ज्योति कुमारी की कहानी ‘शरीफ लड़की’

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हाल में संपन्न हुए विश्व पुस्तक मेला के दौरान युवा लेखिका ज्योति कुमारी के कहानी संग्रह ‘दस्तखत तथा अन्य कहानियां की चर्चा रही. जिन लोगों ने उनकी कहानियां न पढ़ी हों उनके लिए वाणी प्रकाशन से प्रकाशित उसके इसी संग्रह से एक कहानी ‘शरीफ लड़की’- जानकी पुल.
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सब कुछ सही हो रहा है। बिलकुल वैसे ही जैसे मैं हमेशा से चाहती थी। अभी-अभी सिन्हा आंटी पूरे परिवार के साथ आयी हैं। वह कह रही हैं, गंगा में पैस के बेटी माँगे हैं, आप तो सिंह जी… इन्हें देख कर मम्मी भी यहीं आ गयीं हैं। मम्मी पर नजर पड़ते ही सिन्हा आंटी उनसे मुखातिब हो गयी हैं। दीदी सच्ची… भगवान आपके जैसी बेटी सब को दे… सिन्हा आंटी अभी और बोलतीं लेकिन तभी बाहर कोई चिल्लाया, अंधड़ चलने लगा है… जल्दी धोतियाँ समेट लो… मम्मी कई सारी पीली धोतियाँ समेट रही हैं… बच्चे आँधी में गिरे आम लूटने में लग गये हैं…
धप्प… धप्प… धप्प… अतीत से कई सारे कच्चे-पके आम मेरे आँगन में गिर रहे हैं… मेरे इसी आँगन में… पाँच साल की एक छोटी सी बच्ची अपनी परी ड्रेस सँभालती हुई आम चुनने के लिए दौड़ रही है… उसके पीछे उसका चार साल का भाई भी भाग रहा है… दोनों एक-दूसरे से होड़ लगाते आम तक पहुँच गये
हैं… दोनों ने एक ही आम पर हाथ रख दिया है… पहले मैंने इस आम पर हाथ रखा है, यह मेरा है… चुप झूठा, पहले मैंने हाथ रखा था इस पर… दोनों लड़ रहे हैं… लड़की भाई के हाथ पर दाँत काट लेती है… भाई जोर-जोर से रो रहा है… पापा आँगन की तरफ भाग रहे हैं… लड़की को डाँट रहे हैं… तू कभी सुधर नहीं सकती… फिर दाँत काट लिया न इसे… मम्मी भाई का हाथ देख रही हैं… हाथ पर दाँत के निशान… मम्मी ने लड़की को चाँटा मारा… अब लड़की भी रो रही
है… मम्मी भाई को गोद में लेकर अन्दर जा रही हैं… मम्मी भाई को चॉकलेट दे रही हैं… भाई पर्क खा रहा है… लड़की और ज्यादा जोर-जोर से रो रही है… मुझे भी चॉकलेट दो… कुछ नहीं मिलेगा तुझे… लड़की बार-बार चॉकलेट माँग रही
है… मिन्नतें कर रही है… निराश होकर कह रही है, ठीक है, मत दो… दादी वाली परीलोक चली जाऊँगी मैं… वहाँ तो जितना मन उतना चॉकलेट मिलता है… तू जाएगी परीलोक… वहाँ जाने का टिकट तक नहीं मिलेगा तुझे… दादी कह रही
हैं… क्यों नहीं मिलेगा… क्योंकि वहाँ जाने का टिकट सिर्फ शरीफ लड़कियों को मिलता है… तेरे जैसी बदमाश को नहीं… लड़की रुआँसी हो जाती है… आँखों से आँसू टप-टप गिर रहे हैं। दादी को दया आ रही है। वह उसे पास बुलाकर कह रही हैंµ एक उपाय है… लड़की खिल उठती है। दादी कह रही हैं, लेकिन बहुत मुश्किल उपाय है, तुझसे होगा नहीं… दादी आप बताओ तो, मैं परीलोक जाने के लिए कुछ भी कर सकती हूँ। परीलोक का टिकट लेने के लिए