राकेश तिवारी की कहानी ‘अंजन बाबू हँसते क्यों हैं’

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80-90 के दशक में जब दिल्ली विश्वविद्यालय में पढता था तो जिन कथाकारों की कहानियां पढने में आनंद आता था उनमें एक राकेश तिवारी थे. मध्यवर्गीय जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों को लेकर कई कमाल की कहानियां लिखी उन्होंने. बीच में अपने लेखन को लेकर खुद लापरवाह हो गए. अभी दो दिन पहले ही उनका कहानी संग्रह ‘मुकुटधारी चूहा‘ रिलीज हुआ तो अचानक मुझे उनकी कहानियां याद आ गई. अब देखिये वेतनवृद्धि-पदोन्नति को लेकर कितनी रोचक और मार्मिक कहानी है यह- मॉडरेटर.
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अंजन बाबू हँसते क्यों हैं
अंजन बाबू नहाते-नहाते खिलखिलाने लगते हैं। इतनी जोर से कि बाहर वाश-बेसिन पर झुककर कुल्ला कर रही पत्नी के कान चौकन्ने हो जाते हैं। वह कुल-कुल, कुल-कुल.पुच्चकरने को होती है, किन्तु एकाएक रुक जाती है। मुँह का पानी धीरे से थूकती है, ताकि सुन सके। फिर पंजों के बल आगे बढ़ती है.. बमुश्किल दो कदम। स्नान घर के दरवाजे पर कान टिकाती है। अन्दर खिल-खिलजारी है। जैसे कोई उन्हेंगुदगुदा रहा हो। वह हलकी-बक्की। क्या कोई चुटकुला याद आया होगा? या फिर पुर्जातो नहीं खिसका…।

आखि़र अंजन बाबू इस कदर हँसते क्यों हैं?

तंगी और आर्थिक दबावों में अंजन बाबू की हँसी कब की फुर्र हो चुकी थी। अभी हाल तक उनकी तस्वीर कुछ इस तरह थी.. दुबली काया पर फ्यूज बल्ब की तरह लटका चेहरा। पपड़ियाये होंठ। मिट्टी पड़ी-सी आँखें। माथे पर बल। कमर से सरकती पतलून।
घर आते तो कुछ रुटीन वार्तालाप। सूचनाओं का आदान-प्रदान। फिर पढ़ने की मेज पर झुक जाते। नमक, मिर्च, तेल, मसाले, पसन्द-नापसन्द, किसी बात को लेकर न कोई टिप्पणी, न नाक-भौंह सिकोड़ना। खाना तैयार होता तो पत्नी के बुलावे पर रस्सी से बँधे मवेशी की तरह पहुँच जाते। चार पैसे की आमदनी बढ़ाने को, कहीं से कोई काम ले आते और मेज पर गर्दन दिये रहते।
गर्दन अब भी दिये रहते हैं। पर, इधर कुछ दिनों से खुश-खुश से रहने लगे हैं। यदा-कदा बत्तीसी भी दिखा देते हंै। किन्तु आज तो हद हो गयी। स्नान घर में खिलखिला रहे थे। जीवन में ऐसा कोई परिवर्तन तो आया नहीं। खुशी हरामजादी लुटने को लुच्चों के पास जाने में तो संकोच न करे, लेकिन अंजन बाबू से दो गज की दूरी। घर में ऐसा कुछ नहीं बदला। वही मासूम-सी बच्ची है, वही सुन्दर, सुशील पत्नी.. गुलदस्ते में सजे गुलाब-सी। अंजन बाबू की नजर टिक गयी तो टिकी, नहीं तो नहीं। क्या करें, फुर्सत तो हो। हरदम चिन्ताएँ, हर कदम जिम्मेदारियाँ। उम्र तैंतीस, वजन पचपन और कन्धों पर बोझ कई मन, कई टन।
तो फिर इस बदरंग जीवन को अंजन बाबू ने अचानक कौन से प्रिज्म से देखना शुरू कर दिया कि सतरंगी नजर आने लगा?
