर के  निम्न और मध्यवर्गीय किरदारों, उनके जीवन चित्रों के माध्यम से आसानी से देखा जा सकता है। अपने रचनात्मक लेखन की पहली सीढ़ी विचार की अपेक्षा अनुभव को बताने वाले इस नाटककार का यह कहना है कि ‘‘चरित्र भले ही मेरे नाटककार के दिमाग की उपज हैं पर वो कोई कठपुतली तो नहीं और न ही शतरंज की बिसात पर खड़े राजा-रानी जिन्हें मैं अपनी सहूलियत से आगे बढ़ाउंगा… जिंदा आदमी की अपनी अलग पहचान होती है और यही कारण है कि वो मेरे नाटक में अपने भिन्न विचार, भिन्न दिशा और भिन्न नियति के साथ हैं।’’(’द प्ले इज़ द थिंग- श्रीराम मेमोरियल लेक्चर-2, 1997)2 । इसलिए तेंदुलकर अन्य नाटककारों से गुज़ारिश भी करते हैं कि नाटककार की शैली किरदारों पर हावी न हो जाए क्योंकि इससे किसी भी दर्शक पर नाटक का जो प्रभाव पड़ेगा वह बिल्कुल ऐसा होगा जैसे एक ही नाटककार  अलग-अलग मुखौटों के पीछे से बोल रहा है। इस विचार का व्यावहारिक रूप तेंदुलकर के नाटकों में कारगर तरीके से दिखाई देता है । उनके अनेक नाटकों में कई-कई पात्र होने के बावजूद दोहराव और एक जैसापन नहीं दिखाई देता। हर किरदार की अपनी अलग शख्सियत है और हर किरदार में जीवन धड़क रहा है।
                 तेंदुलकर का घासीराम मध्यवर्ग का वह चित्र पेश करता है जो शक्ति, सम्पन्नता, वैभव पाने के लिए निरंतर समझौते करता आया है और पतन के गर्त में गिरता है। यह मध्यवर्ग समाजवादी तो नहीं हो पाया है लेकिन वह सामंती भी है और पूंजीवादी भी। घासीराम कहीं न कहीं उस पूंजीवादी अस्मिता के संघर्ष का प्रतीक है जो नितांत अकेले संघर्षरत है। समाज के निम्न वर्ग से आने वाला घासीराम शक्तिहीनता और उपर उठने का जज्बा लेकर आया है। यह शालीन व्यक्ति पूना में हुए अपने अपमान के कारण सुअर बनकर लौटने कीप्रतिज्ञा लेता है। वह पहले सामंती समाज को परखता है फिर उसका हिस्सा बनता है। निम्न वर्ग से आया घासीराम व्यवस्था को बदल भी सकता था। कोतवाल बनकर वह स्त्री-पुरुष के अवैध संबंधों पर रोक लगाने की पूरी कोशिश करता है पर वह खुद इस व्यवस्था में इतना जकड़ जाता है कि उसीमें मिलकर रह जाता है और सत्ता उसे अपना मोहरा बनाकर उससे सब कुछ छीन लेती है। तेदुलकर के नाटकों कमला’, ‘सखाराम सबाइंडरऔर खामोश अदालत जारी हैको भी देखें तो मध्यवर्गीय सामंती, रूढ़ मान्यताओं का चेहरा साफ दिखता है जहां स्वाधीन विचारों वाली स्त्री के लिए जगह नहीं बनती।
                ठेठ सामंती समाज में स्त्री की तस्वीर को तेंदुलकर के नाटक सामने लाते हैं। इनके नाटकों में स्त्री- सत्ता के लिए, घरेलू जीवन को सुनिश्चिित गति देने के लिए, व्यावसायिक फायदे  के लिए खरीदी-बेची जाती है। यानि स्त्री लालच, प्रलोभन और उपभोग की वस्तु है। स्त्री का वस्तुकरण और इससे जुड़ी अनेक छवियां इनके नाटकों में हैं। पुरुषप्रधान समाज की स्वामित्ववादी परिधि में जीने वाली स्त्री की चेतना जब जागृत होती है तब वह सवाल उठती है-‘‘ मैं पत्नी नहीं गुलाम हूं। उसकी निगाह में मैं भी एक कमला ही हूं … गुलाम को कोई हक हासिल नहीं होता… गुलाम इसलिए होता है कि सिर्फ खटता रहे। मालिक के इशारों पर नाचता रहे।……क्यों जारी रहेगा,? क्यों नहीं पुरुष भी घिसटता चले? …क्यों नहीं नारी एक बार भी मालिक बने? क्यों नहीं वह इंसान की तरह जीने की मांग करे?-(कमला)3सवालों की यह कड़ी बनते ही पुरुषप्रधान समाज के स्त्री-संबंधी तयशुदा मानकों के अनुसार एक संवेदनहीन वस्तु मान ली गयी बेणारे विरोध करते हुए साफ शब्दों में कहती है-‘‘ मैं लीला बेणारे, एक जिंदा औरत हूं।’’