तुझे दस लाख सोने के सिक्के जमा करने होंगे, वो भी परीलोक वाले सिक्के… परीलोक वाले सिक्के कैसे होते हैं दादी… लड़की संजीदगी से पूछ रही है… वो सिक्के हमलोग देख नहीं सकते बेटे, वो भगवान के घर में जमा होते हैं। जब हमलोग कोई अच्छा काम करते हैं तो सिक्के जमा होते हैं… एक अच्छे काम का एक सिक्का… नहीं… तुम्हारे सारे चॉकलेट एक कीमत के होते हैं? नहीं न… कोई एक रुपये में मिल जाता है तो कोई पाँच रुपये में, तो कोई पचास रुपये में… वैसे ही हर अच्छे काम का वैल्यू अलग-अलग होता है… जैसा काम करोगी, उसके वैल्यू के बराबर सिक्का जमा होता जाएगा… लेकिन अगर एक भी बदमाशी या बुरा काम करोगी तो एक सिक्का कम हो जाएगा, तुम्हारे एकाउंट से… और अगर बहुत ज्यादा बुरा काम करोगी तो पूरा एकाउंट खाली हो जाएगा… इस तरह से अगर दस लाख सिक्के जमा हो पाये, तब परीलोक जाने का टिकट मिलेगा…
दादी समझा रही हैं…
लेकिन दादी मुझे पता कैसे चलेगा कि मेरे एकाउंट में कितने सिक्के जमा हुए… दादी चुप हैं… इस बार पापा कह रहे हैं, उसका भी उपाय है… आम का पेड़ यह सब बता सकता है… तुम एक गुठली जमीन में गाड़ दो… जब उसमें से कोंपल निकलेगा तो समझना कि एक सिक्का जमा हो गया… फिर उसमें जितने पत्ते निकलते जाएँगे, उतने सिक्के… और जितने पत्ते टूट या सूख जाएँ, समझना उतने सिक्के कम हो गये… इस तरह से अगर दस लाख सिक्के तू जमा कर पायी, तो जा पाएगी तू परीलोक….
लड़की एक गुठली मिट्टी में गाड़ रही है। लड़की बेचैनी से कोंपल फूटने का इन्तजार कर रही है। रोज देखने आती है, कोंपल फूटा कि नहीं… लड़की अब सुधर रही है। बदमाशी करते-करते उसके हाथ रुकने लगे हैं। मन में अलार्म-सा कुछ बजने लगता हैµपरीलोक का टिकट। लड़की सोच रही है, ठीक कहती है दादी, मैं बहुत बुरी हूँ… तभी तो कोपल नहीं फूट रहा… फूटेगा भी कैसे… कल होमवर्क ठीक से किया, तो भाई की पेंसिल छुपा दी… इसीलिए एकाउंट खाली हो गया होगा… कल से बदमाशी एकदम बन्द… लड़की संकल्प ले रही
है… संकल्प पूरा नहीं हो रहा है… लड़की पछता रही है… परेशान हो रही है…
मैं तुम्हें देख रही हूँ लड़की… हाँ, रंजना, मैं तुम्हें देख पा रही हूँ… अब जब यह दृश्य बीस साल पुराना हो चुका है, तब भी यह सबकुछ मैं ऐसे देख पा रही हूँ, जैसे, अभी इसी वक्त घटित हो रहा हो… हाँ, यह घटित ही तो मेरा हासिल
है… मेरा यानी तुम्हारा रंजना… तुम मान क्यों नहीं लेती कि बस यह घटित ही तेरा हासिल है… मम्मी धोतियों में तह लगा रही हैं… मम्मी लोहे का एक चाकू मुझे दे रही है, कह रही है, रंजना, आज से तुझे उबटन लगेगा… ले, यह चाकू अपने पास रख… हमेशा अपने पास रखना… अब कहीं बाहर न निकलना… जिन्न-भूत, नजर-गुजर का क्या ठिकाना… एक मिनट मम्मी… रंजना दौड़ रही है… रंजना आँगन में है… बोल न रंजन, मैंने ठीक किया न… मैंने ठीक किया न रंजन… रंजना कई बार पूछती है… रंजन खामोश है… रंजना पर यह खामोशी बहुत भारी है… मन में कोई झंझावात उपद्रव मचा रहा है… रंजना रंजन को झकझोर रही है…
