प्रशासनिक सेवाओं में भारतीय भाषाओं के साथ सौतेला व्यवहार क्यों?

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यूपीएससी की परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं के साथ भेदभाव को लेकर चल रहे आन्दोलन पर सरकारी आश्वासन एक बाद फिलहाल विराम लग गया. लेकिन अखिल भारतीय सेवाओं में भारतीय भाषाओं के साथ भेदभाव का इतिहास पुराना है. वरिष्ठ लेखक, शिक्षाविद प्रेमपाल शर्मा के इस लेख को पढ़कर उस भेदभाव का इतिहास समझ में आता है. प्रेमपाल जी स्वयं यूपीएससी के माध्यम से भारतीय रेल सेवा में कुछ दशक पहले चयनित हुए थे. यह लेख उनके अनुभव यात्रा का भी एक दस्तावेज है- मॉडरेटर.
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      हिन्‍दी सहित भारतीय भाषाओं में पढ़ने वाले और अपनी भाषा के बूते देश की सर्वोंच्‍च नौकरी प्रशासनिक सेवा, पुलिस सेवा, विदेश सेवा और केन्‍द्रीय सेवाओं में जाने वाले नौजवानों के लिए एक अच्‍छी खबर दिल्‍ली के गलियारों में गूंज रही है । खबर यह कि 2011 में सिविल सेवा परीक्षा के प्रथम चरण (सी सेट) में जो अंग्रेजी लाद दी गई थी और जिसकी व‍जह से भारतीय भाषाओं के बूते चुने जाने वालों की संख्‍या 15-20 प्रतिशत से घटकर 2-3 प्रतिशत तक आ गई थी सरकार ने उस पर पुनर्विचार करने का मन बना लिया है । यों भारतीय भाषाओं के लिए यह कोई नयी बात नहीं है लेकिन जब सरकार इतनी संवेदनशून्‍य हो जाए और पिछले तीन वर्ष के दुष्परिणामों को जानने, समझने के बावजूद भी अंग्रेजी की पक्षधर बनी रहे तब नयी सरकार के इस कदम का स्‍वागत किया जाना चाहिए । सरकार ने संघ लोकसेवा आयोग को पु‍नर्विचार कराने के लिए कहा है और इसके लिए यदि प्रारंभिक परीक्षा की तिथि‍ 20 अगस्‍त से आगे बढ़ानी भी पड़े तो उसके लिए कदम उठाए जाएं ।

      डॉ. दौलत सिंह कोठारी की अनुशंसाओं के अनुरूप वर्ष 1979 से सिविल सेवा परीक्षा में अंग्रेजी के साथ साथ भारतीय भाषाओं में उत्‍तर देने की छूट दी गई थी । तभी से वर्ष 2010 तक यह परीक्षा आयोजित होती रही । लेकिन वर्ष 2011 में परीक्षा के पहले चरण में बदलाव किया गया जिसके परिणामस्‍वरूप जहां हिन्‍दी समेत भारतीय भाषाओं से प्रारंभिक परीक्षा पास करने वालों की संख्‍या लगभग छह हजार होती थी वह घटकर 2011में दो हजार रह गई । अगले दो वर्ष यानि 2012 और 2012 में यह संख्‍या और भी कम हो गई । यहां तक कि हाल ही में घोषित 2014 के परिणाम बताते हैं कि हिन्‍दी माध्‍यम सहित भारतीय भाषाओं में पास होने वालों की संख्‍या घटकर दो से तीन प्रतिशत ही रह गई है । यानि कुल 11 सौ से अधिक चुने हुए उम्‍मीदवारों में भारतीय भाषाओं के मात्र 26 बच्‍चे ही पास हुए हैं ।

