‘कान्हा सान्निध्य’ पर वरिष्ठ कवि राजेश जोशी का पत्र

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कान्हा प्रकरण पर विष्णु खरे के विवादास्पद लेख के सन्दर्भ में वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने यह पत्र उस समाचार पत्र ‘प्रभात वार्ता’ को लिखा है जहां विष्णु खरे का लेख पहले प्रकाशित हुआ था. आपके लिए- जानकी पुल.
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राजेश जोशी
११ निराला नगर, भदभदा रोड भोपाल ४६२००३
प्रिय भाई,
कान्हा में शिल्पायन के ‘सान्निध्य’ शीर्षक से आयोजित कविता समारोह पर विष्णु खरे की द्विअर्थी-अश्लील शीर्षक वाली हास्यास्पद और कुछ वरिष्ठ तथा लगभग पच्चीस से अधिक युवा और युवतम कवियों पर घृणा और हिंसा से भरी जो कुत्सित टिप्पणी आपने 2 सितम्बर 2012 के रविवार्ता में प्रकाशित की है, उस पर टिप्पणी करने की न तो मेरी कोई इच्छा है ना ही मुझे यह ज़रूरी लगता है। लेकिन इसमें कुछ तथ्यात्मक भूलें हैं जो इस ख़ाक़सार से सम्बन्धित हैं उनका स्पष्टिकरण किया जाना मुझे ज़रूरी लग रहा है, इसलिए यह पत्र लिख रहा हूँ।

१.     मैंने अपने पिता की स्मृति में किसी पुरस्कार की कोई स्थापना नहीं की है। मेरे पिता पं. ईशनारायण जोशी संस्कृत के विद्वान थे। संस्कृत के साथ ही उर्दू और गुजराती भाषा पर भी उनका समान अधिकार था। संस्कृत से उन्होंने कई महत्वपूर्ण अनुवाद किये हैं। उन्होंने लगभग 300 से अधिक लेख और टिप्पणियाँ भी अनेक विषयों पर लिखीं हैं। तीस के दशक के उत्तरार्ध में उन्होंने जयपुर के एक महत्वपूर्ण केन्द्र से धर्मशास्त्र का अध्ययन किया था। वर्ष 2007 में उनके निधन के बाद मेरे सहित उनके पाँच पुत्रों ने अपने निजी साधनों से एक न्यास की स्थापना की है। यह न्यास इसी पूंजी से प्रति वर्ष पं. ईशनारायण जोशी की स्मृति में एक स्मृति -व्याख्यान का आयोजन करता है। इस स्मृति -व्याख्यान के अन्तर्गत – परंपरा और आधुनिकता, तुलसी की कविताई,पुनर्जागरण और स्वाधीनता संग्राम में भगवत् गीता की भूमिका,संस्कृत नाटकों का काल संवादी स्वर और मोहनजोदाड़ो विषयों पर श्री अष्टभुजा शुक्ल, श्री केदारनाथ सिंह, श्री कमलेश दत्त त्रिपाठी, श्री श्रीनिवास रथ और श्री ओम थानवी के व्याख्यान हो चुके हैं। इस वर्ष इस आयोजन के तहत डॉ. भगवान सिंह ऋगवेद और आधुनिक इतिहास विषय पर व्याख्यान देंगे। हमने इस आयोजन की कोई स्मारिका भी आज तक प्रकाशित नहीं की है। किसी तरह का कोई विज्ञापन अथवा किसी तरह का कोई निजी या सरकारी अनुदान भी आज तक नहीं लिया गया है। इसमें किसी भी प्रकार की कोई संदिग्ध संस्था का सहयोग नहीं लिया गया है। सिर्फ केन्द्र सरकार के उपक्रम राष्ट्रीय तकनीकी शिक्षक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान द्वारा इसे अपना सभागार बिना किसी शुल्क के उपलब्ध कराया जाता है।

