‘बनारस टॉकीज’ का एक ट्रेलर

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हिन्द युग्म प्रकाशन ने हिंदी में अलग ढंग की किताबें छापकर एक नई शुरुआत की. लेखकों और पाठकों के बीच के खोये हुए रिश्तों को जोड़ने का उनका प्रयास सफल रहा. इस प्रकाशन की अगली किताब है ‘बनारस टॉकीज’. लेखक हैं सत्य व्यास. उसी पुस्तक का एक रोचक अंश- मॉडरेटर 
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ये भगवानदास है बाउ साहब। भगवानदास होस्टल। समय की मार और अंग्रेजी के भार से, जब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय सिमटकर B.H.U. हुआ; ठीक उसी समय भगवानदास होस्टलसिमटकर B.D. होस्टल हो गया। समय की मार ने इसके नेम में कटौती भले ही की हो; इसके फ़ेम में कटौती नहीं कर पाई। इसके 120 कमरे में 240 “बी॰डी॰जीवीआज भी सोये हैं।
क्या!! बी॰डी॰जीवी कौन-सा शब्द है?”
इसीलिये कहते हैं बाउ साहब कि जरा इधर-उधर भी देखा कीजिये! होस्टल में घुसने से पहले जो बरगद है ना; उस पर का Graffiti पढ़िये। जिसपर लिखा है-
कृपया बुद्धिजीवी कहकर अपमान न करें। यहाँ बी.डी.जीवी रहते हैं।
अब आप पूछेंगे कि ये बी.डी.जीवी क्या बला हैं? रूम नम्बर-73 में जाइये और जाकर पूछिये कि भगवानदास कौन थे? जवाब मिलेगा-घंटा!!ये हैं जयवर्धन जी।” ‘लेक्चर – घंटा, लेक्चरर – घंटा, भगवान – घंटा, भगवानदास घंटा। सबकुछ घंटे पर रखने के बावजूद, इतने नम्बर तो ले ही आते है कि पढ़ाकुओं और प्रोफेसरों के आंख की किरकिरी बने रहते हैं। ग़लत कहते हैं कहनेवाले, कि दुनिया किसी त्रिशूल पर टिकी है। यह दरअसल जयवर्धन शर्मा के घंटेपर टिकी है; और वो ख़ुद अपनी कहावतों पर टिके हैं। हर बहस की शुरुआत और अंत एक कहावत के साथ कर सकते हैं।
आगे बढ़िये तो रूम नम्बर-79 से धुँआ निकलता दिखाई देगा। अरे भाई, डरिये मत! आग नहीं लगा है। भगवानदास के एकमात्र विदेशी छात्र अनुराग डेफूँक रहे होंगे। अब ये विदेशीऐसे हैं कि इनके पुरखे बांग्लादेशी थे; लेकिन अब दो पुश्तों से मुगलसराय में पेशेवर हैं। अरे…!! पेशेवर मतलब- पेशेवर वकील बाउ साहब!आप भी उलटा दिमाग़ दौड़ाने लगते हैं! ख़ैर, एक बात और जान लीजिये कि ये बंगाली होने के कारण पूरे भगवानदास के दादाहैं। कुछ जूनियर्स के तो दादा भइयाभी हैं। ससुर टोला भर का सब बात क़्रिकेटे में करते हैं और क्रिकेट के क्या कहा जाता है….Encyclopedia हैं –
अगर फ़लाना प्रोफ़ेसर सचिन के फ़्लो में पढ़ाता, तब बात बनती।
अरे! साला का लेक्चर है कि गार्नर का बाउंसर है?”
लड़की देखी नहीं बे! साला ग्लांसे मार लेती।
पिंच-हिटिंग और हार्ड-हिटिंग के अंतर पर घंटा भर लेक्चर दे सकते हैं। मार्क ग्रेटबैच को फ़ादर ऑफ पिंच हिटिंगका ख़िताब इन्हीं का दिया हुआ है। डकवर्थ-लुईस मेथड का द विंची कोडदेश भर में सिर्फ़ अनुराग डे समझते हैं। 1987 वर्ल्ड कप के सेमीफ़ाइनल में जब फ़िलिप डेफ्रिटस के पहले ही ओवर में सुनील गावस्कर बोल्ड हो गए तो 6 साल के अनुराग डे चिल्लाने लगे- Fix है! Fix है!  उनके पिताजी को लगा कि बेटा चिल्ला रहा है- Six है! Six है! काश! पिताजी उस दिन समझ गए होते! पिताजी की नासमझी से मैच फिक्सिंग जैसा अपराध फैल गया।
