प्रेम का संक्षिप्त इतिहास

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सन १९१९ में पैदा हुए अंग्रेज इतिहासकार लारेंस स्टोन, सिविल वार और विवाह पर किये गए अपने कामों  के लिए विश्व भर में जाने जाते है. स्कल्पचर इन ब्रिटेन: द मिडिल एजेस;1955, द क्राइसिस ऑफ एरिस्टोक्रेसी, 1558-1641(1965), रोड टू डायवोर्स: इंग्लैंड,1530-1987(1990),एन इम्पेरिकल एस्टेट एट वार, (1994) आदि इनकी महतवपूर्ण किताबें है. प्रस्तुत लेख उनके किताब The Family,Sex and Marriage in England,1500-1800(1977) से है. प्रेम के इतिहास और दर्शन पर बहुत कम सोचने वाले हम पाते है की स्टोन इस लेख में प्रेम के व्यापक इतिहास पर बात करते हुए, विवाह के बदलते रूप व अर्थ पर भी सटीक टिप्पणी करते है. प्रेम और प्रेम कहानियाँ हम सभी के खाते में है, शायद इसलिए भी हम प्रेम पर पढ़ने के बारे में ज़हमत कम उठाते है. इस प्रेम दिवस  पर लारेंस स्टोन का ये लेख एक खास कमी को पूरा करता है. चयन, भूमिका और अनुवाद-राकेश कुमार मिश्रा. 

१४ फरवरी को जानकी पुल की विशेष प्रस्तुति.
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कई इतिहासकार व मनोवौज्ञानिक इस पर सहमत पाए जाते है की रोमांटिक प्रेम- जो ज्यादातर कम समय के लिए लेकिन तीव्र अनुभुति लिये होता है और जो किसी दूसरे व्यक्ति के प्रति विकसित आकर्षण के कारण पैदा होता है—असल में सांस्कृतिक स्थितियों कि देन होती है. प्रेम का अपना एक इतिहास है. लंबे समय तक ये कुछ विशेष काल अवधि में कुछ विशेष समाजों में पाया जाता रहा है, या कुछ विशेष जन समूहों में, जैसे- बौद्धिक वर्ग, जिसके पास इतनी सुविधा थी की वो इस तरह के विचारों को पनपने दे. कई विद्वानों ने इस पर भी चिंतन किया है कि -क्या रोमांटिक प्रेम जौविक सेक्स के ऊपर एक आवरण जैसा है या इसकी जैविक रासायनिक  जड़ें भी है जिसका सीधा सम्बन्ध लिबिडो से है. अगर किसी ने प्रेम के बारे में नहीं पढ़ा या नहीं सुना तो क्या उसके साथ “प्रेम में पड़ना” जैसी स्थिति होगी? या कविता प्रेम की आविष्कारक है या प्रेम कविताएँ प्रेम की आविष्कारक है? प्रेम के इतिहास के संदर्भ में कुछ चीजें विश्वास के साथ कही जा सकती हैं. पहली बात ये की रोमांटिक प्रेम हर कालखंड व स्थितियों में देखा जा सकता है और जो बहुत प्राचीन समय से काव्य अभिव्यक्तियों का विषय रहा है. सोलोमन के गीत से लेकर शेक्सपियर की रचनाओं तक. दूसरी तरफ, इतिहासकारों ने खोजा कि रोमांटिक प्रेम और सामाजिक मंजूरी ये दोनों ही सभी समाज के लोगो को सामान्य रूप से उपलब्ध नहीं थी. ऐतिहासिक साक्ष्य ये बताते है की रोमांटिक प्रेम “प्रिटिंग प्रेस युग” के पहले बौद्धिक वर्ग तक ही सीमित था. इसका मतलब ये नहीं की प्रेम निचले वर्गों में उपस्थित ही नहीं था. एक सांस्कृतिक युक्ति के रूप में रोमांटिक प्रेम को सामाजिक अनुमोदन यूरोप में मिलना शुरू हुआ. इसकी शुरुआत १२ वीं सदी में फ्रांस के राजशाही दरबारों से होती है जिसे उस समय के आश्रित कवियों ने भव्य बनाया. इन कवियों के रचनाओ से हमें एक अविवाहित पुरुष व विवाहित महिला के बीच के सम्बन्ध का उल्लेख मिलता है. १६ वी व १७ वी सदी तक आते- आते हमें और पुख्ता साक्ष्य मिलते है. शिक्षा और प्रिंटिंग प्रेस का विशेष धन्यवाद जिन्होनें प्रेम को विस्तारित किया. आज हमारे पास प्रेम कवितायें है, जैसे-शेक्सपियर के सोनेट्स. हमारे पास प्रेम पत्र  है और महिलाओं की आत्मकथायें है जो उनके प्रेम प्रसंगों से सीधे जुड़े हुए है. यूरोप के राजशाही दरबार जोशीले संपर्कों व मुलाकातों के लंबे समय तक केन्द्र रहे है, इनमें से कुछ संपर्क रोमांटिक भी थे. प्रिंटिंग प्रेस के शुरुआत के साथ ही पोर्नोग्राफी की भी पहुँच बड़े जनसमूह तक होने लगी. जिसने लोगो के वासनाओं को उत्तेजित किया. साथ ही शेक्सपियर के नाटक भी ये बताते हैं कि किस तरह रोमांटिक प्रेम एक बड़े जन समूह का हिस्सा था. जिसने अपना एक मजबूत दर्शक वर्ग बना रखा था. इस रोमांटिक प्रेम को कितनी स्वीकृति मिली यह एक दूसरा प्रश्न है. हम साधारण रूप से नहीं जानते की शेक्सपियर के नाटकों के दर्शकों का “रोमियो और जूलियट” पर क्या प्रतिक्रिया थी. क्या उन दर्शकों को वाकई ये पसंद था( जैसा कि शेक्सपियर के नाटकों को देखकर लगता है ). क्या युवा प्रेमी इन नाटकों को पूरी तरह समझ या पहचान पाए थे? या वो थियेटर छोड़ने के बाद मोंतागुए और कार्पुलेट के माता-पिता जैसे व्यवहार करने लगे. जिनकी पूरी कोशिश थी की उनके बच्चे गैरज़िम्मेदाराना बाल्यावस्था से बाहर आयें और पूरी तार्किकता के साथ राजनितिक क्रियाकलापों में भाग लें.