२.     श्री लीलाधर मंडलोई ने इस आयोजन के लिये जो भी मदद की है या की होगी उसमें मुझे कुछ भी अनुचित नहीं लगता। जबलपुर में लेखकों को कुछ घंटों के लिये रूकने,हाथ-मुँह धोने आदि के लिये रेल्वे स्टेशन पर बने अतिथि गृह ( रिटायरिंग रूम्स ) में ही प्रबंध किया गया था। संभवतः इसमें लीलाधर मंडलोई की कोई भूमिका नहीं थी। स्मारिकाओं में विज्ञापन दिलवाने के लिये किसी पद के दुरूपयोग की आवश्यकता नहीं होती। विष्णु खरे जी ने हिन्दी के लेखकों को लगभग भिखमंगा बना दिया है। वो खुद भी अच्छी तौर से जानते हैं और नहीं जानते हैं तो जानना चाहिये कि आज के किसी भी कवि लेखक को आकाशवाणी या दूरदर्शन के असाइनमेंट का लालच नहीं लुभाता । उन्हें (विष्णु खरे जी को) लुभाता हो तो पता नहीं?

३.     खरे जी ने लिखा है कि कौन लेखक है जो प्रकाशकों का लाडला नहीं बनना चाहता?इस आरोप की रोशनी में क्या एक बार विष्णु खरे जी स्वयं को देखना नहीं चाहते? पूछा जा सकता है कि हिन्दी का एक बड़ा प्रकाशक विष्णु खरे जी को फ्रैंकफर्ट ((जर्मनी में होने वाले पुस्तक मेले में अपने खर्च पर क्यों लेकर गया था?आपने अपने रसूख से उसके कौन से हित साधने का लालच उसे दिया था? सोवियत संघ के विघटन से पहले और जर्मनी के एकीकरण से पहले आप पर पश्चिम जर्मनी की एम्बेसी क्यों इतनी मेहरबान थी? वो कौनसी ताकतें थीं जो महीनों और बरसों आपको जर्मनी में रहने और बार बार विदेश जाने के लिये आमन्त्रित करती रहती थीं?

४.     आपने मेरे मैच-फिक्सिंग की जाँच के लिये तो कुमार अम्बुज और नीलेश रघुवंशी से अनुरोध कर दिया है लेकिन आप जो आये दिन विदेशी दौरे करते रहते हैं,विदेशों की एम्बेसियों से अपने सम्बंध बनाये रहते हैं,नवभारत टाइम्स में रहते हुए उसके मालिकों से जो मैच -फिक्सिंग आपने की उस पर कौन नज़र रखेगा? क्यों आपको (खरे साहब को) हमेशा से पूंजीवादी या साम्राज्यवादी देशों की एम्बेसियाँ ही इन्टरटेन करती रहीं? शीतयुद्ध जब समाप्त नहीं हुआ था, उस समय आपकी भूमिका क्या थीं? खरे साहब जानते होंगे की नवभारत टाइम्स में उनके सहकर्मी उन्हें सी .आई .ए. का एजेन्ट कहा करते थे।

५.     खरे साहब ने भोपाल के तीन लेखकों द्वारा भारतीय जनता पार्टी की सरकार की सांस्कृतिक नीतियों और कार्यकलापों के बारे में जारी किये गये परिपत्रों का हवाला देकर कई सवाल उठाये हैं। इस टिप्पणी में भी उन्होंने महत्वाकांक्षी व्यक्तियों द्वारा चलायी जाने वाली संस्थाओं और उनके कार्यकलापों पर सवाल खड़े किये हैं। मैं कहना चाहता हूँ कि व्यक्ति और सरकार या किसी शक्ति संरचना में फर्क किया जाना चाहिये। अनेक व्यक्ति अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं के चलते कई किस्म की अ-पोलेटिकल ( गैरराजनीतिक ) स्पेसेस साहित्य के लिये निर्मित करते हैं। ऐसी किसी भी लोकतान्त्रिक स्पेस में दूसरी और विरोधी विचारधारा से जुड़े लोगों के साथ भी संवाद करना संभव होता है। होना चाहिये। उनके साथ संवाद किया जाना चाहिये। उनके साथ रचना पाठ भी किया जाना चाहिये। मुझे इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता। कान्हा में युवा कवि गिरिराज किराड़ू द्वारा जो छोटी सी टिप्पणी पढ़ी वह लगभग मार्क्सवाद विरोधी थी। क्या वागीश सारस्वत की ही तरह किरिराज किराड़ू के साथ भी किसी प्रगतिशील जनवादी को एक मंच पर नहीं बैठना चाहिये? तो फिर तो यह सवाल भी उठेगा कि श्री विष्णु खरे के साथ भी किसी प्रगतिशील जनवादी को एक मंच पर कविता क्यों पढ़ना चाहिये? विचारधारा के ही मामले में नहीं सैकयूलरिज़्म के बारे में भी विष्णु खरे की विश्वसनीयता उतनी ही संदिग्ध है जितनी वागीश सारस्वत की है।
 
