संवाद और संवेदना की रेसिपी और लंचबॉक्स

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यह सिर्फ ‘लंचबॉक्स‘ फिल्म की समीक्षा नहीं है. उसके बहाने समकालीन मनुष्य के एकांत को समझने का एक प्रयास भी है. युवा लेखिका सुदीप्ति ने इस फिल्म की संवेदना को समकालीन जीवन के उलझे हुए तारों से जोड़ने का बहुत सुन्दर प्रयास किया है. आपके लिए- जानकी पुल.
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पहली बात: इसे‘लंचबॉक्स’ की समीक्षा कतई न समझें. यह तो बस उतनी भर बात है जो फिल्म देखने के बाद मेरे मन में आई.

अंतिमबात यानी कि महानगरीय आपाधापी में फंसे लोगों से निवेदन:इससे पहले कि ज़िंदगी उस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दे, जहाँ खुशियों का टिकट वाया भूटान लेना पड़े, कम-से-कम ‘लंचबॉक्स’ देख आईये.

अंदर की बात:दरअसल कोई भी फिल्म मेरे लिए मुख्यत: दृश्यों में पिरोयी गई एक कथा की तरह है.माध्यम और तकनीक की जानकारी रखते हुए किसी फिल्म का सूक्ष्म विश्लेषण एक अलग और विशिष्ट क्षेत्र है,जानती हूँ. फिर भी कुछ फ़िल्में ऐसी होती हैं,जिन्हें देख आप जो महसूस करते हैं उसे ज़ाहिर करने को बेताब रहते है. ऐसी ही एक फिल्म है ‘लंचबॉक्स’.

‘लंचबॉक्स’ में तीन मुख्य किरदार हैं- मि.साजन फर्नांडिस(इरफ़ान खान), इला(निमरत कौर) और शेख(नवाजुद्दीन सिद्दीकी). तीनों की तीन कहानियां हैं और ये मुख्य कथा में जीवन के प्रति अपना भिन्न दृष्टिकोण लेकर आते हैं. मि.फर्नांडिस अपने अकेलेपन में स्वनिर्वासन झेल रहे हैं. उम्मीद, हंसी और अपनत्व से रहित उनका जीवन डब्बे के बेस्वाद खाने की तरह है. जब वो दूसरी बार इला का भेजा लंचबॉक्स खा चिट्ठी का जवाब ‘द फ़ूड वाज साल्टी टुडे’ भेजते हैंतो यह जैसे उनके जीवन में नमक और लावण्य का प्रवेश है.

इला अपनी चिट्ठियों में मुखर और खुली हुई है क्योंकि “चिट्ठियों में तो कोई कुछ भी लिख सकता है.”आरम्भ से ही वह अपनी उदासी छिपाने की कोशिश नहीं करती. पति लंच सफाचट कर नहीं भेजता और उसे परवाह भी नहीं- यह बात पहली चिट्ठी में ही लिखने से नहीं झिझकती. अपनी ओर से वह पति के साथ संवाद बढ़ाने को प्रयासरत है. व्यवहार में आए ठंडेपन को मसालों के स्वाद से छूमंतर कर देना चाहती है. तभी तो रेडियो पर रोज़ नई रेसेपी सुनना, पूरे मनोयोग से लंच तैयार करना और देशपांडे आंटी से नुस्खे लेना उसकी कोशिशों में शामिल है.पर ये सब काम नहीं आता, बावजूद इसके कि आंटी मैजिक होने का भरोसा देती हैं.

शेख अनाथ है. उसकी जिजीविषा काबिले-तारीफ है.उसकी कहानी फिल्म को हंसी से सराबोर करती है, सहज बनाती है. लोकल ट्रेन में सब्जी काटने से लेकर नौकरी जाने के भय, मि.फर्नांडिस द्वारा बचाये जाने और उसके खिलंदड़े स्वभाव के लौटने के बीच हास्य के कई दृश्य हैं.

