‘कई चाँद थे सरे आसमां’ के बहाने कुछ मौजू बातें

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हाल के बरसों में जिस एक उपन्यास ने बड़ी सरगर्मी पैदा की वह शम्सुर्ररहमान फारुकी का उपन्यास ‘कई चाँद थे सरे आसमां‘ है. मूल रूप से उर्दू में लिखे गए इस उपन्यास के हिंदी और अंग्रेजी संस्करणों की भी धूम मची. इस उपन्यास पर युवा लेखक शशिभूषण द्विवेदी ने एक बढ़िया लेख लिखा है. पढ़ा तो सोचा साझा किया जाए- मॉडरेटर 
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शम्सुर्रहमान फारूखी का उपन्यास कई चांद थे सरे आसमांएक ऐसी किताब है जिसे बेहिचक हिंदी ही नहीं, भारतीय भाषाओं की अहम किताब कहा जा सकता है। यह उपन्यास सिर्फ उपन्यास नहीं है। यह भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति का दो सौ सालों का इतिहास भी है जिसे एक राजनीतिक निगाह से भी देखा जा सकता है। उपन्यास एक तरह से उस भुला दी गई संस्कृति का आईना है जिसमें हिंदुस्तान का बौद्धिक समाज सांसे लेता रहा है। 

लगभग सत्रहवीं सदी से शुरू हुआ यह उपन्यास अट्ठारहवीं सदी के अंत में आकर अपने ऊरूज पर पहुंचता है और सात-आठ पीढ़ियों का शिजरा बनाते हुए पूरे हिंदुस्तान की कहानी कह देता है। हालांकि इसके केंद्र में वजीर खानम नाम की एक ऐसी स्त्री की कथा है जो अपनी बदकिस्मती के बावजूद अपनी हिम्मत आप है। फारूखी साहब ने वजीर खानम की कथा कहने के लिए एक बड़ा खूबसूरत रूपक उठाया है और वह रूपक है बनी-ठनीका। राजस्थान के किशनगढ़ की खास चित्रशैली में बनी-ठनीका रूपक दरअसल भारत की गंगा-जमुनी तहजीब और स्त्री नियति का एक करुण आख्यान है। इसमें कुछ लोग राधा की छवि खोजते हैं तो कुछ मीरा की। जो हो, लेकिन बनी-ठनीभारतीय स्त्री की वह छवि तो है ही जो अपने रूप, अपने स्वाभिमान, अपनी ठसक, अपने प्रेम और अपनी ममता की मिसाल आप है। उपन्यास की नायिका वजीर खानम उर्फ शौकत महल भारतीय स्त्री की उसी मोहिनी छवि का विस्तार है जिसकी शुरूआत बनी-ठनीसे होती है जिसे अट्ठरहवीं सदी के एक मुस्लिम चित्रकार ने बनाया था और जिसकी तलाश उसकी तमाम पीढ़ियां करती रहीं। 

1718-47 में किशनगढ़ के एक छोटे से गांव हिंदलवी पुरवा के चित्रकार मख्सूल्लाह मियां ने बनी-ठनीका एक चित्र बनाया जिसके बारे में कहा जाता है कि वह किसी असल लड़की हूबहू तस्वीर थी जिसे मियां ने कभी देखा भी नहीं। और संयोग ऐसा कि इलाके के राजा गजेंद्रपति मिर्जा की बेटी मनमोहिनी से उस तस्वीर की शक्ल हूबहू मिलती थी। नतीजा हुआ कि गजेंद्रपति और उसका अमला चित्रकार को खोजता हुआ गांव में आया। चित्रकार नहीं मिला लेकिन बेटी की तस्वीर बनने और उसकी बेपर्दगी से राजा गजेंद्रपति को इतना गुस्सा आया कि उसने मनमोहनी को सबके सामने मार डाला और पूरा गांव उजाड़ दिया। मख्सूल्लाह मियां गांव छोड़कर कश्मीर चले आए और शादी करके यहीं बस गए। यहां उनके दो बेटे हुएमुहम्मद दाऊद बडगामी और याकूत बडगामी। ये गायक हुए और बाप के मरने के बाद कश्मीर छोड़कर बनी-ठनीकी तस्वीर लिये उसे खोजते राजपूताना आ गए। यहीं उनकी शादियां हुईं और बर्बादी का एक सिलसिला भी। व्यापार के एक सिलसिले में ये लोग एक सफर पर थे कि दिल्ली के रास्ते में मराठों और अंग्रेजों में मुठभेड़ हुई जिसमें दाऊद बडगामी और याकूत बडगामी का पूरा परिवार खाक हो गया। बचा सिर्फ़ उनका एक बेटा मुहम्मद याहया जिसे एक गानेवाली अकबरी बेगम ने पाला-पोसा। 