       आपका
       राजेश जोशी
      सितम्बर १२
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15 COMMENTS

  1. Is baat main sachaaee hai ki shilpayan anya bahut se Hindi prakashakon ki tarah royalty lekhkon nahin deta. Iski pushti ek aise lekhak ne mujh se ki hai jiski do kitaaben shilpayan se chhap chuki hai. Doosari baat kaun si aisee majboori lekhkon ke samane rahti hai ki kisi ke bulave par kahin bhi jaane ke liye taiyar ho jaate hain. Yahi nahin kisi bhi aisee sansthan se apne ko jod lete hain jinke malik har tarah ke ulte seedhe dhanda karne me mahir hote hain. Durbhagya se aaj bhi pragatisheel aur janvaadi lekhakon se dosti gaanth kar log samskriti ki duniya main apni saakh banana chahte hain taki shiksha aur sanskriti ka unka vyavsaay chal sake. Is judaav main na to vichardhara ki koi bhumika hoti hai aur nahi sadashyata ki. Yah sahi hai ki aisee chijon ka virodh karne wale khud sahi hon jaroori nahin hai. Lekin aise virodh ka jawab dekar aamtaur par apne ko aur hasyaspad hi bana ja sakta hai.

  2. अजैण्‍डा की बात हमेशा ही महत्‍वपूर्ण रहेगी अन्‍यथा अस्‍थायी तौर पर ही सही, एक ऐसा समूह बनता चला जाता है जहाँ पक्षधरता के प्रश्‍न गौण होने लगते हैं और उसके जोखिम से भी बचने की गलियॉं निकल आती हैं। किसी असुविधाजनक सवाल से सार्वजनिक रूप से नहीं टकराना पड़ता और किसी के प्रति कोई जवाबदेही नहीं बनती। सिर्फ तुर्की-बतुर्की आपसी मुँहजोरी और लटठमलटठा होती रहती है। फिर तर्क समाप्‍त होने लगते हैं और कुतर्कों का एक दौर शुरू होता है जो एक आपसदारी की तरह एक-दूसरे की रक्षा में और हर उस आदमी के खिलाफ आक्रमण में जुट जाता है जो उन्‍हें असुविधाजनक प्रतीत होता है। विचार गायब हो जाता है। जो भी उन्‍हें उनके खिलाफ लगता है, वह भले ही उचित और वैचारिक बात कह रहा हो, शत्रु की तरह दिखता है। कोई किसी अन्‍य बात पर हँस भी रहा हो तो उन्‍हें लगता है कि उन पर ही हँसा जा रहा है।

    हम सब सहमत होंगे कि किसी भी आयोजन में भागीदारी के कुछ आधारभूत कारण और औचित्‍य तो बनाना ही होते हैं। तथाकथित डेमोक्रेटिक स्‍पेसेज के बरअक्‍स ही हम वैचारिक संगठन बनाते हैं क्‍योंकि हमें लोकतांत्रिकता के नाम पर ऐसी जगहें नहीं चाहिए कि हाट-बाजार जैसी चिल्‍लपों मच जाए। 'अराजकता भरी और सुविधाजनक लोकतांत्रिकता' और 'अनुशासन/प्रतिबद्धता प्रेरित लोकतांत्रिकता' में हमेशा ही फर्क है। हमारी आकांक्षा क्‍या है, यह हमें समझना चाहिए। और हमें यदि किसी अन्‍य तरह से चुनाव और भागीदारियॉं करना है तो फिर वामपंथ वगैरह का राग छोड़ देना चाहिए। आप जैसे हैं, वैसे दिखें और घोषित करें। एक कौर पपीते का और एक घूँट अल्‍कोहल। इस तरह से अल्कोहल की मस्ती आ सकती है पर अल्कोहल के खतरे कम नहीं होते अंतर्विरोधों को समझते हुए, व्‍यक्तिगत चीजों से या मान्‍यताओं से उठकर विचार करना होगा।
    निजी आयोजनों में भी फासिज्‍म के उस तरह के चिन्‍ह हो सकते हैं जैसे सत्‍ता संरचनाओं में होते हैं। और यदि ऐसा दिख रहा है तो फिर निजी आयोजनों को हम 'डेमोक्रेटिक स्‍पेस' के नाम पर विकल्‍प की तरह स्‍वीकार नहीं कर सकते।

