दूरदर्शन की नई पहल है ‘दृश्यांतर’

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दूरदर्शन की नई पहल है ‘दृश्यांतर’. ‘मीडिया, साहित्य,संस्कृति और विचार’ पर एकाग्र इस पत्रिका का प्रवेशांक आया है. जिसमें सबसे उल्लेखनीय है श्याम बेनेगल से त्रिपुरारी शरण से बातचीत. ‘मोहल्ला अस्सी वाया पिंजर’ में सिनेमा के अपने अनुभवों पर चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने अच्छा संस्मरणात्मक लेख लिखा है. यतीन्द्र मिश्र लोकप्रिय सिनेमा पर ऐसी लिखते हैं जैसे कोई गंभीर विमर्श कर रहे हों और उनसे पहले किसी ने वैसा लिखा ही न हो. ‘अनारकली’ फिल्म और संगीतकार सी. रामचंद्र पर उनका लेख कुछ इसी तरह का है. यतीन्द्र ने ‘गिरिजा’ के बाद बहुत संभावनाएं जगाई थी, लगता है उनके लेखन की संभावनाएं शेष हो गई हैं. आजकल कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा जोड़ते रहते हैं.
साहित्यिक पाठों में शिवमूर्ति का अपनी माँ को याद करते हुए लिखा स्मृति लेख उत्कृष्ट गद्य का नमूना है. असगर वजाहत का नाटक है, राजेंद्र यादव के लिखे जा रहे उपन्यास ‘भूत’ का अंश है. 1971 के युद्ध पर डायरी की शक्ल में लिखा गया कुछ है. जबसे साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष हुए हैं तिवारी जी तबसे उनका लिखा हर शब्द महत्वपूर्ण हो गया है. यह डायरी नुमा भी कुछ उसी प्रकृति का है.

‘दृश्यांतर’ से इस अंक से यह पता चला कि एक जमाने के फिल्म पत्रकार विनोद भारद्वाज उपन्यास भी लिखते हैं. तेजेंद्र शर्मा क्या लिखते हैं पता नहीं लेकिन डायस्पोरा लेखन के नाम पर उनकी मौजूदगी हर जगह रहती है, यहाँ भी है.

कुल मिलाकर, यह पत्रिका साहित्यिक ही अधिक लगती है. दूरदर्शन ने हिंदी साहित्य को लेकर पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया है, यह स्वागतयोग्य है. बहुत दिनों बाद किसी संस्थान ने साहित्यिक प्रकृति की पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया है, जिसके एक अंक की 50 हजार प्रतियाँ छपेंगी. हालाँकि मुझे उम्मीद थी कि दूरदर्शन के गौरवशाली दिनों की कुछ यादों को भी इस पत्रिका के पन्नों पर संजोया जायेगा. लेकिन उसका न होना निराश करता है. बहरहाल, यह प्रवेशांक है और पहले अंक पर ही उम्मीदों का इतना बोझ नहीं डालना चाहिए. कुछ उम्मीदें भविष्य के लिए भी छोड़ देनी चाहिए.

पत्रिका के संपादक अजित राय से उम्मीद की जा सकती है कि वे आने वाले दिनों में मेरे जैसे पाठक की इन उम्मीदों का ध्यान रखेंगे. 100 पृष्ठों की इस पत्रिका मूल्य 25 रुपये है. 
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1 COMMENT

  1. उम्मीदें कम रखी जाएं तो सुख से इसके अगले अंकों को पढ़ सकेंगे. ध्यान रहे, दूरदर्शन बाबुओं का बसेरा है, साहित्यकारों का नहीं.
    Prabhakar, ITB

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