धप्प… धप्प… धप्प… आँगन में जैसे आम की बारिश हो रही है… अतीत से बारिश की फुहारें मुझे भिगो रही हैं… लड़की भीग रही है… बारिश तेज होती जा रही है… उससे लय-ताल मिलाती लड़की नाच रही है… दादी बारिश से बचती-बचाती छाते को सँभालती मन्दिर से आ रही हैं… लड़की उनसे लिपट गयी है… दादी की झिड़कियों का उस पर कोई असर नहीं हो रहा है… वह दादी का हाथ खींच रही है… वह दादी को कुछ दिखा रही है, कह रही है, देखो दादी… मेरे एकाउंट में एक सिक्का जमा हो गया है… अब तो बस… वह उँगली पर दस लाख में से एक घटा रही है… नाकामयाब हो कॉपी पर पेंसिल से कुछ लिख और मिटा रही है… बार-बार यह कसरत दुहरा रही है… छह दिन बीत चुके हैं… लड़की दादी से कह रही है, दादी जब सिन्हा अंकल के यहाँ बाबू हुआ था, तो छह दिन में उसका नाम रखा गया था न… हूँ… तो मेरे आम के पेड़ का भी कुछ नाम रखो न… वह भी तो छह दिन का हो गया है… पेड़ का भी कहीं नाम रखा जाता है… क्यों नहीं रखा जाता… पापा के एकाउंट का हिसाब जिसमें है उसका भी तो नाम रखा गया है, पासबुक… फिर मेरे एकाउंट का हिसाब जिसमें रहेगा उसका नाम क्यों नहीं रखा
जाएगा… तुझसे तो बात ही करना बेकार है… दादी झल्ला रही हैं… लड़की जिद कर रही है… दादी ऊब रही हैं… दादी नाम रख रही हैं… रंजना… ऊँ… ऊँ… रंजना… तू इसका नाम रंजन रख ले… रंजना का रंजन…    
पता है रंजन… आज मिस ने मुझे गुड दिया… देख… देख… डायरी भी देख, एक भी रिमार्क नहीं मिला है, पिछले चार दिनों से… फिर भी तेरे पत्ते क्यों नहीं बढ़
रहे… शायद अभी एक सिक्का पूरा नहीं हुआ होगा… कहीं ऐसा तो नहीं कि भगवान जी मेरे अच्छे काम देख ही नहीं पा रहे… लड़की का चेहरा बुझ रहा
है… बहुत बिजी रहते होंगे न… उन्हें तो बहुत ज्यादा जोड़-घटाव करना पड़ता होगा… कहीं मेरे एकाउंट के जोड़-घटाव में गड़बड़ी तो नहीं हो गयी… लड़की का चेहरा सफेद पड़ रहा है… नहीं-नहीं, दादी कहती हैं, भगवान सब देखते हैं और उनसे गलती भी नहीं होती… फिर भी रंजन, मैं तुम्हें तो सबकुछ बताती हूँ न… तू ध्यान रखना मेरे एकाउंट का… ध्यान रखना कि भगवान जी कुछ मिस न करें… ध्यान रखना कि वे मेरा अच्छा काम भूल न जाएँ… लड़की समझा रही है…
लड़की रो रही है… रंजन का एक पत्ता नीचे जमीन पर पड़ा
है… कल उसने फिर भाई से झगड़ा किया था…
आँसू की बूँद मुझ पर गिर रही है… मम्मी रो रही है… मम्मी एलबम से तस्वीरें निकाल-निकाल कर नये एलबम में सजा रही है… रंजना इसे लेते जाना
… तुझे कोई और भी तस्वीर चाहिए तो इसमें रख ले… मैं अपनी पुरानी डायरी के कवर उतार रही हूँ… अनिल कुमार… गुलाब का सूखा हुआ फूल… हर पँखुड़ी पर आई लव यू रंजना… रंजना मुस्करा रही है… गुलाब का सूखा हुआ पत्ता… उस पर एक फोन नं.
