हमारी ‘छोटी’ लड़ाई की गरदन पर आपके ‘साथ’ का ज्ञानपीठीय हाथ

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युवा लेखक गौरव सोलंकी का यह लेख मूल रूप से ‘जनसत्ता’ में प्रकाशित प्रियदर्शन के लेख की प्रतिक्रिया में लिखा गया था. प्रसंग पुराना है लेकिन समस्या वही है- भारतीय ज्ञानपीठ का मनमानापन. वह लेख प्रस्तुत है गौरव सोलंकी की भूमिका के साथ- जानकी पुल.
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मूलत: यह लेख (इसका छोटा रूप) 3 जून को जनसत्ता में छपे प्रियदर्शन के एक लेख (http://www.jankipul.com/2012/06/blog-post_03.html) के जवाब में लिखा गया था. इसी उम्मीद से कि 10 जून को जनसत्ता में छप सकेगा. लेकिन जनसत्ता ने मुझे उदाहरण देकर याद दिलाया कि अभिव्यक्ति पर सेलेक्टिव सेंसरशिप किसी एक संस्था की जागीर नहीं है. 

लेखकों-प्रकाशकों के बारे में और ज्ञानपीठ के विरुद्ध लड़ाई के बारे में कही गई प्रियदर्शन की कुछ सामान्य बातों और कुछ व्यक्तिगत आरोपों पर मुझे आपत्ति थी. लेकिन जनसत्ता ने मेरे लेख को छापने से इनकार कर दिया. संपादक थानवी जी को प्रियदर्शन द्वारा उठाई गई बातों के सीधे जवाब देने और साथ ही उनसे सवाल करने पर आपत्ति थी. और वे चाहते थे कि कुछ बदलावोंके बाद अगर मेरा लेख छपे भी, तो उस पर प्रियदर्शन का जवाब भी उसी के साथ, उसी दिन छपे.  

मैंने सोचा. और मुझे लगा कि जब किसी अख़बार में किसी पर सवाल उठाना या आरोप लगाना ग़लत नहीं है, तब उसी अख़बार में उनके जवाब देना कैसे ग़लत हो सकता है? और यह कैसा न्याय है कि उनके सवाल (वे भी ग़लत तथ्यों पर आधारित) छपें, तब उसके साथ प्रतिक्रिया देना तो दूर, मुझे एक हफ़्ते बाद भी अपनी बात अपने ढंग से कहने का मौका न मिले. और जब मैं अपनी बात कहूं, वह भी जनसत्ता में किए गए बदलावों के साथ, तो वह छपने से पहले ही प्रियदर्शन को पढ़वा दी जाए और वे तब उस पर एक और लेख उसी के साथ लिखें. मुझे अपनी बात बिना काटे कहने दी जाती और अख़बार में पढ़कर वे अगले हफ़्ते कुछ भी लिखते तो मुझे कोई समस्या नहीं थी. लेकिन यह 2-1 का खेल मेरी समझ में नहीं आया, जिसमें मेरी टाँगें बाँध दी जानी हैं और यह भी तय है कि आखिरी गोल वही करेंगे. यह मुझे अलोकतांत्रिक लगा और इसी ने सबसे ज़्यादा बेचैन किया. यह भी लगा कि इस तरह कहीं यह दो व्यक्तियों की लड़ाई जैसा ही बनकर न रह जाए, जबकि मेरा सारा विरोध उनकी कही बातों और उनके बेहद संदिग्ध अर्थों से है. 

ये अजीब महीने हैं – एक ही वजह से बुरे भी और अच्छे भी – कि साहित्य, साहित्यकारों और मीडिया को लेकर लगातार बहुत से भ्रम टूटे हैं, कुछ समय कोफ़्त हुई है और आख़िर में मोहभंग हुआ है. 

ख़ैर, अब एक यही विकल्प मेरे पास बचा है कि मैं वेबस्पेस पर ही अपनी बात कहूं, जहाँ हम सब बराबर हैं. यहाँ से भले ही मैं जनसत्ता के उन सब पाठकों तक अपनी प्रतिक्रिया न पहुंचा पाऊं, जिन्होंने वह भ्रामक लेख पढ़ा था, लेकिन यहाँ कम से कम मैं वह कहने के लिए आज़ाद तो हूं, जो कहना चाहता हूं.  

इस बीच बता दूं कि मुझे यह भी सलाह दी गई कि कुछ मतभेदों या आपत्तियों के साथ कोई साथ आए, तो उसे नाराज़ करके विरोध में कर देना ठीक नहीं है. लेकिन मैं कोई राजनेता नहीं हूं जो किसी भी क़ीमत पर अपने साथ बड़ी संख्या चाहे और यह कोई नया गुट बनाने की या शक्ति-प्रदर्शन की लड़ाई भी नहीं है और न ही किसी को हराने की. हो सकता है कि बहुत से और मौकों की तरह इस मुद्दे के बहाने भी बहुत से लोग मुद्दे पर नहीं, मौका देखकर अपने शत्रु ज्ञानपीठके विरुद्ध लड़ रहे हों, लेकिन मैं उस विचार और सच के लिए लड़ रहा हूं, जिस पर मुझे यक़ीन है. यह सोचकर लड़ने नहीं लगा था कि मेरे साथ कितने लोग आएँगे और कितने नहीं, कि साथ कौन है, और सामने कौन. यह मेरी अकेले की लड़ाई भी नहीं है. हम सब इसके लिए इतने ही ज़रूरी हैं और इतने ही जवाबदेह. और इसीलिए, जो भी, जब भी मुझे ग़लत लगेगा, कहूंगा, भले ही अकेला बचूं. और अपनी बात ग़लत लगेगी, तब भी कहूंगा. जिनके विरुद्ध लड़ रहा हूं, वे कुछ सही कहेंग़े तो उन्हें सही भी कहूंगा. इसे आप ज़िद या बेवकूफ़ी भी समझ सकते हैं.  

फ़िलहाल इस तरह के भ्रामक लेखों पर यह मेरी आख़िरी प्रतिक्रिया समझी जाए. हालात जैसे हैं, उनमें यह विडम्बना भी संभव है कि मेरे इस लेख की  (प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष) प्रतिक्रिया में मेरे विरुद्ध लिखे गए लेख या ज्ञानपीठ के विरुद्ध लड़ाई से सम्बन्धित बाकी लेख भी उसी अख़बार में छपते रहें, जहाँ यह लेख नहीं छप सका. या ऐसा ही और भी कुछ हो! लेकिन आप देख ही रहे हैं कि मै इसमें अभी कुछ नहीं कर सका, आगे भी क्या कर सकूंगा?   

