हिंदी में हंसना अंग्रेजी में हंसने से अलग है

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उत्तर आधुनिकता के विद्वान सुधीश पचौरी जिस विषय पर लिखते हैं उसका एक नया ही पाठ बना देते हैं- हमारे जाने समझे सबजेक्ट को हमारे लिये नया बना देते हैं- उदहारण के लिए सरिता_मार्च (प्रथम अंक) व्यंग्य  विशेषांक में प्रकाशित हंसी पर यह लेख. आपके लिए प्रस्तुत है- जानकी पुल. 
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हंसना एक जादू है. वह विकसित मानव की सांस्कृतिक क्रिया है. सांस्कृतिक भेद से हास्य भेद होता है. हर संस्कृति अपने ढंग से हंसा करती है.  
हिंदी में हंसना अंग्रेजी में हंसने से अलग है. हिंदी वाला हंसता है तो जोरदार ठहाका मार के हंसता है. कोई कोई तो ताली मार के हंसने लगता है. अंग्रेजीवाला हंसता है तो अपनी  मुस्कान का हिसाब  लगाकर हंसता है. सोच सोच कर हंसता है कि कब कितना हंसे! वह किसी कंजूस की हंसी है. हिंदी में कवि अपने ढंग के हंसी के कंजूस हैं. वे हंसने हंसाने वालेां पर क्रोधित होते हैं, उन्हें  अपने से नचा विदूषक-जोकर कहा करते है. लेकिन ऐसे में फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ के गाने की वह लाइन याद आती है जिसकी एक लाइन कहती है- 
‘कहता है जोकर सारा जमाना
आधी हकीकत आधा फसाना
संस्कृत में दरबारों में विदूषक हुआ करते थे जो राजा और सभासदों के मनोरंजन का माघ्यम होते थे. वे हाजिरजबाव और राजा के मूड को भांप कर चलते, उसके बहकने पर उचित और प्रिय कटाक्ष करके उसे पटरी पर लाने वाले हेाते. उसकी रीति नीति पर द्वयर्थक बोलते जिसमें एक अर्थ में तारीफ रहती. दूसरे अर्थ में निंदा रहती. समझदार को इशारा काफी होता. वे जनता का पर्याय होते. ऐसे विदूषक कलाकार होते. अंग्रेजी में क्लाउन कहलाए. हिंदी में विदूषक. वे हर राजतंत्र में रहे दुनिया भर में रहे. उनका काम रीतिनीति में दूषण को बताने का रहता. वे उसे विशेष ढंग से बताते, इसलिए विदूषण कहलाए.

इस तरह विदूषक का काम बडा कठिन रहता. हर समय तलवार की धार पर चलने जैसा होता. कालंतर में यह मुसाहिबी ओर आधुनिक काल में चमचागीरी  में बदल गया. चमचा आज का विदूषक होता है ओर देखा जाए तो सब एक दूसरे के चमचे हेाते हैं, इसलिए जो विदूषक पर हंसते हैं. वे उससे जलते हैं. विदूषक का  हास्य के बिना काम नहीं सरता. किसी को कुछ कहना ज्यों ज्यों कठिन होता गया होता उतना ही चुनौती भरा विदूषक बना होगा. बिना भाषा और संचार दक्षता के अच्छा विदूषक संभव नहीं. विदूषक समाज और सत्ता के बीच पुल हेाता है. हास्य इस पुल की सबसे बडा रस्सी हेाती है. कठिन बात भी चुभनेवाली बात भी हंसकर कही जाए और सुनने वाले में हंसी का भाव पैदा करती हो तो सहने योग्य ही नहीं आंनदकारी हो जाती है. हास्य प्रसन्न करता है. प्रसन्न व्यक्ति ही हास्य पैदा कर सकता है. प्रसन्न हेाना अपने आप में स्वायत्त होना है. हंसने हंसाने के लिए एकदम स्वायत्त होना जरूरी होता है अगर हास्य-कलाकार विदूषक स्वायत्त नहीं हुआ तो भृत्य हो जाता है चमचा हो जाता है और बेकार हो जाता है.
हंसी सबको प्रसन्न करती है. वह हर्षित करती है.विषाद दूर करती है. गोस्वामी तुलसी ने कहा है-
आवत ही हरषे नहीं नैनन नाहिं सनेह!
तुलसी तहां न जाइए चाहे कंचन बरसे मेह!!
