बिसरे संगीतकार की भूली याद

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भारतीय सिनेमा के सुनहरे संगीतमय दौर के वो तेरे प्यार का गम, एक बहाना था सनम और जिक्र होता है जब कयामत का तेरे जलवों की बात होती है का कालजयी संगीत रचने वाले संगीतकार दान सिंह कभी गायकों और गीतकारों के चहेते रहे तो कभी गुमनामी में रहे, पर जिसने भी ऐसे गीतों को सुना, बिना संगीतकार का नाम जाने भी उसे मन ही मन प्यार किया. ‘वो तेरे प्यार का ग़म’ किताब उसी संगीतकार दान सिंह के जीवन की उतार-चढाव भरी दास्तान को पत्रकारीय ढंग से, सहज और सरस भाषा में से प्रामाणिक तथ्यों के साथ पेश करती है. यह किताब ना केवल दानसिंह के जीवन का कोलाज है बल्कि अपने समय का दस्तावेज भी है. लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, पं. हरिप्रसाद चौरसिया, पं. शिवकुमार शर्मा जैसे संगीतकारों ने जिसके सहायक के तौर पर काम किया; मोहम्मद रफी, मुकेश, मन्नाडे, गीता दत्त, उषा मंगेशकर, आशा भोंसले, सुमन कल्याणपुर जैसे चोटी के गायकों तथा गुलजार, हरिराम आचार्य, आनंद बख्शी जैसे गीतकारों के साथ काम करते हुए जिसने सिनेमा संगीत का जादू रचा, उसी दानसिंह के जीवन की अंतरंग तस्वीरों के एल्बम जैसी है यह किताब. इसका कैनवस संगीत और सिनेमा तक सीमित नहीं है, यह एक रचनात्मक संघर्ष का, एक मनुष्य के जीवन के विरोधाभासों का, उससे उपजी पीड़ा और रचनात्मक द्वंद्व का सामूहिक आस्वादन है. पेश है ईश मधु तलवार की लिखी इस किताब का एक अंश: मॉडरेटर 
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वर्ष-1964। मुम्बई में ताड़देव का एक स्टुडियो। गीता दत्त के गाने की रिकॉर्डिंग चल रही है। यह वो समय है, जब गीता दत्त के गुरुदत्त से रिश्ते समाप्ति की ओर बढ़ रहे थे। गमगीन गीता दत्त डूब कर गाना गा रही हैं- 
मेरे हम नशीं, मेरे हम नवां
मेरे पास आ, मुझे थाम ले
तू चला है मुझसे बिछुड़ के यूं
ज्यों शिकस्ता साज से रागिनी
ज्यों चली हो जिस्म से दूर जां
ज्यों चली हो आंखों से रोशनी
मुझे दे दे बांहों का आसरा
मेरे पास आ, मुझे थाम ले।
और तभी अचानक गीता दत्त की रुलाई फूट पड़ती है। रिकॉर्डिंग बीच में रुक जाती है। संगीतकार दानसिंह के संगीत का जलवा जैसे गीता दत्त के लिए कयामत बन कर आया। उनके संगीत निर्देशन में यह रिकॉर्डिंग थी फिल्म भूल न जानाके गाने की, जिसे जयपुर के हरिराम आचार्य ने लिखा था। इन्डो-चाइना वार पर बनी इस फिल्म को विदेश मंत्रालय के लाल फीतों ने डिब्बे से बाहर निकलने नहीं दिया और यह फिल्म रिलीज ही नहीं हो पाई। इसके साथ ही फिल्मी आकाश में कई लोगों की उड़ान थम कर रह गई। इनमें दानसिंह भी शामिल हैं।
बॉलीवुड को बीते जमाने के सदाबहार गीतों की सुरीली सौगात देने वाले संगीतकार दानसिंह की कहानी भी उनकी फिल्म भूल न जानाजैसी ही है, जिसमें बधाओं की लम्बी रिले रेस चलती है। इस फिल्म की तरह दानसिंह के जीवन का भी गत् 18 जून को अंत हो गया, लेकिन जब तक उनके मधुर सुर फिजां में गूंजते रहेंगे, तब तक वे यादों में जीवित रहेंगे। यूं तो दानसिंह को अमर बनाए रखने के लिए उनके संगीतबद्ध किए शशि कपूर-शर्मिला टैगोर अभिनीत फिल्म माय लवमें ये दोनों गाने ही काफी हैं- वो तेरे प्यार का गम इक बहाना था सनम, अपनी किस्मत ही कुछ ऐसी थी के दिल टूट गया, और जिक्र होता है जब कयामत का, तेरे जलवों की बात होती है, तू जो चाहे तो दिन निकलता है, तू जो चाहे तो रात होती है।ये दोनों गाने मुकेश ने गाए हैं। बहुत कम लोगों को जानकारी होगी कि इस फिल्म में दानसिंह के सहायक के रूप में लक्ष्मीकान्त ने मेन्डोलिन, प्यारेलाल ने वायलिन, पं. शिवकुमार ने संतूर, हरि प्रसाद चौरसिया ने बांसुरी और मनोहरी ने सेक्सोफोन बजाया था।