वजीर खानम इसी मुहम्मद याहया की तीसरी बेटी थी। बड़ी बेटी का ब्याह एक मौलवी से हुआ, छोटी उम्दा खानम एक नवाब युसूफ अली खां की रखैल बन गई। लेकिन तीसरी बेटी वजीर खानम की किस्मत कुछ इस तरह लिखी गई कि इतिहास बन गई। वजीर खानम बला की खूबसूरत, शेरो-शायरी में माहिर और अपनी किस्मत खुद लिखने का हौसला रखने वाली लड़की थी। शायरी में उसके उस्ताद मशहूर शायर शैख नासिख थे। लेखक ने काफी शोध करके उसकी कुछ नज्में और गज़लें खोज निकाली हैं जिनसे वजीर खानम की बौद्धिक क्षमता का पता चलता है। वजीर की खूबसूरत शख्सियत के बारे में लेखक ने कई जगह लिखा है कि पांच-पांच बच्चे पैदा करने के बाद भी उसकी खूबसूरती पर कोई खास असर नहीं पड़ा। उसकी तस्वीर जो बनी-ठनी का ही प्रतिबिंब है, पर लेखक ने लिखा है—‘आंखों में कामुकता और जवानी का ऐसा भरपूर शऊर था कि शहजादा मिर्जा गुलाम फखरुद्दीन फतहुलमुल्क बहादुर के हाथ से तस्वीर छूटते-छूटते बची। लगता था कि तस्वीर अपनी आंख या भौंह से कोई इशारा करने वाली है। लेकिन उसकी अदा में कोई घटियापन या बाजारूपन न था। सुडौल चेहरे पर बड़ी-बड़ी आंखें, उन पर लंबी-लंबी पलकें लेकिन आंखें झुकी हुई नहीं, कुछ उठी हुई। आंखों का रंग शर्बती और चेहरे में हल्की सी ठंडक की ऐसी कैफियत जैसे ताजा खिला हुआ जंगली गुलाब।’ 

पैंतीस साल की उम्र में भी सुडौल कसे हुए कूल्हे और जानू गोया सांचे में ढले हुए, चीते सी पतली कमर में खम, पेट बिल्कुल सपाट और बेशिकन, उस पर फ़ालतू चर्बी क्या, फालतू बोटी का भी नाम न था। मतलब यह कि पूरी दिल्ली में उसकी खूबसूरती का जवाब नहीं था। और यह खूबसूरती सिर्फ दैहिक नहीं थी, बौद्धिक और रूहानी भी थी। उसकी अपनी खास तबीयत थी जिसमें बड़ी बहन की तरह न तो ब्याहता बनकर रहने का ख्¸याल था और न मंझली बहन की तरह किसी की रखैल बनकर रहने का। बाजारू औरत की तरह का तो कोई सवाल ही नहीं उठता। दरअसल वह आजाद तबीयत की थी और किसी से भी अपनी शर्तों पर ही संबंध रखने को राजी थी। वह ऐसा गुलाब थी जिसके साथ कांटे खुद-ब-खुद आते हैं। उसकी जिंदगी में पहला जलजला आया एक अंग्रेज अफसर मर्स्टन ब्लेक के रूप में। शुरू में मर्स्टन ब्लेक से उसे मोहब्बत नहीं थी, लेकिन एक सफर दौरान हालात ऐसे हुए कि उसे मर्स्टन ब्लेक के साथ जाना पड़ा और एक तरह से उसकी रखैल बनना पड़ा। हालांकि यह भी हुआ उसकी अपनी शर्तों पर ही। मर्स्टन ब्लेक जयपुर में अट्ठाइस साल का असिस्टेंट पोलिटिकल एजेंट था और कुंवारा था। बाद में मर्स्टन ब्लेक ने उसे ब्याहता बनाने की मौखिक अर्जी भी कंपनी सरकार को दी थी लेकिन बदकिस्मती से वह दिन कभी नहीं आया। इस बीच पंद्रह सोलह साल की वजीर खानम मर्स्टन ब्लेक के दो बच्चों की मां बन गई। यही वह दौर था जब महाराजा जयपुर सवाई जयसिंह बीमार पड़े और उनके उत्तराधिकार को लेकर झगड़ा शुरू हो गया। पोलिटिकल एजेंट की अनुपस्थिति में इस मामले को संभालने की जिम्मेदारी मस्टर्न ब्लेक की थी और उसे उसने बखूबी अंजाम भी दिया लेकिन इसी बीच एक बलवे में उसकी हत्या कर दी गई। ऐशो-आराम में रही वजीर खानम अपने दो बच्चों एक बेटा और बेटी के साथ अब तन्हा हो गई थी। 

