कविता भाषा में अपने होने की जद्दोजहद की पहचान है!

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सविता सिंह की कविताओं का हिंदी में अपना अलग मुकाम है. उनकी कविताओं में गहरी बौद्धिकता को अलग से लक्षित किया जा सकती है. अपनी कविताओं को लेकर, अपने कविता कर्म को लेकर, स्त्री कविता को लेकर उनका यह जरूरी लेख पढ़ा तो मन हुआ कि साझा किया जाए आपसे- प्रभात रंजन 
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हम जिस समय में अब रहते हैं, वह कतई वह नहीं, जिसमें हम रहते थे, या वे लोग जिन्हें हम प्रेम करते थे या फिर जिनसे हमारे मतभेद होते थे। वह एक वर्तुल समय था जिसमें समय के एक छोर का दूसरे छोर से रिश्ता था। हमारे अनुभवों में भी चीजें तब वैसे ही अवस्थित थीं- भूत, वर्तमान और भविष्य एक दूसरे को छूते हुए, एक दूसरे का विस्तार थे जैसे।

अब हमारा समय एक खंडित समय है। हमारे अनुभव में भिन्नता का अब एक मानीखेज दखल है। एक स्त्री अब यह पूछती हुई नहीं हिचकिचाती- मैं किसकी औरत हूं?’ यह मेरी एक कविता का शीर्षक भी है जो मेरे पहले संग्रह अपने जैसा जीवन’  में  आत्मा सरीखी कविता की तरह संग्रहित है। यह समय को खंडित करती हुई कविता है। हमारा भारतीय समय जिसका अर्थ यहां इतिहास और परंपरा से है, उसे भी मरोड़ती हुई कविता! पितृसत्तात्मक समय से मुठभेड़ है उस कविता में। इस प्रक्रिया के दौरान एक नई स्त्री समय के एक खंड को लेकर उदित होती है। यह स्त्री लिखती है, उसका शब्दों के साथ बिलकुल ही नया रिश्ता है। यह अपने इतिहास में अपने को खोजने बिलकुल नई जगह जाती है। इससे वह चाहती है कि उसका होना और लिखना तय हो।

अक्सर अपने होने, जैसी हूं, वैसी होने पर सोचती हूं। मेरा खयाल है कि सारे प्रबुद्धजन ऐसा सोचते हैं। सबके अपने ढंग भी होंगे, अपने अनुभवों की झीनी चादर को वे भी परखते होंगे। उन इलाकों में जाते होंगे जहां वे भटके होंगे, जैसे मैं अपने होने में अपने कवि होने को लेकर अक्सर ऐसी स्थिति में रहती हूं। विस्मित भी होती हूं। सुबह-सुबह कमरे में आई धूप को लेकर जैसे हर बार विस्मय होता है, या फिर किसी चिड़िया को अपनी डाल पर चिंतामग्न बैठे देख जीवन  को लेकर होता है, वैसी ही इन सबके बारे में व्यापक ढंग से सोचते हुए लिखने से होता है।

प्रत्यक्षतः लिखना तो एक कर्म है, लेकिन वह अपने होने कीजमीन से ही निःसृत होता है- यह बात लिखने और सोचने दोनों को ही और गाढ़ा कर देता  है। उस हद तक कविता भी इसी गंभीरता से रचे जाने को विवश करती है। बल्कि एक कविता जो मेरे तीसरे कविता संग्रह स्वप्न समयमें अभी कहां हूंशीर्षक से छपी है, वह इस स्थिति को कुछ हद तक उजागर करती हैः अभी जहां हूं/ स्वप्न और यथार्थ का इलाका/ जहां अपना होना ही विचलित करता है/ जहां मेरे साथ सिर्फ एक किताब है जीवन की/ और उसमें कुछ बाद के पन्ने/ थोड़ी हवा भी है उड़ाती-पड़ाती इनको/ एक साथ जैसे हों कई-कई जीवन फड़फड़ाते।अपने स्त्री होने और कविता लिखने की बात तो जैसे और भी जटिल ढंग से प्रस्तुत होती रहती है। कविता किस हद तक मुझे स्त्री बनाती है, किस हद तक बन चुकी स्त्री को बदलती है- ये सवाल सदा मुझे घेरे रहते हैं। इनका समाधान अपनी कविताओं में ही ढूंढने की कोशिश करती हूं। ढेर सारी कविताएं मैने अपनी कविताओं से बातचीत करती हुए लिखी हैं।

