आशुतोष भारद्वाज की कहानी ‘मिथ्या’

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 आज आशुतोष भारद्वाज की कहानी. उनकी कहानी का अलग मिजाज़ है. जीवन की तत्वमीमांसा के रचनाकार हैं वे. वे शब्दों को लिखते नहीं हैं उसे जीते हैं, उनकी कहनियों में जीवन की धड़कनों को सुना जा सकता है. कश्मीर के परिवेश को लेकर एक अलग तरह की कहानी है ‘मिथ्या’, होने न होने का भ्रम लिए.

                               
मृत्यु से पहले मृत्यु की आंखें आती होंगी। तुम्हें घूरेंगी, तुम्हारी बाह झकझोरने लगेंगी। तुम भीगा चेहरा, नामालूम भय या पसीने से, तीन रजाई की तहों से बाहर निकालोगे — हरी लकड़ी का हिलता दरवाजा, रात भर सुलगते रहने के बाद बुझी बुखारी, सफेद ठोस झील पर ठहरी नाव, कांच पर औंधे गिरे कोहरे से परे बर्फ से चुआते पहाड़ … और मेज पर जलते चिनार की लकड़ी के लैंप तले बिखरे ढेर सारे कागज। तुम रोज की तरह लैंप बंद किये बगैर रजाई में कुकड़ गये थे कि पाच मिनट बाद फिर से बैठ जाओगे।
अपना भीगा बदन संभालते तुम उठोगे। तुम्हें सर्दियों में भी बहुत पसीना आता होगा। लातें पिंडलियों में बिलखती होंगी, हाथ उंगलियों को टटोलेंगे, पीठ सिमट कर जांघों में समाने लगेगी — क्या यह बांह तुम्हारी ही है? और आखें? वही जो बिस्तर में जाने से पहले थीं या पिछले चार घंटों में तुम्हारे अंग एक नयी काया में अपने को कहने की जुबान सीख गये हैं? फर्ज करो अचानक से तुम्हें एहसास कुलबुलाये यह देह तुम्हारी नहीं तुम महज इसके चौकीदार हो? यह हाथ कहीं से आ अचानक धड़ से अटक गया है और टांगे जो रोज तुम्हें ढोती हैं दरअसल इस शरीर में किरायेदार सी रह रहीं हैं?
साल की इन अखीरी-अशरीरी सुबहों में तुम्हारे शरीर को खुद पर ही भरोसा नहीं।
भरोसा तो तुम्हें अपने शब्द पर भी नहीं। इस पर भी नहीं कि वह बूढ़ा जिसके लिये, जिससे भागकर, तुम यहां आये होगे जो यहां से चैबीस घंटे दूर इस वक्त सो या अपनी डैस्क पर उॅंकड़ू बैठा कागज सुर्ख कर रहा होगा, वह वाकई अपने अखीरी दिनों में होगा भी या नहीं। लेकिन फिर भी तुम मानना चाहोगे मान भी लोगे वह अपनी मौत की ओर उसी गति से सरक रहा होगा, जिस रफ्तार से तुम्हारे शब्द। कौन पहले पहुंचेगा वहा — वह बेलौस बेखौफ बूढ़ा या तुम्हारे अचकचाते असमय अक्षर? बर्फीली झील पर टिकी इस लकड़ी के नाव के घर में समूचा संघर्ष महज इतने से बित्ते पर सिमट आयेगा — तुम्हारे शब्द उस बूढ़े की मौत से मुखातिब, मुंतजिर होंगे।
तुम अब उठ रहे होगे, उनी मोजे और मोटा फिरन पहनोगे जो दानिश भाई ने तुम्हें दिये होंगे, तुम्हारे गर्म कपड़े इस शहर में आ बेकार हो गये होंगे। तुम बुखारी का ढक्कन हटा बुझी लकड़ियों को फूंक मारोगे, गर्म हवा छत तक जाते लोहे के पाइप से होती बाहर फुड़फुड़ायेगी, काले चकत्ते पूरे में बिखर जायेंगे — रत्ती भर आंच नहीं। सभी लकड़ियां दो घंटा पहले ही खाक हो चुकी होंगी।
