ये किसने पुकारा है, ये किसका निमंत्रण है

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उपन्यासकार प्रचण्ड प्रवीर कविताएं भी लिखते हैं. क्लासिकी अंदाज की कविताएं. हिंदी कविता के समकालीन चलन से हट कर. लेकिन उनकी इस कविताई का भी आकर्षण सम्मोहक हो जाता है कई बार. आप भी देखिये- मॉडरेटर.
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अनामिका और चन्द्रमा

चन्द्रमा मुझे देखते उतर आया !

सोने की थाली में उसकी चंचल छाया डोली,
ऐसे में कहीं दूर कोई बावरी बीना बोली

उपवन से सुरभि से ले कर मैं चहकी,
रजनीश से छुपने मिलने को बहकी

चन्द्रमा मुझे देखने उतर आया !

चाँदनी ने हँस-हँस कर मेरी पायल चूमी,
बयार ने झूम-झूम कर काली लट खोली
मेरे नयनों का नीलम, मेरे कुंतल का रेशम,
      समीर में कर्णफूल हिला, धीमे-धीमे मद्धम-मद्धम

चन्द्रमा मुझे बताने उतर आया !

      श्रृंगार की सुधा सरीखी स्तुति सारंग ने की,
      मलयज सी शीतल थी वह मयंक की बोली

      आमोद से काँपी अकेली मैं, किन्तु यह क्या ?
हिमांशु के मुख पर खिंची थी विषाद की रेखा !
चन्द्रमा मुझे सुनाने उतर आया …

किसी रजनी में इंदु ने था चकोर को देखा,
अतिरिक्त इससे केवल थी उसकी व्यथा कथा

      विलाप, शोक, हाहा, निर्वेद औ’ करुण रुदन,

शेष सोम का फिर था विनम्र प्रणय निवेदन
चन्द्रमा मुझे सुनने उतर आया !
यौवन के अवसान पर, एक निशा मेरे आह्वान पर,
मैं गाती थी हँस-हँस, गिरते रहे उसके आँसू झर-झर
उस दिन से वसुधा पर ओस रातों में बरसने लगे,
चन्द्रमा की दारुण पीड़ा, अनामिका से कहने लगे !

एकांत बुलाता है अनामिका को
अनामिका,
मैं अरण्य का संवाद हूँ, करुण क्रंदन औविलाप हूँ
अभिजीत नक्षत्र सा अभिशापित, आभा शून्य नीलाभ हूँ
परिचय प्रतिष्ठा से यदि निरूपित हो,
निरीह श्रावण में झर झर, बिलखता काला आकाश हूँ
अनामिका,
श्वासों के कोलाहल से विस्मृत, प्राण का प्रथम उच्छ्वास हूँ
संयम का शिल्पी मैं, सुलभ सखा विवेक का वास हूँ
            वैराग्य मानस में यदि पुष्पित हो
,
आम की शाखों पर पूर्णिमा संध्या में, रूप चन्द्र वैशाख हूँ
अनामिका,
कानन में बिखरे रश्मि किरणों में, सहसा फूटता प्रभात देखो
पिक के मधुर गान से, अंतर के उठते प्राण को देखो
उल्लास चंचलता में यदि समाहित हो,
विस्मय को नयनों में सहेज, खग के सुदूर प्रयाण को देखो
अनामिका,
सदियों से सोये अम्बर के इन अनगिन तारों को गिनों
व्यथा से टूटते तारों पर, आकाशगंगा की लोरियां सुनो
कुंतल की भ्रमिका से यदि उत्तर हो,
दुःख-सुख की सीमा से दूर, आनंदमय अनंत मधुमास हूँ


आँधी और अनामिका
ये किसने पुकारा है, ये किसका निमंत्रण है
किसी मौन ऋचा का, यह असीम से निवेदन है

कदाचित अनंत की ध्वनि है, अज्ञात का अनुनय है
अनामिका को पुकारता, किसका यह नाद विजय है

ज़रा ठहरो अभी कि बड़ी तेज आँधी चलने लगी है
दो घड़ी में ही अनामिका सिमटी सी डरने लगी है

घाम प्रखर, तप्त दिवाकर, धूल- कंकड़, भयंकर बवंडर
अनिल की विषम दृष्टि, अनल सी हो उठी सकल सृष्टि

व्याकुल प्राण हो रहे थे मार्तण्ड की विकल उष्णता से
घनघोर वृष्टि की प्रार्थना की अनामिका ने व्यग्रता से

सहसा पर्जन्य का वज्र आया, इंद्र का अमोघ अस्त्र आया
कृष्ण हुए व्योम पर, भयभीत करने हुंकार सहस्र आया

विस्मित सिक्त खड़ी थी अनामिका हरी धरणी पर
कपाल कपोलों से गिरती एक बूँद ठहरी थी नासिका पर

आँधी के थम जाने पर, मनोरथ सिद्ध हो जाने पर
सम्मुख एकांत स्वयं विकराल सा आ खड़ा था

उस विराट के प्रताप पर अश्रु अनवरत बहने लगे
मयंक रजनी आदित्य मारूत हा हा करने लगे

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