आप किस मीडिया में नैतिकता की छानबीन कर रहे हैं हरिवंशजी ?

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कल वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश का लेख आया था मीडिया की नैतिकता पर. युवा लेखक विनीत कुमार का यह लेख उसी लेख के कुछ सन्दर्भों को लेकर एक व्यापक बहस की मांग करता है- जानकी पुल.
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हरिवंशजी, आपके लेख मीडिया को अपनी लक्ष्मण रेखा का एहसास नहीं पर असहमति दर्ज करने से पहले आपसे अपील करना चाहता हूं- प्लीज,प्लीज,प्लीज…लक्ष्मण रेखा, खासकर मीडिया की नैतिकता के संदर्भ में प्रयोग करना बंद कर दीजिए. आपसे पहले भी कई समझदार और गंभीर माने-जानेवाले मीडियाकर्मियों/संपादकों ने इसका प्रयोग किया है. आए दिन मीडिया को लेकर जब भी कोई विवाद खड़े होते हैं, समाचार चैनलों पर लक्ष्मण रेखा की पट्टियां,मोंटाज,वॉल रेंगने-चमकने और खड़ी होने लगती है. हम हर बार आहत होकर फेसबुक,ब्लॉग और कई बार लेख के जरिए इसका विरोध करते हैं. आज एक बार फिर आहत होने की स्थिति में आपसे अपील करते हैं कि इस आलंकारिक प्रयोग के पहले इस पर ठहरकर थोड़ा विचार जरुर करें.

जिस लक्ष्मण रेखा का प्रयोग आप जैसे गंभीर और व्यावहारिक संपादक मीडिया के संदर्भ में करते हैं,दरअसल ये अपने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में इससे बिल्कुल अलग और परस्पर विरोधी है. लक्ष्मण रेखा मर्दवादी,तंग सोच का वो घिनौना प्रतीक है जिसके अनुसार घटना के पहले ही एक स्त्री को( इसे सीता तक सीमित न करके सामान्य अवधारणा तक ले सकते हैं) कमतर करके देखा जाता है. शुचिता,सुरक्षा और अतिरिक्त ख्याल के नाम पर एक ऐसी चहारदीवारी खड़ी करने की कोशिश की जाती है जिसके आगे स्त्री बद्ददिमाग तो है ही साथ ही अपनी भावनाओं,मानवीय अनुभूतियों और समझ के अनुसार व्यवहार करने लायक तक नहीं समझी जाती. दूसरी तरफ इस सख्त निर्देश के बावजूद सीता द्वारा इसे लांघना बल्कि इसे ध्वस्त करना कहें तो इस मर्दवादी सोच का अतिक्रमण है जो सुरक्षा-असुरक्षा से कहीं ज्यादा स्त्री की अपनी स्वेच्छा और अनुभूतियों के अनुसार व्यवहार करना ज्यादा बड़े सच और स्वाभाविक रुप में सामने आता है. मीडिया के संदर्भ में अगर नियमन,अनुशासन और नैतिकता के लिए अगर यही जड़ और तंग दिमाग से पैदा हुए शब्द लक्ष्मण रेखा इस्तेमाल के लिए बच जाते हैं तो रेखा लांघना क्या, इसका पूरी तरह ध्वस्त हो जाना ज्यादा जरुरी है. एक कलंक को सुधार और बेहतरी के प्रतीक के रुप में आप जैसे गंभीर संपादक सिरमौर बनाते हैं, पढ़-सुनकर अफसोस होता है. निर्मल बाबा प्रकरण में भी आपने न जाने कितनी बार समाचार चैनलों पर इसका प्रयोग किया जिन्हें सुनते हुए लगा कि व्याकरणिक दृष्टि से दुरुस्त भाषा इस्तेमाल करनेवाले संपादक सामाजिक संदर्भों के मामले में आखिर इतने लापरवाह कैसे हो जाते हैं ? ये लक्ष्मण रेखा और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ जैसे आलंकारिक प्रयोग तो मीडिया के साथ ऐसे चिपक गए हैं कि जैसे मीडिया के कभी खत्म होने( अपने स्वाभावगत अर्थ में) पर ही प्रयोग होने बंद होंगे.