हंसने की क्रिया ‘हर्ष का अपभ्रंश है. हर्ष के साथ सनेह न हो तो हंसी का मतलब उलट जाता है हंसी इसी मानी में दुधारी तलवार है. हंसी में स्नेह न हुआ तो वह काट खाने  वाली बन जाती है. महाभारत में एक बार कौरवों पर द्रौपदी हंस दी कि ‘अंधे के बेटे अंधे  ही होते हैं’. इतनी सी  बात पर  महाभारत हो गया. हंसी हंसाती नहीं है तो रुलाती है. हंसी में कटाक्ष की तिक्तता आई हंसी जहर बन जाती  हैं. वह अपनी सीमा से आगे निकल जाती है. और हंसी की जगह क्रोध पैदा करने लगती है. जो हंसी नहीं सह पाता वह तुच्छ होता है. हंसी सहने के लिए हंसने वाला कलेजा चाहिए. आज समाज में अगर हंसी बढ रही हैं तो इसीलिए कि हंसने वाले कमतर होते जा रहे हैं. हंसना एक गुण है वह मनुष्य के विकसित स्वभाव का द्योतक है. यह हरेक के पास हो सकता है कोई इसे खो देता है कोई सहेज कर रखता है.
हंसी समाजभेद से अपने अर्थ और भूमिका  बदलती है. वह सहज सामाजिक क्रिया है.
बडे आदमी की हंसी छोटे की हंसी से अलग हेाती है. बडे की हंसी के लिए बडा होना होता है छोटे को हंसने के लिए अलग से कवायद नहीं करनी पडती. उस पर सब हंसते रहते हैं वह इसी बात पर हंसने लगता है. वह किसी के हंसने का बुरा नहीं मानता. वही महान है जो किसीके हंसने का बुरा नहीं मानता. उस पर हंसने वाला उसकी सहनशक्ति देख खुद हास्य का पात्र बन जाता है.
जो कमजोर पर हंसते हैं वे कमजोर से डरकर हंसते हैं. उनका वे किसी का अपने पर हंसना नहीं सह सकते. कमजोर पर हंसना  आसान है. वह ताकतवर की ताकत को बढाता है लेकिन ताकतवर पर हंसना ताकतवर को कमजोर करना है इसीलिए ताकत के पुजारी हंसते हुए नहीं दिखते . वे अटठहास के स्वामी हेाते हैं. अठठहास डराता है किसी को हंसाता नहीं है.
हंसी आम आदमी का फ्री का जनतंत्र है. हंसते हुए कोई बडा छोटा नहीं होता. .इस बराबरी से डरकर बडा आदमी खुल कर हंस नही पाता है. हंसी सचुमच का सांस्कृतिक जनतंत्रा पैदा करता है जिसमें हंसते वक्त सब बराबर सब अपने से लगते हैं. हास्य सबसे बडा सिविल स्पेस है. हंसी के फूल यहीं खिलते हैं. समाजों के  विकास के पैमाने में खुशी की जगह हंसी को भी शामिल किया जाना चाहिए. खुशी उपभोग निर्भर हो सकती है, लेकिन हंसी मूड निर्भर है. खुश आदमी हंसे ये जरूरी नहीं लेकिन हंसने वाला खुश ही दिखता है. वैसे भी ‘हँसी-खुशी एक साथ आते हैं.
हँसी सबको मुक्त करती है. एक हंसी, एक किलकारी, एक चुहल, एक ताली, एक चुटुकला बोझिल जीवन केा हल्का कर जाते हैं.
हंसी विकसित ज्ञानावस्था का प्रमाण है. यह कभी भी बन सकता है. हंसना सहज है और कला भी है. हंसना अहेतुकी भी होता है और सहेतुकी होता है. किसी को नीचा दिखाने के इरादे से हंसना अपराध है उसमें हिंसा है, लेकिन किसी को हंसी हंसी में कुछ प्रबोधना  निर्मल संचार है.
हंसी सर्वाधिक सामाजिक क्रिया है. वह समाज को निरेाग करती है इसीलिए इन दिनों महानगरों  में हास्य क्लब बन चले हैं. जहां लोग इकठ्ठे होकर सुबह शाम सामूहिक हंसी हंसते रहते हैं वे बेहतर महसूस करते हैं. जब जबर्दस्ती हंसना इतना उपयोगी है तो सहज हंसी तो अमृत है. 