  3. प्रियदर्शन जी ने वाकई गंभीर सवाल उठाया है… हमें इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए…

    साथ ही यह भी कहना चाहूँगा की पिछली सदी के आखिर में जो आरोप-प्रत्यारोप(झोंटा-झोंटी या हमारे गाँव में राड़ी-बेटखौकी वाला झगडा कहते हैं) की नयी साहित्यिक विधा विकसित हुयी है उससे पीछा छुड़ाना भी जरूरी है… हम लोग साहित्यिक कृतियाँ रचने से अधिक समय इसी अवांछित विधा में खर्च कर देते हैं.. सबसे ज्यादा विवाद इस बात पर होता है, तुम उसके घर क्यों गए… उसके साथ क्यों बैठे… लेखकों को आजादी नहीं होगी तो वह रचेगा कैसे… उसे तो मदिरालय से वेश्यालय तक जाने की छूट मिलती रही है…

  4. यकीनन यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है. मैं समझता हूँ कि विष्णु जी के तात्कालिक प्रयासों से जो मामला पलटा उसमें सर्वाधिक लाभ इस प्रकाशक को हुआ है. आप यकीन नहीं करेंगे पर मैं आपको एक सच्ची घटना बता रहा हूँ इस प्रकाशक से जुड़ी हुई. मैं बनारस आया हुआ हूँ और एक लेखक से मिला जिसकी किताबे इसने प्रकाशित की है. किताब की रॉयल्टी के साथ किताब की टाईपिंग का कॉस्ट भी प्रकाशक के पास ही पड़ा है,जो किन्हीं वजहों से लेखक को कराना पड़ा. यह वाकया तीन साल पहले का है और अभी तक इस प्रकाशक ने उस लेखक को एक ढेले बराबर धन नहीं दिया है. रॉयल्टी तो रॉयल्टी, उस किताब की टाईपिंग कीमत भी नहीं लौटाया. कुछ समय पहले इस प्रकाशक ने लेखक को वादा किया कि वह पैसे डूबते सूरज वाली डाक से भेज रहा है और फिर बेचारा भूल गया. अभी मैने लेखक का नाम गुप्त रखा है, अगर यह प्रकाशक हो हल्ला करता है तो मैं एक शब्द में उस लेखक का नाम चस्पाँ कर दूँगा. कुछ यशस्वी कवि इन बातों को नजर अन्दाज कर इस महान प्रकाशक से अगले साल के लिए भी ऐसे कार्यक्रम को लेकर 'वंस मोर' का नारा लगा रहे हैं.

  5. आम पाठक को यह प्रकरण कुछ समझ ही नहीं आ रहा…. कौन किस पर आरोप लगा रहा है… कौन सही है कौन गलत…. कविता का भला तो कहीं से नहीं हो रहा…. कवि की कवि से वार्ता से ..संवाद से क्या सिद्ध होगा.. क्या हासिल होगा.. नहीं मालूम… यदि कुछ होगा तो वह कवि और जन के बीच संवाद से…. मारुती-मानेसर प्रकरण पर कविता नहीं दिखी है (मुझे)… लगता है कविता और कविता पूंजीवाद का पक्ष ले रही है…

  6. पंकज जी नीचे प्रियदर्शन के उस लेख का लिंक दे रहा हूं. उनके इस सवाल को नजरानादाज किया जा रहा है कि जो प्रकाशक लेखक को रायल्टी नहीं देता है वह इतना बड़ा आयोजन करता है और हमारे मूर्धन्य लेखक उसके ऊपर सवाल नहीं उठाते. मुझे लगता है कि वाम-दक्षिण मिलन से बड़ा सवाल आज यह है. कविता के आयोजन तो खूब हो रहे हैं लेकिन प्रकाशक कविता छाप रहे हैं क्या? जानबूझकर बहस में इस पहलू से कन्नी काटकर सब निकल जा रहे हैं.
    http://www.jankipul.com/2012/09/blog-post.html

