यह चुपचाप चलता हुआ षडयंत्र है

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तुषार धवल मेरे समकालीन कवि हैं, ऐसे समकालीन जिनकी तरह आरंभ में मैं लिखने की कोशिश करता था- कविताएं। इधर कुछ अरसे से मैंने उनकी कविताएं पढ़ी नहीं। कई बार कुछ रचनाकारों की बेहतर समझ बनाने के लिए उनकी रचनाओं से दूर जाना भी जरूरी होता है। अरसे बाद जब उनकी कविताओं के पास लौटा तो इस कवि ने चौंका दिया। कविता की भाषा, कंटेन्ट सबके साथ ऐसी तोड़-फोड़ कि मन अर्थ के लिए नहीं उस chaos को लेकर बेचैन होने लगता है जिसे कुछ विद्वान creation का उत्स कहते हैं। उनकी कविताओं का दूसरा संकलन आ रहा है- ‘ये आवाजें कुछ कहती हैं’, जिसमें 18 दीर्घ कवितायें हैं। इसकी भूमिका लिखी है मेरे एक और प्रिय कवि शिरीष कुमार मौर्य ने। प्रकाशक है दखल प्रकाशन, जिनके पहले सेट की पुस्तकों ने साहित्य जगत में वैकल्पिक प्रकाशन की बेहतर उम्मीद जगाई है। दखल को शुभकामना और अपने प्रिय कवि तुषार को बधाई देते हुए उस संग्रह आपके लिए दो कविताएं कवि के वक्तव्य के साथ- प्रभात रंजन 