हंसने वाला किसी हाल में  हंस सकता है. कबीर में हंसी है तलसी में हेसी है वे जगत पर हंसते हैं इसके मिथ्यात्व पर हंसते हैं. वे अंहकार पर हंसते हैं. अहंकार पर हंसना ताकत पर हंसना है. हंसना एक चितवृत्ति है, एक मनोदशा है जो हरेक के पास होती है लेकिन जिसे रोजमर्रा की तनाव भरी जिंदगी में दबाए रखा जाता है.
आप हंस दीजिए और समस्या हल्की हो उठती है. जीवन का प्रबंधन आसान हेा उठता है. थ्री ईडियटस या मुन्ना भाई सीरीज की फिल्में यही बताती है कि हंसते हंसते पढना पढाना सबसे बडी शिक्षण प्रविधि है,  पेडगोगी है. बच्चे खेलते हुए हंसते हैं, हंसते हुए खेलते हैं. खेलना सीखना है. हंसी उत्साह की जनक है. सक्रियता का दरवाजा है.
लगातार तनाव झेलते लोगों से डाक्टर कहते हैं कि जरा हंस लिया करो. हंसोगे दवाई कम खानी पडेगी. जल्दी ठीक हो जाओगे. मेडिकल वाले आजकल हास्य को इलाज की तरह बताते हैं. हास्य दवा से सवाया है. हंसने से दैहिक दैविक भौतिक ताप तीनेां कट जाते हैं !
भारत में दो तरह की हंसियां हैं. एक देसी हंसी दूसरी फिरंगी हंसी .फिरंगी हंसी हिंदी से भिन्न होती है. फिरंगी  समझता  है कि वह अब भी दुनिया का राजा है और अगर वह हंसेगा तो लेाग उसे भी लल्लू पंजू समझलेंगे. अगर वह जोर से हंसेगा तो उसका रुतबा खत्म हो जाएगा.
इन दिनों वह हमारी आजादी हमारी भीडों और गंदगी को देखकर हंसता है अगर सारे हिंदुस्तानी एक साथ एक दिन फिरंगी लोगेां पर हंसने लगे तो फिरंगी का सारा रुतबा काफूर हेा जाएगा उसे समझने के लिए रिसर्च करनी पडेगी कि सवा अरब लेाग एक साथ कैसे हंसने लगे. हमारी अंनत हंसी सुनकर फिरंगी हंसना भूल जाएंगे. उनके हंसने का अर्थ बदल जाएगा. हंसने की नई थियरी यहीं से निकलेगी जब वे जंगली थे जब प्लेटो जनाब अपने ‘रिपब्लिक’ से कवियेां को बहिष्कृत कर रहे थे तब यहां कि भरत मुनि अपने नाटयशास्त्र में हास्य रस को आठ रसों में शामिल कर रहे थे. हास्य रस की थियरी दे रहे थे. 
इसलिए भइए जब हिंदी वाला हंसे तो सावधन हो जाओ. समझ लेा कि कहीं गडबड है.
हिंदी वाला हंसता है तो रुतबे की ऐसी तैसी करके हंसता है. न अपने रुतबे की परवाह करता है दूसरे की की परवाह तो करता ही नहीं.
हिंदी में हजारों किस्मों से हंसा जाता है. हास्य के दस प्रकार तो पंडितो ने ही बताए हैं आप सैकड़ों और जोड सकते हैं. आप सिटकाम की हँसी से लेकर स्टेंडअप कामेडियन की कामेडीज  तक को जोड सकते हैं. आप रिकार्डड हंसी और उसके बिजनैस को जोड सकते हैं हंसी इन दिनों एक बिजनेस  है. जोक्स की फेक्ट्री खुली हुई हैं. चुटकुलों के सिंडीकेट हैं. उनमें औरतों पर जोक्स होते हैं जो मर्दवादी नजरिए वाले होते हैं, औरतों की कीमत पर हेाते हैं. नेताओं पर होते हैं. बिजनैसमेनों  पर होते हैं. नौकर शाहेां पर होते हैं. पब्लिक डोमेन में, साइबर डोमेन में सलीब्रिटीज पर हेाते हैं अब तो टिवटर पर फेसबुक पर हरेक के उपर हर प्रकार का जोक बनते रहते हैं. कमियों पर हंसना सुघरकार्य है.