१६ वीं. व १७ वीं. सदी की हर उपदेशात्मक किताब, चिकित्सीय अनुबंध व हर सामाजिक व धार्मिक पवित्रता ने रोमांटिक सोच व इच्छा को सीधे ख़ारिज किया है क्योकि ये उपयुक्त शादी के लिए उचित नहीं थे. १६ वीं सदी में शादी माता पिता द्वारा ही तय किया जाता था. जिसके तहत माता पिता अपने बच्चों के लिए सामाजिक व आर्थिक आधारों पर उपयुक्त जीवन साथी खोजते थे. लोगों  में ऐसा विश्वास देखा जाता है की दो अनजाने लोगों  में यौनिक अनुबंध के कारण स्वत: ही अनिवार्य संतुलन बन जाता है, एक परिवार की इकाई बनाने के खातिर. हाल ही में जापान में हुए सर्वे से ये पता चलता है प्रेम विवाह और परम्परागत विवाहों में तलाकों में कोई अंतर नहीं है. जिसमें एक में विवाह माता-पिता के अनुसार हुई थी, दूसरे में स्वयम के इच्छा के अनुसार. विवाह को लेकर जो घोर परम्परागत व दकियानूस विचारधारा थी वो सामूहिक चिंता के बजाये व्यक्ति विशेष की चिंता बनने लगी और आर्थिक या राजनीतिक आयामों के बजाये व्यक्ति विशेष के संतोष से आकर जुड गया. रोमांटिक आन्दोलन और उपन्यासों के उद्भभव के बाद, विशेष तौर पर “पल्प फिक्सन” के आने के बाद समाज ने नए विचारों को स्वीकार करना शुरू किया. ये मानना  शुरू किया की ये स्वाभाविक व प्रशंसनीय है कि दो युवा लोग गहराई से एक  दूसरे से प्रेम करें और इसमें गलत कुछ भी नहीं है. इस तरह के नए विचारों की स्वीकृति के बाद समाज में माता –पिता द्वारा तय किये जाने वाले विवाह असहनीय माने जाने लगे. आज वयस्कों में तेजी से बनने वाले सम्बन्धों में नए आयाम शामिल हो गए है. इसमें जनसंचार के साधनों ने अहम भूमिका निभाई है. इस विश्वास को भी स्थान मिला है की यौनिकता प्रमुख व मानवीय जरुरत है. एक ऐसा विचार जिसका आधार फ्रायड ने रखा था. अब तक के ज्ञात समाजों में सेक्स को किसी समाज ने प्रमुख सांस्कृतिक भूमिका के रूप में स्वीकार नहीं किया और न हीं यौनिक मानव इच्छा की सूची में स्थान दिया. इसके बजाए सभ्यताए असंतुष्टियों से भरी रही. आज ये विश्वास करना मुश्किल है की १७ वीं सदी में अधिकांश यूरोप में एक समाज था जिसमें लोग २० से ३० के बीच शादी करते थे, जिनके जीवन में पवित्रता के लिए खास जगह थी. अब एसे लोगो की संख्या २ से ३ % हो गई है. आज व्यक्तिवादी सोच के उभरने के साथ ही पश्चिम समाजों में इतनी स्वतंत्रता आई है कि अब व्यक्ति किसी के साथ सो सकता है. अब वो शादी और तलाक दोनो के लिये मुक्त है.

