निलय उपाध्याय और मुंबई की लोकल

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निलय उपाध्याय ठेठ हिंदी के कवि हैं. उनकी कविताओं में वह जीवन्तता है जिससे पता चलता है कि वे जीवन के कितने करीब धडकती हैं. मुंबई की लोकल को लेकर उन्होंने एक कविता श्रृंखला लिखी है, उसकी कुछ कवितायें आपके लिए- जानकी पुल.
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लोकल के डब्बे में हिरोईन 
लोकल का डब्बा सवारियों से भरा था
जब एक औरत घुसी
लोगो पर गहरी नजर डाल
जैसे रोते हुए कहा – मेरा बच्चा
और अजीब सी बदहवासी में निकल गई बाहर
जाते ही किसी ने कहा अरे पहिचाना उसे
कौन थी वह
सबको लग रहा था चेहरा उसका
जाना पहिचाना
नाम आते ही पहचान गए सब
वह थी बालीवुड फ़िल्मों की हिरोइन
कई निकलने को तत्पर हुए 
मगर चल पडी लोकल और चर्चा निकल गई
अभी तीन साल पहले उसकी शादी हुई थी
एक बच्चा भी था
पति से तलाक के किस्से भी गरम थे
क्या हुआ बच्चे को पर अटक गई बात
घर आने के बाद डब्बे में सवार हर आदमी ने
अपनी बीबी से कहा,
बीबी ने बताया मुहल्ले की औरतों को
मुहल्ले की औरतों ने दूसरी को
और देखते देखते फ़ैल गई
लोकल के डब्बे से घर घर तक हिरोईन के
आने की खबर
और सबके चेहरे पर तैर गया
लाख टके का यह सवाल
आखिर क्या हुआ उसके बच्चे का
गहराती रही रात
गहराता रहा दुख, सोचते रहे सब
जरूर साजिश होगी उसके पति की
और जैसा कि समय है
पैसों के लिए अपहरण भी हो सकता है
पता नही किस हाल में होगी
बेचारी नन्ही सी जान
औरत
औरत ही होती है
चाहे फ़िल्मों की हो या घर की
कुछ ने मन्नतें मानी,
कुछ को नींद नही आई रात भर
अगली सुवह
अखबार में छोटी सी खबर थी
कि अपने आने वाले सीरियल जिसमे गुम हो जाता है
मुम्बई के किसी स्टेशन पर एक मां का बेटा
का प्रमोशन करने चर्च गेट स्टेशन गई थी
बालीवुड फ़िल्मों की हिरोइन
मुम्बई लोकल की औरतें
वह लड़की
जो दरवाजे के पास खडी कान में इयर फ़ोन लगा
सुन रही है गाना और चिप्स भी खा रही है,
अगला स्टेशन आते जबरन आ जाएगी गेट पर
और हवा में इस तरह लहराएगा उसका आंचल
कि शर्माएंगे मेघ भी
उधर फ़ोन पर
हाफ़ पैट पहने अपने प्रेमी से बात कर रही है एक
कि चालीस मिनट बाद अंधेरी पहुँच जाएगी
वहीं पर आगे वाले
सिग्नल के नीचे करे इंतजार
बीच में खडी एक
बता रही है एक कि पति की कमाई
ठीक ठाक है, बच्चे भी कमा रहे हैं अच्छा खासा
मगर क्या करूं घर में बैठकर इसलिए
नौकरी कर ली स्कूल की
बच्चो के साथ बहल जाता है दिन
ये मुम्बई लोकल की औरतें हैं
तेज चलती है, तेज बोलती है
दौड कर पकडती है ट्रेन
धक्का देकर चढती है, और गेट पर खडी
आती हुई ट्रेन के दरवाजो पर खडे लडकों का
उड़ा देती है मजाक, तीन लोगों से प्यार कर
ठोक बजा कर करती है शादी
ये मुम्बई लोकल की औरतें हैं
कम नहीं खाती,
गम नहीं खाती, गुस्सा आया
तो कर देती है नाक में दम, नहीं करती
छोटे छोटे फ़ैसलों के लिए पति का इंतजार
मन न हो खाना बनाने का तो बहाना नही बनाती
साफ़ कह देती है
पति से-
आज खाना लेकर आना
इन्हें देखकर
कई बार सोचती है मुम्बई की लोकल
कि काश होते उसके भी डैने, पटरी की जगह
होता उसका आसमान और वह उड़ती हुई
मुम्बई की इन लड़कियों को ले जाकर छिड़क देती
बीज की तरह
गांव गांव शहर शहर पूरे देश मे
खत्म हो जाती याचना स्वतंत्रता और समानता की
सचमुच अगर होता ऎसा
कितना सुन्दर दिखता अपना देश 
धूल धूसरित अप्सरा
उस युवती पर
जो दिखने में थी धूल धूसरित
पर अप्सरा जैसी, उस पर आराम से
लिखी जा सकती थी,कोई कविता,
एक अच्छी सी कहानी, अगर पहुंच गई होती
वह मीरा रोड
उस कहानी पर
सीरियल बनाया जा सकता था
फ़िल्म बनती तो जरुर हिट हो जाती
खोज का एक मिथक था उसका जीवन
कहां मिलती है
आजकल ऎसी सच्ची कहानी
धूपिया रंग था उसका
दूर दूर तक फ़ैले सागर में
पत्थर सी उभरी थी उसकी आंखे
जिसमे भरी थी किसी के लिए
बेपनाह मोहब्बत
खुलती थी तो
दौड़ती दिखाई देती थी लहरें
पूरब से पश्चिम की दिशाओं तक
प्याज के गांठ की तरह
अपनी ही परतों मे कस कस कर रची
बोलने मे तुतलाती थी,
मगर भाषा मे इतना अपनापन था
कि स्वर की लहरियां लगती थी आवाज
                                               
