‘समन्वय’ की शुरुआत पर कुछ बातें पॉपुलर पॉपुलर!

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आज से इण्डिया हैबिटेट सेंटर के भारतीय भाषा फेस्टिवल ‘समन्वय’ के चौथे सत्र का शुभारम्भ हो रहा है. इस बार ‘समन्वय’ का पहला ही सत्र (कल 2 बजे दोपहर) ‘पल्प-गल्प’ यानी हिंदी के नए लोकप्रिय लेखन को लेकर है. इससे यह समझ में आता है कि हिदी में नए ढंग का पॉपुलर आज चर्चा के केंद्र में है. उसको महत्व मिलने लगा है. उत्साहित हूँ कि उसमें भाग लेना है.

मुझे कुछ बातें याद आ रही हैं. मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास ‘कुरु कुरु स्वाहा’ के कथानायक की आकांक्षा है कि एक ठो वेस्टलैंड और एक ठो वार एंड पीस लिख जाएँ. वे हिंदी का एक ‘क्लास’ बनाना चाहते थे. आज लेखकों की सबसे बड़ी आकांक्षा है कि एक ठो बेस्टसेलर लिख जाएँ. यह एक बहुत बड़ा बदलाव है जिसे समझने की जरुरत है. अगर बिकना ही पैमाना बन गया तो न तो यह क्लास बचा रह पायेगा मुझे इसमें संदेह है.

दूसरा प्रसंग मुझे याद आता है महान लोकप्रिय उपन्यासकार ओम प्रकाश शर्मा से जुड़ा हुआ. वे दिल्ली के बिड़ला मिल में मजदूरी करते थे. कम्युनिस्ट पार्टी के चवनिया मेंबर थे. कुछ कविता-शविता भी करते थे. उनको यह महसूस हुआ कि उनके जैसे मजदूरों के मनोरंजन के लिए कोई सस्ता विकल्प नहीं है. उन्होंने तय किया कि वे मजदूरों के मनोरंजन के लिए ‘सस्ता’ साहित्य लिखेंगे. मरने से पहले उन्होंने 300 से अधिक उपन्यास लिखे. वे साहित्य को ‘मास’ तक पहुंचाना चाहते थे.

बरसों तक क्लास और मास का यह द्वंद्व चलता रहा. कुछ किताबें लाखों छपती रही, बिकती रही. गाँव देहातों तक की जनता उनको पढ़ती रही, दूसरी तरह प्रेमचंद और रेणु की परंपरा को बढाने वाले लेखक थे जिनकी किताबें भले लाखों में न बिकती रही हों लेकिन बड़े बड़े ईनाम-इकराम उनके नाम होते रहे, पुस्तकालयों में उनकी किताबें थाक के थाक जमा होती रही. मास वाले रोज लिखते रहे रोज मरते रहे क्लास वाले अमर होते रहे.

हिंदी में यह दो तरह का पाठक वर्ग हमेशा से रहा है. याद कीजिए जब प्रेमचंद थे तब इब्ने सफी भी थे. लेकिन दोनों दुनियाएं समानांतर थी. उनकी आपसी टकराहट नहीं होती थी. लेकिन कमबख्त जबसे लेखकों को बेस्टसेलर लिखने की धुन सवार हुई है तब से दशकों पुराना यह भेद मिटता दिखाई दे रहा है. आज क्लास के लिए लिखने वाले लेखकों में भी बिकने की चाह बलवती हुई है. एक लेखक के तौर पर मुझे इसमें कोई बुराई नहीं दिखती कि लेखक अपने लेखन के बल पर आत्मनिर्भर हो सके. लिखने में उसका श्रम लगता है, वह उसकी पूँजी होती है उसे उसकी उचित कीमत मिलनी ही चाहिए. लेकिन यह भी सच है कि सब कुछ नहीं बिकता है. सब कुछ बिकने के लिए ही नहीं होता है.
यह अच्छी बात है कि हिन्द युग्म जैसे प्रकाशक हिंदी में आये हैं जो नए काट के लेखकों को लेकर आये हैं. उनकी किताबें 500-1000 भी बिकती हैं कि बेस्टसेलर का हल्ला मचने लगता है. यह घालमेल समझने की जरुरत है. हिंदी में लोकप्रिय साहित्य का हमेशा से बड़ा बाजार रहा है. वहां 500-1000 का टोटा नहीं रहा है.  

हो यह रहा है कि नए ढंग के पाठक बनाने के फेर में हम उन लाखों पाठकों की तरफ नहीं देख रहे हैं जो हिंदी प्रदेशों के गाँवों-कस्बों में नव साक्षर बनते हैं और पढने के लिए कुछ ढूंढते हैं, उनको अपने कस्बे के अखबार के अलावा कोई विकल्प नहीं दीखता है. अकारण नहीं है कि हिंदी प्रदेशों में अखबारों की बिक्री बढ़ रही है.

अगर हम यह समझते हैं कि थोड़े बहुत अंग्रेजीदां मुन्ने-मुन्नी हिंदी की किताबें पढने लगेंगे, खरीदने लगेंगे तो हिंदी लोकप्रिय होगी. यह ग़लतफ़हमी है. हिंदी में इस वर्ग के लिए किताबों की जरुरत नहीं है जो अपने दोस्तों अपनी कंपनी के पाठकों के सहारे खड़ा होने की कोशिश में है बल्कि उस वर्ग तक किताबों को पहुंचाने की है जो बरसों से गुलशन नंदा, वेद प्रकाश शर्मा, सुरेन्द्र मोहन पाठक जैसे लेखकों के सहारे खड़ा रहा है. मैं फिर कहना चाहता हूँ हिंदी में पाठकों का टोटा कभी नहीं रहा है उन तक पहुँच पाने का टोटा रहा है. हम उस तंत्र को खोते चले गए हैं जो वहां भी किताबें पहुच्न्हा देती थी जहाँ बिजली-सड़क ठीक से नहीं होती थी.

आज कुछ प्रकाशक साहित्यिक क्लास के बरक्स एक पॉपुलर क्लास खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं. मैं इसको संदेह की नजर से देखता हूँ. मुझे दुःख इस बात का है कि हम हिंदी में चेतन भगत तो खोजने, बनाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन हम गुलशन नंदा, ओम प्रकाश शर्मा या वेद प्रकाश शर्मा बनाने, खोजने की कोशिश नहीं कर रहे हैं. वही वेद प्रकाश शर्मा, जिसके शहर मेरठ पहुँचकर जिनसे मिलकर आमिर खान अपने एक फिल्म का प्रचार शुरू करते हैं. हिंदी को आज चेतन भगत की नहीं वेद प्रकाश शर्मा की जरूरत है जिसका उपन्यास ‘वर्दी वाला गुंडा’ 8 करोड़ से अधिक बिक चुका है. और एक जमाने में जिसने देश में किताबों की लोकप्रियता के मायने समझाए थे.

हिंदी में वही लेखन लोकप्रिय होगा जो उसकी जरूरतों, उसकी रुचियों के अनुकूल होगा. किताबों की दुनिया टीवी की दुनिया नहीं है जहाँ दर्शक विकल्पहीनता की स्थिति में होता है. पाठकों के पास विकल्प होते हैं. जब तक हम छोटे शहरों के हिंदी पाठकों को ध्यान में रखते हुए पॉपुलर नहीं लिखेंगे तब तक हिंदी के नए ढंग का लोकप्रिय साहित्य सचमुच में लोकप्रिय होगा मुझे इसमें संदेह लगता है.
प्रभात रंजन 

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