मर्स्टन ब्लेक से उसे मोहब्बत थी जिसे वह ताजिंदगी भूल नहीं पाई। लेकिन अब उसके सामने उसकी पूरी किांदगी पड़ी थी और उस समय उसकी उम्र महज उन्नीस साल थी। उसके दोनों बच्चों को एक तरह से मर्स्टन ब्लेक के भाई-बहन ने उससे छीन लिया था। इस मजबूर अकेली औरत के लिए अब दिल्ली में ही जगह बची थी। लेकिन दिल्ली आने से पहले ही मर्स्टन ब्लेक की मौत की खबर और वजीर खानम की शोहरत दिल्ली तक पहुंच गई थी। दिल्ली में उसे अपनी मंझली बहन उम्दा खानम और उनके नवाब युसूफ अली खां का सहारा था। उन्हीं के जरिए वह दिल्ली के रईसों में अपनी पहचान बनाने की कोशिश करने लगी। पहला मौका उसे नवाब युसूफ अली खां के जरिए ही मिला दिल्ली के रेजिडेंट विलियम फ्रेज़र की महफिल में जहां दिल्ली और आस-पास के तमाम रईस मौजूद थे जिसका हाल इलाहाबाद की फैनी पार्क्स की डायरियों से मिलता है। यहीं उसकी मुलाकात लोहारू और फिरोजपुर झिरका के नवाब शम्सुद्दीन अहमद से हुई और शम्सुद्दीन अहमद का दिल वजीर खानम पर आ गया। दोनों की मोहब्बत परवान चढ़ी और यहीं से वजीर खानम की जिंदगी का एक दु:खद अध्याय फिर शुरू हुआ। दरअसल, विलियम फ्रेजर लंपट शख्सियत का आदमी था और कैसे भी करके वह वजीर खानम को हासिल करना चाहता था। एक बार वह वजीर की हवेली में भी आया और लगभग बदतमीजी कर बैठा। स्वाभिमानिनी वजीर को यह बर्दाश्त नहीं हुआ और फ्रेज़र को उसने बेइज्ज¸त करके घर से निकाल दिया। फ्रेजर के दिल में यहीं से गांठ पड़ गई। शम्सुद्दीन और फ्रेजर में इस बात को लेकर झगड़ा भी हुआ। इसी बीच शम्सुद्दीन का अपने सौतले भाइयों से रियासत की विरासत को लेकर झगड़ा चल ही रहा था जिसका फायदा विलियम फ्रेजर ने उठाया और कंपनी सरकार के कारिए शम्सुद्दीन को लोहारू की रियासत से बेदखल करा दिया। शम्सुद्दीन कैसे भी करके अपने इस अपमान का बदला लेना चाहता था और इसके लिए उसने अपने बचपन के साथी करीम खां के कारिए फ्रेजर की हत्या करवा दी। 

हालांकि यह कभी साबित नहीं हो सका कि फ्रेजर की हत्या में शम्सुद्दीन का हाथ था इसके बावजूद कंपनी सरकार ने बदले की भावना से फैसला उसके खिलाफ दिया और फांसी पर लटका दिया। बाद में नवाब शम्सुद्दीन दिल्ली को तारीख में शहीद माना गया। शम्सुद्दीन अहमद से वजीर खानम को नवाब मिर्जा नाम की औलाद हुई जो बाद में शायर नवाब मिर्जा खां दाग के नाम से नाम से प्रसिद्ध हुई। मिर्जा दाग और मिर्जा गालिब के बिना दिल्ली का सांस्कृतिक इतिहास पूरा नहीं होता, लेकिन दिलचस्प है कि पूरे उपन्यास की पृष्ठभूमि में शायर मीर तकी मीर छाए हुए हैं। इसका एक कारण तो शायद लेखक की मीर को लेकर अपनी दीवानगी है और दूसरा यह कि मीर अकेले ऐसे शायर हैं जिनके शायरी में तारीख बोलती है। वे मिर्जा गालिब की तरह के ख्याली शायर नहीं हैं बल्कि बहुत दुनियावी शायर हैं और उनकी शायरी में उनका समय और उसकी तहजीब बहुत साफ दिखती है। बहरहाल, शम्सुद्दीन अहमद की फांसी के बाद फिर वजीर तन्हा हो गई और अपनी मंझली बहन के पास रामपुर चली गई जहां नवाब युसूफ अली खां नियुक्त थे। रामपुर में एक बार फिर वजीर की ननद के जेठ नवाब आगा मिर्जा तुराब अली से उसका निकाह हुआ और जिंदगी फिर एक बार नए ढर्रे पर चल पड़ी। लेकिन वजीर की जिंदगी में चैन कहां था। 