दूसरा कि आप देखें कि जिस तंग दिमाग की लक्ष्मण रेखा के भीतर रहकर भी मीडिया के एक से एक बड़े धत्कर्म होते हैं, वो अगर सच में ध्वस्त होने लगे तो सोचिए क्या हाल होगा ? आप जिसे साख और नैतिकता के सवाल से जोड़कर देख रहे हैं, वो पता नहीं कभी था भी या नहीं लेकिन मौजूदा दौर में ये तो स्पष्ट है कि नैतिकता और साख का लोप ही मीडिया का मूल्य है क्योंकि कोई भी धंधा इन्हीं मूल्यों को अपनाकर चमकता है. नैतिकता और साख के बूते वस्तु विनिमय प्रणाली के तहत सहयोग का अर्थशास्त्र पनप सकता है, घोर मुनाफे का धंधा नहीं जो कि आज मीडिया के भीतर है. ऐसे में आपके सात्विक विचार और चमकीले शब्द मीडिया आलोचना के नाम पर कविताई-चौपाई के आसपास बनती तो जान पड़ती है लेकिन वो सीधे-सीधे इस धंधे पर चोट करती है, मुझे ऐसा मानने में भारी दिक्कत और असुविधा हो रही है. बावजूद इसके जिस अर्थ में आप जैसे लोग मीडिया की लक्ष्मण रेखा का प्रयोग करते आए हैं, अगर वो ध्वस्त होकर भी पत्रकारिता बचती या पैदा होती है, मीडिया पैदा होता और विस्तार पाता है तो वो हमारे लिए जश्न का दिन होगा. एक घिसे-पिटे आलंकारिक प्रयोग के ध्वस्त होने की शर्त पर अगर मीडिया बचा रह जाता है तो क्या बुरा है ? खैर, अब आइए लेख पर..

आपके पूरे लेख में मीडिया की बेहतरी के लिए एक महामानव की कल्पना और उस कल्पना के आधार पर एक ऐसी अधिरचना की निर्मिति है जिसके व्यवहार में आने के पहले पत्रकारों से कहीं पहले मीडिया मालिकों के हृदय परिवर्तन की अनिवार्यता है. उन मालिकों के हृदय परिवर्तन की जो अपने मीडिया संस्थानों के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स जैसी सभा में बमुश्किल किसी मीडियाकर्मी को शामिल करना पसंद करते हैं. हरिवंशजी,आप तो अंदरखाने के संपादक हैं, पत्रकार से मालिक की हैसियत तक पहुंचनेवाले संपादक हैं,आपसे बेहतर भला कौन जान सकता है कि मीडिया संस्थान बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में किन मिजाज,रसूक,पृष्ठभूमि और प्रभाववाले लोगों को शामिल करता है ? बुद्धिजीवी तबके के लोगों की लंबी फेहरिस्त है जो अपने-अपने क्षेत्रों के काबिल नाम हैं लेकिन क्या ये संपादकीय पन्नों पर लेख लिखने या समाचार चैनलों पर होनेवाली परिचर्चा के अलावे भी खुद मीडिया को बेहतर करने के नाम पर आमंत्रित किए जाते हैं, कभी किसी अखबार या चैनल के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में शामिल किए जाते हैं ? मेरी जानकारी के मुताबिक ऐसे किसी भी पढ़े-लिखे लोगों की जरुरत मीडिया संस्थान महसूस नहीं करते क्योंकि ये लोग मीडिया या पत्रकारिता के संदर्भ में बात कर सकते हैं जबकि संस्थान को ऐसे दिमाग चाहिए जो धंधे को चमका सके. उसे सुधीर चौधरी जैसा ऐसा दागदार मीडियाकर्मी चाहिए जो डबल सिम मोबाईल बनकर एक ही साथ संपादक की भी और बिजनेस हेड की कुर्सी भी संभाल सके. अगर मीडिया साख की ही चिंता करता तो उन रिटायर्ड अधिकारियों, मल्टीनेशनल कंपनियों के सीइओ,एनजीओ के घाघ लोगों को शामिल नहीं करता जिन्हें पता है सत्ता के चोर दरवाजे मीडिया में आकर किन चाबियों से खुलते हैं और दोनों के भीतर सब-वे आसानी से बनाए जा सकते हैं. जो जानते हैं कि गिनती दिनों में डीएबीपी से लेकर आइबी मिनिस्ट्री तक के कागजों में स्केटिंग शूज कैसे लगाए जा सकते हैं कि वो फड़फड़ाते हुए एक टेबल से दूसरी टेबल तक पहुंच जाए. जो जानते हैं कि गिलास के भीतर के द्रव्य को हल्का पीला करने के साथ ही कैसे बड़े से बड़ा काम आसानी से हो सकते हैं.जिन्हें पता है मीडिया सरोकार का तर्जुमा किस भाषा में किया जाए कि जिसे कार्पोरेट एक मिनट में समझ जाए..और मेरे ख्याल से ये सब इतना खुल्लम-खुल्ला हो रहा है कि थोड़ी नजर पैनी करने पर हम जैसे बहरिया लोग भी समझ सकते हैं. अब देखिए न, गिरते-पड़ते एक एसएमएस मेरे पास आ गया-