थर्मस में रात का बचा गर्म कहवा कप में डाल तुम हाउसबोट के डैक पर आ जाओगे, मेज पर बिखरे कागजों पर पिछली रात की लिखावट निगाहों से छुलाते हुये।
रोशनी नहीं उतरी होगी बाहर अभी। लेकिन अंधेरे में भी कांच की झील पर बर्फ की बारीक परत चमकती रहेगी। तुम्हें पानी पर ठहरी हाउसबोट लकड़ी की रेलगाड़ियों सी लगेगी जो झील की पटरियों पर आ ठहर गयीं हैं किसी ने इनकी चैन खींच इन्हें यहां हमेशा को रोक दिया होगा इस झील पर समय की जुंबिष को थाम लिया होगा। इन घरों की रंगीन बत्तियों पर टंगी बर्फ की गीली सफेदी में समय कैद हो चुका होगा।
तुम्हें अचानक लगेगा इन रेलगाड़ियों से घिर चुके हो, विशाल डायनासोर की तरह वे तुम्हें कुचलने आ रही हैं…. तुम जमी हुई झील पर बचते-फिरते भाग रहे होगे लेकिन कोई कहीं से बचाने नहीं आयेगा — यहां है ही कौन जो तुम्हारी चीख सुनेगा। ये डायनासोर अपनी सूंड़ में तुम्हें लपेट घुमा कर जोर से दूर फेंकेगे, तुम वहीं जा गिरोगे जहां वह बूढ़ा मर रहा होगा।
क्या वह वाकई मर रहा होगा, वह बूढ़ा? अगर हां भी तो क्या वैसे ही जैसे तुम लिख रहे हो? पिछले पंद्रह दिनों में तुम उसकी देह पर दर्जनों खूनी घाव भौंक चुके होगे, न जाने कितनी जगहों पर घेर कर अपने फंदे में फंसाया-मारा होगा उसे, कई कई तरह से उसे अपने पन्नों में लड़खड़ाता, लुढ़कता, कराहता, मरता हासिल कर चुके होगे — कई ड्राफ्ट तैयार तुम्हारे पास। जिस तरह तुम अपनी कहानियों और उनके किरदारों की संभावनाओं से जूझते हो, उस बूढ़े का अनेक मुद्राओं में गला घोंट रहे होगे। सोते से नहीं उठ पाया, लंबी बीमारी ;हांलांकि तुम्हें उसकी बीमारी के बारे में कुछ नहीं पता, उसकी अंतिम प्रकाशित डायरियों में उसने अपनी अच्छी सेहत का जिक्र किया है. अस्पताल में अंत, अपने अखीरी उपन्यास से लड़ते हुये डैस्क पर ही कुछ देर पलक ठहराने को सिर झुकाया और अपने ही शब्दों की कुंआरी कराहती कब्र में सरक गया, महीने भर से कुछ न लिख पाने की जलालत न झेल पाने से अपना बूढ़ा सिर गुसलखाने के नल में दे मारा, सुबह पार्क में टहलने गया पेड़ पर रस्सी डाल लटक गया…
बहुत संभव है लेकिन वह अपनी मौत में भी तुम्हें मात दे जायेगा। उसकी आखिरी हरकत भी तुम्हें हैरान छोड़ जायेगी।
तुम जमी हुई झील के बीच उभरे सफेद चिनार को ताकते रहोगे जो सर्दियों से पहले ही अपनी पत्तियां झरा आया होगा। विचित्र झील है यह कितनी वनस्पति, वृक्ष इसकी सतह पर पलते हैं। कई साल पहले जब तुम पहली बार यहां आये थे, गर्मियों में, पानी पर हिलते हुमकते पौधों को देख चैंक गये थे। लकड़ी के घर इस झील पर तैरते थे लंबे रंगीन चोगे पहने गुलाबी गालों वाली गुलगुली लड़कियां छोटी नावों को नन्हे चप्पुओं से खेती अपने बड़ी नाव वाले घर तक आती थीं, घर के पिछले कमरे से आगे आंगन तक आने के लिये फिर नाव लेती थीं। इन सर्दियों में लेकिन नाव चुप खड़ी रहेंगी हैं थूथन झुकाये कई मवेशी कतार में बांध दिये गये हों। लोग नीचे मैदानी इलाकों में चले गये होंगे सिवाय एक अकेला लंगड़ा बूढ़ा होगा यहां जिसके एक दांत पर सोने की परत चमकती रहेगी जो अपने नाव के घर की दहलीज पर खड़ा इंतजार कर रहा होगा अपने उस बेटे का जो गर्मियों से गायब होगा जिसकी खुष्क प्रतीक्षा पर यह बर्फ ठंडी परतें छोड़ती जायेगी।