हलो रंजना, आज स्कूल क्यों नहीं आई… कौन… मैं अनिल… लड़की डर रही है… किसी को पता न चल जाये कि उसके लिए किसी लड़के का फोन आया
है… नम्बर कहा। से मिला… नेहा से… पापा अन्दर आ रहे हैं… लड़की झट से फोन काट देती है… किसका फोन था… आज कई बार फोन आ रहा है लेकिन कोई बोल नहीं रहा, अभी किसका था… नेहा का… लड़की पापा से नजर चुरा रही है… पापा, आज पापा नहीं रह गये हैं, पापा आँख बन गये हैं, पापा कई-कई आँखों में तब्दील हो गये हैं… ये आँखें लड़की को बेध रही हैं… अन्दर, बिलकुल अन्दर, वहाँ झाँक रही हैं, जहाँ गूँज रहा है, फोन नेहा का नहीं, अनिल कुमार का था… पापा से झूठ क्यों बोला… अनिल को डाँटा क्यों नहीं… उसकी हिम्मत कैसे हुई यहाँ फोन करने की… किसी को पता चल जाता तो… मैं तो बदनाम ही हो जाती… ओ माई गॉड… कितना बड़ा अनर्थ हो जाता… पापा तो मेरी जान ही ले लेते… थैंक गॉड, किसी को पता नहीं चला… लेकिन पापा से झूठ बोलकर आज मैंने गलत किया न रंजन… पर मैं क्या करूँ… अगर सच बोलती तो क्या पापामान लेते कि मैं सचमुच सच बोल रही हूँ… सचमुच, आज तक मैंने स्कूल में अनिल तो क्या किसी भी लड़के से बात तक नहीं की है… नहीं मानते न… बोल न रंजन
… नौवीं कक्षा की एक सुन्दर सलोनी टीनएजर हरे रंग के सलवार-कुरते में एक डाल पर लेटी है… वे आँखें उसे आर-पार बेध रही हैं… वह डाल से और चिपक जाती है… अपनी आँखें बन्द कर वह पूछ रही है, बोल न रंजन… हवा का एक तेज झोंका पत्ते सहित डाल को हिला जाता है… थैंक्स रंजन… लड़की अच्छा महसूस कर रही है… अपनी ही रौ में बोले जा रही है, बायो मैम ठीक कहती हैं… पेड़-पौधे हमारी तरह सजीव हैं… वे भी सब कुछ महसूस करते हैं, सुख-दुख… मैं कहूँ तो सच-झूठ भी… लड़की मुस्करा रही है… वह दूसरे डाल पर जा बैठी है… वह डाल को चूम रही है… सॉरी रंजन… उस दिन मैंने तुझे बहुत दुत्कारा… एक्सट्रीमली सॉरी… मुझे गुस्सा आ गया था, यह जान कर बहुत गुस्सा आया था मुझे कि पत्तों का ठीक मेरी बदमाशी के अगले दिन टूटना भगवान की नहीं, पापा की कारिस्तानी थी… मैं सच जान गयी थी… परीलोक का… टिकट का… एकाउंट का… लेकिन सब जानकर भी तुमसे मुँह नहीं मोड़ पायी मैं… चार दिन भी नहीं रह पायी मैं, तेरे बिना… पाँच साल की उम्र से बारह साल की उम्र तक लगातार हर बात तुझे बताते-बताते शायद तू मेरी आदत बन गया था… हाँ, मुझे पता ही नहीं चला, लेकिन तू मेरी आदत बन गया था… एक ऐसी आदत जो मेरी जरूरत बन गयी थी…
ये कैसी जरूरत है… लड़की खुद से पूछ रही है… लड़की करवटें बदल रही है… मसनद को अपनी बाँहों में भींच रही है… मसनद अब मसनद नहीं रहा… वह अनिल बन गया है… लड़की उसमें सिमटती जा रही है… डूबती जा रही है… झुरझुरी… तड़प… बेचैनी… उत्तेजना… आनन्द का सागर… लड़की डुबकियाँ लगा रही है… तैर रही है… उसके पैर, पैर नहीं रहे, मछलियाँ बन गये हैं… बदन लहर बन गये हैं… हाथ बदन पर फिसल रहे हैं… सीने पर जो फूलों की गेंद उग आये हैं, उससे खेल रहे हैं… आँखें… लड़की चिहुँकती है… पापा की आँखें… कमरा अब कमरा नहीं रह गया… वह आँखों में तब्दील हो गया है… आँखें ही आँखें… लड़की चादर खींच रही है… लड़की चादर में सिमट रही है… अब लड़की नहीं दिख रही है, बस, चादर दिख रहा है…