मैं यहाँ एक महत्वपूर्ण बिन्दु रेखांकित करना चाहता हूँ  कि वर्तमान परिवारों(इस सामान्यीकरण में मैं गरीब अमेरिकी काले परिवारो को बाहर रखूंगा ) के बिखराव बहुत उच्च तलाक दर के कारण हो रहे हैं—जो अब ५०% तक पहुच गए हैं . यहाँ यह याद रखना चाहिये कि शादियों की औसत अवधि आज वही है जो सौ साल पहले थी. अब तलाक का मानसिक प्रभाव व्यक्तियों पर अलग होता है, फिर भी ज्यादातर मामलों में औरतों की भयावह आर्थिक स्थिति सामान्य रूप से देखी जा सकती है. रेखांकित करने वाली बात ये है की टूटती शादियाँ, सौतेले बच्चे और एकल अभिभावक, जैसे उदहारण ये आज ही सामने नहीं आये है बल्कि पहले भी थे.

रोमांटिक प्रेम के साथ जो सबसे बड़ी ऐतिहासिक समस्या जुडी हुई है कि इसकी स्थिति संपत्तिविहीन गरीब लोगो के बीच अब भी दयनीय है. संपत्तिविहीन होने के कारण इनका प्रेम और विवाह दोनों ही इनके रिश्तेदारों के लिए बहुत महत्व नहीं रखता और वो अब भी अपना जीवनसाथी चुनने के लिए अपने संबंधियो पर ही निर्भर है. १८ वीं सदी और उससे पहले के रिकॉर्ड बताते हैं कि गरीब लोगो ने लंबे समय तक प्रेम के कारण विवाह किया है और इस तरह के जोड़ो से ये आशा की गयी की वो लंबे समय तक एक दूसरे से प्रेम करेंगे पर यह संभव नहीं हो पाया. कृषक समुदाए के विवाहों में आसानी से ये देखा जा सकता है, जिसमें कई बार पति अपने पत्नी के बजाये अपनी गाय से ज्यादा  प्रेम करता है. गहरे आकर्षण व जुड़ाव के कारण ये जोड़े बन तो रहे हैं पर इन जोड़ों की भौतिक रुचियों और इच्छाओं से इनकार नहीं किया जा सकता.
राकेश कुमार मिश्र 

१७ वीं. सदी से एकदम अलग १८ वीं. सदी में इंग्लैंड और अमेरिका में आधी दुल्हनें शादी के दिन गर्भवती पाई गई. इस तरह के तथ्य हमें गहरे जुड़ाव के बजाए यौनिक जुड़ाव के बारे में ज्यादा बताते हैं. सेक्स तात्कालिक मेल-मिलाप के बाद शुरू होता है जबकि शादी बाद  की स्थिति है. अगर एक गरीब नौकरानी अपने मालिक के द्वारा गर्भवती की जाती है(और ये ज्यादातर होता है) और ऐसे स्थितियो में उसकी शादी १० पौंड देकर एक गरीब जरुरतमंद से कर दी जाती है. इसमें गहरे आकर्षण का कोई मामला नहीं है. जैविक यौनिक आकर्षण के कारण दो  जवान लोगो में आकर्षण पैदा हो सकता है लेकिन इसे सामाजिक स्वीकृति देने के पीछे कई कारण होते है, जैसे-समय, वर्ग,सांस्कृतिक नियम व सम्पत्ति. हम एक अजीबो गरीब स्थिति में है जहाँ प्रेम के बजाए शादी पर ज्यादा जोर है.

लगभग ये सारे बदलाव हमारे समय व संस्कृति के लिए एकदम नए व विचित्र है. 
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