‘हाफ गर्लफ्रेंड’ से क्या सीख मिलती है?

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चेतन भगत ने एक बड़ा काम यह किया है कि उसने ऐसे दौर में जबकि पढना लोगों की जीवन शैली से से दूर होता जा रहा है, पढने को फैशन से जोड़ा है, उसकी पहुँच बढ़ाई है, उसका दायरा बढ़ाया है. हम अक्सर उसके लेखन की आलोचना करते हुए इस सकारात्मक पहलू को भूल जाते हैं, उसे नजरंदाज कर देते हैं. मेरा मानना है कि जैसे चेतन भगत को पढना फैशन का हिस्सा बना है उसी तरह उसकी आलोचना करना भी. अभी हाल में ही मैंने बैंगलोर में देखा कि एक माँ अपने स्कूल जाने वाले बेटे को चिढाते हुए अंग्रेजी में कह रही थी कि ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ नहीं पढोगे और वह बच्चा मुँह बिचका रहा था. बहरहाल, यह मुझे याद आया पुणे डीपीएस में कक्षा सात में पढने वाले अमृत रंजन की इस रिव्यू को पढ़कर. इतनी अच्छी हिंदी कि रश्क होता है. यकीन मानिए मुझे भाषा तक दुरुस्त नहीं करनी पड़ी. जी, चेतन भगत के नए उपन्यास ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ की रिव्यू. पढ़िए- प्रभात रंजन 
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यह मेरी पहली चेतन भगत की किताब थी और शायद यह आख़िरी भी होगी। चेतन भगत, मैं आपकी बुराई या कुछ, नहीं कर रहा लेकिन इस किताब की कहानी क्या है? एक लड़का था माधव, एक लड़की थी रिया। माधव को दोस्ती से बढ़कर कुछ और चाहिए था। लेकिन रिया बस एक दोस्त बनना चाहती थी। मुझे पूरी किताब पढ़ते हुए लगा कि सर चेतन भगत इस कहानी को बस खींचते जा रहे हैं। कहानी के मसाले में उपन्यास।
मैं जब किताब के बीच में था, तो एक स्थान आया जहाँ सर चेतन भगत ने अपनी ही तारीफ़ की है, यह उन्होंने तब किया जब रिया माधव को अंग्रेज़ी सीखने के गुर बता रही थी। उन्होंने रिया से बुलवाया कि उसे अंग्रेज़ी की आसान किताबें पढ़नी चाहिए जैसे कि लेखक चेतन भगत की किताबें। मुझे इस बात पर बहुत हंसी आई, ख़ुद की किताब में अपने ढोल। वह अपने नाम की जगह अर्नेस्ट हेमिंग्वे या चार्ल्स डिकैन्स या किसी का नाम ले सकते थे। मुझे एक बात इस किताब में बहुत बुरी लगी। लड़का अंग्रेजी नहीं जानता, हिन्दी में बात करता है। इस बात में क्या ख़राबी है? उसके दिल को, उसकी भाषा को, सब वह लड़की बदल देती है। चेतन भगत को हिन्दी की तरफ अपनी नाव की दिशा खींचनी चाहिए थी। हाँ मैं मानता हूँ कि अंग्रेज़ी लेखक हैं लेकिन फिर भी, भारतीय हैं। जो चेतन भगत के प्रशंसक हैं, माफ़ कीजिएगा। अब किताब की अच्छी बातों पर आता हूँ। माधव के दोस्त जो उसे सलाह देते हैं वह मुझे बहुत सच्चीलगी। मेरे दोस्त भी मुझे ऐसी ही सलाह देते हैं जिससे मैं हमेशा प्रिंसिपल की ऑफ़िस के सामने खड़ा रहता हूँ।
माधव बिहार का एक सीधा-सादा लड़का है जो बस पढ़ने आया था। लेकिन पहले ही दिन उसकी नज़र एक ख़ूबसूरत लड़की पर पड़ी और वह उसपर फ़िदा हो गया। एक दिन उस लड़की को माधव अपने हॉस्टल में ले आया। उसने यह बात अपने दोस्तों को बताई और वे उससे सवाल पूछने लगे कि उसने उस लड़की के साथ क्या-क्या किया। इसी से सारी कहानी शुरू हुई और ख़तम उस दिन हुई जब रिया के साथ वह कुछ करना चाहता था और रिया ने मना कर दिया और माधव ने गुस्से में आकर कहा, “देती है तो दे वरना कट ले।” उस दिन के बाद उनका रिश्ता टूट गया। रिया की शादी ज़ल्दी हो जाती है, न चाहते हुए भी उसे लंदन के रोहन से शादी करनी पड़ती है जो रिया को बहुत सताता है। उधर अकेला माधव बस पढ़ाई करता रह गया।
अमृत रंजन
कहानी का दूसरा हिस्सा माधव के बिहार लौटने का है। अपनी माँ के कारण वह बिहार लौटता है। फिर स्कूल में ट्वायलेट फैसिलिटी के लिए गेट्स फाउंडेशन को बुलाता है। कहानी में शौचालय पर जो़र कुछ ज़्यादा ही दिखता है, पता नहीं क्यों? और उस फंक्शन में बोलने के लिए अंग्रेज़ी सीखने पटना जाता है। जहाँ उसका सामना रिया से होता है। माधव की फिर वही कोशिश कि किसी तरह वह रिया को हासिल कर ले। दिल्ली-बिहार के बाद अमेरिका भी कहानी में आता है। आखिर में मुझे वह स्थान अच्छा लगा जहाँ रिया और माधव की शादी हो जाती है और उनका एक बेटा होता है। माधव और रिया उसे बास्केटबॉल खेलना सिखा रहे होते हैं। उनका बेटा बहुत कोशिश करता है और आख़िर में हार मान जाता है। लेकिन माधव उसे कहता है कि सफल होते रहने के लिए लगातार कोशिश करना होता है। मुझे एक बात समझ नहीं आई। इस किताब से क्या सीख मिलती है? कोशिश करते रहना, लेकिन माधव ने किस चीज़ की कोशिश की। इस बात को अपने मन में दोहरा कर देखिए।
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किताब का नाम – हाफ़ गर्लफ़्रैंड
लेखक – चेतन भगत
भाषा – अंग्रेज़ी
प्रकाशक – रूपा पब्लिकेशन्स
पेपरबैक संस्करण
पृष्ठ – 260
मूल्य – 176

5 COMMENTS

  1. हाफ गर्लफ्रेंड में तो सीखने के लिए कुछ भी नहीं है लेकिन ऊपर लिखे विचारों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है . मेरी शुभकामनाएं है अमृत के साथ.

  2. सर किताब इतनी बुरी भी नहीं है |बेचारा लेखक नई नई कहानी कहाँ से लाए |

  3. मैं अापसे पूरी सहमत हूँ। मैंने जब उनके एक उपन्यास पर बने घटिया फ़िल्म थ्री इडियट्स देखी तो उस नाम की तरफ़ देखना बंद कर दिया। गुलशन नंदा शायद बेहतर होंगे।

  4. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (10.10.2014) को "उपासना में वासना" (चर्चा अंक-1762)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।दुर्गापूजा की हार्दिक शुभकामनायें।

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