चादर… झक्क सफेद चादर…. माँ चादर दिखा रही है… साज में सफेद
चादर… हाँ, रंजना को बचपन से सफेद चादर ही पसन्द है… वह हमेशा सफेद चादर पर ही सोती है… उसे उसका मलिन होना तक नागवार गुजरता है… लड़की रो रही है… सफेद नाइट सूट में लिपटी तेरह साल की टीनएजर लड़की अपने जन्मदिन की सुबह रो रही है… झक्क सफेद चादर उसके हाथ में है… सुबह जगी तो बहुत खुश थी वह… हर साल की तरह वह इस गिफ्ट से उस गिफ्ट तक फिसल रही थी… तभी कुछ लाल दिखा… सफेद चादर पर लाल दाग
… सफेद नाइट सूट पर लाल दाग… लड़की तब से रो रही है… मम्मी उसे समझा रही है… इसमें रोने की क्या बात है… यह तो हर लड़की के साथ होता है… मम्मी उसे बता रही है कि ऐसा हो तो क्या करना चाहिए… क्या करना चाहिए कि दाग चादर में न लगे… मम्मी उसे और भी बहुत कुछ बता रही हैं… कह रही है, इस दौरान अचार न छूना… अचार सड़ जाता है… चार दिन बाद इस दौरान पहने सारे कपड़े, चादर आदि धो कर बाल धो के नहा लेना… इसके पहले पूजाघर में न जाना… भगवान को न छूना… भगवान से जुड़ी किसी चीज को हाथ न लगाना… लड़की अचरज में है… पूछ रही है… क्यों… क्योंकि इस दौरान लड़की मरा जाती है… मरा जाती है… लड़की के मन पर हथौड़ा सा कुछ लगा… हर साल की तरह इस साल अपने जन्मदिन पर भगवान का आशीर्वाद लेने नहीं जा सकती मैं रंजन… क्योंकि मैं मरा गयी हूँ… नहीं समझे… मतलब मैं अपवित्रा, अछूत हो गयी हूँ…
अछूत… छूना मत मुझे… दूर हो जा… पापा लड़की को दुत्कार रहे हैं… पूरा घर उसके मरने की मन्नत माँग रहा है… उसके स्पर्श से बचने की हर सम्भव कोशिश कर रहा है… लड़की रो रही है… लड़की वीर्य से लिथड़ी है… ऊपर से नीचे तक… आगे से पीछे तक… अन्दर से बाहर तक… उसका रोम-रोम लिथड़ा है… वह मम्मी की तरफ जा रही है… मम्मी उसे धक्का दे रही हैं, जा रसातल
में… लड़की नीचे गिर रही है… गहरी खाई में… वह डर रही है… चिल्ला रही है… मदद के लिए पुकार रही है… तभी रंजन की बाँहें फैलने लगती हैं… वे बाँहें उसे बचा रही हैं… लड़की ऊपर आ रही है… वह हर किसी की तरफ बाँहें फैला रही है… एक-एक करके सबके पास जा रही है… लेकिन अब वहाँ कोई नहीं है… सिर्फ आँखें हैं… अंगारे-सी दहकती आँखें… अंगारे उसकी तरफ लपक रहे हैं… लड़की जल रही है… रंजन मदद को दौड़ रहा है… रंजन जल रहा है… लड़की चिल्ला रही है… लड़की कराह रही है… मम्मी उसे झिंझोड़ रही हैं… क्या हुआ… क्यों चीखी… कराह क्यों रही है… पंडित जी कह रहे हैं… काली छाया का प्रकोप है… मम्मी उसे जन्तर पहना रही है… जंतर बाँधी लड़की रंजन की बाँहों में लेटी है… अनिल! लड़की चौंकती है… सामने की छत से अनिल उसे निहार रहा है… आजकल वह अक्सर इस छत पर नजर आ जाता है… लड़की के चचेरे भाई से उसने हाल ही में दोस्ती गाँठी है… उसके साथ शाम को छत पर चेस खेलने के बहाने वह लड़की को देख रहा है… यह उसका रोज का क्रम बनता जा रहा है… और लड़की का भी…