      यों पटना, केरल, मद्रास में भी इसके खिलाफ सुगबुगाहट चल रही थी लेकिन पिछले दिनों दिल्‍ली में जगह-जगह सी सेट के खिलाफ लगातार प्रदर्शन हुए । सिर्फ प्रदर्शन तक ही बात सीमित नहीं रही पिछले 2-3 वर्षों में कई संगठनों ने कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया । एक जनहित याचिका दिल्‍ली उच्‍च न्‍यायालय WP(C)  651/2012 अभी भी विचाराधीन है । माननीय उच्‍च न्‍यायालय ने पूरे मामले की सुनवाई के बाद एक समिति का गठन करने का आदेश दिया । कार्मिक मंत्रालय ने न्‍यायालय के आदेशों का पालन करते हुए मार्च 2014 में एक तीन सदस्‍यीय समिति का गठन भी कर  दिया है जिसे एक महीने के अंदर रिपोर्ट सौंपनी थी । जनहित याचिकाकर्ताओं ने संघ लोकसेवा आयोग और कार्मिक मंत्रालय से यह भी अनुरोध किया कि इस समिति में उन भारतीय भाषाओं के विद्वानों को भी शामिल किया जाए जो अपनी भाषा का पक्ष रख सकें । जैसाकि अक्‍सर ऐसे मामलों में होता है समिति की सिफरिशें तो न जाने कब आएंगी और फिर पता नहीं कब न्‍यायालय अंतिम निर्णय तक पहुंचे लेकिन तब तक तो अपनी भाषाओं में पढ़ने वालों के सपने सूख चुके होंगे । इसी आक्रोश में दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के पास कुछ छात्र आमरण अनशन पर भी बैठे हैं ।

संक्षेप में पहले इस विवाद की पृष्‍ठभूमि को जानना बहुत जरूरी है । कोठारी समिति की सिफारिशों के अनुरूप पहली बार देश की सभी प्रशासनिक सेवाओं आई.ए.एस.,विदेश सेवा, रेलवे, रक्षा सभी के लिए एक कॉमन परीक्षा की शुरूआत हुई थी वर्ष 1979 में । उससे पहले पिछले तीस वर्षों 1947 से 1978 तक उम्र, विषय,साक्षात्‍कार और अलग-अलग सेवा के लिए अलग-अलग प्रणालियां थीं ।कोठारी समिति ने ग्रामीण गरीब बच्‍चों को ध्‍यान में रखते हुए उम्र बढ़ाकार अट्ठाईस वर्ष की । देश भर में परीक्षा के केन्‍द्र बढ़ाए । लेकिन सबसे क्रांतिकारी बात थी आठवीं अनुसूची में उल्लिखित भाषाओं के माध्‍यम से परीक्षा देने की छूट । उन्‍होंने अंग्रेजी को बाहर नहीं किया था बस भारतीय भाषाओं को अंग्रेजी के बराबर रखा था । सच्‍चे मायनों में यह था प्रशासन के एक बहुत छोटे से हिस्‍से में लोकतंत्र का प्रवेश । गरीबों का अपनी भाषाओं के बल पर प्रवेश । इसके परिणाम भी बहुत अच्‍छे निकले ।

इसका प्रमाण है इस परीक्षा के मूल्‍यांकन के लिए समय-समय पर बैठाई गई विभिन्‍न समितियां और उनकी विस्‍तृत रिपोर्ट । इस परीक्षा की पहली मूल्‍यांकन समिति के चेयरमैन थे प्रोफेसर सतीश चन्‍द्र । जाने-माने इतिहासकार और भूतपूर्व यू.जी.सी. के चेयरमैन । समिति ने अपनी रिपोर्ट 1990 में दी । भारतीय लोकतंत्र और नौकरशाही के लिए बड़े  सुखद  सत्‍य  सामने   आए । जैसे :-
(1) आजादी के बाद पहली बार पहली पीढ़ी के पढ़े हुए नौजवान सीधे इतनी ऊंची प्रशासनिक सेवाओं में शामिल हुए ।
2. पहली बार दलित,आदिवासी पचास प्रतिशत से अधिक अपनी भाषाओं के माध्‍यम से इन सेवाओं में आये ।
3. अनुसूचित जाति के 55 प्रतिशत, जनजाति के 48 प्रतिशत और सामान्‍य उम्‍मीदवारों के 20 प्रतिशत निम्‍न आय वर्ग के थे ।
4. समिति ने विशेष रूप से यह बात रेखांकित की कि भारतीय भाषाओं में उत्‍तर देने की पद्धति ठीक है और किसी भाषायी वर्ग के पक्ष में पक्षपात नहीं है ।
संवाद और अभिव्‍यक्ति की जरूरतों के हिसाब से दो सौ नंबर के निबंध का पेपर वर्ष 1993 में जोड़ा गया और कुछ मामूली फेरबदल विषयों के साथ भी किया गया ।
ठीक दस वर्ष बाद वर्ष 2000 में प्रोफेसर योगेन्‍द्र कुमार अलघ की अध्‍यक्षता में फिर एक समिति बनी । इस समिति ने भी सतीश चन्‍द्र समिति की तरह ही भारतीय भाषाओं से चुने अ‍भ्‍यर्थियों को लोकतंत्र का एक सुखद समावेषी पक्ष माना और इसे जारी रखने की सिफारिश की । अलघ समिति को इसके अलावा इस पक्ष पर विचार करने के लिए भी कहा गया था कि कैसे सही विभाग के लिए सही अभ्‍यर्थी उनकी अभिरुचिओं, क्षमताओं के अनुसार चुने जाएं । क्‍या विभागों का बंटवारा उनके प्रशिक्षण के दौरान सामने आई प्रवृत्तियों, अभिव्‍यक्तियों के अनुसार हो ? प्रोफेसर अलघ ने अपनी सिफारिशें वर्ष 2002 में दी थीं ।

