हिन्दी का लेखक हिन्दी के पाठक के अलावा सबके लिए लिखता है

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दिव्य प्रकाश दूबे ने हिंदी दिवस के बहाने हिंदी को लेकर कुछ विचारोत्तेजक बातें लिखी हैं, जो कमोबेश हिंदी समाज की चिंता हैं. एक सच्चे लेखक की चिंता. बहसतलब बातें हैं, जिनके ऊपर हम हिन्दीवालों को कभी न कभी जरूर सोचना चाहिए- मॉडरेटर. 
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लेख थोड़ा लम्बा हो गया है लेकिन हिन्दी दिवस पर इतना पढ़ना तो बनता ही है !!!  14 सितंबर को हिन्दी दिवस होता है, ये GK का ज्ञान मैं इसलिए दे रहा हूँ  क्योंकि हिंदुस्तान में हिन्दी दिवस किस दिन होता है ये बात जानने या न जानने  से हम सब की जिंदगी में कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला।  हिन्दी दिवस है, एक दम कुछ intellectual type के लोगों को आज बड़ी चिंता होने  लगेगी कि हिन्दी की present situation बड़ी ही खराब है। कई लोग तो आँसू की  नदिया बहा देंगे हिन्दी की दयनीय स्थिति पर…, कुछ तो ऐसे भी मिलेंगे  जिन्होंने हिन्दी की खराब स्थिति पर Phd कर रखी होगी। जो लोग रोना-धोना  मचायेंगे उनमें से कइयों के बच्चे इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ते होंगे। यकीन  न आए तो आज शाम का टीवी खोल के देख लीजिएगा।  देखिये, हिन्दी की किताब पढ़ने के साथ दिक्कत ये है की पूरी किताब पढ़के एक भी  नयी vocabulary तो सीखते नहीं हम लोग जो MBA के entrance में या कहीं बोलने  में काम आए। style नहीं न हिन्दी में और वैसे भी हिन्दी की किताब लेकर flight  में या ट्रेन में जाओ तो बड़ा ही down market लगता है। वहीं अगर हाथ में  अँग्रेजी की कोई भी किताब होती जो भले हम पढ़ते नहीं बस ट्रेन में लेकर जाते या  कॉलेज में हाथ में दबाये रहते तो बड़ा ही confident सा फील होता है।  

अपने आस पास जरा नज़र घुमा के देखिये अंग्रेजी की किताबें तो हर जगह मिलती हैं,  pirate होती हैं, हम लोग मोलभाव करके फुटपाथ से भी ले लेते हैं। फुटपाथ वाली  दुकान में आप हिन्दी की किताब पूछोगे तो दुकानदार ऊपर से नीचे तक आपको ऐसे  देखेगा जैसा आपने किताब की दुकान पर बिंदास बोल कर कॉन्डोम मांग लिया हो। हाँ हिन्दी के नाम अगर उसके पास कुछ मिले तो शायद आपको मस्तरामजैसा कुछ टिका  दे, उसकी demand रहती ही है।  देखिये इतना तो आप समझ ही गए होंगे कि हिन्दी में किताबों की स्थिति बड़ी गड़बड़  है तो सवाल ये उठता है कि इसका जिम्मेदार आखिर है कौन? काँग्रेस है राहुल गांधी है सोनिया गांधी है या फिर opposition है, मोदी है, मुलायम हैं?  किसी हिन्दी के लेखक से कभी गलती से मत पूछ लीजिएगा ये सवाल, वो तुरंत अपनी  आँखें लाल करके बोलेगा- पूरा सिस्टम खराब है, publisher जिम्मेदार है, सरकार जिम्मेदार है,  capitalism जिम्मेदार है। ऊपर से नीचे तक सब corrupt हैं!!” 