फिल्म का मेरा पहला पसंदीदा दृश्य है— मि.फर्नांडिस जब गलती से मिले सही डब्बे को खोलते हैं, डब्बा सर्विस के खाने से ऊब चुके व्यक्ति के नीरस जीवन में नई खुशबू, नया स्वाद आ जाता है. उनके पूरे शरीर में उत्सुकता की लहर दौड़ पड़ती है. बार-बार रोटियों को उलटते-पलटते वह चावल-सब्जी के डब्बों को सूंघते  हैं. उनके चारों ओर देखिये तो सभी किसी-न-किसी के साथ बैठे हैं, पर वे अकेले हैं, निपट अकेले. इस अकेलेपन ने उनके स्वभाव को रुखा बना दिया है.मोहल्ले के बच्चों और सहकर्मियों से उनके व्यवहार को देख, उनके बारे में प्रचलित धारणाओं को जान हमें आभास हो जाता है कि मि. फर्नांडिस महानगरीय जीवन की एकरसता में डूबे एकाकीपन का प्रतिनिधि चरित्र है. वाकई सभी कहीं पहुँचने की ऐसी जिद्द में हैं कि अपने को ही खो देते हैं. जो इस भागमभाग में नहीं हैं, वे दूसरोंकी भाग-दौड़ में पीछे और अकेले छूट जाते हैं. इससे पहले कि हम बिलकुल अकेले पड़ जाएँ यह फिल्म मौका देती है ठहर कर सोचने का कि आखिर सारी भाग-दौड़ का हासिल क्या?

दूसरा दृश्य ठीक इसके बाद का है. इला डब्बे के लौटने के बेसब्र इंतजार में है और दरवाजे पर आहट पाते ही लपक कर डब्बा उठाती है. हिलाने-डुलाने से उसे लगता है कि आज तो चमत्कार हो गया. खोलकर देखने पर उमंग-उछाह से भर वह देशपांडे आंटी को बताने पहुँच जाती है कि आज डब्बा चाट-पोंछकर खाया गया है. आंटी भी चहककर जवाब देती हैं कि “मैंने कहा था न, ये नुस्खा काम करेगा.” पति के आने पर उससे कुछ सुनने की आस लगायी हुई इला निराश हो, खुद ही लंच के बारे में पूछती है. पति ‘अच्छा था’ का नपा-तुला जवाब देता है. नाप-तौल से वस्तु-विनिमय तो होता है, भाव-विनिमय नहीं होता. इला कुछ और सुनना चाहती है. बेरुखी को दरकिनार कर बात पगाने का फिर प्रयास करती है, बेपरवाह पति डब्बे में ‘आलू-गोभी’ होने की बात कह वहां से चला जाता है.
संवादहीनता का आलम यह है कि इला पति को बता भी नहीं पाती कि उसका बनाया लंचबॉक्स उसे मिला ही नहीं है.भारतीय समाज के बहुतेरे परिवारवादी, नैतिकतावादी यह कह सकते हैं कि देखो ‘बेचारा’ पति पत्नी और बच्चों के लिए इतनी मेहनत करता है, मुंह अँधेरे उठकर जाता है, देर रात को आता है और यह औरत बता भी नहीं रही कि उसकी गाढ़ी मेहनत की कमाई से बनाया लंच किसी और ने खाया होगा. अब ऐसी कमाई किस काम की कि परिवार से दो बातें करने भर की मोहलत ना हो! औरत तो कह भी रही है कि अब हमारे पास कितना कुछ है. सामान बढ़ाते जाने का क्या लाभ जब उसे भोगने का वक्त नहीं? पर ध्यान कौन देता है. परवाह किसको है घर में बंधी औरत का!