अंजन बाबू उँगलियों से फिटर-फिटर बालों का पानी छिटकते हैं। कमीज पहनने को होते हैं तो पत्नी पूछती है, ”कैसे हँसी आ रही थी?“
ऐसे ही।वह मुस्कुरा देते हैं। पत्नी फिर कुरेदती है, ”ऐसे ही?“
कुछ याद आ गया था।
कुछ क्या?“
शाम को बताऊँगा। दफ्तर के लिए पहले ही देर हो चुकी है। झटपट नाश्ता दो और खाना बाँधो।
आखि़र, आजकल अंजन बाबू बात-बात पर हँसते क्यों हैं? अंजन बाबू हँसते क्यों हंै, यह सवाल दफ्तर के लोगों को ज्यादा मथता-कचोटता है। दफ्तर वाले ज्यादा निकट हंै तो ईष्र्या स्वाभाविक है। हालाँकि अंजन बाबू की हालत दफ्तर वालों से छिपी नहीं है। उन्हीं साथियों के आगे महीने की दस तारीख़ के बाद वे उधार के लिए हाथ पसारते हैं। उन्हीं को दुखड़े सुनाते हैं। फिर भी एक निहायत मरियल, फक्कड़ और दो टके के नौकरीपेशा आदमी से ईष्र्या? और ईष्र्या का कारण.. कि आखि़र यह अंजन का बच्चा आजकल ठट्टा मारकर हँसता क्यों है?
बधाई हो, शीलाजी।अंजन बाबू दफ्तर पहुँचते ही शीला शुक्ला को बधाई देते हैं। शीलाजी गद्गद। साथी अंजन बाबू को घेर लेते हैं। इन्दु भूषण पांडे पूछते हैं, ”अंजन बाबू, शीलाजी का नाम भी है?“
है का मतलब?’’ अंजन बाबू शरारती मुस्कान बिखेरकर कहते हैं, ”अरे भाई, इस बार वह पहले नम्बर पर हैं। यकीन न हो तो चन्दर साहब से पूछ लो।
चन्द्र प्रकाश बड़े साहब के निजी सचिव हैं। लोग उन्हें भी साहबों-सा सम्मान देते हैं और प्रायः उनसे किसी तरह की पूछताछ का साहस नहीं जुटा पाते।
अंजन बाबू की बात पर आधे लोग मुस्कुराने लगते हैं। बाकी चिन्तित और परेशान। कहीं सचमुच शुक्लाइन बाजी न मार ले गयी हो। शीलाजी की खुशी सतह पर आये बुलबुले की तरह फट जाना चाहती है। अंजन बाबू की ओर झुककर पूछती हैं, ”सच-सच बताना, मेरा नाम है?“
अंजन बाबू हँसते क्यों है: देखिये, आप विश्वास नहीं करेंगी तो मैं नहींकह दूँगा।
नहीं, ऐसा मत कहियेगा।उनका गिरगिटी चेहरा बदरंग हो जाता है। ऐसा भय कि जैसे फैसला अंजन बाबू की कलम से होता हो।
कुछ दूर स्टूल पर बैठा चपरासी वार्तालाप सुनने का प्रयत्न कर रहा है। ध्वनि तरंगें उसके कानों के पर्दों को छू नहीं पा रहीं। वह अपनी गिद्ध दृष्टि से हिलते होंठों का अर्थ ढूँढ़ने का प्रयास कर रहा है। अचानक जोश में आकर वह सीटी मार देता है.. वय वये…!
अंजन बाबू पांडे की ओर गर्दन घुमाकर जाॅनी वाॅकरछाप अदा के साथ देखते हैं। इस अदा की विशेषता यह है कि दोनों आँखें अधमुँदी हो जाती हैं। इसके बाद आँख दबाकर संकेत करने की आवश्यकता नहीं रह जाती।
पांडेजी फौरन संकेत पकड़ लेते हैं, जैसे उनका टीवी पड़ोस में चल रही केबल टीवी की फिल्म पकड़ लेता है। कहते हैं, ”चलिए, बधाई हो, शीलाजी। मुझे बहुत खुशी है।
शीलाजी के होंठों पर विजयी मुस्कान फैल जाती है। वह विजय वर्मा की ओर तीर चला देती हंै, ”लेकिन कुछ लोगों के सीने पर साँप लोट रहे होंगे।
लोटने दीजिए, शीलाजी“, पांडेजी आगे कहते हैं, ”पर हाँ, थोड़ा सावधान रहियेगा। पिछली बार ख़बर उड़ते ही आपके विरोधियों ने बना-बनाया काम बिगाड़ दिया था।
लोग मुँह छिपाकर हँसने लगते हैं।