जलजला फिर एक बार आया। मिर्जा तुराब अली जानवरों की खरीद के लिए बिहार के सोनपुर के मेले में गए और वापसी में ठगों के शिकार हो गए और बेमौत मारे गए। मिर्जा तुराब अली से भी वजीर खानम को एक बेटा हुआमिर्जा शाह आगा। रामपुर में शौहर की मौत के बाद वजीर का जीना उसकी सास और ननद ने मुहाल कर दिया। लिहाजा उसे फिर दिल्ली का रुख करना पड़ा। अबकी उसके साथ उसके दोनों बेटे नवाब मिर्जा और मिर्जा शाह आगा भी थे। मिर्जा शाह आगा अभी दूध पीते बच्चे थे और नवाब मिर्जा चौदह पंद्रह साल के हो चले थे। इस बीच नवाब मिर्जा की शोहरत बतौर शायर दिल्ली और दिल्ली के बाहर फैल चुकी थी और मां से उन्हें तखल्लुस दागभी मिल गया था। मिर्जा गालिब भी दाग की प्रतिभा को पहचान चुके थे। दा$ग की शोहरत तो खै¸र बादशाह बहादुर शाह जफर तक भी पहुंच गई थी। 

लेकिन दाग िफलहाल अपनी मां को एक आरामदेह जींदगी देने और बतौर शायर खुद को जमाने की ही मशक्कत में लगे थे। लेकिन नवाब मिर्जा दाग की उम्र अभी बहुत कम थी और वजीर खानम के पास भी अब आमदनी का कोई जरिया नहीं था। इस बीच वजीर खानम की जिंदगी में फिर एक मोड़ आया। उसकी खूबसूरती और बौद्धिकता के चर्चे बादशाह बहादुर शाह जफर के चौथे बेटे शहजादा मिर्जा फखरू तक पहुंची। मिर्जा फखरू की पहली बीवी खुदा को प्यारी हो चुकी थी और दूसरी से उनकी बनती न थी। मिर्जा फखरू के हाथ में वजीर खानम की एक तस्वीर आई जिसने उन्हें लगभग मदहोश ही कर दिया। आखिरकार बादशाह बहादुर शाह जफर ने मिर्जा फखरू को वजीर खानम से निकाह की इजाजत दे दी और वजीर खानम ने भी बहुत सोच-विचार के बाद इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इस निकाह के बाद बादशाह बहादुर शाह जफर की तफ से वजीर खानम को एक नया नाम मिलाशौकत महल। उधर नवाब मिर्जा को भी मिर्जा फखरू और बादशाह का साया और खां की उपाधि मिली। वजीर खानम से मिर्जा फखरू को भी एक बेटा हासिल हुआखुर्शीद मिर्जा। यह किस्सा 1840 के आसपास का है। 

1852 तक बादशाह के तीनों बड़े बेटे खुदा को प्यारे हो गए और मिर्जा फखरू को वलीअहद का ओहदा मिला। हालांकि लाल किले की बादशाहत अब लगभग खत्म हो गई थी और बादशाही की सिर्फ रवायतें ही बची रह गई थीं। वह वक्त भी अब बहुत करीब था जब दिल्ली को बुरी तरह उजड़ना था और मुगल बादशाहों की बादशाही पूरी तरह इतिहास का हिस्सा बनने वाली थी। वजीर खानम और दिल्ली की किस्मत में एक बड़ी समानता यह थी कि दोनों कई-कई बार उजड़ी और बसीं। दिल्ली को 1856 की क्रांति के बाद उजड़ना था। लेकिन वजीर खानम की किस्मत में 1856 में ही उजड़ना लिखा था। वलीअहद मिर्जा फखरू हैजे के शिकार होकर खुदा को प्यारे हो गए और वजीर खानम फिर से तन्हा हो गई। लेकिन गनीमत यहीं तक नहीं रही। मलिका-ए-दौरां नवाब जीनत महल की साजिश से वजीर खानम को आखिरकार अपने बच्चों के साथ किला मुअल्ला भी छोड़ना पड़ा। लेकिन सब कुछ के बावजूद वजीर खानम ने अपने स्वाभिमान के साथ कोई समझौता नहीं किया। 