यह लेख लम्बा हो गया है और मेरी कोशिश रही है कि इसमें हर बात कह सकूं. इसके अलावा मेरे पास बताने को कुछ भी नया नहीं है. जिन्हें मेरी या इस लड़ाई की नीयत पर इसे पढ़ने के बाद भी संदेह होता है तो मैं फ़िलहाल उनके लिए कुछ भी करने में असमर्थ हूं. उनसे आग्रह है कि मुझ पर और हम सब पर नज़र रखें और बाद में कभी तय करें कि क्या सही था, कौन सही था, और किसने मुखौटा पहना था.. 
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प्रियदर्शन जी,
इंटरनेट और अख़बारों-पत्रिकाओं में लगभग पन्द्रह दिन तक बहुत बोलकर, मैं चुप हो गया था. मैंने अपनी सब बातें कह दी थीं. यह तो बहुत बार कहा कि किस वजह और मकसद से लड़ रहा हूं. जितने सवाल उठाए गए थे, संदेह किए गए थे, उनके भी कई-कई बार जवाब दे दिए थे. उनसे संदेह तो मिटते रहे, लेकिन पूर्वाग्रह जवाबों से नहीं मिटते. इसलिए फिर-फिर वही सवाल आते रहे. और इसी बीच उन्हीं सवालों का नकाब ओढ़कर कई सारी अफ़वाहें आईं, कितने ही भ्रम फैलाए गए. और यह होता ही है, जब भी एक आदमी या कुछ आदमी किसी सत्ता या व्यवस्था के खिलाफ खड़े होते हैं. सत्ता के पास ईनाम में देने को बहुत कुछ होता है, इसलिए हर ऐसी लड़ाई में वह खुद खामोश रहती है, उसकी ओर से लोग आते हैं और या तो शातिर अफ़वाहों से विद्रोहियों का चरित्र-हनन करने की कोशिश करते हैं या लड़ाई को असल मुद्दे से भटका देने की. शब्दों के खेल और झूठे हलफ़नामों से किसी गंभीर और व्यापक लड़ाई को अनावश्यक और निजी लड़ाई बना देने की बेचैन जल्दबाजी भी अन्दर से यही कोशिश है, ऊपर से भले ही वह भली और पॉलिटिकली करेक्ट दिखना चाहे. ऊपर से वह तब और संदिग्ध हो जाती है, जब वह किसी ऐसे बीच के रास्ते से समस्या को तुरंत निपटा देना चाहती है, जिस पर सत्ता पहले से ही राजी हो.

मुझ पर आएँ तो मेरी नीयत पर संदेह पैदा करने के लिए यह भ्रम कुछ लोगों ने फैलाया कि पहले कभी नहीं बोला था, खुद के साथ हुआ तो बोला. हालांकि ऐसा भी हुआ होता, तब भी क्या यह लड़ाई निजी लड़ाई होती? मैं पहले भी यह उदाहरण दे चुका हूं कि क्या आज़ादी का पूरा आंदोलन इसलिए निजी कहा जा सकता है कि गाँधी जी ने तब अंग्रेजों का विरोध शुरू किया, जब उन्हें काला कहकर ट्रेन से फेंक दिया गया? इसके बावज़ूद आरोप लगाने वालों को मैंने अपना लिखा तहलका का अगस्त, 2011 का एक लेख दिखाया (http://www.tehelkahindi.com/indinoo/national/948.html), जो साहित्य की मठाधीशी के ख़िलाफ़ था. बाद में मेरे साथ जो किया गया, उसकी एक वजह वह लेख भी था.

लेकिन इन जवाबों के बहुत बाद, 3 जून को आपने जनसत्ता में यही सब लिखा ( http://www.jankipul.com/2012/06/blog-post_03.html). एक संतुलित लेख, जिसमें आपने समाधान का बहुत आसान फ़ॉर्मूला खोज लिया और ज्ञानपीठ से अपील की कि वह किताब छापकर बड़प्पनदिखाए और इस अनावश्यक प्रसंग को और तूल न दे, जो एक निजी टकराव है. वैसे यह भी सही है कि किताबें-कहानियाँ छपें तो लेखकीय सम्मान की हममें से किसी को भी क्यों फ़िक्र होनी चाहिए? साथ ही आपने रॉयल्टी की पारदर्शिता के लिए और नए लेखकों को प्रोत्साहन देने के लिए ज्ञानपीठ की कुछ प्रशंसा भी की, उसे आदर से देखा और लेखक-प्रकाशक सम्बन्धों को जटिल बताया.
यहीं से मुझे साफ़ कर देना चाहिए कि यहाँ आप और आपका लेख सिर्फ़ एक प्रतीक है, और मैं उन सब लेखकों से बात करना चाहता हूं, जिन्होंने विभिन्न वजहों से, जानबूझकर इस लड़ाई को कमज़ोर करने की कोशिश की है. कुछ के वाकई जायज संदेह थे, मैं उनकी बात नहीं कर रहा. लेकिन जो बेशर्मी से अफ़वाहें लेकर आए या फिर सवालों के जवाब देने के बाद भी हूबहू वही सवाल करते रहे, वे चार किस्म के लेखक हैं.

पहले, कहीं न कहीं ज्ञानपीठ के कृपापात्र थे या होना चाहते थे. उनमें से कई सीधे ज्ञानपीठ के पक्ष का स्टैंड लेकर आए और इसीलिए सभी को साफ़ साफ़ दिख गए. लेकिन कुछ चतुर भी थे.

