लोग कहते हैं कि उम्मीद से चलता है जहाँ

7

आज युवा कवि त्रिपुरारि कुमार शर्मा की गजलें- जानकी पुल.
======================================= 

1.
नज़र, नज़र नहीं आती, कभी नज़र से जुदा
मैं उसके पहलुओं में होता हूँ ख़बर से जुदा
तज़ुर्बा इश्क़ के जंगल से मिला है मुझको
राहजन हो नहीं सकता है राहबर से जुदा
आह! परवाज़, हवाओं ने डस लिए शायद
मैंने देखा है परिंदों को उसके पर से जुदा
इस तरह मैंने गुज़ारी है ज़िंदगी अपनी
मैं रोज़ चलता रहा और रहा सफ़र से जुदा
न मैं क़रीब किसी के, न कोई पास था मेरे
तमाम उम्र रहा हूँ मैं अपने घर से जुदा
इसके बदले वो मेरी उम्र ज़रा कम कर दे
मगर मैं रह नहीं सकता हूँ गुलमोहर से जुदा
2.
अगर ज़िंदा रहीं आँखें नज़ारा हम भी देखेंगे
सहर तक कौन जलता है सितारा हम भी देखेंगे
कोई देखे हमारी सूरतें भी धज्जियाँ कर के
किसी का टूटता चेहरा कुँआरा हम भी देखेंगे
मेरे सीने में अपनी धड़कनें तुम कैसे भरती हो
ज़रा-सा हौसला यूँ ही तुम्हारा हम भी देखेंगे
जिगर के ख़ून से रोशन दिया जो बुझ नहीं पाया
कहाँ तक कैसे होता है गुज़ारा हम भी देखेंगे
ये जो तूफ़ान की मानिंद हम पर फूटते हो तुम
लहर में कौन देता है सहारा हम भी देखेंगे
3.
तुमने आवाज़ न दी फिर भी सदा आ ही गई
इतना रोया हूँ कि हँसने की अदा आ ही गई
मेरे क़ातिल ने मुझे जब लहू में तर देखा 
तो उसके काँपते होंठों पे दुआ आ ही गई
यही एहसास मुहब्बत की तरह लगता है
मैंने चाहा भी नहीं और शिफ़ा आ ही गई
किस तरह फूल अब महकेंगे देखना तुम भी
दिल के बाग़ों में मुहब्बत की हवा आ ही गई
हर एक शख़्स के हिस्से में सब नहीं आता
हुआ अच्छा तेरे हिस्से में वफ़ा आ ही गई
लोग कहते हैं कि उम्मीद से चलता है जहाँ
मौत की शक्ल में दर्दों की दवा आ ही गई
जाने क्या सोचकर हम आज तलक़ ज़िंदा रहे
तुम न आए हो मगर आज क़ज़ा आ ही गई
4.
ये जो चेहरे पे चिपकती हुई-सी आँखें हैं
ब-रंग-ए-स्याह चमकती हुई-सी आँखें हैं
मैं उसकी कूह पर क़ुर्बान हुआ जाता हूँ
वो एक बाग़
, चहकती हुई-सी आँखें हैं
तमाम रात मैं तस्वीर से गुज़रता हूँ
तमाम रात महकती हुई-सी आँखें हैं
एक वीराना सँवर जाए कहीं चुपके से
फूल हों जैसे चटकती हुई-सी आँखें हैं
कभी मदहोश नज़र आए कभी कर जाए
सूरत-ए-जाम बहकती हुई-सी आँखें हैं
ताक ले जिसको वही शै अमीर हो जाए
दिलों में रोज़ दहकती हुई-सी आँखें हैं
न जाने कैसी मुसीबत की घड़ी आई है
किसी के ग़म में बरसती हुई-सी आँखें हैं
5.
एक तस्वीर है कच्ची-सी नज़र रखती है
ख़ुद रात ज्यूँ स्याही में सहर रखती है
मेरी ख़ातिर दुआएँ बाँधते हैं बाबूजी
और माँ है दुआओं में असर रखती है 
कोई मौसम तेरे होने का पता रखता है
कोई आहट तेरे आने की ख़बर रखती है
मैंने सोचा कि ज़रा पी लूँ तो कुछ उम्र बढ़े
निगाह-ए-यार भी क़ातिल है ज़हर रखती है
कुछ ये कहते हैं कि हर शेर बड़ा उम्दा है
कुछ ये कहते हैं मेरी ग़ज़ल बहर रखती है
6.
एक वादा निबाहना है मुझे
उम्र भर तुमको चाहना है मुझे 
अब तो सदियों नहीं मिलोगी तुम
अब तो सदियों कराहना है मुझे 
तेरी खुशियों को चूम कर लब से
तेरे ग़म को सराहना है मुझे 
किसी भी सिम्त अब सफ़र क्यूँ हो
आपकी सिम्त राह ना है मुझे 
मेरी चाहत में जंग लग-सी गई
कोई पूछे कि आह ना है मुझे 
एक भोली-सी आँख की मस्ती
उम्र भर जिसको चाहना है मुझे 
7.
वो मेरे बाजुओं में यूँ आई
जैसे टूटी हो कोई अंगराई
जान बच जाती है गनीमत है
बुरी होती है शाम-ए-तन्हाई
आँख खुलती है तो डर लगता है
हो न जाए किसी की रुसवाई
दिल ने महसूस किया है तुमको
लोग कहते हैं कि बहार आई
ज़िंदगी मेरी मुक़्क़मल न हुई
मौत भी हो गई है हरजाई
वो, जो मायूस नज़र आते हैं
हौसला क्या करेंगे अफ़जाई
सबको तन्हा ही जाना पड़ता है
काम आती नहीं शनासाई
8.
ज़बां पे आई हुई बात ठहर जाती है
जिस तरह आँख में बरसात ठहर जाती है
गुज़र तो जाती है ये उम्र भी क़तरा-क़तरा
दिल के गोशे में कोई रात ठहर जाती है
मैंने माना कि कोई बात नहीं बातों में
चलते-चलते ही मगर बात ठहर जाती है
जब मुझे प्यार का एहसास हुआ करता है
वक़्त के साथ-साथ ज़ात ठहर जाती है
तुम मेरे साथ मगर पास कहाँ होती हो 
ऐसे लम्हों में मुलाक़ात ठहर जाती है  
9.
नज़र में तीरगी है कोई सवेरा नहीं है अब
उसे मैं देख लेता हूँ मगर मेरा नहीं है अब
कोई रिश्ता नहीं बचा हमारे दर्मियां लेकिन
यही रिश्ता है कि कोई रिश्ता नहीं है अब
मुझे गुमान था कि उम्र भर तुम मेरे ख़ुदा हो
तेरे जमाल से ये ज़ीस्त दरख़्शां नहीं है अब
किस मंज़िले-हयात पर आ कर रूकी है बेबसी
किसी भी आँख में मेरे लिए दरिया नहीं है अब
कुछ तो मायूस हूँ ख़ुद से कुछ तुम्हारा ग़म भी है
दिल जानता है सबकुछ पर कहता नहीं है अब
जाने किसकी नज़र-सी लग गई है सारे आलम को
सुना है इश्क़ के हक़ में दुआ करता नहीं है अब
चलो माना कि तुम भी दफ़्फ़तन धोखा नहीं दोगे
बात ये मान तो ली है पै
भरोसा नहीं है अब
10.
हज़ारों रंग हो जिसमें, शबाब क्या होगा
तुम्हारे जिस्म से बढ़कर गुलाब क्या होगा 
दिले-ग़रीब की मानिंद जो जला हर शब
तो उसके जैसा कोई माहताब क्या होगा
वो एक शख़्स जिसे दुनिया ग़म-नसीब कहे
नसीब उसका मुझसे ख़राब क्या होगा
नींद की सतह पर तुम रोज़ आ जाया करो
तेरे बग़ैर जो देखूँ तो ख़्वाब क्या होगा
बड़ी ख़ामोशी से यूँ ज़ीस्त में शिरकत होना
हसीन इससे बेहतर भी बाब क्या होगा
For more updates Like us on Facebook