(खामोश अदालत जारी है)4 इन नाटकों में स्त्री के पक्ष को सामने लाने वाली एक गंभीर बात यह भी है कि वास्तविक लड़ाई सामंती सत्ता, सामंती मानसिकता से है। यही वजह है कि इन नाटकों में दो औरतों को एक-दूसरे के प्रतिपक्ष में रखकर दो भिन्न नजरियों को प्रस्तुत किया गया है। कमलामें सरिता और कमला, ‘सखाराम बाइंडरमें लक्ष्मी और चम्पा तथा खामोश अदालत जारी हैमें बेणारे और श्रीमती काशीकर। यह प्रयोग इसलिए है कि औरतों का एक बहुत बड़ा वर्ग सामंती मानसिकता की दीवारों में इस तरह कैद कर लिया गया है कि अब उन्हें अपनी स्वाधीन चेतना पर हो रहे हमले का कोई असर नहीं पड़ता।
                 सामंती सत्ता ने उन्हें इस कदर अनुकूलित कर दिया है कि स्त्री का विवेकवान होना, अपने लिए स्वाधीनता के आकाश की मांग करना उन्हें उच्छृंखलता जान पड़ता है। कमला का जयसिंह को मालिक कहना और उसकी पहली पत्नी के साथ जीवन गुजारना उसके लिए समस्याजनक नहीं है। उसका मानना है-‘‘ दोई मिलके मालिक को ,खुस रखें चइए,जैदाद फेलाएं चइए। मालिक को बच्चा देय चइए।…मैनत-मजूरी ,बच्चा देबो हमारे जिम्मे। लिखा-पढ़ी, हिसाब-किताब तुमाए जिम्मे। … मइने के पन्दरा रात मालिक के संग तुम सोइयो, पन्दरा रात हम सोहैं।’’( कमला)5 ‘सखाराम बाइंडरकी लक्ष्मी पर पुरूषप्रधान समाज की मानसिकता इस कदर हावी है कि उसे हर हाल में उत्पीड़क सखाराम सही पुरुष जान पड़ता है। यहां तक कि धर्म-कर्म, पूजा-उपासना न करने वाली, पुरुष से जबानदराजी करने वाली, स्वच्छंद विचारों वाली चम्पा की हत्या की साजिश करते समय लक्ष्मी एक औरत नहीं होती वह सामंती व्यवस्था की वफादार कार्यकत्र्ता जान पड़ती है। यही हाल श्रीमती काशीकर का भी है जो अन्य पुरूषों के साथ मिलकर, उन्हीं जैसी निर्मम क्रूरता के साथ  बेणारे को कटघरे में खड़ा करके अपनी अमानवीय गवाही देती हैं। यह उस भारतीय समाज के चित्र हैं जो अधिकार चेतना सम्पन्न स्त्री से भय खाता है। तेंदुलकर के नाटक प्रमाण हैं कि सत्ताएं अपने चाबुक के नीचे रहने वाले लोगों को पसंद करती हैं पर विवेकवान, स्वतंत्रचेता और सत्ता के विरोध में उठने वाले व्यक्ति को अपना परम शत्रु मानती हैं। सत्ता के लिए वह खतरा बन जाता है।
                 तेंदुलकर सत्ता के संरक्षणकारी प्रलोभनों का पर्दाफाश करते हैं। उनके नाटक घासीराम कोतवालका घासीराम तभी तक शक्तिशाली रहता है जब तक पेशवा की शारीरिक भूख संतुष्ट करने और पंडे-पुरोहितों का कद कम करने के सामान जुटाता है। जहां ये दोनों प्रयोजन सध जाते हैं वह पेशवा के लिए वह निरर्थक हो जाता है। चित्तपावन ब्राह्म्णों के स्थान पर घासीराम को तानाशाह बनने देना पेशवा की सोची-समझी साजिश का ही परिणाम है । इसलिए घासीराम को अपनी कठपुतली बनाकर सत्ता उसे बुरा साबित करके मरवा डालती है। बुराई घासीराम की झोली में और प्रतिष्ठा सत्ता के खाने में आती है। नाटक के अंत में दलित घासीराम को घसिएजैसी गाली सत्ता के घिनौने चेहरे का पर्दाफाश कर देती है। घासीराम के बहाने बहुत सारे सवालों को नाटककार ने आवाज़ दी है जो समसामयिक संदर्भां में भी प्रासंगिक हैं।अभियानसे जुड़कर, तेंदुलकर के कई नाटकों केा निर्देशित करने वाले निर्देशक राजेंद्रनाथ का कहना है-‘‘  यह नाटक एक तानाशाह के उदय और अंत की कहानी नहीं है…. हरेक को यह याद रखना चाहिए कि कुछ नाटकों में प्लॅाट एक खूंटी भर होता है जिस पर दूसरे कई मुद्दे टांगे जा सकते हैं। ठीक यह स्थिति घासीरामके साथ है।’’( द डायरेक्टर्स नोट – रंग यात्रा 2)6
                सत्ता के इन्हीं चोर दरवाजों को कुत्तेनाटक की औरत के माध