दूसरे, जो बरसों से मुझसे नाराज़ थे क्योंकि उनके disgusting और irritating private messages या/और मेरे प्रति पूर्वाग्रही रवैये या/और दोहरे चरित्र से तंग आकर मैंने साल-दो साल से उन्हें फ़ेसबुक तक पर ब्लॉक कर रखा था और उनकी किसी बात पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देता था. उनमें से कुछ ने मेरे लेखन में अश्लीलता ढूंढ़ी. कुछ ने इस लड़ाई को असफल साहित्यिक महत्वाकांक्षा की सैद्धांतिक मुनादी जैसी उपमाएं दीं (इस दिलचस्प शीर्षक के हर शब्द की अच्छी चीरफाड़ श्रीकांत ने अपने इस लेख में की है – http://www.jankipul.com/2012/05/blog-post_22.html).
एक ने तो अपने अख़बार में नौकरी करने वाले एक नए लड़के को मोहरा बनाकर इस पूरे मामले को पेज थ्री गॉसिप की तरह परोसवा दिया. (ज़रूरत पड़ी तो मैं नामों और अपनी कही हर बात के सबूतों के साथ भी आ सकता हूं) मैंने तो इस बार उन तक के हर मनगढ़ंत आरोप का जवाब दिया, यह साफ-साफ जानते हुए भी कि वे लेख किसके इशारे पर या किस वजह से लिखे गए हैं. मैंने बदले में उनसे भी सवाल किए, जिनके जवाब देने के लिए उनमें से कई ने मोहलत माँगी, और गायब हो गए. उन सब लेखकों की आसान पहचान यह भी है कि उन्हें किसी मुद्दे से ज़्यादा लेना देना नहीं है, आगे भी वे हर मौके पर आपको मेरे ख़िलाफ़ लिखते दिखेंगे.
तीसरे वे थे, जो साथ आ सकते थे, अगर किसी तरह पूरे मामले से मेरा नाम मिटाया जा सकता. उनके बारे में मुझे साथ आए लेखकों ने बताया कि वे इस चिंता के कारण नहीं आ रहे कि यह लड़ाई जितनी बढ़ेगी, गौरव मशहूर होगा, और यह रोकना ज़्यादा ज़रूरी है, साहित्य के भ्रष्टाचार का तो कुछ नहीं. अब मेरे या किसी के भी नाम पर हर जगह बीप लगाना किसी के हाथ में नहीं था, इसलिए हम कुछ कर न सके. और हम लड़ रहे लोगों के लिए तो मैं एक प्रतीक या माध्यम से ज़्यादा कुछ है भी नहीं. मैं और साथ आए सब लेखक-पाठक बार-बार यह कहते भी रहे कि यह हम सबकी साझी लड़ाई थी/है. हाँ, इस तीसरी श्रेणी के बहुत सारे लेखक विरोध में भी नहीं आए और समर्थन में भी नहीं. इतने भर के लिए हम उनके शुक्रगुज़ार हैं.

चौथी श्रेणी के लेखक वे हैं, जो सिर्फ़ इसलिए मुझ पर, मेरी नीयत पर आरोप लगाने लगे क्योंकि मैं उनकी चुप्पी पर उन्हें कायर बता रहा था. उन्होंने आख़िरकार चुप्पी तो तोड़ी लेकिन मेरे प्रति ज़हर के साथ. फिर दोहरा दूं कि उनकी बात नहीं कर रहा, जिन्होंने अपने सवालों के जवाब पाने के बाद वही सवाल नहीं दोहराए. बल्कि उनके तो हर तरह के संदेहों और सवालों का मैं पूरा आदर करता हूं, जो जेनुइन थे.  

हाँ, कुछ लेखक एक से ज़्यादा श्रेणियों में भी रहे. प्रियदर्शन जी, मैं नहीं जानता कि आप किस श्रेणी में हैं. दूसरी श्रेणी में नहीं हैं, इतना कह सकता हूं. मैं हवा में कोई बात नहीं कहूंगा. तर्क और तथ्यों से अपनी बात रखूंगा और हर बात का जवाब दूंगा. कहीं ग़लत कहूं तो किसी को भी अधिकार है कि मुझे तर्क या तथ्यों से ग़लत सिद्ध करे.

आपने बार-बार कहा कि फिर भी मैं गौरव के पक्ष में हूं, इसके बावज़ूद मैं आपके लिए यह सब क्यों लिख रहा हूं, यह और स्पष्ट कर देने के लिए मैं एक उदाहरण देता हूं.

मान लीजिए कि एक कंपनी है और उसके मज़दूर हड़ताल पर हैं. उनकी माँगें हैं कि वेतन 5000 से बढ़ाकर 5500 कर दिया जाए, उसमें बेवजह की कटौतियां न हों, जो हो साफ-साफ हो, उसकी रसीदें मिलें, कुछ सुविधाएं मिलें, साथ ही शिफ़्ट इंचार्ज, मैनेजर या मालिक उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार करें कोई भी कभी भी गाली न दे दे, मारे नहीं. मालिक के जूते साफ़ करने वाले को प्रमोशन न मिले और मेहनत से काम करने के बावज़ूद सिर्फ़ इस बात पर किसी मज़दूर को गाली देकर या मारकर नौकरी से न निकाला जाए कि उसने मालिक के जूते साफ़ करने से इनकार कर दिया.

तो मज़दूर हड़ताल पर हैं और मालिक कह रहे हैं कि ये सस्ती लोकप्रियता के लिए ऐसा कर रहे हैं. विरोध ज़्यादा होता है तो मालिक कहते हैं कि रामप्रसाद नाम के जिस मज़दूर को जूते साफ़ न करने की सज़ा देने के लिए निकाला था, उसे हम वापस रखने को तैयार हैं. रामप्रसाद ख़ुद पहले दिन से कह रहा है कि इतना अपमानित होने के बाद उसे अब कभी वह नौकरी नहीं करनी, और यह माँग तो कभी थी ही नहीं. वे सब यह चाहते हैं कि बाकी मज़दूरों के साथ सम्मानजनक व्यवहार हो और बाकी माँगें भी मानी जाएं. लेकिन तब मालिक उनकी कोई बात सुनने या कुछ भी कहने को तैयार ही नहीं.

तब अचानक एक आदमी आता है और रोज़ बारह घंटे काम करने वाले मज़दूरों से कहता है. मैं तुम्हारे साथ हूं. लेकिन यह महान विरासत वाली महान कंपनी है, तुम तो खराब कामगार हो, शौकियातौर पर आते हो, इस कंपनी ने इसके बावज़ूद तुम्हें नौकरी और रोज़ी रोटी दी है, और सिर्फ़ कुछ करोड़ का ही तो टर्नओवर है, तुम्हारी तनख़्वाह कैसे बढ़ा दें? और यह रामप्रसाद का मालिक से कुछ निजी झगड़ा है, इसलिए इसे निकाला गया. मैं उनसे फिर भी अपीलकरूंगा कि यह ग़लत है और इसे वापस रख लेना चाहिए. मज़दूर और मालिक का तो रिश्ता जटिल ही होता है, लेकिन वे आदरणीय हैं, बड़े हैं, इसलिए यह ग़ैरज़रूरीहड़ताल यहीं ख़त्म हो जानी चाहिए. हाँ, मैं तुम्हारे साथ हूं.         

क्या अब यह बताने की ज़रूरत है कि वह आदमी किसके साथ है?

ख़ैर, आपने बताया कि आपकी एक कहानी नया ज्ञानोदय में जल्द ही छपने वाली है. इस बात के लिए बधाई.