दरअसल, उपन्यास की नायिका वजीर खानम अपने वक्त की एक विलक्षण स्त्री थी। उसे हमेशा स्थायित्व की तलाश थी और वह किसी को चाहने से ज्यादा चाही जाने वाली बने रहना चाहती थी। लेकिन दुर्भाग्य से यही उसके हिस्से नहीं आया। उसकी बौद्धिकता और तेज का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह किसी मर्द पर निर्भर रहने की ख्वाहिशमंद कभी न रही। अपने लिए अपने बेटे नवाब मिर्जा की चिंता पर वह उससे कहती है कि आप मेरे जिगर के टुकड़े हैं लेकिन आप अव्वल और आखिर मर्द हैं। मर्द जात समझती है कि सारी दुनिया के भेद और तमाम दिलों के कोने उस पर जाहिर हैं, या अगर नहीं भी हैं तो न सही लेकिन वह सबके लिए फैसला करने का हकदार है। मर्द ख्याल करता है कि औरतें उसी ढंग और मिजाज की होती हैं जैसा उसने अपने दिल में, अपनी बेहतर अक¸ल और समझ के बल पर गुमान किया है।… लेकिन बेटा मां को या भाई बहन को माजूर क्यों समझे?  यह क्यों करार दिया जाए कि औरत है इसलिए उसकी मुश्किल कोई मर्द ही या उसका कोई बुजुर्ग ही हल कर सकता है?… आपकी किताबों के लेखक सब मर्द, आपके काजी, मुफ़्ती-बुजुर्ग भी कौन, सबके सब मर्द। मैं शरई हैसियत नहीं जानती, लेकिन मुझे बाबा फरीद साहब की बात याद है कि जंगल में शेर सामने आता है तो कोई यह नहीं पूछता कि शेर है या शेरनी। आखिर हजरत रबिया बसरी भी तो औरत थीं।… मां का मजहब उसकी ममता है और कुछ नहीं।इस तरह लेखक ने वजीर खानम के किरदार को उसके ऊरूज पर पहुंचाया है। 

लेकिन उपन्यास सिर्फ वजीर खानम के किरदार तक ही सीमित नहीं है। इसका सबसे मकाबूत पक्ष इसका सांस्कृतिक आधार है जिसकी जड़ें फारसी साहित्य और दर्शन तक जाती हैं। आज इस्लामी संस्कृति को एक खास कट्टरपंथी दायरे तक सीमित करके देखा जाता है लेकिन अगर अतीत में जाएं तो सभ्यता-संस्कृति का इतना विस्तृत वितान देखने को मिलता है कि आश्चर्य होता है। फारसी एक जमाने में ज्ञान-विज्ञान और दर्शन की भाषा रही है जिसकी एक स्पष्ट झलक इस उपन्यास में भी देखी जा सकती है। उपन्यास का कोई भी पात्र एक-दूसरे से कोई भी बात सीधे-सीधे नहीं कहता। उनकी सारी बातचीत शायरी, संकेतों, प्रतीकों और मुहावरों में ही होती है। यह मुहावरेदारी दरअसल उस वक्त हिंदू-मुस्लिम तहजीब का हिस्सा थी। अट्ठारहवीं सदी का उर्दू-फारसी साहित्य, उसका इतिहास, उसकी काव्य परंपराएं, उसकी दार्शनिक ऊंचाइयां सब इस उपन्यास में इस कदर पिरोई गई हैं कि कथा का अनिवार्य अंग बन गई हैं। काव्य में उस्ताद और शागिर्द की परंपरा ने कैसे उर्दू साहित्य को बनाया-संवारा, एक-एक शेर और शब्द पर होने वाली लंबी-लंबी बहसों, मुअम्मागोई, समस्यापूर्ति ने कैसे उर्दू अदब और आलोचना को एक खास मुकाम तक पहुंचायासब उपन्यास में एक माला की तरह गुंथे हुए हैं। 

एक शेर में कैसे सैकड़ों नाम समाहित होते हैं और उस पहेली को हल करने में कैसे लोग के पसीने छूट जाते थेयह सब उर्दू-फारसी साहित्य की ताकत का बयान करते हैं। सबसे अहम बात है कि उपन्यास में लेखक ने जहां कल्पना के बड़े-बड़े मरहले खड़े किए हैं वहीं एक इतिहासकार की तरह कड़ी मेहनत से शोध भी किया है। उस दौर के तमाम अखबार, डायरियों और दस्तावेजों के हवाले तो हैं ही, उस वक्त बोली जाने वाली भाषा और तौर-तरीकों का भी लेखक ने खास ख्¸याल रखा है। बकौल इंतजार हुसैन उपन्यास बताता है कि 18वीं और
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