 “अच्छा, अच्छा… आपको क्रिकेट में इंटरेस्ट नहीं है!” Girls Hostel में तो है ना? तो रूम नम्बर-79 में ही अनुराग डे के रूम पार्टनर सूरजसे मिलिये। हालाँकि, इनके क्या, इनके बाप के नाम से भी पता नहीं चलता कि वो ब्राह्मण है; लेकिन जानकारों की कमी, कम-से-कम भगवानदास में तो नहीं ही है। फ़ौरन उनकी सात पीढ़ियों का पता चल गया और वो होस्टल के बाबाहो गये। फ़ैकल्टी में सूरजऔर दोस्तों में बाबा। लड़कियों में विशेष रुचि है बाबा की। B.H.U के girls hostel की पूरी ख़बर रखते हैं बाबा। हर खुली खिड़की पर दस्तक देते हैं। खिड़कियों से झिड़कियाँ मिलने पर उदास नहीं होते; दुगने जोश से अगली लीड की तलाश में लग जाते हैं। शरीफ़ लगने और दिखने की कोशिश करते हैं। और हाँ! दुनिया का सबसे साहसिक कार्य करते हैं… कविताएँ लिखते हैं।
ले बाउ साहब….!!आपको क्या लग रहा है कि भगवानदास में पढ़ाई-लिखाई साढ़े-बाईस है? इसीलिये तो कह रहे है कि पूरी बात सुनिये-
किस तरह से पढ़ना चाहते है?”
रात भर में पढ़ के कलक्टरी करना है? तो दूबे जी को खोजिये। रामप्रताप नारायण दूबे। जितना लम्बा इनका नाम, उतना ही लम्बा इनका चैनल। हर सेमेस्टर से पहले, पेपर आउट होने की पक्की वाली अफ़वाह फैलाते हैं और हर एग्जाम के बाद अपने reliable source को दमपेल गरियाते हैं। रूम नम्बर-85. हाँ! तो रात भर में कलक्टरी करना है तो दूबे जी को धर लीजिये। ज़्यादा खर्चा नहीं होगा; केवल रात भर जागने के लिए चाय पिलाइये; मन हो तो दिलीप के दुकान का ब्रेड-पकोड़ा खिला दीजिये। दूबे जी ऐसा बूटी देंगे कि बस जा के कॉपी पर उगल दिजिये; बस पास… गारंटी।
क्या!! कैसा बूटी?”
अरे! वो उनका  पेटेंट है। कहते हैं कि अगर देश उनसे खरीद ले तो देश का एजुकेशन सिस्टम सुधर जाये। फॉर्मुला वन नाम है उसका। फॉर्मुला वन मतलब – एक चैप्टर पढ़ो और पाँचो सवाल में वही लिखो। और लॉजिक यह कि सवाल तो कुछ भी पूछा जा सकता है; लेकिन इंसान लिखेगा वही, जो उसने पढ़ा है। सो, दूबे जी एक सवाल तैयार करते हैं, और परीक्षा में पाँचों सवाल कर आते हैं।
ओहो! क्याआपको खाली पास नहीं होना है; नॉलेज बटोरना है? अरे! तो पहले बोलते! झुठो में एक कहानी सुन लिये-
जाइये, जाकर ज्वाइन कीजिये राजीव पांडेकी क्लास। रूम नम्बर-86 में चलता है उनका क्लास। पढ़ा तो ऐसा देंगे कि लेक्चरर लोग उंगली चूसने लगेंगे। यूपीएससी के सब attempt ख़त्म हो जाने पर इन्हें कैवल्यकी प्राप्ति हुई और पांडे जी लॉ करने आ गये। खूब पढ़ते हैं और उतना ही लिखते हैं। परीक्षा में अक्सर question इसीलिये छूट जाता है कि उनको पता ही नहीं लग पाता कि कितना लिखें? इसीलिये गलती से भी से उनका नम्बर मत पूछियेगा! खिसिया जाएंगे। परीक्षा हाल में ससुर को खैनी नहीं मिलता है तो लिखिये नहीं पाते है।
और अब, जब पूछ ही लिये हैं, तो सुनिये, ‘पढ़ाईके बारे में बी.डी.जीवीयों के विचार:
अनुराग उर्फ दादा – कीनीया-हॉलैंड मैच (वक़्त की बर्बादी)
राजीव पांडे – A representation or rendering of any object or scene intended, not for exhibition as an original work of art, but for the information, instruction, or assistance of the maker; as, a study of heads or of hands for a figure picture. बाप रे बाप!!!
जयवर्धन- घंटा..!!
सूरज बाबा” – ‘ABCDEFG- A Boy Can Do Everything For Girls.’
दूबे जी सिस्टम के लिये नौकर पैदा करने वाली मशीनरी।
ज्ञान तो बिखरा पड़ा है भगवान दास होस्टल में। बस देखने वाली आंखे चाहियें। आँखें से याद आया-
