थी. हूं..रहूंगी

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वर्तिका नंदा का नाम किसी परिचय की आवश्यकता नहीं रखता. पत्रकार के रूप में उनका नाम जाना-पहचाना है. लेकिन एक संवेदनशील कवयित्री के रूप में उनको लोग कम जानते हैं. अभी हाल में ही महिला अपराध पर केंद्रित उनकी कविताओं का संकलन आया थी. हूं..रहूंगी…’. राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक के बारे में यह अलग से बताने की आवश्यकता नहीं है कि हिंदी में यह अपने ढंग का पहला ही कविता-संकलन है. प्रस्तुत है उसी संग्रह की कुछ कविताएँ वर्तिका नंदा के वक्तव्य के साथ- जानकी पुल.
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यह पहला मौका है जब कविता की कोई किताब पूरी तरह से महिला अपराध के नाम है। सालों की अपराध की रिपोर्टिंग का ही यह असर है कि अपराध पर कुछ कविताएं लिखी गईं। मेरे लिए औरत टीले पर तिनके जोड़ती और मार्मिक संगीत रचती एक गुलाबी सृष्टि है और सबसे बड़ी त्रासदी भी। वह चूल्हे पर चांद सी रोटी सेके या घुमावदार सत्ता संभाले – सबकी आंतरिक यात्राएं एक सी हैं। इस ग्रह के हर हिस्से में औरत किसी न किसी अपराध की शिकार होती ही है। ज्यादा बड़ा अपराध घर के भीतर का जो अमूमन खबर की आंख से अछूता रहता है। यह कविताएं उसी देहरी के अंदर की कहानी सुनाती हैं। यहां मीडिया, पुलिस, कानून और समाज मूक है। वो उसके मारे जाने का इंतजार करता है और उसके बाद भी कभी-कभार ही क्रियाशील होता है। हां, मेरी कविता की औरत थक चुकी है पर विश्वास का एक दीया अब भी टिमटिमा रहा है। दुख के विराट मरूस्थल बनाकर देते पुरूष को स्त्री का इससे बड़ा जवाब क्या होगा कि मारे जाने की तमाम कोशिशों के बावजूद वह मुस्कुरा कर कह दे – थी. हूं.. रहूंगी…। अपराधी समाज और अपराधों को बढ़ाते परिवारों को यही एक औरत का जवाब हो सकता है… होना चाहिए भी- वर्तिका नंदा. 
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आबूदाना
पता बदल दिया है
नाम
सड़क
मोहल्ला
देश और शहर भी
बदल दिया है चेहरा
उस पर ओढ़े सुखों के नकाब
झूठी तारीफों के पुलिंदों के पुल
दरकते शीशे के बचे टुकड़े
उधड़े हुए सच
छुअन के पल भी बदल दिये हैं
संसद के चौबारे में दबे रहस्यों की आवाज़ें भी
खंडहर हुई इमारतों में दबे प्रेम के तमाम किस्सों पर
मलमली कपड़ों की अर्थी बिछा देने के बाद
चांद के नीचे बैठने का अजीब सुख है
सुख से संवाद
चांद से शह
तितली से फुदक मांग कर
एक कोने में दुबक
अतीत की मटमैली पगडंडी पर
अकेले चलना हो
तो कहना मत, ख़ुद से भी
खामोश रास्तों पर ज़रूरी होता है ख़ुद से भी बच कर चलना
पुश्तैनी मकान 
सड़क किनारे खड़ी औरत
कभी अकेले नहीं होती
उसका साया होती है मजबूरी
आंचल के दुख
मन में छिपे बहुत से रहस्य
औरत अकेली होकर भी
कहीं अकेली नहीं होती
सींचे हुए परिवार की यादें
सूखे बहुत से पत्ते
छीने गए सुख
छीली गई आत्मा
सब कुछ होता है
ठगी गई औरत के साथ
औरत के पास
अपने बहुत से सच होते हैं
उसके नमक होते शरीर में घुले हुए
किसी से संवाद नहीं होता
समय के आगे थकी इस औरत का
सहारे की तलाश में
मरूस्थल में मटकी लिए चलती यह औरत
सांस भी डर कर लेती है
फिर भी
जरूरत के तमाम पलों में
अपनी होती है
आह ओढ़नी