हाँ, लड़की, मैं तुझे देख रही हूँ… मैं देख रही हूँ कि तू अनिल को देख रही है… उन आँखों की चमक तेरी आँखों में उतर रही है… दिन-ब-दिन गहरी उतरती जा रही है यह चमक… लड़की, मैं सुन रही हूँ, मैं सुन रही हूँ कि तू इसे इल्जाम कह रही है… तू इस इल्जाम को सिरे से खारिज कर रही है… लेकिन मैं मान नहीं रही हूँ… तू मुझसे बहस कर रही है… मैं भी बहस पर उतर आई हूँ… तो तू कल इतनी बेचैन क्यों थी… क्यों बार-बार अनिल की सीट की तरफ देख रही थी… क्यों तूू प्राइमरी सेक्शन में गयी थी… उसके भाँजे को चॉकलेट खिलाने… तो चॉकलेट खिला कर आ जाती न… क्यों बातों-बातों में उससे यह जानने की कोशिश कर रही थी कि अनिल स्कूल क्यों नहीं आया… क्यों फोन बजते ही तेरा दिल धड़क उठता है… क्यों तेरे सिवा जब कोई और फोन उठाता है और उधर से कोई नहीं बोलता तो तू मुस्करा उठती है… लेकिन मैं फोन उठाती हूँ और फोन अनिल का होता है तो मैं उसे कितना डाँटती हूँ… हर बार कहती हूँ कि अब यहाँ फोन किया तो कम्प्लेन कर दूँगी… तो कम्प्लेन कर क्यों नहीं देती… डाँटने के बाद भी तो रोज फोन करता ही है वह… और जब नहीं करता है तो बात-बात पर चिड़चिड़ाती क्यों रहती है… जब स्कूल से निकलती है तो मुड़-मुड़ के क्यों देखती है कि वह साइकिल होते हुए भी पैदल-पैदल तेरी झुंड के पीछे-पीछे आ रहा है या नहीं… उसे आते देख तू मुस्कराने क्यों लगती है… जब वह साइकिल से घर निकल जाता है सीधे तो तेरा मूड खराब क्यों हो जाता है… लड़की तू मान क्यों नहीं लेती है कि तू… क्यों मान लूँ मैं… याद नहीं, अब मुझ पर कितनी बड़ी जिम्मेदारी आ गयी है… अपनी शुचिता बचाये रखने की जिम्मेदारी… प्रकृति हर महीने रीमाइंडर देती है मुझे… प्रकृति ही क्यों, मम्मी भी तो हमेशा देती है यह रीमाइंडर… कभी बोल कर… कभी बिना बोले… पापा के समझाने में, गुस्से में, प्यार में, आँखों में, जुबान पर, हर घड़ी बजता रहता है यह रीमाइंडर…  अपनी शुचिता बचा कर
रख… अपने खानदान की प्रतिष्ठा बचा कर रख… क्योंकि जब तक तेरी शुचिता अक्षुण्ण है तभी तक तेरे खानदान की प्रतिष्ठा अक्षुण्ण है… लड़की बहस पर आमदा है… तुझे याद हो न हो, मुझे मम्मी का हर वह लफ्ज याद है जो उन्होंने प्रकृति के पहले रीमाइंडर पर कहा था, अब आज से तेरी जिन्दगी की नयी शुरुआत है रंजना… पहले का सबकुछ बन्द… बाहर निकलना, लड़कों के साथ खेलना-कूदना, बातचीत… यहाँ तक कि लड़कों की तरफ देखना भी… तू शरीफ खानदान की बेटी है… ऐसा-वैसा कुछ मत करना… वरना खानदान की पीढ़ियों से अर्जित इज्जत पर दाग लग जाएगा… नहीं, मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगी, जिससे मेरे खानदान पर दाग लगे… मैं एक शरीफ लड़की हूँ… मैं अनिल की तरफ देखूँगी भी नहीं… रात में सोते हुए उसे पकड़ने की कल्पना भी नहीं करूँगी… उससे लिपटने की भी नहीं… कल किया था तो कितना भयानक सपना आया… लड़की अपने जन्तर की तरफ देख रही है… लड़की अब लड़की नहीं रह गयी है… आँखें बन गयी है… एक जोड़ी आँखें… कितनी कातर हैं ये आँखें… 