फ़िल्म देखते हैं बाउ साहेब?”
क्या? क्या कहे? आपके जैसा फ़िल्म का ज्ञान कम ही लोगों को है?”
अच्छा तो बताइये कि डॉली ठाकुरकिस फ़िल्म में पहली बार आई थी?”
क्या…? दस्तूर?”
अरे, बाउ साहेब…!! इसिलिये ना कहते हैं कि डॉली ठाकुर और डॉली मिन्हास में अंतर समझिये और भगवानदास आया-जाया कीजिये।
कमरा नम्बर-88 में नवेन्दु जी से भेंट कीजिये। भंसलिया का फिलिम, हमारा यही भाई एडिट किया था। जब ससुरा, इनका नाम नहीं दिया तो भाई आ गये लॉपढ़ने कि वकील बन के केस करूँगा।देश के हर जिला में इनके एक मौसा जी रहते है। डॉक्टर-मौसा, प्रॉक्टर-मौसा, इलेक्ट्रिशियन-मौसा, पॉलिटिशियन-मौसा। घोड़ा-मौसा, गदहा-मौसा। ख़ैर, मौसा महात्मय छोड़ दें तो भी नवेन्दु जी का महत्व कम नहीं हो जाता। फ़िल्म का ज्ञान तो इतना है कि पाक़ीज़ा पर क़िताब लिख दें। शोले पर तो नवेन्दु जी डाक्टरेट ही हैं। अमिताभ के जींस का नाप, धन्नो का बाप, बुलेट पर कम्पनी का छाप और बसंती के घाघरा का माप तक; सब उनको मालूम है। गब्बरवा, सरईसा खैनी खाता था, वही पहली बार बताए थे। अमिताभ बच्चन को याद नहीं होगा कि कितना फ़िल्म में उनका नाम विजयहै। अमिताभ बोलेंगे – 17, तो नवेन्दु बोलेंगे नहीं सर – 18. आप नि:शब्दको तो भूल ही गये। गदरके एक सीन में सनी देओल के नाक पर मक्खी बैठी तो नवेन्दु जी घोषणा कर दिये कि फ़िल्म ऑस्कर के लिये जाएगी; क्योंकि आदमी को तो कोई भी डायरेक्ट कर सकता है; लेकिन मक्खी को डायरेक्ट करना…बाप रे बाप! क्या डायरेक्शन है! ऐसे ज्ञानी हैं नवेन्दु जी।
अच्छा, तो कहानी में interest आ रहा है? पूरी कहानी सुननी है? तो बैठिये; थोड़ा टाइम लगेगा। पेप्सी और चिप्स मँगवा लीजिये।
अब आपसे क्या छुपाना बाऊ साहब। जब कहानी सुनानी ही है तो कहानी शुरू करने से पहले बता दूँ कि इस कहानी का सूत्रधार मैं हूँ- मैं यानी सूरज। अरे वही! Girl’s hostel and all that. किसी से कहियेगा मत! कसम से, अपना समझ के बता रहे हैं आपको।
तारीख़ी तौर पर बंधी इस कहानी का दौर इक्कीसवीं सदी का पहला दशक है। कहानी उन दिनों शुरू होती है जब तेरह टांगों वाली सरकार जा चुकी थी। सुनामी के लहरों से कहर दिखा दिया था और देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई बम विस्फोटों के बीच जीना सीख रही थी।
लेकिन यह कहानी तो देश के सांस्कृतिक राजधानी की है- बनारस। और बनारस की भी क्या है साहब! यह तो भगवानदास होस्टल की कहानी है; जो बनारस के हृदय बी एच यू का छत्तीसवाँ होस्टल है। वकीलों का होस्टल।
हाँ! तो भगवानदास होस्टल जाने के लिये आपको बनारस चलना होगा। अरे, वहीं है ना- सर्व विद्या की राजधानी। बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी; जिसे आप बी.एच.यू. भी कहते हैं। आइये चलें :
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विवरण :
किताब का नाम : बनारस टॉकीज़ (पेपरबैक, उपन्यास)<

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4 COMMENTS

  1. हंडी का एक चावल बता रहा है कि पूरा भात कम्प्लीट…हिंदी में बहुत दिनों से प्रतीक्षित चेतन भगत का आगवन लगता है हो गया इस बावत भाई सत्य व्यास और हिंदी युग्म का स्वागत किया जाना चाहिए…

  2. रोचक है। किस्‍सागोई की लुप्‍त होती जा रही परंपरा में लिखा गया लगता है।

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