क्षण भर का लम्बा आख्यान
ये कवितायें क्षण भर का लम्बा आख्यान हैं. ये उन विस्फोटों की फोरेंसिक जाँच हैं, उनका ब्यौरा हैं, जो मन के बाहर भीतर हुए हैं, होते रहे हैं. ये कवितायें उन विस्फोटों की गवाह भी हैं. जिस सघनता से विस्फोट हुआ ये उसी सघनता से फटीं, जिस तरफ भी छर्रे उड़े, ये उसी तरफ उड़ीं, जहाँ जहाँ भी उस विस्फोट के निशान बने वहीं वहीं ये वैसा ही निशान बनाती चली गईं. जहाँ वेग शिथिल था, ये शिथिल हुईं, जहाँ आवाज़ की कई परतें थीं वहाँ इनमें भी परत बनी. जब त्वचा पर विस्फोट हुआ वे बाहर उगीं, जब कहीं गहरे विस्फोट हुआ वे गहरे उतरीं. विस्फोट की भावध्वनि तरंगों पर चली हैं ये कवितायें और इसीलिये कुछ ऐसी ही बनी हैं.
लेकिन इन सबके बावजूद हमेशा लग रहा है कि इन कविताओं में कवि की सीमा भी दर्ज़ हुई हैं. कई ऐसी ध्वनियाँ थीं जो आकार नहीं ले पाईं, कई ऐसी लहरें थीं जो दर्ज़ नहीं हो पाईं. कवि की ई. सी. जी. मशीन, उसके होने का यंत्र अभी उन सूक्ष्म तरंगों को दर्ज़ नहीं कर पा रहा, ऐसा इस कवि को लग रहा है और वह उदास सा कुछ कुछ इन कविताओं के आगे सर झुकाये बैठा है. सम्भवतया इसके लिये अपने भीतर के मन को और अधिक साफ करना होगा ताकि वे तरंगें वहाँ ठीक ठीक दर्ज़ हो पायें. हमारा समय ऐसी कविता माँग रहा है जो पूरी संजीदगी से इसके नक़ाब उतार सके, उस राक्षस की शिनाख्त कर सके जिसका मोह जाल इतना खूबसूरत है कि उसमें फँसे हो कर भी प्रायः हम सब ही बड़े अनजान नज़र आते हैं. यहाँ सिर्फ आज का तकनीकसंचालित बाज़ार वाद और कट्टरतावाद ही ज़िम्मेदार नहीं है, हमारे भीतर छुपा मन का वह चोर भी उतना ही ज़िम्मेदार है जो कवियों लेखकों और हम में से लगभग हर किसी से ऐसे कर्म करवाता है जिसकी मुखालिफ़त हम अपनी रचना, अपनी दिनचर्या में करते रहते हैं. ज़रूरत है उस सर्व्यापी हो रहे नये ईश्वर की शिनाख्त करने पाने की, उस व्यापक संहारी आक्रांता को उसकी पूरी भयावहता, उसके पूरे विद्रूप और उसके पूरे सौंदर्य में उद्घाटित कर पाने की, उसके रेशे रेशे की शिनाख्त कर पाने की, उसकी असलियत को ठीक वैसे ही बयाँ कर पाने की. यह समय बुरा है लेकिन इस समय में सब कुछ बुरा नहीं है. इसके लिये एक नये कहन, नई कविताई की ज़रूरत है जिन्हें ये कवितायें पूरी नहीं कर पाई हैं. लेकिन, ये क्योंकि कवि के आज के इतने ही सामर्थ्य से उगी हैं, इन्हें प्यार से और उम्मीद से पठकों को सौंपा जा रहा है.
रचना पूर्ण होते ही अपने रचनाकार से मुक्त हो जाती है. अब इसके साथ जो भी सलूक हो, इस कवि की उस पर कवि की हैसियत से प्रतिक्रिया नहीं हो पायेगी. कवि बीत चुका है. अब उसका कवि कुछ कहेगा भी तो सम्भवतः उस रचनाकार के एक करीबी परिचित होने की हैसियत से ही. प्रतिक्रियायें कवि के कवि की काव्य साधना में उपदेश की ही तरह आयेंगी. ना वह खुश होगा, ना उदास. वह अपनी खोज, अपनी साधना में लगा रहेगा. उसे तो बस वह एक कविता खोज लेनी है जो वह लिखना चाह रहा है. बाकी सभी कवितायें उस एक कविता तक पहुँच पाने का प्रयास हैं, रियाज़ हैं.
चालीस के गाँव में प्रवेश पाते हुए इतना ही, इस समय- तुषार धवल
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1.
हॅकिंग हो गई है साहब
यहाँ चालाक सजदों की दुआ क़ुबूल होती है I
***
मेंहंदी के नरम पत्तों पर शबनम की बूँदों से हमने कुछ लिखा था
किसी के लिये
इबारतों के अंजाम लेकिन बदल गये हैं
मोम अर्थों के पिघल नहीं पाते
हल नहीं हो पाते 
समय, मृत्यु और नश्वरता से जूझते
हमारे निश्चय, कल्पना और विश्वास
उनकी सीमा बदल गई है दृष्टि और दर्शन भी !
सहन सुखन
संयम संगम
के कोड बदल गये हैं 
कन्फ्यूज़न है I
हॅकिंग हो गई है साहब !
69 की मुद्रा में सत्ता और सामर्थ्य
निजता का शिखण्डी दर्शन
भीष्म की आदिम छाती की तरफ बढ़ रहा है अपने अर्जुनों के साथ
और खलबली है माहौल में
उसकी पूर्वसूचना में किसी दूसरी धरती से प्रक्षेपित बाण यहाँ बरसने लगे हैं 
और आकाश रंग बदलने लगा है पहाड़ ढह रहे हैं
जंगल गायब जंगलीपन जायज़ 
विश्वबोध उलझा हुआ
ये धूल के कण अब अनगिनत चिमनियाँ हैं 
किसकी भूखी रोयी जली आँख कब पथरा गई
फर्क नहीं पड़ता हमको
कोई नया टेक्स्ट कोड है साहब !
जो उपभोग के यूज़र फ्रेंडली सॉफ्टवेयर में हिडन होता है
और यह वाइरस प्रायः हमारी आँखों के रास्ते हममें घुसता है
वैसा ही कुछ हुआ है साहब !
अपने महाद्वीपों के अवशेष हैं हम लघुद्वीप खारे
जीवन लघोत्तर
माइक्रोचिप में
होने का विस्तार क़ैद
इसी में नया विस्तार भी
क़ैद यहाँ सब कुछ सीमित दायरों में
कवि भी कल्पना भी
आस्थाओं का लोक तंत्र सड़ा हुआ पानी है जिसमें
जमे हुए खून के चकत्ते हैं
और यह हॅकिंग सदियों पहले हुई थी 
मौन की गहराई कैसे नापेगी यह प्रणाली विक्षेप ही जिसका भ्रूण है !
अकेला है जन्म
अकेला सृजन
अकेला भोगी निजता का सेनानी     
सुभाष भगत
आज़ाद
अपने निज में
एक मोमबत्ती जुलूस टी.वी. पर छा कर वफ़ात पाता हुआ 
निजता का प्रतिलोम भी निजी श्लाघा ही है साहब !
नग्नता का एकांतिक दोहन करता आभासी विश्व मगन है
और समूह की ध्वंस चिताओं की राख उड़ रही है
बंधनों से मुक्त चारागाहों में
जहाँ पशुता का श्लाघकाम निर्वसन करता है कुण्ठाचारों को
निर्मनुष्य कर दो आत्म को  
वह असंतुष्ट बन जायेगा हमेशा के लिये 
असंतोष साध्य है जिस प्रणाली का वही बाज़ार है साहब असुरक्षाओं का
भय के उद्योगों का
लोभ के महा कुम्भ में
मेरी भूख आपकी भूख से ज़्यादा अर्थपूर्ण है 
आपका क्या हुआ यह सोचना समय की बर्बादी
मैं इस हिडेन टेक्स्ट को पढ़ सकता हूँ साहब
पर मेरे पास कोई एल्गोरिदम, कोई सॉफ्ट्वेयर नहीं है
कुछ कीजिये साहब !
हैकिंग हो गई है !!
   
गुलदस्तों का वजूद उनकी खुशबू तक ही 
फूलों के गाल क्यों झुलस गए, लफ्फाज़ी है
हैपनिंग नहीं हैं मानवता के प्रश्न… these are fading rumbles of a bygone era… !
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