2011 में प्रारंभिक परीक्षाओं में बदलाव प्रोफेसर एस.के. खन्‍ना भूतपूर्व वाईस चेयरमैन यू.जी.सी. की सिफारिशों के आधार पर किया गया । उनकी सिफारिशों में अंग्रेजी कैसे हावी हो गई और क्‍यों ? इस पर अभी  भी परदा पड़ा हुआ है । जब डॉक्‍टर कोठारी, सतीश चंद्र, प्रोफेसर अलघ अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं की बराबरी पर बल देते हैं तो 2011 के पहले चरण में अंग्रेजी क्‍यों ? अफसोस की बात कि सरकार सिर्फ पहले चरण की अंग्रेजी पर ही नहीं रुकी । आपको याद होगा कि 2013 के शुरू में तो संघ लोकसेवा आयोग ने मुख्‍य परीक्षा में भी ऐसे परिवर्तन किये थे जो कोठारी समिति की सिफारिशों के एकदम उलट थी और भारतीय भाषाओं के पूरी तरह खिलाफ । यह तो अच्‍छा हुआ कि मुख्‍य परीक्षा में परिवर्तन के खिलाफ महाराष्‍ट्र, तमिलनाडु समेत पूरे देश से आवाज उठी, संसद में भी हंगामा हुआ और मुख्‍य परीक्षा में भारतीय भाषाओं के खिलाफ जो सिफारिशें थीं, वे सरकार को वापिस लेनी पड़ीं । लेकिन प्रारंभिक परीक्षा (सी सैट) में भारतीय भाषाओं के प्रति भेदभाव अभी भी बरकरार है ।

      कई बार तो आश्‍चर्य होता है कि अंग्रेजी को बढ़ावा देने वाले ऐसे कदमों से भारतीय लोकतंत्र को मजबूत कर रहे हैं या उसे कमजोर । संघ लोकसेवा आयोग द्वारा ली जाने वाली दर्जनों परीक्षाओं में सिर्फ प्रशासनिक सेवाओं में अपनी भाषाओं में लिखने की छूट मिली हुई है लेकिन अंग्रेजीदां अमीरों की आंखों में वह भी किरकिरी बनी हुई है । क्‍या अपनी भाषाओं में पढ़ने वाले नौजवानों का यह हक नहीं है कि वे प्रथम श्रेणी की नौकरियों जैसे – वन, इंजीनियरिंग, डॉक्‍टरी, सांख्‍ययिकी सेवाओं में अपनी भाषाओं के बूते चुने जाएं । संघ लोकसेवा आयोग की देखा देखी कर्मचारी चयन आयोग की परीक्षाओं में भी अंग्रेजी उतनी ही हावी है । इन सबका असर पूरे देश की शिक्षा व्‍यवस्‍था पर हो रहा है । जब सरकार की प्रतिष्‍ठि‍त नौकरियों में अपनी भाषाओं में पढ़ने वाले प्रतिभावान बच्‍चों को नौकरी नहीं मिलेगी तो अपनी भाषाओं में पढ़ेंगे ही क्‍यों । यही कारण है कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी अंग्रेजी व्‍यवस्‍था मजबूत हो रही है । नयी सरकार आ चुकी है और उसका मुख्यिा भी जन संघर्ष से निकला वह नेता है जो अपनी भाषा के बूते सत्‍ता में आया है । उम्‍मीद की जानी चाहिए कि इस विवाद के बहाने न केवल संघ लोकसेवा आयोग बल्कि केन्‍द्र और राज्‍य बैंक, बीमा, न्‍यायालय में भर्ती करने करने वाली सभी परीक्षाओं के लिए कोठारी समिति की तरह कोई आयोग बने और तुरंत ऐसी व्‍यवस्‍था कायम हो जिससे कि नौजवान सिर्फ अंग्रेजी न जानने के कारण इन नौकरियों से वंचित न हों । नयी सरकार के लिये यह चुनौती भी है और लोकतांत्रिक अवसर भी ।  
  

