सआदत हसन मंटो: ख़ाली बोतल भरा हुआ दिल

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सआदत हसन मंटो की जन्मशताब्दी का साल चल रहा है. पढ़िए उनके ऊपर कृशन चंदर का एक दिलचस्प संस्मरण- जानकी पुल.
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एक अजीब हादसा हुआ है मंटो मर गया है, गो वह एक अर्से से मर रहा था। कभी सुना कि वह एक पागलखाने में है, कभी सुना कि यार दोस्तों ने उससे संबंध तोड लिया है, कभी सुना कि वह और उसके बीवीबच्चे फ़ाकों पर गुजर कर रहे हैं बहुत सी बातें सुनीं। हमेशा बुरी बातें सुनीं,लेकिन यक़ीन आया, क्योंकि एक अर्से में उसकी कहानियां बराबर आती रहीं अच्छी कहानियां भी और बुरी कहानियां भी ऐसी कहानियां जिन्हें पढकर मंटो का मुंह नोंचने का दिल चाहता था, और ऐसी कहानियां भी, जिन्हें पढकर उसका मुंह चूमने को जी चाहता था। यह कहानियां मंटो के खैरियत के ख़त थे। मैं समझता था, जब तक ये ख़त आते रहेंगे,मंटो ख़ैरियत से है क्या हुआ अगर वह शराब पी रहा है, क्या शराबखोरी सिर्फ साहित्यकारों तक ही सीमित थे ? क्या हुआ अगर वह फ़ाके कर रहा है ,इस देश की तीनचौथाई आबादी ने हमेशा फ़ाके किए हैं। क्या हुआ अगर वह पागलखाने चला गया है, इस सनकी और पागल समाज में मंटो ऐसे होशमंद का पागलखाने जाना कोई अचम्भे की बात नहीं अचम्भा तो इस बात पर है कि आज से बहुत पहले पागलखाने क्यों नहीं गया। मुझे इन तमाम बातों से ना तो तो कोई हैरत हुई, कोई अचम्भा हुआ। मंटो ख़ैरियत से है, ख़ुदा उसके कलम में और ज़हर भर दे। 
मगर आज जब रेडियो पाकिस्तान ने यह ख़बर सुनाई कि मंटो दिल की धडकन बंद होने के कारण चल बसा तो दिल और दिमाग़ चलतेचलते एक लम्हे के लिए रूक गए। दूसरे लम्हे में यक़ीन आया। दिल और दिमाग़ ने विश्वास किया कि कभी ऐसा हो सकता है निमिष भर के लिए मंटो का चेहरा मेरी निगाहों में घूम गया। उसका रोशन चौडा माथा, वह तीखी व्यंग्य भरी मुस्कुराहट, वह शोले की तरह भडकता दिल कभी बुझ सकता है दूसरे क्षण यक़ीन करना पडा। रेडियो और पत्रकारों ने मिल कर इस बात का समर्थन कर दिया। मंटो मर गया है। आज के बाद वह कोई नयी कहानी लिखेगा। आज के बाद उसकी ख़ैरियत का कोई ख़त नहीं आएगा। 
अजीब इत्तेफ़ाक़ है। जिस दिन मंटो से मेरी पहली मुलाक़ात हुई, उस रोज मैं दिल्ली में था। जिस रोज़ वह मरा है,उस रोज़ भी मैं दिल्ली में मौजूद हूं। उसी घर में हूं, जिसमें चौदह साल पहले वह मेरे साथ पंद्रह दिन के लिए रहा था। घर के बाहर वही बिजली का खंभा है, जिसके नीचे हम पहली बार मिले थे। यह वही अण्डरहिल रोड है, जहां आल इंडिया रेडियो का पुराना दफ्तर था, जहां हम दोनों काम करते थे। यह मेडन होटल का बार है, यह मोरी गेट, जहां मंटो रहता था, यह वह जामा मस्जिद की सीढियां हैं, जहां हम कबाब खाते थे,
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6 COMMENTS

  1. janaki pul, as far as i know i remember that this named story was given first prise in sahara samay kahani pratiyogita. yes, winner was prabhat ranjan. if i am not wrong that's why you named your blog janaki pul. i think i am right.

  2. जानकी पुल
    शुभ कामनाएं
    बहूत सुंदर प्रस्तुती
    मुझे आज भी याद है १९५० में कहा करते थे ओप्ड़ दी गुड़ गुड़
    बे ध्याना दी ग्लेक्सी मुंग दी दाल दुर फिटे मुहं तब पता नहींथा तोबा टेक सिंह (काश आज भी ऐसे लेक्ख हों
    आभार गुड्डो दादी चिकागो यूं एस ऐ

  3. जानकीपुल में सआदत हसन मंटो पर कृष्ण चंदर का बेहतरीन संस्मरण पढ़ कर आज सुबह की खूबसूरत शुरूआत हुई। धरती से विदा होने से पहले वरिष्ठ विज्ञान लेखक डा. रमेश दत्त शर्मा मुझे किताब घर से प्रकाशित मंटो की कहानियों का संकलन भेंट कर गए थे। आज उसमें से कुछ कहानियां पढ़ूंगा, ‘टोबा टेकसिंह’ भी एक बार और।
    देवेंद्र मेवाड़ी

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