हैं बंद द्वार घर-घर के, अँधियारा रात का छाया

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हाल में ही रवीन्द्रनाथ टैगोर के गीतों का अनुवाद आया है ‘निरुपमा, करना मुझको क्षमा’ नाम से. छंदबद्ध अनुवाद किया है प्रयाग शुक्ल ने. पुस्तक सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन से आई है. उसी पुस्तक से कुछ चुने हुए गीत- जानकी पुल.
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१.
जो गए उन्हें जाने दो
तुम जाना ना, मत जाना.
बाकी है तुमको अब भी
वर्षा का गान सुनाना.
हैं बंद द्वार घर-घर के, अँधियारा रात का छाया
वन के अंचल में चंचल, है पवन चला अकुलाया.
बुझ गए दीप, बुझने दो, तुम अपना हाथ बढ़ाना,
वह परस तनिक रख जाना.
जब गान सुनाऊं अपना, तुम उससे ताल मिलाना.
हाथों के कंकन अपने उस सुर में जरा बिठाना.
सरिता के छल-छल जल में, ज्यों झर-झर झरती वर्षा,
तुम वैसे उन्हें बजाना.
२.
मन के मंदिर में लिखना सखी
नाम लिखना मेरा प्रेम से.
मेरे प्राणों के ही गीत से,
सुर वो नूपुर का लेना मिला.
मेरा पाखी है मुखर बहुत
घेर रखना महल में उसे
धागा ले-के मेरे हाथ का
एक बंधन बनाना सखी,
जोड़ सोने के कंगन इसे.
मेरी यादों के रंगों से तुम एक टिकुली लगाना सखी,
अपने माथे के चंदन पे, हाँ!
मोही मन की मेरी माधुरी,
अपने अंगों पे मलना सखी,
अपना सौरभ भी देना मिला.
मारना-जीना मेरा लूटकर
अपने वैभव में लेना समा
मुझको लेना उसी में छिपा.
३.
हे नवीना,
प्रतिदिन के पथ की ये धूल
उसमें ही छिप जाती ना!
उठूँ अरे, जागूं जब देखूं ये बस,
स्वर्णिम-से मेघ वहीं तुम भी हो ना.
स्वप्नों में आती हो, कौतुक जगाती.
अलका- फूलों को केशों सजाती
किस सुर में कैसी बजाती ये बीना.
४.
रखो मत अँधेरे में दो मुझे निरखने
तुममे समाई लगती हूं कैसी, दो यह निरखने.
चाहो तो मुझको रुलाओ इस बार, सहा नहीं जाता अब
दुःख मिला सुख का यह भार.
धुलें नयन अंसुवन की धार, मुझे दो निरखने.
कैसी यह काली-सी छाया, कर देती घनीभूत माया.
जमा हुआ सपनों का भार, खोज-खोज जाती मैं हार-
मेरा आलोक छिपा कहीं निशा पार,
मुझे दो निरखने.
५.
चुप-चुप रहना सखी, चुप-चुप ही रहना,
काँटा वो प्रेम का-
छाती में बींध उसे रखना.
तुमको है मिली सुधा, मिटी नहीं
अब तक उसकी क्षुधा, भर दोगी उसमें क्या विष!
जलन अरे, जिसकी सब बींधेगी मर्म,
उसे खींच बाहर क्यों रखना!!
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