क्या यह बूढ़ा भी उस हजार मील दूर रहते बूढ़े की तरह अकेला मर रहा होगा? या यह बूढ़ा महज तुम्हारा भ्रम है, कोई बूढ़ा नहीं बचा है इन सर्दियों में इस झील पर; जिस बूढ़े से तुम हफ्ता भर पहले जलते अलाव के किनारे एक शाम मिले होगे, जिसकी हाउसबोट में तुम देर रात बैठे षहद मिले तंबाखू का हुक्का पीते रहे होगे जिसने तुम्हें अपने खोये बेटे की सोयी कहानी सुनाई होगी, जिसने बताया था कि इस साल घाटी में सिर्फ लहू उतरा कोई सैलानी नहीं, उसकी हाउसबोट खाली रही आयी, वह महज तुम्हारी कल्पना होगी तुम दरअसल किसी से नहीं मिले होगे तुम इस उजाड़ में अपने भीतर के डर से उबरने के लिये किसी को गढ़ना चाहते होगे और तुमने इस बूढ़े और उसके बेटे को गढ़ दिया होगा जैसे अपनी कहानियों के किरदार रचते होगे।
कुछ भी हो सकता है यहां। इस झील पर कुछ भी संभव। लेकिन वह बूढ़ा फितूर नहीं, वह वाकई मर रहा होगा, कम अस कम तुम्हारी कल्पना में तो मर ही रहा होगा। तुम हाउसबोट की बालकनी से अंदर कमरे में आ जाओगे। मेज पर बिखरे पन्ने, मेज के उपर बूढ़े की बड़ी सी तस्वीर जिसे तुमने उसकी ही किसी किताब के पिछले पन्ने से काट गत्ते पर चुपका लिया होगा।
आपने जीते में तो मुझे चैन से रहने नहीं दिया, अब मर तो आराम से जाओ।
तस्वीर में उसके होंठ बंद होंगे, वह अपनी ठोड़ी हथेली में थामे बैठा होगा। उसे नहीं, किसी को भी नहीं, मालूम तुम उसकी मौत को लिख रहे होगे कि तुम इस मौत को लिखने अपने शहर से चैबीस घंटे दूर इस बर्फीली घाटी में आ गये होगे, जहां इस झील पर कोई नहीं। सिवाय तुम्हारे और बूढ़े नाविक दानिश के जो तुम्हें दिन में दो बार खाना और कहवा देने लाल चैक से आये करेगा, चला जाया करेगा। और अपने बेटे की प्रतीक्षा करता वह बूढ़ा जिसके बारे में तुम्हें अभी भी नहीं मालूम वह तुम्हारा फितूर तो नहीं।
तुम अपनी डायरी खोलोगे, टेबिल लैंप के नीचे। चार महीने पहले दर्ज इबारत —
23अगस्त 2010। दिल्ली। रात 1.43। और कहां, अखबार का खाली दफ्तर।
परसों कार से आगरा जाते में एक एंबुलैंस साथ चल रही थी। नहीं, मैं ही अपनी गति उसके साथ रख रहा था। आगरा के ही नंबर की गाड़ी थी। पीछे बैठा आदमी रोती औरत को संभालता था। पोल पर टॅंगी ग्लूकोज की बोतल से निकली नलियां लहराती थीं। मेरी कार बहुत नजदीक आती तो कोई चादर ओढ़े भी दीख जाता था। औरत के बिलखने और ढकी सफेद चादर से लगता कोई मुर्दा है। लेकिन फिर नलियां क्यों लटक रहीं थीं?
