क्या ब्लॉग-वेबसाईट पर कॉपीराइट का कानून लागू नहीं होता?

8

नीलाभ का यह लेख कुछ गंभीर सवालों की तरफ हमारा ध्यान दिलाता है. हाल में ही भारत के एकमात्र अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय ने लेखकों की रचनाएँ अपनी वेबसाईट पर डालनी शुरु की हैं. नीलाभ ने अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर बताया है कि इस क्रम में पारिश्रमिक की कहीं कोई चर्चा नहीं होती. क्या एक बड़े संस्थान के लिए इस तरह की मुफ्तखोरी जायज कही जा सकती है? क्या हिंदी लेखकों की रचनाएँ आभासी दुनिया में आ जाएँ यही उनके ऊपर सबसे बड़ा अहसान होता है? क्या ब्लॉग-वेबसाईट पर कॉपीराइट का कानून नहीं लागू होता? निश्चित रूप से यह लेख गंभीर बहस की मांग करता है- जानकी पुल.
========================
एक प्रसिद्ध विचारक ने कहा है कि हर आविष्कार के दो पहलू होते हैं और अक्सर जो पहलू उजागर रहता है और जिससे हमें उसकी ख़ूबियों का पता चलता है, उसी के पीछे उसका वह दूसरा पहलू छिपा रहता है जिसमें उसके नकारात्मक गुण निहित होते हैं. उम्दा लोहे और उससे बने चाकू का आविष्कार करते हुए किसी ने शायद यह सोचा नहीं था कि इससे सिर्फ़ सब्ज़ियां ही नहीं, लोगों के सिर भी बड़ी आसानी से काटे जा सकते हैं. दुनिया की सबसे छोटी चीज़ के विभाजन ने एक ओर ऊर्जा के अनन्त स्रोत खोल दिये,. दूसरी ओर हिरोशिमा और नागासाकी को अंजाम दिया. इस तरह के दो पहलुओं वाला ताज़ातरीन आविष्कार ण्टरने है, जिसने एक ओर तो ज्ञान और जानकारी के अनेकानेक रास्ते खोल दिये हैं, दूसरी तरफ़ लोगों के जायज़ हक़ों में सेंध लगाने का इन्तज़ाम भी कर दिया है.
हिन्दी के साहित्यिक जगत पर सरसरी नज़र दौड़ाते ही हमें उस नयी दुनिया के दर्शन होते हैं जिसेब्लॉग जगतकहा जाता है. अनेकानेक व्यक्ति और संस्थाएं एकएक ब्लॉग खोल कर अपनी रचनात्मकता का प्रदर्शन करती दिखायी देती हैं. इसमें कोई बुरी बात भी नहीं है. हिन्दी के मौजूदा माहौल में अगर इण्टरने ने लोगों को यह अवसर मुहैया करा दिया है कि वे अपनी कविताएं, कहानियां और लेखटिप्पणियां आदि अन्य पाठकों तक या अन्य ब्लौगियों तक पहुंचा सकें तो इसका स्वागत ही किया जाना चाहिये. इससे यह तो पता चलता ही है कि लोगों के भीतर अपने को अभिव्यक्त करने की कितनी ललक है और पत्रपत्रिकाओं के संसार की सीमाओं को देखते हुए नये रचनाकारों ने
For more updates Like us on Facebook

8 COMMENTS

  1. नीलाभ जी अच्छा लगा कि बुजुर्गों की जमात से आपने ये सवाल उठाया है…
    लेखक अगर अपनी जीवीका में पूरा समय लगाएगा, और बाक़ी इधर उधर से समय चुरा कर और थके मन और शरीर से यथासंभव साहित्य ही लिख पायेगा, अगर लेखक के आर्थिक हित सुनिश्चित होते हैं, इसकी परम्परा बनती है, तो ऊर्जावान होकर लेखक लिखेंगे, रचना की गुणवत्ता भी बढ़ेगी, और भाषा का सम्मान भी. और ये हक सिर्फ लेखक के पास होना चाहिए कि वों अपनी रचना किसी मूल्य को लेकर प्रकाशक को या किसी भी दूसरी वेबसाइट पर देता है, कि मुफ्त में. कॉपी /पेस्ट चाहे ब्लॉग से अख़बारों में हो या फिर ब्लॉग या वेबसाइट से दूसरी में हो, बिना अनुमति के ये बेहद निंदनीय है. २०१० में जनसत्ता ने मेरे ब्लॉग से एक पोस्ट छापी थी, मैंने इसका विरोध किया, और जबाब में "थानवी साहेब" का ज़बाब था कि मुझे उनके इस अखबार की हरकत पर धन्य होना चाहिए, नाराज़ नहीं होना चाहिए. जैसे हिन्दी के लेखक बहुतायत में करते हैं. कहीं किसी तरह की माफी, या अपनी नीती में बदलाव की बात और रचनाकार के हितों का सम्मान उनके अजेंडे में नहीं था. उनके कान पर ज़रा जूँ तक नहीं रेंगी, बल्कि बहुत अभिमान से उन्होंने ज़बाब दिया कि "अगर इतना मुझे विरोध है, तो मेरी कोई चीज़ वों नहीं छापेंगे". इस ज़बाब से धन्य और सन्न हुयी, कि भविष्य के लिए कोई उम्मीद भी हिन्दी के मठाधीश नहीं देखते. उस पर सोच विचार की गुंजाईश तक नहीं रखते.
    दो साल पहले विरोध में ये ब्लोग्पोस्ट लिखी थी.
    http://swapandarshi.blogspot.com/2010/02/blog-post_08.html