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3 COMMENTS

  1. तेंदुलकरजी के नाटकों से पहला परिचय कालेज के कोर्स में 'सखाराम बाइंडर' और 'घासीराम कोतवाल' के जरिये हुआ, कोर्स के बाद में भी उनके कुछेक नाटकों 'खामोश अदालत जारी है', 'जाति ही पूछो साधु की' आदि को पढ़ा था, हालांकि सारे तो अब तक भी नहीं पढ़ पाया हूं… बहरहाल लेख बहुत ही श्रम और शोध के साथ लिखा गया है, लेखिका को बधाई – प्रदीप जिलवाने

  2. विजय तेंदुलकर के नाटक सत्तर अस्सी के दशक के बेहतरीन नाटकों में से एक हैं !उस वक़्त ''सखाराम बाइंडर''जैसा बोल्ड नाटक लिखना /मंचन एक लीक से अलग और एक साहस का काम था !उनके नाटक समाज की विसंगतियाँ ,वर्जनाओं,शोषण के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाते हैं!जात ही पूछो,शांतता कोर्ट चालू अहे ,और बेबी ,घासी राम कोतवाल आदि उनके चर्चित और ख्यातिप्राप्त निर्देशकों की पसंद रहे !गौरतलब है कि सुप्रसिद्ध अभिनेता/लेखक श्री गिरीश कर्नाड लिखित नाटक ''तुगलक'(मूल कन्नड़)का उन्होंने हिंदी रूपांतरण किया था जो अद्वितीय था,राष्ट्रीय नाट्य विद्ध्यालय के तत्कालीन निर्देशक श्री बी एम् शाह ने इसका निर्देशन किया था ,संयोगवश अभिनय का अवसर….अद्भुत निर्देशन,अद्भुत अनुवाद …!अच्छा लेख धन्यवाद प्रज्ञा जी …धन्यवाद प्रभात रंजन जी

  3. बढ़िया लेख…तेंदुलकर समाज की तह में चलने वाले बहुत से प्रक्रियाओं को सहजता से देख लेते थे जिनकी तरफ़ आम जनता का ध्यान नहीं जाता. इन्हीं सच्चाईयों को नंगा करने के कारण उनका विरोध हुआ क्योंकि इस सत्य को पचाना और पहचानना असुविधाजनक था. आज भी ये सत्य हमारे भीतर मौजुद है लेकिन तेंदुलकर जैसा साहसी नाटककार नहीं.

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