क्रिकेट खेल, धर्म और राजनीति का सम्मिश्रण था

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आजादी से पहले के दौर में अंग्रेजों ने किस तरह क्रिकेट के खेल का राजनीतिक इस्तेमाल किया इसको समझने के लिए रामचंद्र गुहा की किताब ‘विदेशी खेल अपने मैदान पर’ पढने लायक है. उसी का एक सम्पादित अंश क्रिकेट और साम्प्रदायिकता को लेकर- मॉडरेटर
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बंबई का वार्षिक क्रिकेट उत्सव, युद्ध की पृष्ठभूमि लिए खेल, धर्म और राजनीति का सम्मिश्रण था। इसका अस्तित्व एक विचित्र विरोधाभास था- एक कट्टर सांप्रदायिक प्रतियोगिता जो आधुनिक भारत के सबसे प्रगतिशील और महानगरीय शहर में परवान चढ़ी थी। कोई भी अब उनकी गहरी भावना को समझ सकता था जिन्होंने कड़वाहट से इसका विरोध किया था। भारतीय राष्ट्रवादियों के लिए, बरेलवी या तलेयारखान के लिए क्रिकेट मैदान पर सांप्रदायिक पहचान के ही स्वीकार ने साझी नागरिकता के विचार को भंग कर दिया था, जिस का अर्थ था कि और कुछ भी होने से पहले हम सभी भारतीय हैं। पंचकोणीय क्रिकेट प्रतियोगिता के अस्तित्व ने समावेशी राष्ट्रवाद को अंगूठा दिखा दिया जिसका महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू जैसे लोगों ने समर्थन किया था, और जाति-धर्म के विभाजनों को बढ़ावा दिया। पहले यह बहस हुई कि प्रतियोगिता की शुरुआत ही ब्रितानी फूट डालो और राज करो की नीति के लिए थी और दूसरी दलील ये थी कि इसे जारी रखना पाकिस्तान की नाजायज़ परंतु खतरनाक रूप से फैशनेबल मांग को बढ़ावा देता था।

        प्रशासकों ने जानबूझकर सांप्रदायिक आधार पर खेल के संगठन को प्रोत्साहित किया था ऐसा विस्तृत रूप से माना जाता था। स्वतंत्रता की पूर्वसंध्या को भारत का दौरा कर रहे एक अमेरिकन पत्रकार ने लिखा कि ब्रितानी फूट डालो और राज करो की नीति विद्यालयों में भी पहुंच गई थी – खेल में हिंदू टीम मुस्लिम टीम से लड़ रही थी और स्नातक होने के साथ यह प्रतियोगिता नौकरी के लिए प्रतिस्पर्धा बन जाती थी। स्वतंत्रता के फौरन बाद लिखे अपने एक लेख में पूना के जाने माने क्रिकेटर डीबी देवधर ने दावा किया कि भारत के उच्चतम क्रिकेट में सांप्रदायिकता की भावना सिर्फ ब्रिटिश अफसरों की ही वजह से आई क्योंकि शुरुआती दिनों में ये लोग भारतीयों से निपटते समय खुद को श्रेष्ठता की भावना से भरे रहते थे। भारत में ब्रितानी साम्राज्य की रक्षा के लिए आने वाले सभी ब्रितानी अधिकारियों को उच्च अधिकारियों ने कह रखा था कि मूलवासियों के साथ वो बहुत कम संपर्क रखें। इसलिए अंग्रेज़ों ने बंबई, कलकत्ता और मद्रास के तीन प्रांतीय शहरों में खास क्लब बना लिए। बाद में इनकी देखा देखी पूना और बैंगलोर जैसे दूसरे शहरों में भी क्लबों की स्थापना की गई। पारसी लोगों ने भी इस खेल को चुना और उन्होंने खेल के साथ साथ अंग्रेज़ों की पृथकतावादी प्रवृत्ति को भी ले लिया। एक तरफ अंग्रेज़ पारसियों को उनके पवित्र किलों में प्रवेश नहीं करने देते थे। इसलिए पारसियों ने विवशतापूर्वक अलग क्लब बना लिया। परंतु उन क्लबों में वे दूसरे भारतीयों को अनुमति दे सकते थे। दुर्भाग्यवश यह किया नहीं गया। परिणामस्वरूप हिंदुओं को भी वही रास्ता अपनाना पड़ा। और आखिर में मुसलमान भी यही रास्ता अपानने को बाध्य थे।

        औपनिवेशिक क्लबों का जातिवाद साफ दिखता था। परंतु यह उद्धरण यह भी सुझाता है कि हिंदू सांप्रदायिक क्रिकेट में खुद शामिल होने के इच्छुक होने की बजाए पीडि़त व्यक्ति थे। जबकि वह एक पूर्वव्यापी सोच लगती थी जिस पर शायद 1920 से गांधी और उनके जैसों द्वारा प्रोत्साहित सम्मिलित राष्ट्रवाद का प्रभाव था। यदि ब्रितानी अलग थे तो इसी प्रकार हिंदू समाज भी अपने धार्मिक दायरों के चलते जातियों और उप जातियों के बीच बंटा हुआ था। वास्तव में 19वीं शताब्दी के आखिर के भारत में क्रिकेट क्लबों ने खुद को जाति के आधार पर व्यवस्थित कर लिया था। शासकों ने शायद सोचा होगा कि चतुष्कोणीय क्रिकेट प्रतियोगिता का स्वरूप भारत के लिए स्वाभाविक होगा लेकिन वे इसे बिना सहायता के अस्तित्व में नहीं लेकर आ रहे थे। सांप्रदायिक क्रिकेट में जितने हिंदू जाति के पूर्वाग्रह थे उतना ही पारसियों का सामाजिक दंभ, मुसलमानों की सांस्कृतिक मानसिक संकीर्णता और अंग्रेज़ों की जातीय प्रधानता भी।