    फिर पिछले दिनों किसी पुरानी मित्र ने जिन्हें मीडिया में १८-२० साल का अनुभव है, यही हरकत की, और लाख समझाने पर भी, उसे ये समझ नहीं आया, कि अपनी चीज़ छपने पर खुश होने के बजाय ये बहस क्यूं है, कि बिना अनुमति के नहीं छापो. मेरा जीवन मुख्य रूप से एक वैज्ञानिक का है, और कोपीराईट के विरोध में अनेक मानवतावादी ख्यालों के बावजूद जैसा आज का समय है, कोपीराईट के पक्ष में ही खडी हूँ. इसीलिए कि अगर रचनाकार और वैज्ञानिक और किसी भी दूसरे कलाकार की मेहनत का मूल्य नहीं मिलता, उसका जीवन हमेशा जीविका के संकट से घिरा रहता है, तो जितनी रचना संभव है, उसका अंश ही वो कर सकेगा. और दूसरा ज्ञान को लेकर जमींदारी का भाव बना रहेगा, और खुले रूप से सबके लिए उसका सुलभ होना (खासकर तकनीकी और सायंस की जानकारी) न हो सकेगा.
    सादर
    सुषमा

  2. जायज है. कई अखबार ब्लॉग से साभार लेकर पन्ने भर रहे हैं और लेखक को कुछ नहीं मिल रहा…

  3. बहुत ही सही मुद्दा उठाया गया है, और मैं पूरी तरह सहमत हूँ कि लेखकों को उनके हिस्से के श्रम का मूल्य मिलना ही चाहिए.

    जनविजय जी ने एकदम सही कहा है. कि वहाँ रचनाओं की चोरी भी हो रही है!

    इस संस्थान की साइट में पूर्व में रचनाकार नामक साहित्यिक ब्लॉग (तथा और भी अन्य!) से सामग्री उसी रूप में (यानी की वर्तनी व्याकरण गलतियों और पैरा, बिन्दु पूर्णविराम समेत!) उठा कर पुनर्प्रकाशित की जाती रही हैं. इस बात को राजकिशोर जी (जो शायद अभी यह कार्य देख रहे हैं) के सामने उठाया तो उन्होंने माफी मांगी और रचनाकार की रचनाओं को वहाँ पुनर्प्रकाशित करने की अनुमति देने की बात कही. मैंने शुरू में तो हामी भरी, परंतु बाद में अहसास हुआ कि रचनाकार की रचनाओं के कॉपीराइट तो लेखकों के पास ही हैं, अतः बाद में मना कर दिया.

    मेरा मानना है कि संसाधन से लबालब इस संस्थान को रचनाओं को प्रकाशित करते समय पारिश्रमिक की व्यवस्था तो हर हाल में करनी ही चाहिए.

    सरकारी महकमों को चलताऊ एटीट्यूड से चलाने का यह भी एक उम्दा उदाहरण है. (मैं भी कभी सरकारी महकमे का हिस्सा था इसीलिए भरोसे से कह रहा हूँ.)

    इनके इन कार्यों की हर जगह, हर संभव भर्त्सना करनी चाहिए ताकि स्थिति में थोड़ी ही सही सुधार तो हो.

  4. नहीं, मैं नीलाभ जी की बात से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ। यह पश्चिमी नज़रिया है। भारत जैसे अपढ़ देश में यह एक और बैरियर बन जाएगा।
    हाँ, सरकारी संस्थानों और प्रकाशकों की बात दूसरी है। उन्हें हर हालत में लेखक को भुगतान करना चाहिए। महात्मा गाँधी विश्वविद्यालय ने कई करोड़ रूपए अपनी इस परियोजना के लिए तय किए हैं। इसके बावजूद वहाँ काम नहीं हो रहा, धन की चोरी हो रही है। यहाँ तक कि रचनाओं को टाईप कराने के लिए टाइपिस्ट तक नहीं है शायद, क्योंकि अन्य ब्लोगों और अन्य वेबसाइटों से रचनाएँ उठा-उठा कर जोड़ी जा रही हैं। इसका एक उदाहरण ’हिन्दी समय’ की वेबसाइट पर हाल ही में जुड़ी कवि भगवत रावत की कविताएँ हैं जो ’कविता कोश’ से लेकर जोड़ी गई हैं।
    सरकारी वेबसाइटों को और व्यावसायिक वेबसाइटों को रचना का पारिश्रमिक देना ही चाहिए।

  5. आपसे सहमत हूँ, ब्लॉग की रचनाओं को अखबार और पत्रिकाएं मुफ़्त में छाप लेते हैं। कोई पारिश्रमिक नहीं देते, कई पत्र-पत्रिकाएं तो नेट के भरोसे ही चल रही हैं। इससे लेखकों का हक ही मारा जाता है।

  6. बहुत ज़रूरी और सही समय पर उठाया गया मुद्दा है। हिंदी में पहले ही प्रकाशक लेखकों का हक मारते रहते हैं, ऐसे में अगर सरकारी संस्‍थान भी इसी में शामिल हो गये तो लेखक कहां जाएगा… इस पर खुलकर बात होनी चाहिए।

LEAVE A REPLY

19 − four =