“Dainik Bhaskar presents BDI-NORTHSTAR 2/3/4 BHK in ist Podium project in BHIWADI,321 onwd.Assured gift +Attractive offers on spot booking. Call-9212255655” हरिवंशजी, ये उसी अखबार समूह के रीअल एस्टेट धंधे को चमकाने के लिए जारी एक मामूली एसएमएस है जिसका कोयले आबंटन-घोटाले मामले में भी नाम आ चुका है और दुर्भाग्य से उस खबर के साथ उस उषा मार्टिन कंपनी का भी नाम शामिल है जिसकी बुनियाद पर प्रभात खबर खड़ा रहा है. मुझे नहीं पता है कि इस खबर के बाद प्रभात खबर ने अपनी साख और नैतिकता के पक्ष क्या तर्क दिए लेकिन दूरदराज बैठे प्रभात खबर के हम पुराने प्रतिबद्ध पाठकों को तो जरुर धक्का पहुंचा. खैर, इस मामूली एसएमएस से गुजरने के बाद ये सवाल तो बुनियादी रुप से उठते हैं कि क्या किसी धंधेबाज ने एक ही साथ दस-बारह सेक्टर में अपनी गर्दन घुसेड़ रखी हो, उसके हाथ बिजनेस के कई सेक्टर में लिथड़े हुए हैं. ऐसे में रीअल एस्टेट, इस्पात,कोयले,मॉल आदि दूसरे तमाम धंधे वो मुनाफे के लिए करेगा और वही धंधेबाज जैसे ही मीडिया में आएगा,समाज सेवा और सरोकार में लग जाएगा ? क्या मीडिया उन परंपरागत लालाओ-साहूकारों जैसा ही उसके लिए प्याउं या धर्मशाला है कि पहले मुनाफे के जरे दमभर लोगों को लूटो और फिर समाज सेवा के लिए प्याउं और अब मीडिया संस्थान खोल दो ? हरिवंशजी, जो बाकी दस धंधे में लगा हुआ है वो यकीनन मीडिया में आकर उससे अलग काम नहीं करेगा. वो क्या जो खाटी मीडिया और उसके आसपास के धंधे में लगा है वो भी अपनी सफलता में पत्रकारिता के मूल्यों( मुझे आज दिन तक ये स्पष्ट नहीं हो पाया कि ये हैं क्या) को शामिल नहीं करता बल्कि अपने उस मौद्रिक लाभ( मॉनिटरी बेनीफिट) को शामिल करता है, जिससे इन्डस्ट्री में उसकी गर्दन उंची होती है. हमें रिलायंस-नेटवर्क 18 की करीब 2100 करोड़ की डील के बाद जनवरी 2012 में संपादक राघव बहल की प्रेस रिलीज की भाषा अब भी याद है जिसमें उन्होंने कहा था कि अब वो पूरी तरह कर्जमुक्त हो गए हैं और इतनी ही नहीं इन्डस्ट्री में उनकी बैलेंस शीट सबसे मजबूत हो गई है. राघव बहल ने इससे पहले कभी भी किसी स्टोरी या खबर को लेकर इस तरह की खुश जाहिर नहीं की. मतलब ये कि न तो बाकी धंधे के साथ मीडिया का धंधा करनेवाला या न ही सिर्फ मीडिया का धंधा करनेवाला पत्रकारिता को अपनी उपबल्धि मानता है. उसके लिए उपलब्धि का मतलब है मुनाफा..और सिर्फ धंधेबाज ही क्यों,पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग की ओर से जारी प्रेस रिलीज पर गौर करें तो ध्वन्यार्थ इससे अलग नहीं होंगे.