अपने जैसा जीवनमें शायद यह आंतरिक विचलन कम है। लेकिन नींद थी और रात थीसे लेकर स्वप्न समयतक आते-आते कविता मेरी वासना बन चुकी थी। और हिंदी भाषा को भी वैसी ही देह में घुमड़ती अपनी ही वासनाजैसी गुप्त अनुभूति में बदल चुकी थी। नतीजतन, मैने अपनी भाषा पर भी कविताएं लिखीं- शायद मैं एक स्त्री भाषा की खोज में रहने लगी थी। जो मुझे कहनाथा, वह मेरे होने से ही जुड़ा था जिसके लिए एक अलग किस्म की जमीन चाहिए थी। हिंदी मेरी भाषाजो स्वप्न समयके बाद संवेदमें छपी, आधुनिक हिंदी भाषा के आसपास देखती-सी कविता है। क्योंकि उसने कई और भाषाओं को खुद में कई धाराओं की तरह प्रवहमान पाया। उर्दू मेरी भाषाकविता शायद यहीं से  उपजी, जिसे आने वाले संग्रह में जगह मिलेगी। भाषाएं कविता की जमीन ही नहीं, आत्मा होती हैं। जिनकी खोज मनुष्य हमेशा से करता आया है- अपने होने के सवाल से जूझता हुआ। स्त्री भाषा को कविता विशेष रूप से उपयुक्त बनाती है अपने नैसर्गिक वासना के कारण। इसलिए उसकी कविता अपने ढंग की होती है- अनुभवों के संसार में एक बयार-सी, स्त्री भाषा उसकी कविता को स्त्री कविता तो बनाती ही है, उसके अपने होनेके रहस्य को भी धीरे से  उसे समझा देती है। कवितास्त्री की संपत्ति के रूप में कभी संचित नहीं होती, न उसकी कलम वह औजार बनती है जिससे सिर्फ शक्ति अर्जित की जाए- वह इस लैंगिक औजार को बदल देती है सृजन के वैसे उपकरण में जिससे उसकी अपनी दुनिया अनगिनत रूप ग्रहण करने लगती है। स्याही के साथ एक बहता हुआ संसार बनने लगता है। वह इसे अपने हर महीने बहने वाले खून की तरह लेती है, जिसमें प्रजनन की अपार संभावना होती है।

हम जानते हैं कि कभी एक मनुष्य दूसरे की तरह नहीं होता, जिसे वह पैदा करती है। इतनी भिन्नता वह बार-बार सृजित करती है कि यदि इसी पर गौर करें, तो यह दुनिया बदलती-सी लगने लगती। अपने होनेमें कुछ भी नहीं, उस जैसा इस पृथ्वी पर, इसलिए यह सवाल महत्व का है उसके लिए- कविता का महत्व क्या है। वह क्यों लिखती है और उसे अपने होने का आभास इस कर्म से क्यों होता है। इस विषय पर विचार करती हुई फ्रेंच नारीवादी चिंतकों ने बहुत ही मौलिक काम किया है। मैं जुलिया क्रिस्टेवा तथा हेलेने सिक्सूस के लेखन को बहुत रुचि से पढ़ती हूं। मुझे लगता है कि उन्होंने एक नई दुनिया बनाई है, जिसमें लिखना होने का पर्याय बन चुका है, जिसमें टेक्स्ट ही पूरी दुनिया है और जिसमें दो ही चीजें बची रह गई हैं – एक तो टेक्स्ट, दूसरा पाठक। अपने पुराने रूपों में न तो स्त्री बची है और न ही पुरुष।  बल्कि उनकी लैंगिकता की शिनाख्त अब मुश्किल ही है। वे दोनों ही आपसी द्वंद्वों से उबर चुके हैं। सिक्सूस के यहां यह द्वंद्व स्त्री के भीतर ही समाप्त होता है। जब वह यह महसूस करती है कि जो पुरुष उसके भीतर है, उसे आत्मसात् करना ज्यादा आसान है, बनिस्बत उसके जिसे समाज गढ़ता है। जिस तरह से पुरुषार्थ (मैस्कुलिनिटी) की रचना होती है पितृसत्तामक समाजों में, वह उसे खून-खून किए रहता है। और उसे इस कदर स्त्री विरोधी बना दिया जाता है कि वह हमेशा स्त्री के दमन की सरंचनाओं को तैयार करने में ही लगा रहता है। जिस कारण स्त्री का उसके साथ तारतम्य बैठाना दूभर हो जाता है। स्त्री पुरुष दोनों के भीतर पुरुष और स्त्री अपने आदिम रूपों में विद्यमान रहते हैं। हम सभी लोग द्विलैंगिक अस्मिताओं वाले हैं और हमारे बीच निर्विवाद रूप से आनंद की एक गहरी नदी है, जिसमें अपनी भाषा की नाव के जरिए हम उतर सकते हैं। आनंद का यह द्रव्य स्त्री के लिए अपार संभावनाएं संजोए हुए है जिसमें वह अपने कितने ही रूप पा सकती है या सहजता से उन्हें त्याग सकती है। स्त्री कविता इसी संभावना को पाने का नाम है। स्त्री के होने का अर्थ वह नदी होना है जो अप्रतिम ढंग से आईने की तरह उसके अनगिनत रूप दिखा सके.   स्त्री का अपने इन अनगिनत रूपों को पाना, भाषा में जाना और भटकना और इसके आलोक में कविता को गढ़ना ही कवि कर्म है। इस अर्थ में स्त्री होना, ‘कवि होनाया फिर एक टेक्स्टहोना आपस में मिले-जुले मसले हैं जिन्हें समझना आनंद की अवस्था में जाना है। स्त्री होना और कविता होना किस पल एक-सा अनुभव हो जाए इसका इंतजार हर स्त्री कवि को करना ही होगा, ताकि वह अपने समय को गहनता से जी सके। स्त्री होना एक गहन अनुभव है और स्त्री कविहोना गहनतम। स्त्री कविता को पढ़ने में इसलिए जल्दबाजी नहीं बरतनी चाहिए।

इस समय में, यानी स्त्री समय में भाषा हमेशा धीरज और उदारता चाहती है क्योंकि कुछ बहुत सुन्दर रचा जाना है. भाषा में स्त्री और कविता दोनों अपने को बदलते हुए नए ढंग से पा सकते हैं. यहं पुरुष से कोई अपेक्षा नहीं, शब्दों से है. 
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