मध्यवर्ग को मसीहा का इंतज़ार है!

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पवन के. वर्मा की नई पुस्तक आई है ‘भारत का नया मध्य-वर्ग’. इस पुस्तक में उन्होंने भारतीय जनतंत्र में बदलावों के सन्दर्भ में मध्यवर्ग की भूमिका को रेखांकित करने का प्रयास किया है. उसी पुस्तक का एक प्रासंगिक अंश. मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद मैंने किया है- प्रभात रंजन 
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हमारा जनतंत्र जिस गलत तरीके से चल रहा है उसको लेकर युवाओं में शिकायतें बहुत अधिक होती हैं. काला धन और राजनीतिक पार्टियों के बीच सम्बन्ध एवं राजनीति के अपराधीकरण को लेकर खूब चर्चा होती है. लेकिन उनमें से बहुत कम लोग यह कह पाते हैं कि विश्वसनीय तरीके से क्या किया जा सकता है. जब मैं यह कहता हूँ कि एक ऐसा कानून मौजूद है और जिसे चुनाव आयोग बरसों के अक्षम करने में लगा हुआ है और जिसके मुताबिक़ अगर चंदा 20 हजार रुपये से कम का है तो राजनीतिक पार्टियाँ उसे देने वाले के नाम का उद्घाटन नहीं कर सकती हैं. और यही संस्थानिक रूप से मुख्य संपर्क सूत्र बन गया है राजनीति और काला धन में, तो यह सुनकर वे जानकारी न होने की बात करते हैं. वे यह तो चाहते हैं कि राजनीति स्वच्छ हो, मगर लेकिन इसको लेकर वे साफ़ नहीं होते कि क्या पार्टियों को अपनी आय का वार्षिक विवरण देना चाहिए, या उनकी जांच कौन करेगा या अगर यह व्यवस्था कमजोर है तो इसको बदलने वाली व्यवस्था कौन सी होनी चाहिए. 

उनमें से अनेक हैं जो आईटी के विशेषज्ञ हैं लेकिन बहुत कम ने ऐसा सोचा है कि इसके माध्यम से पार्टियों द्वारा पैसों के सभी लेन-देन किस तरह किया जाए तथा तथा उसे स्वच्छ तरीके से उस वेबसाईट पर रखा जाए जहाँ से उसे सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत उपलब्ध करवाया जा सकता हो. सबसे कोलाहल भरा प्रदर्शन शायद भ्रष्टाचार के लिए बचा कर रखा गया था. लेकिन, यहाँ भी सिवाय लोकपाल बिल के जिसे अप्रत्याशित ख्याति इस वजह से मिली क्योंकि इसको लागू करवाने को लेकर अन्ना हजारे ने आन्दोलन चलाया था, वे इस बात को लेकर स्पष्ट नहीं हैं कि इस अपराध को ख़त्म करने या बहुत कम करने के लिए संस्थानिक तौर पर क्या उपाय अपनाए जा सकते हैं. बहुत कम लोगों ने लोक सेवा अधिकार के बारे में जानकारी पाने की जहमत उठाई, जो कि सफलतापूर्वक मध्यप्रदेश और बिहार में लागू है, जिसके अंतर्गत आम जन को प्रभावित करने वाली सेवाओं को बड़े पैमाने पर ऑनलाइन कर दिया गया, जिसके ऊपर इस बात का उल्लेख किया गया है कि उस सेवा को कितने दिनों में संपन्न कर दिया जायेगा, और उस नियत दिन में जितनी देरी हो उसके लिए सम्बद्ध अधिकारियों के जुर्माने का प्रावधान है. मध्यवर्ग के लोग यह तो चाहते हैं कि भ्रष्ट लोगों को जल्दी से जल्दी सजा दी जाए, लेकिन उन्होंने इस तरफ दिमाग दौडाने की कोशिश नहीं की है कि इसके लिए किस तरह के न्यायिक सुधार की जरुरत होगी. हालाँकि यह कहा जा सकता है कि आम मध्यवर्गीय आदमी राज रोज के कामों के बोझ से इस कदर लदा हुआ है कि उससे शायद ही इसकी उम्मीद की जाती है कि वह इस तरह के मामलों के बारे में विस्तार से पढ़े. लेकिन यह कोई वैध तर्क नहीं हो सकता है. मध्यवर्ग शिक्षित है; समाचार और विश्लेषणों तक उसकी पहुँच है; वह सम्मिलित तौर पर यह काम कर सकता है; उसकी आवाज को सुनने के लिए विवश किया जा सकता है.  