अब रही बात साख और नैतिकता जैसी पूंजी के बचाने और एकमात्र इसी के दम पर चौथा खंभा कहलाने की तो आप जिसे साख कर रहे हैं वो दरअसल ब्रांड के खेल में बहुत पहले ही तब्दील हो चुका है. साख का संबंध जहां सामाजिक छवि से है जबकि ब्रांड का संबंध भारी पूंजी और प्रोमोशन के दम पर बाजार में टिके रहने और समय-समय पर साख में बट्टा लगते रहने के बावजूद मेकओवर करते रहने से हैं. अब देखिए न..पूरा देश जानता है कि राबर्ट बाड्रा-डीएलएफ मामले में दैनिक भास्कर ने चूं तक नहीं किया. अगर अखबार दावा करता है कि वो इस देश में सबसे ज्यादा पढ़ा जानेवाला अखबार है तो इसका मतलब है कि उसने देश की बड़ी आबादी को इस खबर से दूर रखा. क्यों, ये उपर की एसएमएस और कोलगेट प्रकरण शामिल करने के बाद से बताने की जरुरत नहीं रह जाती. इसके साथ ही प्रभात खबर को लेकर भी आरोप है, खासकर मुज्जफरपुर संस्करण में नीतिश कुमार की जिस तरीके से चमचई होती आयी है, वो बिहार में वही टीटीएम( ताबड़तोड़ तेल-मालिश) की पत्रकारिता करता रहा है जो कि बाकी के अखबार कर रहे हैं. इसके पीछे क्या लाभ-लोभ है, ये मीडिया विश्वेषक से कहीं ज्यादा वहां के स्थानीय लोग समझ रहे हैं. कुल मिलाकर अगर सामाजिक रुप से सोचें तो देश के सबसे बड़े अखबार और झारखंड के सबसे बड़े अखबार की साख मिट्टी में मिलती नजर आती है. दैनिक जागरण के साथ ये काम कई बार हो चुका है. हिन्दुस्तान का कांग्रेस प्रेम जगजाहिर है. समाचार चैनलों के लिए अलग से लिस्ट बताने के बजाय राडिया-मीडिया प्रकरण के पुराने पन्ने पलट लेना पर्याप्त होगा..

तो इसका क्या मतलब है कि ये सारे अखबार और चैनल एक दिन बिकने-दिखने बंद हो जाएंगे. बुद्धिजीवी समाज संपादकीय पन्नों पर छपने से मना कर देंगे, चैनलों पर आने से मना कर देंगे ? साख की परिभाषा तो यही कहती है लेकिन इसकी खपत पहले की तरह बरकरार है. क्या ये समझना मुश्किल है कि साख के मिट्टी में मिल जाने के बावजूद मार्केटिंग और सेल्स के लोग लगातार इसकी अपने तरीके से ब्रांडिंग में जुटे रहते हैं और बीच-बीच में इसकी रिब्रांडिंग हो जाया करती है जैसे प्रभात खबर की निर्मल बाबा को लेकर हुई थी. दिक्कत ये है कि आप अपने पूरे लेख में एक ही साथ संपादक,पत्रकार और मालिक की जुबान से कोई ऐसा राग पैदा करने की कोशिश में नजर आते हैं जिसे हर वर्ग का श्रोता वर्ग पसंद कर सके, उन्हें आपका ये मीडिया आलाप रास आए लेकिन जिन ठोस मुद्दों को आपने इस राग में वर्जित स्वर मानकर छोड़ दिया है, उसके इस्तेमाल के बिना भला कैसे मामला बन सकेगा ?