देखते ही देखते काला पड़ गया
उसका रंग,
आंखों के कोर से लुढकी एक सूखी नदी
बेआवाज होठ हिले पर कुछ नहीं कह पाई वह
दादर स्टेशन पर 
जब उसे गिरफ़्तार कर ले गई पुलिस
उसे क्या पता था कि
दो दिलो के बीच आ जाएगा
दो मुल्को का कानून, और नसीब
होगी जेल
अपने पति की तलाश मे
जाने कितनी नदियां
कितने पहाडों के किन किन राहों से चलती
किन किन उम्मीदों के साथ
बांग्लादेश के किसी गांव से मुम्बई आई थी
वह
धूल धूसरित अप्सरा
नीले रंग की बिन्दी
बडे दिनो के बाद दिखा
अंधेरी मे
लोकल का खाली डब्बा, चढा तो
मिल गई विन्डो सीट
बैठा पसर कर,
नौकरी मिल जाती है मुम्बई मे
नही मिलती लोकल में विन्डो सीट
आज आकर चेहरे से
जी भर टकराएगी समुद्र की हवा
आंखो को मिलाएगा सुख बाहर के नजारो का
कि अचानक नजर टिक गई, विन्डो के
ठीक नीचे जहां आराम से चिपकी थी
नीले रंग की बिन्दी
किसकी बिन्दी है यह
जरूर कोई औरत बैठी होगी इस सीट पर
मुझसे पहले हो सकता है कि ललाट को
देने के लिए थोडा विश्राम चिपका दिया हो
और भूल गई हो जाते समय
यह भी तो हो सकता है साथ बैठा हो
उसका पति, सामने उतार कर चिपकाया हो
और छोड़ा भी हो जान बूझ कर जताने के लिए
अपना गुस्सा
हो सकता है बिन्दी के कारण
लग रही हो बहुत खूबसूरत और घूर रहे हों
आस पास बैठे और खड़े लोग, पछता रही हो
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9 COMMENTS

  1. बेशक मैं इन कविताओं का पहला श्रोता रहा हूँ लेकिन पढ़ने पर इनका अर्थ और भी अनेक आयामों को खोलता है । इनमें लोकल और उसके भीतर के जीवन को भारतीय समाज-संस्कृति और राजनीति तथा अर्थव्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में देखा गया है । मैं समझता हूँ भारतीय ही नहीं विश्व-कविता में यह एक दुर्लभ काव्योपलब्धि है कि किसी कवि ने यातायात व्यवस्था के बहाने अपने एक महानगर और देश के जनजीवन को लेकर इतनी कवितायें लिखीं । निलय की अभिव्यक्ति-सहजता उन्हें एक बड़ी काव्य-परंपरा का हिस्सा बनाती है और वे समकालीन जीवन पर अपनी पकड़ को बनाए रखने का एक बेहतर उदाहरण पेश करते हैं ।

  2. ये मुम्बई लोकल की औरतें हैं
    तेज चलती है, तेज बोलती है
    दौड कर पकडती है ट्रेन
    धक्का देकर चढती है, और गेट पर खडी
    आती हुई ट्रेन के दरवाजो पर खडे लडकों का
    उड़ा देती है मजाक, तीन लोगों से प्यार कर
    ठोक बजा कर करती है शादी

    ये मुम्बई लोकल की औरतें हैं
    कम नहीं खाती,
    गम नहीं खाती, गुस्सा आया
    तो कर देती है नाक में दम, नहीं करती
    छोटे छोटे फ़ैसलों के लिए पति का इंतजार
    मन न हो खाना बनाने का तो बहाना नही बनाती
    साफ़ कह देती है
    पति से-
    आज खाना लेकर आना

    निलय जी अद्भूत! कवितायेँ पढ़कर मन हो रहा है कि एक बार आपके साथ मुंबई लोकल की सैर की जाय…

  3. Kisi din ladies coach me galti se chale gaye the kya nilayji? Bina gaye kaise unhe itne achchhe se suna- guna unhe! bahiya kavitayen,sukriya.

  4. कई बार सोचती है मुम्बई की लोकल
    कि काश होते उसके भी डैने, पटरी की जगह
    होता उसका आसमान और वह उड़ती हुई
    मुम्बई की इन लड़कियों को ले जाकर छिड़क देती
    बीज की तरह
    गांव गांव शहर शहर पूरे देश मे
    खत्म हो जाती याचना स्वतंत्रता और समानता की

    सचमुच अगर होता ऎसा
    कितना सुन्दर दिखता अपना देश …..nilay ji ka jawab nahi'n chhoti chhoti bato'n se nikalte hain badi kavitaye;n…..lajawab

  5. कई बार सोचती है मुम्बई की लोकल
    कि काश होते उसके भी डैने, पटरी की जगह
    होता उसका आसमान और वह उड़ती हुई
    मुम्बई की इन लड़कियों को ले जाकर छिड़क देती
    बीज की तरह
    गांव गांव शहर शहर पूरे देश मे
    खत्म हो जाती याचना स्वतंत्रता और समानता की
    बेशक !

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