बकौल आप, आप छिनाल प्रकरण पर भी ज्ञानपीठ का विरोध करते हैं और अब भी कहते हैं कि करते हैं और ज्ञानपीठ तूल तो क्या देगा, वह तो मामले को जल्दी से जल्दी अपनी कुर्सी के पाए के नीचे दबाना चाहता है. ऐसे में आपको इस संतुलनके लिए भी बधाई कि किसी संस्था के ऐसे व्यवहार और ऐसे समय के दौरान आप कहानी भेज भी देते हैं, वह स्वीकृत भी हो जाती है. आपने अपने लेख के आख़िर में पूछा है कि गौरव सोलंकी हाय-हाय क्यों मचा रहा है, वह किसके विरुद्ध और किसलिए लड़ रहा है? तो शुरू में ही यह बता देना मेरा फ़र्ज़ है कि मैं जिन चीजों से लड़ रहा हूं, उनमें दुनियावी समझदारी से भरा हिन्दी के बहुत से लेखकों का यह संतुलनभी है कि वे अपने लेखन में और घोषणाओं में जिन संस्थाओं, व्यवहारों, अपमानों के विरोध में हैं, वे जीवन में लगातार उन्हीं संस्थाओं, व्यवहारों, अपमानों का हिस्सा भी हैं.

मुझे हैरत यह है कि आप कुछ ऊपरी मुद्दों पर ज्ञानपीठ या अन्य प्रकाशकों की थोड़ी सी आलोचना तो करने की कोशिश करते हैं और बार-बार कहने की कि आप मेरे साथ हैं (ऐसा साथ?), लेकिन ज्ञानपीठ की महानता के प्रति एक मोह लगातार आपके लेख में दिखता है. ऐसा लगता है कि ज्ञानपीठ एक लाइन में भी पूरे मामले पर कोई तार्किक प्रतिक्रिया दे दे (आपके अनुसार तो किताब छापने का कह दे बस, जो कह भी रहा है)  तो सब कुछ स्वर्ग हो जाएगा. इसके बाद वह लेख चिंता जताने और लेखकों-प्रकाशकों की हल्की सी आलोचना करने के बाद समझदारी बरतता है और इसीलिए आप मासूमियत से लिखते हैं- शायद हिंदी के प्रकाशकों के साधनों की सीमा हो कि वह इस बाज़ार में बहुत ताकत झोंकने की हालत में ख़ुद को नहीं पाता।


यहीं रॉयल्टी के सब घपलों, लेखकों को लूटने और अपमानित करने के सिलसिलों पर आधा परदा तो डाल दिया जाता है. क्या करे प्रकाशक बेचारा आखिर? अपने बच्चे को भूखा मारे या लेखक को रॉयल्टी दे, अपनी छत की मरम्मत कराए या किताब का प्रचार करे, ऐसी छवि बना दी है आपने अपने लेख में उसकी, और आपको ऐसे व्यवहार के पीछे प्रकाशक का लालच, बेईमानी या बदनीयती कहीं नहीं दिखती, उसके करोड़ों के धंधे में कहीं इतने संसाधन नहीं दिखते कि वह लेखकों की दो-चार हजार की रॉयल्टी तो आधी ईमानदारी से दे दे? क्या जीवन का इतना सारा अनुभव ऐसे बचना सिखाता है सच से? क्या इतने सारे शब्द इसी काम आने थे एक दिन कि आप इतना पॉलिटिकल करेक्ट हो जाएं कि लेखक की किताबें बेचकर उसे ही कर्ज़दार करते रहने वाले और अपनी कारें खरीदते रहने वाले प्राणी आपको ऐसे ही मज़बूर दिखने लगें?
और प्रकाशकों या संस्थाओं के भ्रष्टाचार पर बाकी आधा परदा आप यह दो बातें कहकर डाल देते हैं-

1. हिंदी में कुछ बड़े प्रकाशकों को छोड़ दें तो बाकी मेरे खयाल से रायल्टी तक नहीं देते.
2.
नेशनल बुक ट्रस्ट, प्रकाशन विभाग या फिर ज्ञानपीठ- जो फिर भी पारदर्शिता बरतते हैं और अपने लेखकों को दूसरों के मुकाबले ज़्यादा रायल्टी देते हैं।“ 

देखिए, न हिन्दी के बड़े प्राइवेट प्रकाशक नाराज़ हुए (पहली लाइन से) और न नेशनल बुक ट्रस्ट, प्रकाशन विभाग या ज्ञानपीठ (दूसरी लाइन से). क्योंकि आपने उन्हें कीचड़ में कमल बता ही दिया. अब छोटे प्रकाशक होते रहें नाराज़, वे क्या बिगाड़ेंगे? और वही तो सब गड़बड़ी कर रहे हैं ना? कीचड़ उन्हीं ने तो बना दिया है? यह जो कमाल का संतुलनहै, जिसमें बड़ा और शक्तिशाली कभी ग़लत नहीं हो सकता और वह जवाबदेह भी नहीं है, उससे बस अपीलें की जा सकती हैं और परम्पराऔर बड़प्पन याद दिलाए जा सकते हैं.

आपने जो तीन-चार आपत्तियां मुझ पर और लड़ाई पर की हैं, उनमें से अधिकांश के जवाब 11 मई के मेरे ज्ञानपीठ को भेजे पत्र में ही थे, (http://www.tehelkahindi.com/indinoo/national/1209.html) और जिनके नहीं थे, मैंने इंटरनेट पर या अखबारों-पत्रिकाओं के माध्यम से लगातार दिए. उन्हें अपनी फ़ेसबुक वॉल पर लिखता रहा.