चलिये आपको एक राज़ की बात बता देता हूँ। हिन्दी की extremely bad situation के  लिए बहुत हद हिन्दी के लेखक ही जिम्मेदार हैं। हिन्दी का लेखक अपने पाठक से इतनी दूरी बना कर रखता है जितनी कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच है। अपनी  ही लिखी हुई चीज को प्रचार करने को हिन्दी का लेखक इतना बुरा मानता है जैसे वो किताब का नहीं सिगरेट या बीड़ी का प्रचार कर रहा हो। अब भइया, जब पता ही नहीं  चलेगा कि कोई नयी किताब आई है तो उसका बिकना और पढ़े जाना तो बहुत दूर की कौड़ी है। हिन्दी के बहुत से बड़े लेखक सोते-जागते खाते-पीते intellectual जैसा  behave करते हैं। वही intellectual (बुद्दिजीवी), जो पब्लिक में न ज़ोर से हँसता है न बोलता है बस सोचता रहता है, कभी-कभी बस थोड़ा मुस्कुरा देता है बस और समय समय पर चिंता व्यक्त करता रहता है, नारी से लेकर दलित तक सारे विमर्श करता रहता है। 

दिक्कत एक ही कि हिन्दी का लेखक पूरी दुनिया में हिन्दी के पाठक के अलावा सबके लिए लिखता है। कभी कभी तो इतना complex लिख देता है कि उसको  समझने के लिए दूसरे उसके जैसे ही intellectual (बुद्दिजीवी) को बुलाना पड़े।  अब देखिये ये हिन्दी का रोना धोना तो लगा रहेगा। मैंने ये सोचा है कि जो भी  मेरी हिन्दी favourite किताबें महीने में एक किताब में अपने किसी जानने वाले  को जरूर गिफ्ट करूंगा और दूसरा काम ये कि जहां भी किताबें मिलती हैं उस दुकानदार से हिन्दी की किताब रखने के लिए कहूँगा। आपमें से ज़्यादा से ज़्यादा लोग अगर अपने अपने शहरों में दुकानदार से हिन्दी किताब रखने के लिए कहें तो  शायद कुछ हवा का रुख बदले। मुझे मालूम है मेरे ये करने से कोई दुनिया नहीं  बदलने वाली लेकिन इस बार कोशिश करने का मन है। बहुत हुआ हिन्दी के लिए रोना धोना, क्या पता आपमें से कुछ लोग ऐसा करें तो हिंदुस्तान में हिन्दी भी थोड़ी kool जो जाए।

मेरी कुछ पसंदीदा किताबें जो मैं न जाने कितनी गिफ्ट कर चुका हूँ और आगे भी
 
करने वाला हूँ-
चित्रलेखाभगवती चरण वर्मा
गुनाहों का देवताधर्मवीर भारती
सिनेमा और संस्कृतिराही मासूम रज़ा
क्या भूलूँ क्या याद करूँहरिवंश राय बच्चन
ट-टा प्रोफ़ेसरमनोहर शाम जोशी
मृत्युंजय- शिवाजी सावंत

ये तो रही मेरी लिस्ट आप कौन सी किताब गिफ़्ट करने वालें हैं ?
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2 COMMENTS

  1. हिन्दी के लिए रुदन जारी है…तरह-तरह से वाद-विवाद होते हैं,खासकर 14 सितम्बर यानी हिन्दी दिवस पर…हिन्दी को बचाने-बढ़ाने की कई कवायदें सरकार और सरकारी संस्थान भी करते हैं, मगर सच्चाई यह है कि देश में हिन्दी स्कूलों का संसार पसरने के बजाय लगातार सिमटता जा रहा है…क्यों?
    मामला बहुत उलझा नहीं है…वजह बहुत साफ है. एक तो, अंग्रेजी पढ़े-लिखे होने का प्रतीक है,के सोच से अभी तक हम उबर नहीं पाए हैं, दूसरे दुनिया के बाज़ार पर अंग्रेजी का प्रभुत्व है…
    क्या हम पढ़े-लिखे होने का दंभ और बाज़ार की होड़ छोड़ सकते हैं…???

  2. सटीक बातें लिखी हैं शैलेश ने। पर भारतवासी होने के नाते उनका यह फर्ज भी बनता था कि यत्र तत्र सर्वत्र विद्यमान अंग्रेजी शब्‍दों को हिंदी में ही समझा कर लिखते। बीच बीच में अंग्रेजी के शब्‍दों से गति में अवरोध पैदा होता है।

    बाकी शैलेश ने अपने अनुभवों को तरजीह देते हुए बातें कहीं हैं, जिन पर सोचा जाना चाहिए।

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