दुःख की बात यह है कि गुस्सैल एवं अधीर वर्ग आजकल उस भाव से गुजर रहा है जिसे जादू की छड़ीवाला भाव कहा जा सकता है. देश को परेशान करने वाली समस्याओं के लिए यह जादू की एक छड़ी चाहता है, एक ऐसी चाबी जो कि सभी तालों को खोल दे, एक ऐसा समाधान जो सभी हालात के अनुकूल हो. एक समय ऐसा था जब इस वर्ग के बहुत सारे लोगों को वह समाधान परिवार नियोजन में दिखाई देता था. उनका यह मानना था कि भारत की दुर्दशा का बड़ा कारण यह है कि यहाँ बहुत सारे लोग हैं, सो भी बहुत सारे आम आदमी. इसलिए उनको इमरजेंसी के दौरान संजय गाँधी द्वारा अलोकतांत्रिक, मनमाने ढंग से चलाया जाने वाला जनसँख्या रोकने का कार्यक्रम पसंद आया जिसमें जनसंख्या कम करने के लिए नसबंदी का कोटा तय कर दिया गया था, जिसे हर हाल में पूरा किया जाना होता था चाहे उसके लिए कुछ भी करना पड़े. उनको बाद में इस बात का अंदाजा हुआ कि इस तरह के कार्यक्रम लोकतान्त्रिक आजादी को कम करने से जुड़ा हुआ ही कार्यक्रम ही था, और मनमाने तरीके से लक्षित किये जाने से वे भी नहीं बच सकते थे. जब अन्ना ने 2011 में लोकपाल बिल के लिए आन्दोलन शुरू किया, तो मध्यवर्ग को लगने लगा कि यही वह जादुई छड़ी है जो देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करवा देगी. काफी शिक्षित भारतीय ऐसे थे जो बाबा रामदेव के भाषणों से प्रभावित होकर यह मानने लगे थे कि देश की बुराइयों का एकमात्र कारण वह काला धन जो विदेशों में छिपाकर रखा गया है. इसलिए उस काले धन को वापस लाने से देश में खूब समृद्धि आ जाएगी. मुद्दे से ठीक तरह से जुड़ाव नहीं होने के कारण उनके दिमाग में यह झटपट का समाधान ठहर गया. चाहे वह समावेशी मुद्दों के बावजूद उच्च आर्थिक विकास की बात हो, या बिना इस बात की समझ के सुशासन की बात हो कि गठबंधन सरकारों के कामकाज में सुधार की जरुरत है, या बिना ढांचे में सुधार की जानकारी के स्वच्छ राजनीति की बात हो, जो बरसों से लंबित पड़ा  हुआ है, जो अपने आप में इस लक्ष्य को वास्तविकता में बदल सकता है. जादुई छड़ी के दृष्टिकोण के कारण मसीहा की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है. 

अपनी तमाम चिंता के बावजूद, और बावजूद इसके कि उसके अपने ही समाज एक भीतर सम्मिलित आवाज उठाई जा रही होती है, मध्यवर्ग में इस बात की प्रवृत्ति पाई जाती है कि वह तब तक निष्क्रिय पड़ा रहता है जब तक कि कोई बाहरी शक्ति उसे ऐसा करने एक लिए प्रेरित न करे. यह कोई अन्ना हजारे जैसा हो सकता है, जो मध्यवर्ग को भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़क पर ले आये थे. जब इस तरह का मसीहा आता है तो यह वर्ग उसके त्याग के साथ संघर्ष करने लगता है. कुछ देर के लिए उसकी पूजा होने लगती है. फिर एक नई सुबह का हो हल्ला होने लगता है, ‘दूसरी आजादीकी बात की जाने लगती है. मध्यवर्ग में यह प्रवृत्ति पाई जाती है कि वह अपने नए गड़ेरिये के पीछे भेड़ के झुण्ड की तरह चलने लगती है. नायक पूजा होने लगती है, लेकिन एक बार फिर अपने आपको लेकर, अपने व्यवहार को लेकर किसी तरह का आत्मनिरीक्षण नहीं किया जाता है कि इस बात को लेकर कि हम भ्रष्टाचार से कितना समझौता करते हैं. जब उस मसीहा का प्रभाव कम होने लगता है, जैसा कि अन्ना हजारे के मामले में हुआ, जब रामलीला मैदान के नाटकीय सत्याग्रह के बाद के महीनों में मध्यवर्ग फिर से अपने खोल में वापस चला गया, किसी और मसीहा के इंतज़ार में जो आये और इन बातों को आगे ले जाए. 

यही अरविन्द केजरीवाल के साथ हो रहा है, जो नई सफल पार्टी आम आदमी पार्टी के नेता हैं. उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी, रहन सहन में सादगी, राजनीतिक तौर पर उपलब्धता, और यह वादा कि वे भ्रष्टाचार की व्यवस्था को बदलकर बिलकुल एक नए ढंग की शासन व्यवस्था को लायेंगे, ये कुछ ऐसी बातें हैं जिसने उनको मध्यवर्ग के नए मसीहा के रूप में स्थापित किया. एक बार फिर, यह देखने में आया कि जिस तरह के बदलाव मध्यवर्ग देखना चाहता था उसने एक और नए मसीहा को पैदा किया. वे अपने संघर्ष के माध्यम से मुक्ति दिलवाएंगे. उनको लेकर जो हो हल्ला है वह पहले जैसा ही है, और इस मामले में इतिहास एक तरह से अपने आप को दोहरा रहा है कि जिस तरह से उम्मीदों में बड़े पैमाने पर वृद्धि हुई है. अगर केजरीवाल इन  उम्मीदों को पूरा कर देते हैं तभी वे आगे चल पाएंगे. अगर नहीं, तो निराशा तुरंत घर कर जाएगी. गुस्से और कटुता से भरा हुआ मध्यवर्ग अगले मसीहा का इन्तजार करने लगेगा.
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पुस्तक- भारत का नया मध्य-वर्ग
लेखक- पवन के. वर्मा
प्रकाशक- हार्पर कॉलिन्स 
मूल्य- 125 रुपए
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2 COMMENTS

  1. सरस व सुबोध अनुवाद।
    प्रभात जी आप अनुवाद के क्षेत्र में भी बढ़िया व मौज़ूँ काम कर रहे हैं : क्षिप्रता से पर सधे हुए ढंग से।

  2. मध्यवर्ग का यह चरित्र देश के लिए घातक साबित हो रहा है.

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