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13 COMMENTS

  1. प्रिय गौरव
    ,
    तुम्‍हारे बारे में कुछ साल पहले किसी मित्र के जरिए पता चला था और तुम्‍हारे ब्‍लॉग पर एक कविता पढ़ी थी। उसी समय लगा था इस कविता में कुछ अलग बात है। इसके बाद गाहे-बगाहे तुम्‍हारा लेखन पढ़ने को मिलता रहा और वाकई खुशी होती थी कि अच्‍छा लेखन हो रहा है। इसी बीच अचानक से किसी हड़ताल के बारे में छपी तुम्‍हारी रिपोर्ट पढ़कर अच्‍छा लगता था।
    मौजूदा प्रकरण में सबसे पहले तो एक पाठक की हैसियत से मैं कहना चाहूंगा कि तुम्‍हारा स्‍टैंड मुझे सौ फीसदी सही लग रहा है। अपने सामने पहली बार किसी लेखक को सीधे खड़े हुए देख रहा हूं। एकदम डटे रहो दोस्‍त। तुमने सीधे दोगलेपन पर चोट की है और यह चोट बेहद जरूरी, बेहद अहम है। मुझे लगता है इस देश के तमाम जनसरोकारी आंदोलनों, विचारों, संस्‍थाओं और उनके मूल में मौजूद व्‍यक्तियों की यह सबसे बड़ी समस्‍या रही है। यह दोगलापन ही हमारी बड़ी-बड़ी पराजयों, पतन का कारण रहा। हो सकता है कि यह हमारे टिपिकल भारतीय चरित्र में कहीं गहरे पैठा हुआ है। लेकिन इससे भी बड़ी शर्म की बात यह रही कि हमने कभी इस दोगलेपन पर सवाल नहीं उठाए या उठाए तो उसे बहस के केंद्र में नहीं रखा। शायद खुद को नंगा देखने की हिम्‍मत हमारा 'प्रगतिशील' तबका अभी जुटा नहीं सका है। हिम्‍मत की इसी कमी ने न कभी हमें खुद को ढंग से समझने दिया न समाज को समझ सके। नतीजा सामने है तमाम आंदोलन, विचार, संस्‍थाएं जो जनता की बात कहने का दम भरती थीं आज हाशिए पर हैं और कम से कम जनता से तो दूर ही हैं। लेखक का सम्‍मान जेनुइन तरक्‍कीपसंद (फैशनपरस्‍त ''प्रगतिशीलों'' को छोड़ दें) तबके के लिए एक महत्‍वपूर्ण सवाल है। अगर प्रकाशक जनसरोकारी किताबें छापकर पैसा और क्रेडिट लेते हैं तो उन्‍हें लेखक को सम्‍मान देना होगा। नहीं तो उन्‍हें अपना सामाजिक सरोकारी मुखौटा उखाड़ना होगा। तुमने बिल्‍कुल सही पहलकदमी ली है। इस सवाल को उठाने और साहित्‍य के केंद्र में लाने से पुराने गढ़-मठ धवस्‍त करने की शुरुआत हो सकती है और शायद समाज में भी जनसरोकारी, मुखौटाविहीन व्‍यक्तित्‍वों के आगमन का रास्‍ता खुल सके (शायद कुछ ज्‍़यादा उम्‍मीद कर रहा हूं पर मुझे लगता है करनी चाहिए)।
    बहरहाल यकीन मानो बड़े-बड़े नामों की चकाचौंध से प्रभावित न होने वाला और सच्‍चाई की गंध पकड़ने वाला छोटा ही सही एक पाठक तबका मौजूद है और यकीन से कह सकता हूं कि वह तुम्‍हारे साथ खड़ा है।

  2. तीसरी टीप )

    मै तो उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ जब कोई बड़ा लेखक किसी दूसरे तीसरे " अनजान" लेखक के अपमान पर "अपना "पुरूस्कार लौटाएगा या" अपनी" किताब छापने से किसी प्रकाशन से मना करेगा .जब किसी अनजान लेखक के अपमान के दूसरे-तीसरे दिन तेहलका या दूसरी मैगज़ीन उसका पक्ष छापेगी .साहित्य में लोकतंत्र तभी आयेगा ,"असल क्रांति " वही होगी .

    @Tripurari kumar दूसरे कई वाजिब प्रश्नों के सामानांतर मै इस मुगालते में बिलकुल नहीं हूँ के ये "सच बनाम झूठ " या" लेखकीय सरोकारों " की लड़ाई है . ये दरअसल कौरवो के समूह से अलग हुए एक कौरव की अपने साथ हुए अनेपक्षित व्योवहार से उपजे "दर्शन "की बानगी है जो बाय चांस हिंदी साहित्य की भीतरी राजनीति के उन विकृत यथार्थों को इस तरीके से सामने रखती है . गौरव को मै "मौलिक विद्रोही" तभी मानता जो वे पूर्व में "किसी ओर" के साथ हुए अन्याय के विरोध में ये कदम उठाते पर तमाम असहमतियो के बावजूद केवल उनसे एक बिंदु पर सहमति बनती है पूर्व में छपी कहानी बाद में अश्लील कैसे हो गयी
    ( सम्बंधित कहानी की गुणवत्ता पर संदेह बने रहने के बावजूद )

    अंत में इतना ही कहूँगा हिंदी साहित्य में मैंने अक्सर लेखको को वास्तविक जिंदगी में पन्नो से इतर पाया है . जहाँ चीज़े सही ओर गलत के परिपेक्ष्य में न देखकर दूसरे कई लाभ हानि के पक्षों को देखकर तय की जाती है . इन्टरनेट ने चूँकि एक संवाद का जरिया दिया है जिससे चीज़े न केवल पारदर्शी हो जाती है अपितु उनसे उस विचार को एक बड़ा दायरा मिलता है जिससे आप सहमत भी हो सकते है ओर असहमत भी .पर स्वस्थ बहसे किसी समाज के लिए खाद का काम करती है .
    मेरी असहमतिया /सहमतिया बाकी मुद्दों पर जारी रहेगी .
    इस प्रकरण को मै यही समाप्त करता हूँ