ये कातर आँखें कुछ ढूँढ़ रही हैं… बड़ी बेताबी से…. एक-एक पल भारी… धड़कन जैसे सुपरफास्ट ट्रेन…. डर… डर… डर… लड़की डर रही है… सुबह उठते ही अपनी पैंटी पर दाग ढूँढ़ रही है… हे भगवान, बस इस बार बचा ले… अब दुबारा कभी ऐसा नहीं करूँगी… इस बार भी मैंने जान-बूझकर कुछ नहीं किया… कोई जाने या ना जाने, तू तो जानता है न मेरे भगवान… तुझे तो सब पता है… तू ही बता, मैं क्या करूँ… मैं क्या करूँ… ये बदलाव तो खुद ब खुद हो रहे हैं… मेरे न चाहते हुए भी हो रहे हैं… न चाहते हुए भी अनिल को ढूँढ़ती हैं मेरी ये निगाहें… उससे नजर मिलते ही सुखद-सी सिहरन पूरे बदन में सरसराने लगती है… क्लास में अटेंडेंस के लिए उसका रोल नम्बर सुनूं या किसी के मुँह से उसका नाम… मुझे कुछ होने लगता है… बिस्तर पर जाते ही उसके सीने पर सिर रखकर सोने का जी करता है… ऐसे में जब उसके भाँजे ने बताया कि आज घर पर कोई नहीं है…. वह मुझसे मिलना चाहता है… एक हफ्ते से बीमार था वह… तरस गयी थी मैं, उसे देखने के लिए… मैं खुद को रोक नहीं पायी… उसके पीले पड़े चेहरे पर मुझे देखते ही जो चमक आयी थी, उस पर बिछती चली गयी मैं… वह किस (चुम्बन)…. उसमें डूबे हुए बेताब लम्हे… कितना सुखद था सबकुछ…. लेकिन इतने सुखद एहसास की इतनी दुखद परिणति… 15 तारीख की डेट थी… आज बीस हो गया लेकिन… पर तू डरती क्यों है? तूने तो ऐसा कुछ किया नहीं है… लेकिन कौन मानेगा… कौन मानेगा कि बिना कुछ किये मेरा पीरियड रुक गया है… अगर डॉक्टर क्लीन चिट दे दे तो भी लोग तो यही कहेंगे कि डॉक्टर से कुछ उपाय करा लिया है बदनामी के डर से… फिर तो मैं पूरी तरह बदनाम हो जाऊँगी… मैं एक शरीफ घराने की शरीफ लड़की हूँ…यह सब नहीं सह पाऊँगी… हे भगवान मेरी मदद कर… इस बार बचा ले… मैं तुम्हारे सामने कन्फेस करती हूँ, भगवान मुझे माफ कर दे… हे भगवान, मुझे माफ कर दे… मैंने गलती की है…. लड़की कह रही है… उससे घंटे भर लिपटी रही… अंग-अंग का संगम… लिप लॉक किस… किस, करने से कुछ नहीं होता स्टुपिड… नेहा समझा रही है… लड़की समझ गयी है… उसका डर जा रहा है… अनिल आ रहा है… उसके करीब… और करीब… बेहद करीब… लड़की उसे रोक रही है… अनिल मुझे डर लग रहा है… आज बहुत डर लग रहा है… आज नहीं, जब से यह पीरियड शुरू हुआ है, तब से यह डर मेरे अन्दर फल-फूल रहा है… यह आ जाए, तो डरती रहती हूँ कि कोई जान न जाए कि आया है… यह ना आए, तो डरती रहती हूँ कि कोई जान ना जाए कि दो दिन लेट हो गया, पीरियड नहीं आया है… मैं अब जी नहीं रही हूँ, डर रही हूँ… डर मेरा स्थायी भाव हो गया है… हमेशा डरती रहती हूँ कि पता नहीं इस महीने मुझे यह सर्टिफिकेट मिल भी पाएगा या नहीं कि मैं एक शरीफ लड़की हूँ… अनिल, मैं सचमुच एक शरीफ लड़की हूँ… देखो, मैं तुमसे प्यार करती हूँ लेकिन मैं आज तक वर्जिन हूँ… तो मैं हुई न शरीफ लड़की…
लड़की एआईईईई का एक्जाम देने दिल्ली जा रही है… पापा-मम्मी के साथ… वहाँ मासी के यहाँ रुकना है… एक्जाम दे कर लड़की थक गयी है… सो रही है… मम्मी-पापा को मौसा-मासी घुमाने ले जा रहे हैं… लड़की को अगले हफ्ते फिर एक्जाम देना है इसलिए वह घर में रह कर पढ़ रही है… लड़की मिस कॉल दे रही है… लड़की फोन पर बात कर रही है… एक महीने हो गये, मिले हुए… स्कूल जाते थे, तभी ठीक था… अब तो मिलना बहुत मुश्किल हो गया है… अंकल-आँटी कब तक आएँगे… अनिल पूछ रहा है… दस बजे तक… मैं आ रहा हूँ… लड़की एड्रेस लिखवा रही है… लड़की दरवाजा खोल रही है… लड़की डर रही है… लड़की अनिल की बाँहों में है… डर जा रहा है… बेताबी बढ़ रही है… दो जिस्म, दो जान, एक हो रहे हैं… मिलन… संगम….