माय लवके गाने आनंद बख्शी ने लिखे थे। ये उनके  शुरुआती दिन थे। जब छठे दशक के मध्य में माय लवफिल्म बन रही थी, तब दानसिंह इसके निर्माण से जुड़े बी.एन. शर्मा के फ्लैट में उनके साथ रहते थे। बी.एन. शर्मा जयपुर के ही रहने वाले थे। इनके पड़ौस में ही रहते थे गीतकार आनंद बख्शी। उन दिनों आनंद बख्शी की मुफलिसी का अंदाज इससे लगाया जा सकता है कि वे सुबह के कार्यों से निवृत्त होने के लिए रोज दानसिंह जी वाले फ्लैट में टॉयलेट इस्तेमाल करने आते थे। वैसे दानसिंह के भी ये संघर्ष के दिन थे। दानसिंह की किस्मत ही कुछ ऐसी रही कि उनकी फिल्में नहीं चल पाईं, लेकिन गाने खूब चले।
अब उनकी भूल न जानाफिल्म को ही लिजिए, जो रिलीज नहीं हो पाई, लेकिन इसके गाने रिलीज हो गए थे। इसमें गुलजार का लिखा और मुकेश का गाया एक गीत लोग आज भी गुनगुना लेते हैं –
पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो
मुझे तुम से अपनी खबर मिल रही है।
खयालों में तुमने भी देखी तो होंगी
कभी मेरे ख्वाबों की धुंधली लकीरें
तुम्हारी हथेली से मिलती हैं जा कर
मेरे हाथ की ये अधूरी लकीरें
बड़ी सर चढ़ी हैं ये जुल्फें तुम्हारी
ये जुल्फें मेरे बाजुओं में उतारो
पुकारो मुझे नाम ले कर पुकारो
 इस गाने के लिए बनाई दानसिंह की पहली धुन तो मुंबई की माया नगरी में चोरी ही हो गई थी। इसका भी एक दिलचस्प किस्सा है। जब मुकेश यह गीत रिकॉर्ड कराने आए तो धुन सुन कर बोले- इस धुन पर तो मैं अभी एक गीत रिकॉर्ड करा कर आ रहा हूं- तुम्हीं मेरे मंदिर, तुहीं मेरी पूजा…दानसिंह ने कहा-यह धुन वहां कैसे चली गईइस पर मुकेश का जवाब था-दानसिंह जी, यह बंबई है। आप तरल-गरल पाार्टियों मे लोगों को धुन सुना देंगे तो यही होगा। इस पर दानसिंह ने कहा-इससे क्या फर्क पड़ता है? एक घंटे बाद आ जाइये, मैं नई धुन तैयार करता हूं।और उन्होंने पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारोकी जो नई धुन तैयार की वह आज भी यू ट्यूबपर सुनते हुए लोगों को भीतर तक हिला देती है।
दानसिंह के साथ धुन चोरी का यह अकेला वाकया नहीं है। कितने लोगों को मालूम होगा कि इन्दीवर के लिखे सदाबहार गीत चंदन सा बदन चंचल चितवनकी धुन जो लोग आज भी सुनते हैं, वो दानसिंह की बनाई हुई है, लेकिन उन्हें कभी इसका क्रेडिट नहीं मिला। इस बारे में जयपुर में रह रहे भूल न जानाके गीतकार हरिराम आचार्य बताते हैं- ‘‘दानसिंह जी ने  यह धुन इन्दीवर के लिखे इसी गीत पर भूल ना जानाके लिए बनाई थी। इन्दीवर ने भूल न जानाके लिए जब यह गीत लिखा था तो चंदन सा बदनउसके मुखड़े में नहीं, अन्तरे में था। तब इस गाने का इसी धुन पर मुखड़ा यह था-‘‘मतवाले नयन, जैसे नील गगन/पंछी की तरह खो जाऊं मैं’’ बाद में इसी गीत की पंक्तियों को इन्दीवर ने ऊपर नीचे कर के चंदन सा बदनबनाया। इसकी धुन दानसिंह वाली ही है। इसमें यमन-कल्याण के वही सुर हैं, जो दानसिंह जी ने लगाए थे।’’ हरिराम आचार्य पूछने पर आगे बताते हैं-‘‘दरअसल, फिल्म निर्माता जगन शर्मा से इंदीवर ने अनुरोध किया कि सरस्वती चन्द्रफिल्म के लिए कल्याणजी को यह गीत पसंद आ गया है, आप इजाजत दें तो मैं उन्हें दे दूं। उन्होंने इजाजत दे दी। इंदीवर ने शायद गीत के साथ ही धुन भी दे दी’’
वैसे दानसिंह मुझे बातचीत में कई बार यह भी बता चुके हैं कि  फिल्म पूरब पश्चिमके गीत ‘‘कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे’’ की धुन उन्होंने एक पार्टी में एक गीतकार को सुनाई थी और उसने इम्पाला कार की कीमत पर मेरी यह धुन बेच दी। उन दिनों इम्पाला कार के जलवों की चर्चा होती थी। यह बात अलग है कि दानसिंह स्वयं अपने जीवन में कभी कार नहीं खरीद पाए और गुमनामी की जिंदगी जीते हुए साइकिल के पैडलों से ही जयपुर की सड़कें नापते रहे।
बहरहाल, दानसिंह के संगीत निर्देशन में मुकेश, मन

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1 COMMENT

  1. चीनी राष्ट्रपति भारत दौरे पर हैं ऐसे में तो ये पोस्ट और भी कमाल का प्रभाव छोड रही है , कमाल का प्रसंग और सुरूचिपूर्ण लेखन है प्रभात जी ..बहुत बहुत आभार इसे साझा करने के लिए

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