ऐसे पति को क्या सजा नहीं मिलनी चाहिए जिसे शादी के छह-सात साल बाद भी अपनी पत्नी के हाथ के बने खाने का स्वाद तक की पहचान नहीं? खैर, इस गफलत से ही सही, गलत ट्रेन के दो तनहा मुसाफिर सही तरीके से एक दूसरे की ज़िंदगी में शामिल हो जाते हैं. चिट्ठी पहले इला ही भेजती है. अपनेपन से भरी औपचारिक चिट्ठी कैसे लिखी जाती है, यह इला की पहली चिट्ठी से पता चलता है.
एक दृश्य है जिसमें शेख मि.फर्नांडिस के पास आकर कहता है कि “सब कहते हैं आप मुझे कभी नहीं सिखाएंगे. मैं अनाथ हूँ. बचपन से सबकुछ अपने-आप सीखा है. यह भी सीख लूँगा.”यहीं से वह दुर्गम किले से दिखनेवाले फर्नांडिस के जीवन में घुसपैठ कर लेता है. ट्रेन की उनकी यात्राएँ और ‘पसंदा’ खिलाने घर ले जाना सब एक क्रम में होता है. पहली बार जब शेख फर्नांडिस को घर बुलाता है तब लगता है कि यह काम निकालने की तरकीब है, लेकिन दफ्तर, लंचटाइम और रेलयात्रा के एक जैसे लगते कई दृश्यों से उन दोनों का एक सहज संबंध विकसित होता है. यह भी साफ़ हो जाता है कि शेख निश्छल स्वभाव का, लेकिन चतुर और आशावादी व्यक्ति है. आज की मतलबी दुनिया में ऐसे लोग कम ही है.

‘लंचबॉक्स’ में चार स्त्री किरदार हैं— इला, देशपांडे आंटी, इला की माँ और मि.फर्नांडिस की मर चुकी पत्नी. मि.फर्नांडिस की मृत पत्नी एक जीवित पात्र की तरह फिल्म में मौजूद है. एक पूरा दृश्य उसके साथ मि.फर्नांडिस के संबंध पर केंद्रित है. मरी हुई पत्नी से उन्हें जितना लगाव है, उतना इला के पति को उससे होता तो क्या बात थी! खैर,रात भर फर्नांडिस पत्नी के पसंदीदा रिकार्डेड वीडियो को देखते हैं और पुरानी साइकिल पर हाथ फेरते समय उसके हंसते हुए चेहरे के टीवी स्क्रीन पर उभरते प्रतिबिम्ब को अब याद करते हैं तो हमारे सामने उनके भावुक व्यक्तित्व की तहें खुल जाती हैं.

इला की माँ के साथ इला के दो दृश्य हैं और दोनों अद्भुत. पहला वह जिसमें पति के अफेयर के

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20 COMMENTS

  1. And how film replicates itself here in form of ostentation of this exaggerating adulation of this review . Not a single critique. Hagiography is construed as response perhaps.Appeasing each is way of friendship in this putrid social milieu. Seems all are friends in call for duty to massage the ego of review writer . The hindi of the writer is really praiseworthy and there may be others things to be lauded but what the 'friends' has done here is called ostentation in frank terms.

  2. All the relations are filial in this unreal Indian middle class.Film and its review both betray it. It is Electra complex in worst form.They need a father for husband.They prefer an oldie in their narcissist pursuit of mirror stage psychology because a retired oldie has a vegetation which turns into sycophancy catering to infinite appetite for attention of Middle class Indian Housewife . This film is a patriarchal filth. This tear jerking overtly sentimental not -a-review type review is even worse than the film. It fails to see the misogynist political subconscious of the film .It reminds me of Sylvia Plath—''So black no sky could squeak through.
    Every woman adores a Fascist''. The heroine obsession for attention strikingly reverberates Mallika Sherawat preference for Narendra Modi- ''the most eligible bachelor'' -the oldie. Manu Gandhi described in her diary how the inmates of the ashram (?) envied and compete with each other to be close to Gandhi. The gerentophilia is recurrent theme in patriarchal cinema . Be it Black or Nishhbd or American Pie for that matter. How true was D H Lawrence to pronounce that all the relations are filial in this middle class labyrinth of platonic social space.

  3. फिल्म को काफी गहराई से समझा और अभिव्यक्त किया है आपने…

  4. लेखन में इतना स्पंदन विरले ही मिलता है. फिल्म की समीक्षा क्या,यह तो खुद ही एक फिल्म है.

  5. वाकई समीक्षा कतई नहीं है ये.. एक रोचक कहानी के बीच से होकर गुजरने सा है…आजकल कहानियां भी कहाँ ऐसा तरल अहसास दे पाती हैं.