  3. (दूसरी टीप )
    "may 27 कहते है साहित्यकार मानवीय मूल्यों का चौकीदार है जो दिन हो या रात अक्सर जागते रहो की हांक लगाता है .पर अब ऐसी "हांके "मुख्यधारा के सरोकारों से इतर दुनियादारी के दूसरे कई गैर जरूरी शोरो में धीमी पड़ गयी है या उलझ रही है .
    कुछ घटनाएं रूमानी लगती है पर अपने सामाजिक संदर्भो को लेकर वे कितनी मौलिक है कितनी ईमानदार है इसका उस वक़्त में कहना मुश्किल होता है . आने वाला वक़्त उनकी सही रूप रेखा उनके सन्दर्भ तय करता है पर अपने समांनातर वे कई अच्छी बुरी चीज़े लेकर चलती है ,किसी भी बहस में शामिल होने का "अतिरिक्त आग्रह " किसी भी बहस के लोकतान्त्रिक पक्ष को मजबूत नहीं करता .इस बहस में जो सहमति रखेगे वही लेखकीय आचार सहिंता का पालन करेगे ऐसा भी नहीं है .. किसी भी घटना को देखने की हर व्यक्ति की अपनी समझ अपनी दृष्टि होती है .अपने पास उपलब्ध तथ्यों ओर सूत्रों से वो किसी घटना की विवेचना करता है फिर अपनी राय देता है .वो सहमति में भी हो सकती है असहमति में भी .
    . "पक्षधरता" के आधार सिर्फ सिर्फ नैतिक ओर साहित्यिक माप दंड नहीं होते है .कभी कभी "लेखकीय सरोकार" पीछे हो जाते है है दोस्तिया फ्रंट पे आ जाती है .जाहिर है यही नियम असहमतियो पर भी सामान रूप से लागू होता है .तटस्थता के भी कई पक्ष होते है .एक वो जो किसी भी बहस के मूल बिंदु को लेकर संदेह में रहता है दूसरा वो जो किसी भी बहस के व्यक्तिपरक केन्द्रित होने के खिलाफ होता है तीसरे वे लोग हमेशा तटस्थ भूमिका में रहे है ,रहते आये है वे क्यों चुप है इसका जवाब शायद वही जानते है .असहमत होने वाले व्यक्ति तटस्थ रहने वाले तबके से ज्यादा ईमानदार होते है क्यूंकि वे स्पष्ट तो है .
    पर कुछ चीज़े ओर भी है जिन पर गौर किया जाना चाहिए
    लेखक जब लेखकीय सरोकारों को लेकर सार्वजानिक मंच पर विरोध दर्ज करता है उसमे असहमतिया व्यक्त करने का एक" लेखकीय आचरण "होता है .सूचना क्रान्ति के इस युग में जाहिर है उस पर इसे निभाने की एक अतिरिक्त जिम्मेदारी होती है ,भावावेश में भी इस संतुलन का इस गरिमा की क्षति हुई है ओर लगातार हुई है
    कहानी की रचनात्मक गुणवत्ता पे अब ईमानदार बातचीत नहीं होती . दोस्त लेखक कहानी की बुनावट पर कुछ असहमतिया व्यक्त करने से बचते है . लेखक में भी आलोचना के प्रति सहिष्णुता लुप्त हो रही है .कहानी की आलोचना को लेखक पर्सनल अटैक की मार्फ़त लेने लगे है . ऐसा क्यों है के कहानिया अब स्मर्तियो में नहीं रह पाती है ? .भाषाई जाल अचानक इतने महत्वपूर्ण हो गए है. कथा का कोनटेक्स्ट ,चरित्र ,मेसेज अस्पष्ट होने लगे है .भाषाई कौशल के अस्पष्ट से कई टुकडो में कही कहानिया खो तो नहीं रही है ?? कहानी कहाँ है ? क्या इन सबमे लेखक की ही भागेदारी नहीं है .
    ये बहस आलोचक की भी विश्वसनीयता को संदेह के घेरे में लाती है .वे ऐसी कहानीयो को फ्रंट पर क्यों रख रहे है जो शायद गुणवत्ता की दृष्टि से उत्कृष्ट नहीं है . क्या प्रकाशक का दबाव है या दोस्तिया निभाने की कुछ कवायादो में से एक . क्या आलोचकों ओर प्रकाशको का ये गठजोड़ पाठको के साथ छल नहीं है ?
    उम्मीद करता हूँ
    किसी दिन कोई अनजान बिना छपा लेखक अपनी असहमतिया दर्ज कराये तो उसे भी इन सब खानों में जगह मिलेगी ,उसके पक्ष में बड़े लेखक अपनी किताबे वापस लेगे या किसी पुरूस्कार को ग्रहण करने से मना करेगे ( वही असल क्रान्ति होगी .)"
    (

  4. तुम्हे क्या लगा गौरव ? किसी को "अमर सिंह" कहना क्या उसका सम्मान करना है ?हिंदी ब्लॉग पर चिटठा चर्चा पर मैंने खुद दोपहर में "छिनाल प्रकरण" के सामने आने पर इस पर लेख लिखा लिखा था.ओर लगातार इसके विरोध में शामिल रहा था इंटरनेट इसकी सनद है . सच कहूँ तो तुम्हारे इस प्रकरण पर अब कुछ कहना नहीं चाहता था बस प्रियदर्शन जी के लिए मन में बहुत सम्मान था इसलिए यहाँ ये टीप उनके लिए दी थी .उन्होंने भी यही कहा था हिंदी का सवाल गौरव से कही ज्यादा बड़ा है . जब देखा लोग चुप है तब अंतत यहाँ टीप दी . पता नहीं तुमने फेसबुक पर मेरी टिप्पणिया पढ़ी है जानकी पुल की पिछली पोस्ट पर या भूल गए ?ईमानदारी से अपनी राय रखना वही लिखना जो आप सोचते है ज्यादा अच्छा है बनिस्बत इसके के तटस्थ स्टेंड लिया जाए .
    मेरा संशय सिर्फ यही था ओर है जो मैंने तुमसे भी चैट में कहा था के एक लेखक किस आम व्यक्ति के अपेक्षा ज्यादा संवेदनशील होता है ज्यादा जागरूक उसके भीतर किसी दूसरे व्यक्ति की अपेक्षा चीजों को देखने की एक व्यक्ति को देखने की बेहतर दृष्टि होती है . एक ऐसा लड़का जो आई आई टी जैसे देश के विख्यात समूह से निकलता है लिखता पड़ता है वो किसी आम व्यक्ति की अपेक्षा ज्यादा समझदार है वो अपने आस पास रहे व्यक्ति या समूह को पहचाने में कैसे चूक कर सकता है ? या वो चीजों को जान बूझ कर तब तक इग्नोर करता है जब तक परिस्थितिया उसके अनुकूल जाती है .बावजूद इस संशय के कायम रहने के मैंने यही कहा के
    "गौरव के साथ रहने का सिर्फ कारण बनता है जो कहानी पहले छपी बाद में अश्लील कैसे ही गयी ".

    कुछ टिप्पणिया मिली है उन्हें यहाँ दे रहा हूँ .

    (पहली टीप त्रिपुरारी शर्मा के लेख न मै गौरव के साथ हूँ न कौरव पर फेस बुक पर है )
    पहली ओर जरूरी बात "शीर्षक " के साथ दौ सो फीसदी सहमति है !