अंजन बाबू जब से नौकरी के लिए शहर आये, गाँव में दो बहनें ताड़ की तरह बढ़ती हुई एक साथ दरवाजे की चैखट को छूने लगीं। न उन्होंने बहनों के बढ़ने-गदराने का क्रम देखा, न पिताजी के मुरझाने का। बस छुट्टी पर गाँव गये, तो देखा बहुत कुछ बदल गया है.. जैसे अचानक।
पिता रिटायर हो चुके थे। फंड वगैरह की सारी रकम बड़ी बेटी और अंजन बाबू की शादी में पहले ही झोंक दी। अब ठन-ठन गोपाल। शरीर की सारी कुव्वत बुढ़ापे ने चूस ली। आँखों की ज्योति भी दगा दे गयी। चश्मा लगाकर भी धुँधला ही दिखाई देता है। इसके बावजूद दो ट्यूशन कर रहे हैं।  मुँहजबानी सवाल हल करा देते हैं। जीवनभर की मास्टरी में इतना अनुभव भी न होगा? यह बात और है कि उनके निजी जीवन में दो सवालों का हल नहीं निकल रहा.. बेला और मिट्टू का ब्याह कैसे होगा, इसका कोई उत्तर उनके पास नहीं है।
आँखों से असहाय होकर भी बेटे पर कम से कम बोझ डालना चाहते हैं। ज्यादा कमा नहीं सकते तो ख़र्चे ही समेट लिए। घर की हालत देखकर अंजन बाबू दंग रह गये थे। हर कोने-चप्पे में कंगाली के पैरों की छाप नजर आ रही थी। जैसे उनकी अनुपस्थिति में कमजोर बाप और जवान लड़कियों को अकेला देखकर कंगाली घर को रौंद गयी हो, राशन-पानी खा गयी हो और लत्ते-कपड़े तार-तार कर गयी हो।
उनके पीछे, घर में कंगाली का कथकलीहोता है, यह समझते अंजन बाबू को देर नहीं लगी। उन्होंने तय कर लिया कि जैसे भी हो, गाँव को सौ रुपए माहवार ज्यादा भेजने होंगे।
गाँव से लौटकर आये तो मेज पर गर्दन और अधिक झुक गयी। हालाँकि, इसके बावजूद अभी पचास रुपये भी बढ़ाकर नहीं भेज पाये हैं। पता नहीं, क्या होता है, वेतन मिलने के हफ्ते दिन में ही नोट जाने कहाँ चले जाते हैं। जेब निगल जाती है कि पंख लग जाते हंै?
 गणित के मास्टर तो अंजन बाबू के पिताजी थे। पर हिसाब-किताब लगाते रहना अंजन बाबू की नियति बन गयी है। मसलन, सौ रुपये की आमदनी बढ़ी तो पचास इस मद में, पचास उस मद में। दो सौ की वेतन बढ़ोतरी हो जाये तो सौ का ये, पचास का वो और पचास का वो। तीन-चार सौ एकमुश्त बढ़ गये, फिर तो…आये हाये, मजा आ जाये। सौ रुपये गाँव भेजूँ…और बाकी रकम से सारा स्वर्ग ख़रीदकर घर ले जाऊँ।…और फिर चैन की बाँसुरी बजाऊँ.. हरि प्रसाद चैरसिया की तरह।
लेकिन सालाना बढ़ोतरी से पहले ही बेटी के स्कूल की फीस, दूध, सब्जी, राशन-पानी और तेल-चीनी के दाम बढ़ जाते हैं। कितना ही बजट बना लो, कितने ही गणितज्ञ हो जाओ, बाजार की आँधी सब चैपट कर देती है। जेब में मन्दी, बाजार में उछाला।
गणित कोई जादूगरी तो है नहीं। वह तो सिर्फ दो और दो चार होने का सत्य बताता है, दो के चार बनाना नहीं। इसीलिए कभी-कभी यह हिताब-किताब अंजन बाबू को मिथ्या और छलावा लगता है। खर्चों का जोड़-बाकी करने से जेब की रकम तो बढ़ती नहीं।
लेकिन फिर भी वे जोड़-बाकी करते हैं। किये बिना भी मन नहीं मानता। कभी यह विचार भी आता है कि पिताजी गणित के मास्टर थे, उनके गुण-सूत्रों के जरिये आनुवंशिक गुण-दुर्गुण की तरह यह हिसाब-किताब उनके खून में तो नहीं आ गया? फिर अपनी मूर्खता पर ख़ुद ही झल्ला पड़ते हैं.. धत तेरी, अधपड़ अंजन की ऐसी-तैसी।
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