बादल रोता है बिजली शरमा रही

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जब सीतामढ़ी में था तो नवगीत दशक-1 को साहित्य की बहुत बड़ी पुस्तक मानता था. एक तो इस कारण से कि हमारे शहर के कवि/गीतकार रामचंद्र ‘चंद्रभूषण’ के गीत उसमें शामिल थे, दूसरे देवेन्द्र कुमार के गीतों के कारण. नवगीत के प्रतिनिधि संकलन ‘पांच जोड़ बांसुरी’ में उनका मशहूर गीत ‘एक पेड़ चांदनी लगाया है आंगने…’ पढ़ा था. आज ‘हिंदी समय’ पर देवेन्द्र कुमार बंगाली नाम से उनके गीत पढ़े तो वह दौर याद आ गया, और वह बिछड़ा दोस्त श्रीप्रकाश, जो मेरे पढने के लिए डाक से ये किताबें मंगवाता था. आप भी पढ़िए- जानकी पुल. 

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1.
एक पेड़ चाँदनी

एक पेड़ चाँदनी
लगाया है
      आँगने,
फूले तो
आ जाना एक फूल
माँगने।
ढिबरी की लौ
जैसे लीक चली आ रही
बादल रोता है
बिजली शरमा रही
      मेरा घर
छाया है
तेरे सुहाग ने।
तन कातिक, मन अगहन
बार-बार हो रहा
मुझमें तेरा कुआर
जैसे कुछ बो रहा
रहने दो,
यह हिसाब
कर लेना बाद में।
नदी, झील, सागर के
रिश्‍ते मत जोड़ना
लहरों को आता है
यहाँ-वहाँ छोड़ना
      मुझको
पहुँचाया है
तुम तक अनुराग ने।
एक पेड़ चाँदनी
लगाया है
      आँगने।
फूले तो
आ जाना एक फूल
माँगने।
2.
मेघ आए, निकट कानों के
मेघ आए, निकट कानों के
फूल काले खिले धानों के
दूब की छिकुनी सरीखे
हवा का चलना
दूर तक बीते क्षणों में
घूमना-फिरना
सिलसिले ऊँचे मकानों के।
रंग की चर्चा तितलियों में
मेह भीगी शाम
       बिल्‍ली-सी
नदी की पहुँच गलियों में
खिड़कियों का इस तरह गिरना
गीत ज्‍यों उठते पियानों के।
मेघ आए निकट कानों के
फूल काले खिले धानों के।
3.
हमको भी आता है
पर्वत के सीने से झरता है
              झरना…
हमको भी आता है
भीड़ से गुजरना।
कुछ पत्‍थर
कुछ रोड़े
कुद हंसों के जोड़े
नींदों के घाट लगे
कब दरियाई घोड़े
       मैना की पाँखें हैं
       बच्‍चों की आँखें हैं
       प्‍यार है नींद, मगर शर्त
              है, उबरना।
गूँगी है
बहरी है
काठ की गिलहरी है
आड़ में मदरसे हैं
सामने कचहरी है
बँधे खुले अंगों से
भर पाया रंगों से
डालों के सेव हैं, सँभाल के
कुतरना।
4.
मन न हुए मन से
मन न हुए मन से
हर क्षण कटते रहे किसी छन से।
तुमसे-उनसे
मेरी निस्बत
क्या-क्या बात हुई।
अगर नहीं, तो
फिर यह ऐसा क्यों?
दिन की गरमी
रातों की ठंडक
चायों की तासीर
समाप्त हुई
एक रोज पूछा निज दर्पन से।
मन न हुए मन से
हर क्षण कटते रहे किसी छन से।
5.
सोच रहा हूँ
सोच रहा हूँ
लगता है जैसे साये में अपना ही
गला दबोच रहा हूँ।
एक नदी
उठते सवाल-सी
कंधों पर
है झुकी डाल-सी
अपने ही नाखूनों से अपनी ही
देह खरोंच रहा हूँ।
दूर दरख्तों का
छा जाना
अपने में कुआँ
हो जाना
मुँह पर घिरे अँधेरे को
बंदर-हाथों से नोच रहा हूँ।
6.
हम ठहरे गाँव के
हम ठहरे गाँव के
बोझ हुए रिश्‍ते सब
कंधों के, पाँव के।
भेद-भाव सन्‍नाटा
ये साही का काँटा
सीने के घाव हुए
सिलसिले अभाव के!
सुनती हो तुम रूबी
एक नाव फिर डूबी
ढूँढ़ लिए नदियों ने
रास्‍ते बचाव के।
सीना, गोड़ी, टाँगें
माँगें तो क्‍या माँगें
बकरी के मोल बिके
बच्‍चे उमराव के।

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2 COMMENTS

  1. निश्छल भावों की सरल कविता, जैसे भाव इधर छलके उधर छलके।

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