    आप मेरे साथ है या आप गलत है ऐसा "अतिरिक्त आग्रह" किसी भी बहस में नहीं होना चाहिए विष्णु खरे जी से लेकर मंगलेश डबराल जी पर हालिया दिनों में लम्बी अंतहीन बहसे चली .कुछ उनमे सम्मिलित हुए कुछ नहीं .जाहिर है सबकी अपनी अपनी वजहे है अपने अपने तर्क है . कुछ कभी भी किसी भी बहस में शामिल नहीं होते ओर कुछ लोगो को देख रहा हूँ वो दोनों जगह "लाइक" का बटन दबा रहे है . हिंदी साहित्य की कई परते है उन परतो में सबके अपने अपने हिस्से के सच ! कई दिनों से इस लड़ाई के कई फोकस देख रहा हूँ ,असहमतिया व्यक्त करने में हिचक होती है ? असहमतियो को लोग निजी राग द्वेष में रख लेते है ओर आप को अपने दुश्मनों की फेरहिस्त में .
    गौरव एक प्रतिभा शाली लेखक है इसमें शायद किसी को भी दो राय नहीं है. उनकी कविताएं मुझे उनकी कहानियो से ज्यादा अपील करती रही है . गौरव इसे लेखकीय सरोकार की लड़ाई कहते है अलबत्ता मुझे ये" स्वाभिमान" की लड़ाई ज्यादा लगती है (अलबत्ता इसके तौर तरीके से मै इत्तेफाक नहीं रखता क्यूंकि कही कही गौरव सार्वजानिक मंच पर " बेहद पर्सनल" हो गए है शायद भावुकता ओर क्रोध के कारण ) उनके साथ केवल एक बात की सहमति बनती है के जो कहानी पहले छप चुकी है वो बाद में अश्लील कैसे हो गयी ( अलबत्ता इस कहानी को मै उनकी श्रेष्ट रचनाओं में नहीं रखता ).
    यदि भारतीय ज्ञान पीठ में व्यक्तिगत भ्रष्टाचार कई सालो से है तो पिछले चार पांच सालो में किसी एक के साथ तो हुए अन्याय के एवज में किसी दूसरे -तीसरे – या चौथे लेखक ने अपनी किताबे क्यों वापस नहीं ली क्यों . क्यों पुरूस्कार वापस नहीं लौटाए ? ,आखिर "असल क्रान्ति "तो यही होती है शायद ! किसी भी रचनाकार के भीतर आम व्यक्ति की अपेक्षा ज्यादा सजग दृष्टि होती है सरोकारों ,सवेद्नाओ ओर मानवीय मूल्यों को परखने में वह बेहद सम्पन्न होता है .उसके जीवन-व्यवहार में गम्भीर सृजनात्मक संतुलन होता है फिर भी लोग चूक गए ? अभी अभी अमर सिंह का एक बयान मै टाइम्स ऑफ़ इंडिया में पढ़ रहा था जिसमे वो जया बहादुरी के सीट बदलने को लेकर कहते है ये उनका निजी" सिलसिला "है .जाहिर है अमिताभ जिस" साथ" का "लाभ "उठाते वक़्त मौन रहे है उसकी "हानि "की जिम्मेवारी भी उन्हें उसी गरिमा से स्वीकारनी होगी . नेपाल की "निभा शाह "की एक बात याद आती है "एक दौर में क्रांतिकारी होना सरल होता है, लेकिन असल बात निरंतर क्रांतिकारी बने रहने की है. . पर अब दूसरा संशय है पुरुस्कार से शुरू होकर लेखकीय सरोकारों तक पहुंची की ये लड़ाई सार्वजानिक मंचो पर पर्सनल होते हुए "अश्लील" ना हो जाए .

  5. बेफिक्र होकर कभी भी पूरी बात डालें, लेकिन मेरी और अपनी, दोनों की 🙂 मैं जो प्राइवेट में हूं, वही पब्लिक में हूं.

    आपकी तुलना इसीलिए प्रियदर्शन से की, कि आपको जो शंकाएं थीं, उनके जवाब पब्लिक स्पेस में तो दिया ही था, पर्सनली भी दिया था गिरिराज की वाल पर आपके एक कमेन्ट के बाद. ऐसा कई लोगों को दिया था. विमल को भी. वे भी उसके बाद चुप रहे. ये तक नहीं लिखा कि क्या सोचा, क्या समझा. बचपने में यह समझ बैठा था कि कुछ लोगों के जेनुइन शक हैं, कुछ तय करके नहीं बैठे. यही सब कहा था, जो इस लेख में लिखा. लेकिन तब आपने न नए सवाल उठाए और मेरे जवाब सुनकर चुप हो गए. आप नहीं करेंगे तो मैं वह चैट सार्वजनिक कर सकता हूं. हर एक आदमी की चैट और फोन रिकॉर्ड भी कर सकता हूं. लेकिन कितना घुसूं कीचड में? अपने जवाब देखिये उस चैट में. कितने जब किसी के कुछ कहने के बाद दूसरा ह्म्म्म कहे, लेकिन दो हफ्ते बाद फिर से वही बात कहे तो इसका अर्थ क्या सिर्फ मन में पाले पूर्वाग्रह नहीं हैं?

    मुझे इसी का दुःख होता है. फिर तो सवाल जवाब का कोइ अर्थ ही नहीं. जब बार बार मेरे बोलने के बाद वही सवाल दोहराने हैं जैसे मेरी बात सुनी ही न जा रही हो. मैंने बहुत वक्त बर्बाद किया है हिन्दी से जुड़े लोगों पर. वे अपने छोटे छोटे खोल में सिमटकर रहते हैं और उसके बाहर नहीं निकालना चाहते. किसी के बुरे नहीं बनाना चाहते. खासकर सत्ता के तो कभी नहीं. क्या पता कल ज्ञानपीठ किताब छापने लगे. हिन्दी अकादमी से कुछ फ़ायदा हो जाए. ऐसा बोलें तो जनसत्ता कभी नहीं छापेगा हमें. ऐसा बोलें तो राजकमल नाराज़ हो जाएगा, ऐसा बोलें तो राजेन्द्र यादव. इसी चक्कर में उम्र बीत जाती है. मैंने सच में बेवकूफी में बहुत वक्त बर्बाद किया है. और नहीं करूँगा.