ओढ़नी में रंग थेरस थेबहक थी
ओढ़नी सरकी
जिस्म को छूती
जिस्म को लगा कोई अपना छूकर पार गया है
ओढ़नी का रागवाद्यसंस्कारअनुराग
सब युवती का श्रृंगार
ओढ़नी की लचक सहलाती सी
भरती भ्रमों पर भ्रम
देती युवती को अपरिमित संसार
यहां से वहां उड़ जाने के लिए।
दोनों का मौन
आने वाले मौसम
दफ्न होते बचपन के बीच का पुल है
                        
ओढ़नी दुनिया से आगे की किताब है
कौन पढ़े इसकी इबारत
ओढ़नी की रौशनाई
उसकी चुप्पी में छुपी शहनाई
उसकी सच्चाई
युवती के बचे चंद दिनों की
हौले से की भरपाई
ओढ़नी की सरकन अल्हड़ युवती ही समझती है
उसकी सरहदेंउसके इशारेउसकी आहें
पर ओढ़नी का भ्रम टूटने में भला कहां लगती है कोई देरी

सच
कचनार की डाल पर
इसी मौसम में तो खिलते थे फूल
उस रंग का नाम
किताब में कहीं लिखा नहीं था
उस डाल पर एक झूला था
उस झूले में सपने थे
आसमान को छू लेने के
उस झूले में आस थी
किसी प्रेमी के आने की
उस झूले में बेताबी थी
आंचल में समाने की
पर उस झूले में सच तो था नहीं
झूले ने नहीं बताया
लड़की के सपने नहीं होते
नहीं होने चाहिए
उसे प्रेम नहीं मिलता
नहीं मिलना चाहिए
किताबी है यह और बेमानी भी
झूले ने कहां बताया
ज़िंदगी में अपमान होगा
और प्रताड़ना भी
देहरी के उस पार जाते ही
पति के हाथोंबेटों के हाथों
जहां छूटी अम्मा की देहरी
जामुन की तरह पिस जाएगी
यह फूलों की फ्रॉक
आइस्क्रीम खाने की तमन्ना
मचलने के मज़े
कोयल की कूक
तब बचेगी सिर्फ़
मन की हूक
और याद आएंगे
कचनार के झूले
किसी फ़िल्मी कहानी की तरह
कौन हूं मैं 
       
इस बार नहीं डालना
आम का अचार
नहीं ख़रीदनी बर्नियां
नहीं डालना धूप में
एक-एक सामान
नहीं धोने खुद सर्दी के कपड़े
शिकाकाई में डाल कर
न ही करनी है चिंता
नीम के पत्ते
ट्रंक के कोनों में सरके या नहीं
इस बार नींबू का शरबत भी
नहीं बनाना घर पर
कि खुश हों ननदें-देवरानियां
और मांगें कुछ बोतलें
अपने लाडले बेटों के लिए
नहीं ख़रीदनी इस बार
गार्डन की सेल से
ढेर सी साड़ियां  
जो आएं काम
साल भर दूसरों को देने में
इस साल कुछ अलग करना है
नया करना है
इस बार जन्म लेना है
पहली बार सलीक़े से
इस बार जमा करना है सामान
सिर्फ़ अपनी ख़ुशी का
थोड़ी मुस्कान
थोड़ा सुकून
थोड़ी नज़रअंदाज़ी और
थोड़ी चुहल
लेकिन यही प्रण तो पिछले साल भी किया था न