        यदि चतुष्कोणीय प्रतियोगिता के जन्म के मूल में पूर्णतया ब्रिटिश सरकार की फूट डालो राज करो की नीति न भी रही हो तो इसकी निरंतरता के बारे में क्या? क्या 1930 और 1940 में प्रतियोगिता की बढ़ रही लोकप्रियता ने पाकिस्तान के आंदोलन के लिए चारे का काम नहीं किया? और अधिक सटीक रूप से क्या सांप्रदायिक क्रिकेट ने सांप्रदायिक वैरभाव को पोषित और गहरा नहीं किया? खिलाडि़यों के अनुसार नही। दो सिंध के खिलाडि़यों ने जिनमें से एक हिंदू और एक अंग्रेज़ था कहा कि जो सोचता है कि सांप्रदायिक क्रिकेट बुरी भावना को जन्म देता है उसे कराची आकर दोनों खिलाडि़यों और दर्शकों के बीच मौजूद खेल प्रतिद्वंद्विता और अच्छी दोस्ती को देखना चाहिए। उसने इसमें जोड़ा कि वे बहुत बदली हुई राय के साथ वापस जाएंगे। यह बात 1928 में अखबार के किसी क्रिकेट के पन्ने पर लिखी थी लेकिन करीब दस साल बाद बंबई के एक क्रिकेटर ने भी, जहां पर खेल के और राजनैतिक दांव भी स्पष्ट रूप से ऊंचे थे, यही बात कही। नवंबर 1940 में मुस्लिम कप्तान सैयद वजीर अली को यह कहते हुए उद्धत किया गया कि यह प्रतियोगिता थोड़ी भी राष्ट्रविरोधी नहीं है और इसे भारतीय क्रिकेट के हितों में जरूरी और आवश्यक रूप से जारी रहना चाहिए। इसके अगले साल जब इस क्रिकेट टूर्नामेंट का भाग्य अधर में लटका हुआ था तो हिंदू कप्तान सीके नायडू ने दावा किया कि इस प्रतियोगिता ने किसी भी प्रकार से सांप्रदायिक भेदभाव को बढ़ावा नहीं दिया है। इसने स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और सांप्रदायिक एकता को बढ़ावा दिया है। इसने समुदायों को बांटने की बजाए मिलाया है। सीके के एक और साथी मुश्ताक अली के मुताबिक महोत्सव ने हमेशा खिलाडि़यों और जनता के बीच प्रतिस्पर्धा की एक स्वस्थ भावना और खेल भावना को प्रोत्साहन दिया है। उनके अनुभव के अनुसार-स्टैंड के हर तरफ से सराहना की तरंग और शोर ने बिना भेदभाव के अच्छे प्रदर्शन का स्वागत किया है। बेशक यह नायडू (एक हिंदू) के छक्कों के लिए हो, निसार (एक मुस्लिम) की विकेट उखाड़ती गेंदों के लिए हो या फिर भाया (एक पारसी) के चतुर क्षेत्ररक्षण के लिए।

        क्रिकेटरों के कथन में सच्चाई की झलक थी परंतु क्या सच में यही मसला था? क्या हिंदू और मुसलमानों के बीच के खेल मुकाबलों ने एक दूसरे के कौशल और उपलब्धियों की तारीफ को बढ़ाया था या फिर उन्होंने कहीं और ज्यादा खतरनाक जंग को आरंभ करने का काम किया? यहां पर इस विषय पर बहस लंबे समय से चल रही और अब तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी है। उदाहरण के तौर पर जार्ज आरवेल जैसे लोग इस अंतरराष्ट्रीय खेल को गोलाबारी रहित युद्ध के रूप में पेश करते हैं। नवंबर 1938 में जब पंचकोणीय प्रतियोगिता का विवाद चरम पर था तो एक दूसरे अंग्रेज़ लेखक ने इसे इस तरह पेश किया। एल्डस हक्सले ने टिप्पणी की कि आशावादी सिद्धांतकार खेल को राष्ट्रों के बीच रिश्तों के रूप में मानते हैं। राष्ट्रवादी भावना के वर्तमान हालात में यह सिर्फ अंतरराष्ट्रीय गलतफहमी पैदा करने का एक और कारण है। फुटबाॅल मैदान पर और रेस-ट्रैक पर होने वाली झड़पें महज शुरुआती होती हैं और प्रतियोगिता की अधिक तैयारी में सहयोग करती हैं। ब्रितानी उपन्यासकारों के बीच इस सर्वसम्मति के भाव को आगे बढ़ाते हैं एलन सिलितो, जो सोचते है कि खेल राष्ट्रीय भावना को शांति के समय में भी जिंदा रखने का एक साधन है। यह युद्ध की संभावित घटना के लिए राष्ट्रीय भावना को तैयार करता है।

पेंगुइन बुक्स इंडिया द्वारा प्रकाशित रामचंद्र गुहा की किताब ‘विदेशी खेल अपने मैदान पर’ का एक संपादित अंश। प्रकाशक की अनुमति से प्रकाशित।
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  1. बहुत ही सार्थक प्रस्तुति। स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!

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