    और इसे प्लीज़ पर्सनल न बनाएँ. मुद्दे की बात करें, ये नहीं कि गौरव ने किस पत्र में क्या लिखा. मान लीजिए कि कुछ गलत भी लिखा हो आपकी नज़र में लेकिन क्या उससे ज्ञानपीठ या कोइ प्रकाशक सही सिद्ध हो जाता है? आप उस पक्ष पर टिप्पणी करने से लगातार बचे हैं. गौरव हद दर्जे का घटिया आदमी हुआ होगा और इसलिए मेरी आलोचना तो बार बार कीजिए लेकिन उनके अपमानजनक रवैये पर भी कभी कुछ तो कहिये. इतना भर कि ज्ञानपीठ की इस हरकत की आलोचना की जानी चाहिए. आपने एक बार भी सार्वजनिक रूप से ऐसा कहा हो तो प्लीज़ शेयर कीजिए. मेरी नज़रों में इज्ज़त हो जाएगी आपकी. नहीं कहा हो तो यही समझूंगा कि मुझे दस जगह बुरा कहा लेकिन ज्ञानपीठ से डरते रहे. और यह सिर्फ आप के लिए नहीं है. बहुत लोग हैं ऐसे. बाकी यही लिखता रहूँगा बार बार तो कोई फ़ायदा नहीं. मुझे माफ कीजिए. अपनी दुनिया रचिए और उसमें सुख से रहिये.

    बात पहले ही बहुत भटक चुकी है. मैं महत्वपूर्ण नहीं हूं, मुद्दा है. विदा!

  6. हा हा हा !
    जानकीपुल ओर फेसबुक पर मेरा स्टैंड इस मुद्दे पे शुरू से एक ही है भाई . इन्टरनेट इसकी सनद है . तुम्हारा मेरे मेसेज बॉक्स में "अपना पक्ष" रखने के बावजूद !ओर ये बात मैने चैट में भी कही थी कहे तो डाल दूँ !

  7. निजी दुश्मनों की फेहरिस्त में किसने किसे रखा सर? मैंने कोई गालियाँ थोड़े ही दी हैं. हवा में नहीं कह दिया कि मैं सही हूँ और कोइ और गलत. तर्क दिए हैं, उन पर आप वैसे ही बात नहीं कर रहे, जैसे प्रियदर्शन जी ने नहीं की थी. तर्क से बात कीजिए, धारणाओं से नहीं. संतुलित होना या न होना महत्वपूर्ण है या सही होना?

    और उम्मीद करता हूँ कि आपकी प्रतिक्रियाओं में यह तथ्य कभी वजह नहीं बनेगा कि मैंने कुछ हफ्ते पहले आपको फेसबुक में अपनी लिस्ट से हटाया. पहले बेहतर रहा कोई व्यक्ति कभी हमारे लिए इसलिए कम बेहतर न हो जाए कि वह फेसबुक पर हमारे मैसेज का जवाब नहीं देता और हमें अपने दोस्तों में नहीं रखना चाहता.

    सादर!

  8. अमर सिंह- अमिताभ प्रकरण याद है आपको ? संबंधो के खात्मे पर अमिताभ जैसे लोग क्यों किसी प्रतिक्रिया से बचते रहे क्यूंकि वे जानते थे जिन संबंधो का लाभ उठाते हुए वो चुप रहे है उनकी हानि की जिम्मेवारी भी उन्ही की है .
    सार्वजानिक असहमतियो में एक अनुशासन होता है खास तौर से उस वक़्त जब वे किसी साहित्यिक उद्देश्य को लेकर चली हो इस पूरे प्रकरण में पहले पत्र से इसका अभाव है . "जो मेरे साथ नहीं वे गलत" ओर अपने साथ हुए असहमतो के साथ असहमत होने की उनकी जिद बरकरार है . ये किसी परिपक्व व्यक्तित्व का रिफ्लेक्शन नहीं देती पहले लोगो से चुप्पी तोडने का " अतिरिक्त आग्रह " फिर कुछ लोग गर अपनी राय रखते है जिसमे कुछ बिन्दुओ पर असहमति का स्वर भी भी है तो उन्हें गलत करार दे कर अपने " निजी दुश्मनों "की फेरहिस्त में रखना दुर्भाग्यपूर्ण है . प्रियदर्शन जी ने बेहद संतुलित दृष्टिकोण से अपना नजरिया रखा है ,जिसमे किसी एक भी व्यक्ति के पाले में पक्ष खड़ा नहीं दिखता . कम से कम उन्होंने कुछ कहा तो है तटस्थता की "समझदारी भरी चुप्पी" या केवल "फेसबूकिया लाइक" करके काम तो नहीं चलाया .साहस केवल विरोध करने में नहीं है साहस असहमतियो को उसी गरिमा से स्वीकारने में भी है इस पूरे प्रकरण में कई बातो के साथ ये बात भी पता चलती है की एक क्षेत्र विशेष में पारंगत व्यक्ति जीवन के दूसरे व्योव्हार में उतना ही बेहतर हो ये जरूरी नहीं .

  9. इसमें कुछ नया नहीं. और मेरे स्टैंड में भी कुछ नया नहीं
    मैं आपके साथ हूँ गौरव!

    और इसमें यह 'शान' शामिल है कि छिनाल प्रकरण के बाद न तो मैं वर्धा के दरवाजे पर गया, न कालिया साहब के दरबार में …कभी-कभी मैं कहना अच्छा भी लगता है.

  10. इस प्रसंग को पढ़ते हुए एक शेर याद आया:

    शिकवा कोई दरिया की रवानी से नहीं है
    रिश्‍ता ही मेरी प्‍यास का पानी से नहीं है।

    दूसरा वही मुक्‍ितबोध याद आए—

    ये दुनिया जैसी भी है इससे बेहतर चाहिए
    इसे साफ करने के लिए
    एक मेहतर चाहिए।

    इस प्रसंग से बार बार गुजरना वाकई बहुत दुखद है।

  11. गौरव जी प्रियदर्शन जी का मैं बहुत आदर करता हूं, लेकिन जनसत्‍ता में उन्‍होंने जो लिखा वह उनके कद और समझ के अनुकूल नहीं था। मैं तो लेख पढ़कर यह निष्‍कर्ष निकाल रहा हूं कि उन्‍होंने पूरे विवाद को ठीक से समझे बिना ही आपको कठघरे में खड़ा कर दिया है। मुझे प्रियदर्शन जी से ऐसी नासमझी की उम्‍मीद नहीं थी। आपने पूरे तथ्‍यों और शब्‍दों की शालीनता से उन्‍हें जबाव दिया है… उम्‍मीद है प्रियदर्शन जी को सच समझ आएगा…

  12. गौरव का जवाब मात्र जवाब ही नहीं , अपितु , उन सब लेखकों की मन की बात है .. इतने अच्छे , सटीक और balanced उत्तर के लिए सलाम काबुल करे गौरव.
    afterall , मैं भी एक छोटा सा लेखक हूँ और आपकी यहांपर लिखी बात मेरे मन को भी प्रतिनिधित्व देती है .

    प्रभात रंजन को भी बधाई , इस लेख के लिए.

    विजय

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