आखिरी बात, आप और आपके जैसे बाकी लोग/मंच जिनमें कि द हिन्दू का संपादकीय से लेकर एनडीटीवी 24x7 और सीएनएन-आइबीएन7 तक की बहस शामिल है, आखिर में आकर इसी नैतिकता पर आकर अटक जाते हैं और इस निष्कर्ष तक पहुंचते हैं- एक तो ये कि किसी भी तरह से बाह्य नियमन( एक्सटर्नल रेगुलेशन ) न हो और दूसरा कि ले चल मुझे भुलावा देकर,मेरे नाविक धीरे-धीरे जैसी पंक्तियों की पांत पकड़कर मीडिया के लिए एक ऐसे हिमयुग की कल्पना की जाए जहां सिर्फ और सिर्फ मीडिया सीना तानकर, आदर्श मुद्रा में खड़ा हो. ये दोनों ही स्थिति मनोविलास के लिए पर्याप्त हो सकते हैं या थोड़ी देर के लिए गुडी-गुडी मिंट का असर पैदा करने के लिए लेकिन इससे कुछ ठोस निकलकर आता नहीं या फिर न निकलकर आए शायद इसी मंशा से नैतिकता के पाठ दोहराए जाते हों. नहीं तो इतनी अक्ल तो सबकी काम करती है हरिवंशजी कि जिस मालिक ने मीडिया धंधे को चमकाने के लिए एक से एक खूंखार ब्यूरोक्रेट,बैंक,कानून,एनजीओ और यहां तक की मीडिया प्लानर-बायरों की फौज खड़ी कर रखी है, उनसे निबटने के लिए इस पिद्दी नैतिकता के दो-चार पन्ने की संहिता कितनी लाचार जान पड़ती है. आप धंधे चमकाने के लिए तो जमकर कार्पोरेट, राजनीतिक और लाटसाहबों का जमावड़ा लगाएं और जैसे ही रेगुलेशन की बात की जाए आपको समाज का चिंतनशील,साहित्याकार,पत्रकार,लेखक,बुद्धिजीवी सबके सब बाहरी लगने लगें..धंधेबाजों के अलावे बाकी लोग अगर बाहरी हैं तो फिर आप किस मीडिया में नैतिकता की छानबीन कर रहे हैं हरिवंशजी ?
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5 COMMENTS

  1. bahut achha,esi dhar ke sath likhte rahe. dhyan rahe jagh milne par aap bhi charan na ho jaye, kyoki bare- bare log birudabali gane or likhane me vyast hai. arvind jha

  2. तकदीर ज़माने वालो की स्याही ही लिखा करती है,
    हमने देखा था अकबारों को बिकते हुए,
    लोग कहते हैं खबरे भी बीका करती है,,,,,,,,पंकज !!!

  3. क्या सच में हरिवंश जी इतने मासूम है,जितनी मासूमियत से उन्होंने ये लक्ष्मण रेखा वाला लेख लिख मारा.या पाठकों को निहायती बेवकूफ समझते है.ऐसे लेखकों को स्पेस ही नहीं देना चाहिए.

  4. निकोलाई चेनीर्शेव्स्की 19वीं शताब्दी के महान विचारक और लेखक माने जाते हैं, अपने उपन्यास “क्या करें” की भूमिका में उन्होंने शायद मुझ जैसे पाठक की ही ओर इशारा करते हुए लिखा है कि “मुझे आप सब लोग दयनीय ढंग से मनोरंजक लगते हैं, क्योंकि आप बेहद बीमार, बेहूदा छोटे छोटे लोग हैं,…. और फिर, मेरे बेहद नेक लोगों, आपको हर बात खोल कर समझनी पड़ती है- आप पर्याप्त मात्रा में संकेतों को चाहे जितना पसंद करते हों, फिर भी आप उसे पहचान पाने में उतने दक्ष नहीं हैं… ” सचमुच में हम निहायत बुरे लोग हैं और एक बहुत बुरे समय में रह रहे हैं, बलात्कारों से भरे समय में। रविवार 14 अक्तूबर को, हरिवंश जी ने अपने लेख में साफ साफ कुछ बातें लिखीं। माफ कीजिये गा लेकिन अपनी साफ साफ बातों में आपने जिन बातों कि और इशारा किया वो हमारी समझ में नहीं आई। मैं दुविधा में हूँ कि बुराई किसमें हैं, दुविधा यह भी है कि हम एक गठित राष्ट्र राज्य में रह रहे हैं या एक ऐसे राष्ट्र राज्य में जिसे अभी गठित होना है, गो कि मैं मानता हूँ कि राष्ट्र राज्य बनने कि एक सतत प्रक्रिया होती है और उसमें नागरिकों के चरित्र कि अहम भूमिका होती है, ….

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