अगर अस्पताल से मुर्दे को ला रहे होंगे तो बोतल क्यों लटकी होंगी? लेकिन हो सकता है आगरा से दिल्ली इमरजैंसी में ले जा रहे हों और वह रास्ते में ही खत्म हो गया हो और अब उसे लौटा ले जा रहे हों।
अगर मैं किसी की देह, अपने की देह, कार की पिछली सीट पर लेकर अपने शहर इसी तरह लौट रहा हॅूं तो? कितना तेज चलाउॅंगा — नहीं, बहुत धीमे कि पीछे लेटा वह लुढ़क न जाये। शायद पहले उसे सीट से बांध दूंगा। लेकिन क्या इस आखिरी यात्रा पर उसे पिछली सीट पर रहने दूंगा, हो सकता है उसे अपने बगल की सीट पर बिठा कर लाउॅं, बार-बार उसकी देह को संभालता। कई सौ किलोमीटर की यात्रा — मैं स्टेयरिंग पर, मेरे बाजू एक देह।
मुझे डर भी लगेगा उसके अंग सिकुड़ने न लगें, बर्फ की सिल्ली बिछा दूंगा।
बगल चलती गाड़ियों को पता चलेगा क्या? आंखों पर चश्मा पहना दूंगा, मुर्दे की शायद आंखें ही सबसे पहले बदलती हैं। लेकिन चेहरा? क्या मृत व्यक्ति के अनुभावों में कुछ ऐसा होता है कि उसका भेद जीवित इंसान से किया जा सके? नकाब तो पहना नहीं सकता। उसके बगल की सीट पर तौलिया टांग दूंगा। टोल टैक्स पर लेकिन? अपनी ओर का शीशा थोड़ा सा खोलूंगा बस, छुट्टे पैसे पहले ही रखूंगा।
रास्ते में हो सकता है कोई शवयात्रा गुजर रही हो, तो क्या उन सबसे कहूंगा मुझे और मेरे मुर्दे को भी साथ ले चलो।
अगर रास्ते में मेरा एक्सीडैंट हो गया, कार चकनाचूर हो गयी, मैं मारा गया तो? मुर्दा थोड़े मरेगा लेकिन। लोगों को, राहत को आई हाईवे पुलिस को लेकिन यही लगेगा कि दो लोग मारे गये एक्सीडैंट में। यानी वह दो बार मारा जायेगा। नहीं मरेगा तो एक ही दफा, दूसरी मर्तबा तो महज मरा हुआ समझा जायेगा।
और अगर यह पूरा दृश्य दिन के बजाय रात में हुआ तो?
तुम डायरी खुली छोड़ दोगे। गर्म टोपी उतार बाल उंगलियों में जकड़ खींचने लगोगे। चार बाल उखड़ हाथ में आ भी जायेंगे। गिटार के तार से इन लच्छों को तुम टेबिल लैंप के नीचे ले जाओगे। सामने बिखरे पन्ने बौखलाये बौराये बदहवास तुम्हें देख रहे होंगे। तुम पिछले कई सालों से लैपटाॅप पर लिख रहे हो लेकिन यहां कोरे कागज ही लाये हो कि तुम्हें उस बूढ़े पर, नहीं बूढ़े पर नहीं उसके काम पर तो तुम्हारी कभी कुछ लिख पाने की हस्ती या हैसियत या औकात ही नहीं थी तुम तो महज उसकी मौत पर लिख रहे हो, लिखना है जो लिखता मिटाता कागजों के ढेर अपने कमरे में बिखेरता रहा होगा।
क्या यह आसान रास्ता? न तो तुम उसके काम पर लिख पाये न ही कोई ऐसी कहानी जिसे तुम उसे दिखला सको तो तुमने तिकड़म भिड़ाई कि उसकी संभावित मौत पर पहले ही एक मृत्युगीत तैयार कर रख लो जिसे उसकी मौत के तुरंत बाद कहीं प्रकाशित होने भेज सको और भले ही तुम्हारा अब तक का काम कचरे की पोटली हो लेकिन उस बूढ़े पर तुम्हारी यह पंक्तियां दुनिया का महानतम बिदाई गीत मानी जा सकें।
तुम दुनिया भर की भाषाओं में लिखे गये ढेर सारे शोकगीत और शोकगद्य भी इस बीच पढ़ते रहे होगे कि किसी के मरने के बाद उसे कैसे याद किया जाता होगा लेकिन क्या कोई तुम्हारी तरह भी रहा होगा जिसने किसी की मौत से पहले ही लिख दिया होगा।
क्या यह कुत्सित क्रूरता? तुम्हारे ही शहर में रहते जिस बूढ़

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