7 COMMENTS

  1. behad umda gazalen….Tripurari har vidha mein alag rang bharte hai…inki gazalen pahle bhi suni hain padhi hain, har baar pahle se purasar lagti hain….mubaraq chhote ustad

  2. tripurari ki kavitayen mujhe bahut psnd hain .. lekin ghazlen bhi sundar hain.. kaise bharti ho tum mere seene me dhadkane.. kai sher laajvaab hain.. badhai..

  3. Gazal sahee bahr mein ho to uskaa mazaa kuchh aur hee hai . T.K . Sharma
    kee gazalon ke bhaav yun to man ko chhoote hain lekin unke adhikaansh
    ashaar bahron se gire hue hain . Sharma ji ek chhotee bahr 2 1 22 12 12 22
    ( vo mere baazuon mein yun aaee ) ko pooree gazal mein sahee dhang se nibhaa nahin paaye .

  4. "आह! परवाज़, हवाओं ने डस लिए शायद
    मैंने देखा है परिंदों को उसके पर से जुदा
    इस तरह मैंने गुज़ारी है ज़िंदगी अपनी
    मैं रोज़ चलता रहा और रहा सफ़र से जुदा"
    "लोग कहते हैं कि उम्मीद से चलता है जहाँ
    मौत की शक्ल में दर्दों की दवा आ ही गई "
    "ताक ले जिसको वही शै’ अमीर हो जाए
    दिलों में रोज़ दहकती हुई-सी आँखें हैं
    सभी ग़ज़लें अलग ढब की हैं. प्यार की ज़मीन की उर्वरा शक्ति देखते बनती है. अच्छा लगा इनसे गुज़रना. बधाई नौजवान शायर को.

LEAVE A REPLY

18 + fourteen =