  7. ऐसी किसी भी लोकतान्त्रिक स्पेस में दूसरी और विरोधी विचारधारा से जुड़े लोगों के साथ भी संवाद करना संभव होता है। होना चाहिये। उनके साथ संवाद किया जाना चाहिये। उनके साथ रचना पाठ भी किया जाना चाहिये…तो जोशी जी भारत भवन क्यूं नहीं जाना चाहते? शक्ति संरचनाओं में फर्क के आधार आत्मगत होंगे कि वस्तुगत ? मौजूदा दौर में जब ३८ से अधिक प्रकार के वाम दल , एक दूसरे की वर्ग समझ को खारिज करते हुए भांति भाँति से जनता का मनोरंजन कर रहे हैं तब शक्ति संरचनाओं में फर्क करने के लिए वस्तुगत समझदारी की सम्भावनाएं कहाँ दिखाई दे रही हैं? गिरिराज किराडू को पता नहीं क्यूं राजेश जोशी के प्रमाणपत्र की इतनी फ़िक्र है. उधर अम्बुज भी अपनी पुरानी टीप को बड़ी मुद्रा से पुनर्प्रकाशित कर रहे हैं जिसमें कुछ भी मौलिक और नया नहीं है. तीनों ने जो प्रहसन शुरू किया था वह एक बड़े विदूषक(खरे) के मंच पर कूद पड़ने से त्रासद अंत की और है.

  8. अभी नेटवर्क मिला तो यह पत्र पढ़ पाया. इस बीच राजेश भाई से कई बार बात भी हुई थी. विष्णु खरे ने अपने पत्र से चीजों को इतना नीचे पहुंचा दिया है कि इस मुद्दे पर कोई गंभीर, निर्वैयक्तिक बहस हो पाना शायद संभव ही नहीं. (इसके पहले फेसबुक पर किये गए 'रहस्योद्घाटन' को छोड़ दे रहा हूँ फिलहाल.)

    राजेश भाई के पिताजी के नाम पर बने न्यास पर गलतबयानी, निरंजन श्रोत्रिय जैसे व्यक्ति को साम्प्रदायिक कहा जाना, लक्ष्मण प्रसाद मंडलोई सम्मान के बारे में घटिया बातें…यह सब खरे साहब ने किस कुंठा में कहा है, यह वही बता सकते हैं. यह पत्र उसका सबसे श्लीलतम संभव जवाब हो सकता था.

    आवाजाही के बारे में भी मैं राजेश जी के स्टैंड से बिलकुल सहमत हूँ. डबराल जी के सन्दर्भ में हुई बहस में भी मैंने यही स्टैंड लिया था कि किसी साम्प्रदायिक मंच पर जाना गलत है लेकिन एक न्यूट्रल मंच पर किसी के साथ भी बहस की जानी चाहिए.

  9. bahut khub..mai to thara sahityik galiyaron ke jhanjhavato se nitant aparichit …magar rajesh ji ki baton ki akramakta ne mujhe udvelit kiya hai..mai us vivadaspad teep ko bhi padh pata to kya hi achcha hota..

  10. राजेशजी को जाने क्यूँ कान्हा में मेरा बोला हुआ (मैंने कुछ भी लिखित नहीं पढ़ा था)'लगभग' मार्क्सवाद-विरोधी की तरह याद है. खुशकिस्मती से उस बोले हुए का अभिलेख जानकीपुल पर मौजूद है. पाठक स्वयं फैसला कर सकते हैं: http://www.jankipul.com/2012/08/blog-post_1449.html

  11. " मैं कहना चाहता हूँ कि व्यक्ति और सरकार या किसी शक्ति संरचना में फर्क किया जाना चाहिये। अनेक व्यक्ति अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं के चलते कई किस्म की अ-पोलेटिकल ( गैरराजनीतिक ) स्पेसेस साहित्य के लिये निर्मित करते हैं। ऐसी किसी भी लोकतान्त्रिक स्पेस में दूसरी और विरोधी विचारधारा से जुड़े लोगों के साथ भी संवाद करना संभव होता है।"…!!! बहुत जरुरी बात..!

  12. इस विविअद में मेरा एक निवेदन हे जो प्रियदर्शन ने भी कहीं लिखा था . जो प्रकाशक लेखक को एक रुपया रोयल्टी देने को राजी नहीं हे वह लाखों रूपये का आयोजन क्यों, किसके लिए, किसके बल पर कर रहा हें

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