हास्य का भरा पूरा बाजार है. हिंदी टीवी चैनलों पर जाइए तो दर्जनों लेाग हर वक्त ठठा कर हंसते दिखते हैं  उनके पीछे रिकार्ड हंसाते रहते हैं. अपनी अति पर जाकर हंसी फूहडता में बदल जाती है. हंसने का बिजनेस होगा तो हंसी अश्लीलता की ओर जाएगी ही.
हंसी का बिजनेस से बैर है. वह निर्व्याज दान है. बिजनेस हेा जाने के बाद आप किसी फिल्मी कामेडियन की तरह बन सकते हैं. लेाग आपकेा हास्यावतार मान सकते हैं.आप जानी वाकर महमूद या मोहन चोटी या सतीश शाह या टीवी कलाकार अर्चना पूरन सिंह की तरह बन  सकते हैं. कामेडी टीवी शेा की परमानेंट हेा चलीं अर्चना पूरन सिंह और सलमान के एक बेराजगार भाई स्टैंडअप कामेडियनों के आने मात्र तक पर हंसने लगते हैं. अर्चना पूरन सिंह के मुंह से हर समय हो हो घ्वनि निकलती है. हो हो मुँह खुला रहता है जैसे हास्य का मच्छर घुसता है हंसी हंसने लगती है. उन्हें देखकर दर्शक हंसने लगते हैं जबर्दस्ती का हंसना जोकर होना है.हंसाने का यह भी एक तरीका है. हास्य के साथ व्यंग्य मिला रहता है.व्यंग्य सहेतुकी होता है.
हिंदी में हास्य रस की कमी होती दिखती है.एक जमाना था जब सारे साहित्यकार हास्य व्यग्ंय से ही अपनी साहित्यक यात्रा तय करते थे भारतेंदु के नाटकों में हास्य मिलता है जो आज भी प्रमुदित करता है. प्रतापनारयण मिश्र और बालमुकुंद गुप्त के चुटीले हास्य से आज भी सीखा जा सकता है कि किस तरह ताकतवर पर हंसते हुए उसे कमजेार किया जा सकता है. हिंदी में हास्य कविता का इतिहास पुराना है. निराला से लेकर नई कविता के कवि भारतभूषण अग्रवाल और प्रभाकर माचवे की हास्य कविताएं मिलती है. उर्दू में अकबर इलाहाबादी,  हिंदी में बेढब बनारसी, गोपाल प्रसाद व्यास, काका हाथरसी की कविताएं आज भी हंसाती हैं. अशेाक चक्रध्रर, हुल्लड बीकानेरी और दर्जनों कवियां की  हास्य कविताएं बडी लोकप्रिय हैं. हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल और मनोहर श्याम जोशी की गद्य रचनाएं हास्य व्यंग्य का अनूठा उदाहरण हैं. आज हास्य व्यंग्य अखबारों में पत्र-पत्रिकाओं में अपेक्षाकृत कम मिलता है लेकिन उसकी मांग बढ रही है. हास्य-व्यंग्य लेखन का बाजार बढ रहा है.
हम तो कहेंगे इस देश में एक दिन हास्य का होना चाहिए, जब अखिल भारत पूरे दिन सिर्फ हास्य का समारेाह करे. अगर ऐसा हुआ तो हिंसा कम हो जाएगी. आतंकवाद मर जाएगा. हमारे मनहूस राजनेता संसद में हंसकर बहसें किया करेंगे. समाज का क्रोध-क्षोभ  कम हो जाएगा.
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3 COMMENTS

  1. आदरणीय सुधीश पचौरी जी के प्रति पूरे सम्मान के बाद ये अर्ज़ करना चाहूंगा कि हँसना हर्ष का अपभ्रंश है – ऐसा कहना ठीक नहीं.. संस्कृत में हस्‌ धातु है जिससे हसति आदि क्रियाएं बनती हैं.. हँसना की व्युत्पत्ति वहाँ है.. और हर्ष की उतपत्ति हृष्‌ धातु से बताते हैं.. हर्ष का मूल अर्थ रोंगटे आदि खड़े हो जाना है.. कामोत्तेजना के लिए भी हर्ष शब्द का इस्तेमाल किया जाता है.. और बहुत अधिक प्रसन्नता के लिए भी आजकल हर्ष का प्रयोग होता है..ये अर्थविस्तार का मामला है..

  2. बहुत बढ़िया ..सचमुच हिंदी में हसना और अंग्रेजी में हसने में बड़ा फर्क है .में तो कबी -कभी अपने बच्चो से भी पूछती हूँ -क्या तुम इंग्लिश में हंस रहे हो

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