कहानी रोज़ की

रसोई में
रोज़ तीनों पहर पकते रहें पकवान
नियत समय पर टिक जाएं मेज़ पर
इसकी मशक़्क़त में
चढ़ानी पड़ती है
अपनी डिग्रियों की बलि
जूते पॉलिश हों
आंगन धुल जाए
बादशाह और नवाबज़ादों के घर लौटने से पहले
सब कुछ सरक जाए अपनी जगह पर
मुस्कुरातेइतरातेकुछ ऐसे कि जैसे
न हुआ हो कुछ भी दिन भर के मेले में
जैसे बटन के दबाते
सब सिमट आएं हों
आहिस्ता से अपनी-अपनी जगह
इसके लिए देनी पड़ती है
अपनी ख़ुशियों की आहुति
सर्दी आने से पहले
दुरुस्त हो जाएं हीटर
बाहर उछल आएं रजाई-कंबल
बनने लगें गोभी-शलगम के अचार
गाजर के हलवे
इसके लिए मांग की ..सिंदूर की रेखा
खींच लेनी पड़ती है थोड़ी और
बारिश में टपकती छत से
गीले न हों फर्श
रख दी जाए बालटीटपकन से पहले ही
शाम ढलने से पहले आलू के पकौड़ों की ख़ुशबू
पड़ोसी अफ़सरों के घर पहुंच जाए
इसके लिए ठप्प करना पड़ता है अपने सपनों का ब्लॉग
इस पर भी सर्द मौसमों के लिहाफ़ों
गर्मी में एसी के हिचकोलों के बीच
बिस्तरों पर चढ़े
क्षितिज के पार की
औरतों के अधिकार की बात करते
न तो शहंशाह मुस्कुराते हैंन नवाबजादे
इसके लिए
आंखों के नीचे
रखना पड़ता है
एक अदद तकिया भी


आंख़ों के छोर से
पता भी नहीं चलता
कब आंसू टपक जाते हैं
और तुम कहते हो
मैं सपने देखूं

तुम देख आए तारे ज़मी पे
तो तुम्हें लगा कि सपने
यों ही संगीत की थिरकनों के साथ उग आते हैं
और यहां सब कुछ मिलता है एक के साथ एक फ्री


नहींऐसे नहीं उगते सपने

मैं औरत हूं
अकेली हूं
पत्रकार हूं

मैं दुनिया भर के सामने फौलादी हो सकती हूं
पर अपने कमरे के शीशे के सामने
मेरा जो सच है
वह सिर्फ़ मुझे ही दिखता है
और उस सच मेंसच कहूं
सपने कहीं नहीं होते

तुमसे बरसों से मैनें यही मांगा था
मुझे औरत बनानाआंसू नहीं
तब मैं कहां जानती थी
दोनों एक ही हैं

बसअब मुझे मत कहो
कि मैं देखूं सपने
मैं अकेली ही ठीक हूं
अधूरीहवा सी भटकती

पर तुम यह सब नहीं समझोगे
समझ भी नहीं सकते
क्योंकि तुम औरत नहीं हो
तुमने औरत के गर्म आंसू की छलक
अपनी हथेली पर रखी ही कहां.?

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3 COMMENTS

  1. अस्मितावादी विमर्श और नारीवाद के दौर में कई तरह का महिला लेखन हमारे सामने आ रहा है- एक, नारीवाद के सिद्धांत पढ कर लिखा हुआ, दो, भोगा हुआ यथार्थ के आधार पर आत्‍म‍कथ्‍यात्‍मक लेखन और तीन, लंबे अनुभव और चिंतन से निकला हुआ स्‍त्री जीवन का यथार्थ. वर्तिका जी लंबे समय तक इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया में क्राइम रिपोर्टर रहीं और इस दौरान तरह-तरह के दुख झेल रही महिलाएं उनके संपर्क में आई. स्‍वयं एक महिला होने के कारण स्‍वानुभूति से चलकर उन तमाम महिलाओं के प्रति सहानुभूति से पैदा हुई संयुक्‍त भाव की अभिव्‍यक्ति है उनका ताजा कविता संग्रह- थी, हूं, रहूंगी. वर्तिका जी को हाशिए की आवाज को स्‍वर देने के लिए हार्दिक धन्‍यवाद और बधाई.

  2. All the poems reflect one theme-'Kaun Hun Main',the most important question of existence.'Mujhe Aurat banana ansoo nahin' reminds of "Anchal mein hai doodh aur ankhon mein paani'- nothing has changed, since ages the same pain continues.Very intensely felt observations ,very valid questions – beautifully expressed.

  3. इस पर भी सर्द मौसमों के लिहाफ़ों
    गर्मी में एसी के हिचकोलों के बीच
    बिस्तरों पर चढ़े
    क्षितिज के पार की
    औरतों के अधिकार की बात करते
    न तो शहंशाह मुस्कुराते हैं, न नवाबजादे
    इसके लिए
    आंखों के नीचे
    रखना पड़ता है
    एक अदद तकिया भी

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