किस तआल्लुक का सिला देता है

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नसीम अजमल मूलतः गणितज्ञ हैं, फज़ी लॉजिक के विद्वान. लेकिन उर्दू शायरी में उनका अपना ही मुकाम है. अपना बयान, अपनी पहचान. हिंदी वाले उनकी शायरी के रंग खूब पहचानते हैं. एक ऐसा शायर जिसने अपने अहद को उदास होने के अंदाज़ सिखाए. पेश हैं उनकी ताज़ा ग़ज़लें– जानकी पुल.

१.
चांद तारों को जिया देता है
मुझको मुझसे वो मिला देता है.
यूँ भी होता है कभी रात गए
यक-ब-यक मुझको जगा देता है.
आँख खोलूं तो वो हँसता है बहोत
ख्वाब देखूं तो डरा देता है.
छिपता फिरता है निगाहों से मेरी
दर्द भी कितना बड़ा देता है
उससे पूछूं जो कभी उसका पता
अपनी आवाज़ सुना देता है.
यूँ गुजरता है मेरी जान से वो
फूल सहरा में खिला देता है.
याद रखता है हर इक वक्त मुझे
वक्त आने पे भुला देता है.
फूंक देता है मेरे दर्द में रूह
रूह में दर्द छुपा देता है.
हर शबे-तार नए ख्वाब की ओस   १. सियाह रात
मेरी पलकों पे सजा देता है.
जब भी गिनता हूँ दिल के ज़ख्मों को
इक नया फूल खिला देता है.
और बहुत दूर गुज़रगाहों से
एक कंदील जला देता है.
२.
वो समंदर से सदा देता है
आग पानी में लगा देता है.
ढूंढने वाला उसे आठ पहर
बेकरानी की सदा देता है.
हर कदम बेश है वो नक्श-ए-कदम
पांव इमकां के हिला देता है.
क्या तमाशा है मेरा जौक-ए-नमूं   १.प्रकट होने का उत्साह
चुटकियों में जो उड़ा देता है.
दश्त-ए-आफलाकके सब संग-ओ-शज़र  २. आसमानों के जंगल
मेरी राहों में सजा देता है.
दूर उफक पार मेरे दिल के लिए
एक तस्वीर बना देता है.
कितना ख्वाहाँ है चमन रेजी का
मुट्ठियों भर जो हवा देता है.
खौफ देता है मुझे वक्ते-दुआ
किस तआल्लुक का सिला देता है.
मुझको लुढ़का के पहाड़ों से कहीं
कहकहा एक लगा देता है.
फिर बुला कर वो मुझे हश्र के दिन
फैसला अपना सुना देता है.
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