  6. इतनी अच्छी बातें कहने के लिए आप सब का शुक्रिया

  7. बहुत संवेदनशील और करीने से लिखी गई टिप्पणी है सुदीप्ति। बधाई।

  8. सबसे अच्छी बात यह: ' इसे ‘लंचबॉक्स’ की समीक्षा कतई न समझें. यह तो बस उतनी भर बात है जो फिल्म देखने के बाद मेरे मन में आई.' समीक्षा में मन की बात खो जाती है कई दफ़े और हम जैसों के पल्ले भी सब नहीं पड़ता।

    मेहरूनिसा के बारे में भी कुछ कहिए। सुनने लायक होगा।

  9. फ़िल्मी समीक्षाएं हमेशा उन लोगों से बेहतर बन पड़ती हैं जिन्हें स्टार देने की मजबूरी नहीं होती वैसी ही यह भी है. शानदार. फिल्म देखने को मजबूर करने वाली. लेकिन मीनमेख न निकाले तो समर कैसा? सो मोहतरमा- हाथ रोक के क्यों लिखा है यह आपने? आजाद क्यों नहीं कर देतीं कलम को? अंतर्वस्तु (कंटेंट) पूरी की पूरी लाजवाब है पर रूप (फॉर्म) सबसे अच्छा वहीँ आया है जहां आपने भाषाई शुचिता का बहुत ध्यान नहीं रखा है.
    उदाहरण के लिए यह दो प्रसंग- "खैर, इस गफलत से ही सही, गलत ट्रेन के दो तनहा मुसाफिर सही तरीके से एक दूसरे की ज़िंदगी में शामिल हो जाते हैं."
    " ‘ज़िंदगी हर हाल में खूबसूरत है’— यही झलकता है उनकी खनकती आवाज़ से. शेख और देशपांडे आंटी जैसे किरदार अगर नहीं होते तो यह प्रेमकथा बोझिल और उदास होती."

  10. फ़िल्मी समीक्षाएं हमेशा उन लोगों से बेहतर बन पड़ती हैं जिन्हें स्टार देने की मजबूरी नहीं होती वैसी ही यह भी है. शानदार. फिल्म देखने को मजबूर करने वाली. लेकिन मीनमेख न निकाले तो समर कैसा? सो मोहतरमा- हाथ रोक के क्यों लिखा है यह आपने? आजाद क्यों नहीं कर देतीं कलम को? अंतर्वस्तु (कंटेंट) पूरी की पूरी लाजवाब है पर रूप (फॉर्म) सबसे अच्छा वहीँ आया है जहां आपने भाषाई शुचिता का बहुत ध्यान नहीं रखा है.
    उदाहरण के लिए यह दो प्रसंग- "खैर, इस गफलत से ही सही, गलत ट्रेन के दो तनहा मुसाफिर सही तरीके से एक दूसरे की ज़िंदगी में शामिल हो जाते हैं."
    " ‘ज़िंदगी हर हाल में खूबसूरत है’— यही झलकता है उनकी खनकती आवाज़ से. शेख और देशपांडे आंटी जैसे किरदार अगर नहीं होते तो यह प्रेमकथा बोझिल और उदास होती."

  11. बहुत तरल लिखती हो दोस्त. सुबह-सुबह तुम्हारी पोस्ट पढ़कर अपने स्थायी भाव की तरफ बढ़ गया. कुछ पंक्तियां तो ऐसी कि जैसे जानकीपुल से चुराकर अपनी आलमारी में रख लूं…नाप-तौल से वस्तु-विनिमय तो होता है, भाव-विनिमय नहीं होता….टीवी स्क्रीन पर उभरते प्रतिबिम्ब को अब याद करते हैं तो हमारे सामने उनके भावुक व्यक्तित्व की तहें खुल जाती हैं.
    तुम्हें पढ़ना हमेशा कुछ रखकर भूल जानेवाली चीजों की तरफ लौटने जैसा लगता है..बस ये है कि हम जैसे लोग जो दुधमुंहे बच्चे की तरह जिसे अंदाजा नहीं होता कि कितना दूध पीया जाए और ज्यादा पीकर ओकते-बकते रहते हैं, तुम ठीक इसके उलट हो..थोड़ा कम अंतराल में लिखा करो तो पढ़ने का सुख लगातार मिलता रहे.

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