प्रेमपालशर्मा
                                             
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5 COMMENTS

  1. योग्यता को भाषा का मुहताज नहीं बनाया जाना चाहिए। इससे देश प्रतिभाओं से वंचित हो जाता है। समाज के हर तबके के बच्चे को अवसर मिलना चाहिए। बहुत ही जानकारी पूर्ण लेख प्रेमपालजी ने लिखा है।सहज भाषा मे लिखना उनकी सबसे बड़ी विशेषता है।

  2. मुझे अज तक समझ में नहीं आया ,अलघ समिति २००२ की सिफारिशें न मानकर अचानक खन्ना समिति कहाँ से बिठा दीगयी ,और अचानक उसे लागू भी कर दिया गया है .और यह मामला अब प्रशासनिक सेवाओं के साथ सभी अखिल भारतीय सेवाओं में भी अंग्रेजी की अनिवार्यता को कह्तं करने का वक्त आ गया है .इसके खिलाफ भी अब अन्दोलन करना होगा .

  3. भारतीय भाषाओ के प्रति सौतेला व्यवहार चिंता का विषय है लेख़क ने बखूबी इस पर प्रकाश डाला है साथ ही इस समस्या के समाधान के लिए उपाय भी बताये है .

  4. भाषा माध्यम होनी चाहिए न कि सिर्फ योग्यता या योग्यता का पैमाना. और जब भाषा विशेष को ही योग्यता मान लिया जाये एक आम आदमी का विश्वास टूटता है. वह अपने रास्ते की जमीन को खिसकता महसूस करता है और रास्ता बदल लेता है. इस तरह जड़ कटनी सुरु ही जाती हैं.
    ये सेवाएं किसके लियें हैं? जनता के लियें ना तो फिर जनता की भाषा जानने वाले अपनी योग्यता के बल पर अगर इन सेवा में आ जाएँ तो कौन सी हानि हो जाएगी? कौन से पहाड़ टूट जायेंगे? और अगर अग्रेजी भाषा ही इस सेवा के लियें एक मात्र योग्यता है तो इन योग्य अधिकारीयों ने कौन से महान कार्यों को अंजाम दे दिया? कुछ किया हो या ना किया हो लेकिन एक लकीर जरूर खीच दी और जनता उसी लकीर की फ़कीर बन गयी है. और अपने बच्चों को भी कहीं ना कहीं मजबूरी में इस लछ्मण रेखा से निकलने देना भी नहीं चाहती.
    अगर इस सरकार में शामिल जनप्रतिनिधि अपनी भाषा में सपथ ले सकते हैं तो युवा अपनी भाषा के माध्यम से और तर्कसंगत तरीके से इन सेवाओं में क्यों नहीं चुने जा सकते? और अगर ऐसा होता है तो हम पर विश्व का कौन सा देश या सगठन प्रतिबंध लगा देगा? हमें कौन बेदखल कर देगा? भारत तो भारत ही रहेगा.भाषा संयुक्त राष्टय संघ में अगर हिंदी बोलने का हम दम भरते हैं तो इन सेवाओं में भारतीय अनुसूची में शामिल भारतीय भाषाओं के माध्यम से लोक सेवक के आने का रास्ता क्यों नहीं खोला जाता? इससे तो भारीतय समाज में एकजुटता ही आएगी. आदमी का भाषायी समाज में विश्वास जमेगा. यहाँ मैं अग्रेजी का तो विरोध नहीं कर रहा हूँ. विरोध कर रहा हूँ उस हीनता का जिसने हमें लाचार किया हुआ है. और तंत्र इसे पुख्ता कर रहा है.

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