तीन दिन बीत गये हैं… लड़की मम्मी और मासी के बगल में लेटी है लेकिन वह वहाँ नहीं है… वह तो अनिल के साथ है… उसके होटल के कमरे में… उसकी बाँहों में… आनन्द के सागर में… तैरते-तैरते वह रंजन के पास पहुँच गयी है… रंजन, तू सोच रहा होगा कि मैं अब शरीफ लड़की नहीं रही… है न… मैं भी ऐसा ही सोच रही थी परसों… लेकिन फिर मुझे लगा कि वर्जिनिटी की प्रतीक झिल्ली तो खेल-कूद या अन्य कई फिजीकल एक्टिविटीज के दौरान भी फट जाती है, तो क्या लड़की शरीफ नहीं रह जाती…. रहती है न… अब तू सोच रहा होगा कि मैं पिछले तीन दिनों से जो कर रही हूँ वह खेलकूद तो है नहीं… मानती हूँ लेकिन तू यह भी तो मानता है न कि प्यार करना गुनाह नहीं है… प्यार पाक है… अनिल और मैं भी तो प्यार करते हैं…. हमारा प्यार बढ़ते-बढ़ते इस मुकाम तक पहुँचा
है… इसमें गलत तो कुछ भी नहीं है… मैं आज भी उतनी ही शरीफ लड़की हूँ रंजन… हूँ न…
अगर इसमें गलत कुछ भी नहीं है तो इस रिश्ते को सब को बता क्यों नहीं देती…
कैसे बता दूँ रंजन… ये दुनिया समझेगी इसे कभी… बहुत अजीब है यह दुनिया… यहाँ तो बद अच्छा बदनाम बुरा…
बद अच्छा बदनाम बुरा… आई एग्री रंजना…. डोंट वरी… मैं जल्दी ही कुछ करता हूँ… तुम्हारी इज्जत मेरी इज्जत है… और प्रॉमिस आगे से ऐसा प्रीकॉशन लूँगा कि यह समस्या दुबारा नहीं आएगी…
एबॉर्शन करा के लौटी लड़की रंजन की डाल पर लेटी है हमेशा की तरह… लड़की कह रही है… अभी मुझे पढ़ना है… कुछ बनना है… अभी कैसे जन्म देती इस बच्चे को… दुनिया इसे स्वीकार नहीं करती… मैं और अनिल अभी खुद को पालने लायक नहीं हैं… बच्चे को खाक पालेंगे… इज्जत, प्रतिष्ठा, परिवार सब खोकर भी उस बच्चे को क्या दे पाती मैं, एक नारकीय जीवन… यह सही नहीं था रंजन, इसलिए मैंने यह कदम उठाया… और कई शादीशुदा कपल भी तो एबॉर्शन जैसा कदम आये दिन उठाते रहते हैं… ऐसी महिलाओं को तो कोई नहीं कहता कि वे शरीफ नहीं रहीं… फिर मैं इस कदम से शरीफ लड़की कैसे नहीं रही… मैं शरीफ हूँ… हाँ, मैं आज भी उतनी ही शरीफ लड़की हूँ…
रंजना अलबम पलट रही है… चार साल की इंजीनियरिंग की पढ़ाई और फिर दो साल से नौकरी के दौरान लिव-इन…. एक ही कम्पनी में नौकरी हो इसके लिए कितनी मन्नतें, कितनी कोशिशें…. रंजना इन कोशिशों को याद कर मुस्करा रही है… लड़की मुस्करा रही है…अनिल की जिद कामयाब रही… उसके पापा मान गये हैं… डोनेशन से वह उसी कॉलेज में एडमिशन ले रहा है जिसमें रंजना का एडमिशन हुआ है…
लड़की केक काट रही है… अनिल हैप्पी बर्थ’डे सांग गा रहा है… अनिल कह रहा है… रंजना, अब तो हम दोनों वेल सेटल्ड हैं… अब हमें शादी कर लेनी चाहिए… तुम कहो तो मैं घर में बात करूँ… मैं तुम्हंे बताने ही वाली थी अनिल
… घरवालों ने मेरी शादी तय कर दी है… अनिल का चेहरा सफेद पड़ रहा है… लड़की कह रही है… अनिल तुम तो अच्छी तरह जानते हो, मैं तुमसे बेहद प्यार करती हूँ… लेकिन अपने घरवालों से भी बहुत प्यार करती हूँ… सॉरी अनिल लेकिन मैं उन्हें कैसे मना करूँ… अब अगर शादी नहीं होगी तो लड़के वाले, अगुआ आदि के मार्फत बात तो फैलेगी ही न… फिर मेरे घर-खानदान की क्या इज्जत रह जाएगी… मेरी क्या इज्जत रह जाएगी… इतने दिनों तक कितने जतन से

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4 COMMENTS

  1. कहानी के नाम पर वही घिसी पिटी पुरानी बात.पूरी कहानी(?) में सिर्फ और सिर्फ दृश्य हैं कहानी कहीं नहीं.अन्तरंग संबंधों को दृश्य दर दृश्य दिखाना आधुनिकता या खुला विचार है शायद यही मान कर ये लिखी गयी है. 'हंस' का स्तर निम्न से निम्नतर होता जा रहा है.

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