प्रेम खाप के लिए है अभिशाप तो व्यक्ति के लिए अमर फल!

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ऐसा नहीं है कि 2015 के पुस्तक मेले में मुझे सिर्फ रवीश कुमार का ‘इश्क में शहर होना’ ही पसंद आया. दूसरी किताब जिसके ऊपर मन रीझ गया वह है ‘बेदाद-ए-इश्क रुदाद-ए-शादी’. प्रेम विवाह करने वालों की इस अनुभव कथा की पोथी बनाने का यह आइडिया जिसका भी था उसको सलाम. एक लघु प्रकाशन दखल प्रकाशन से आई यह किताब धीरे-धीरे लोगों के जुबान पर चढ़ती जा रही है, मन में घर करती जा रही है. कहने का मतलब है कि इस बार मेला लघु के चढ़ने और दीर्घ के पिटने का रहा. चाहे लघु प्रेम कथा(लप्रेक) हो या लघु प्रकाशन से आई यह किताब. इसी किताब से आज पढ़िए हमारी आपकी प्रिय सुमन केशरी की यह आत्म प्रेमकहानी- प्रभात रंजन 
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कबिरा यह घर प्रेम का खाला का घर नाहिं
कबिरा यह घर प्रेम का खाला का घर नाहिं
सीस उतारे भुँई धरे, तब बैठें घर माहिं ॥

“प्रेम” एक ऐसा शब्द जो मन में आते ही ऐसी स्फुरण पैदा करता है कि तन भी उसकी झकझोर से बच नहीं पाता।

प्रेम कहते ही ढाई आखर याद आना वैसा ही सहज है जैसा कि भूख-प्यास लगना, धूप से उजास होना।

किंतु सैकड़ों सालों से कहा जाता रहा है पदों, गीतों, लोक-कथाओं शेरों-गज़लों और कहावतो- मुहावरों- सभी के सहारे कि प्रेम करना इतना आसान-सहज नहीं, वो तो आग का दरिया और डूब के जाना है।
प्रेम कहते ही हमारा ध्यान उस संबंध की ओर ही जाता है, जिसे घर-परिवार और समाज की सहज मान्यता प्राप्त नहीं है…यानी वह संबंध जिसे एक “व्यक्ति” ‘सचेत भाव से जानता-बूझता’  दूसरे “व्यक्ति” से बनाता है और उस बनाए गए संबंध में उन दोनों के देश, जाति, धर्म, भाषा, वर्ग आदि का कोई विशेष महत्व नहीं होता। वह एक धरातल पर पहले-पहल मन का मन से मेल होता है। और चूंकि वह दो व्यक्तियों की रजामंदी पर निर्भर है इसीलिए उसकी मुखाल्फत वे सब सत्ताएं करती हैं, जो किसी भी तरह की यथास्थितिवादिता को बनाए रखना चाहती हैं।

प्रेम में आखिर ऐसा क्या है कि वह बीज-सा रहता सभी के मन में है, पर उसके पनपने से घर-समाज-संसार ऐसे घबराता है मानो प्रेम एक भाव न होकर प्लेग जैसी कोई महामारी हो!

स्त्री-पुरूष का प्रेम या व्यापकतर धरातल पर कहें तो जीवन-साथी स्वयं ही खोजने-पाने के उद्यम में जुटा कोई भी प्रेम ही वह प्रेम है, जिसके मार्ग की कठिनाइयों का जिक्र ऊपर किया गया है। डॉ.राम मनोहर लोहिया की इस बात के गहरे निहितार्थ हैं  कि ‘प्रेम विवाह, जातिप्रथा की विकृतियों और विवाह संस्था में निहित स्त्री-पुरूष की गैर-बराबरी को दूर कर सकता है।

दरअसल प्रायः विवाह को जीवन की पूर्णता का द्योतक मान लिया जाता है। चूंकि प्रजनन का संबंध अधिकांशतः विवाह-संस्था से ही जुड़ा हुआ है इसीलिए मनुष्य की सहजवृत्ति यही होती है कि केवल संतति ही नहीं वरन् जीवन जीने की पद्धति, आचार-विचार, संस्कार भी निरंतरता को प्राप्त हों। अन्य सामाजिक- आर्थिक बातों के साथ साथ मेरेबाद मेरीऔर मेरे पूर्वजोंकी स्मृति को, जीवन शैली को  बचा रखने की लिप्सा ने भी स्त्री-पुरूष के सहज समागम को संस्थाबद्ध करके विवाह-संस्था को जन्म दिया है। और यही वो वासना है जिसके चलते देश, प्रांत, धर्म, जाति, कुल, नीति-रीति और लिंग के इर्द-गिर्द  ढेरों-ढेर लक्ष्मण रेखाएँ खींच दी गईं हैं।

चूंकि यह पितृसत्तात्मक समाज है इसीलिए पुरूष वर्चस्व को बनाए रखने के लिए भी यह जरूरी है कि स्त्री-पुरूष के बीच की दूरी बनी रहे। यदि वे एक दूसरे को मित्रवत् बराबरी से विवाह के पहले ही जान लें तो चल चुका पुरूष का शासन ! विवाह तय करते समय पुरूष का उम्र में बड़ा होना भी इसी बात का द्योतक है कि वह अपनी वरीयता बनाए रखे, आदेश दे सके, स्त्री को वश में कर सके। अपने संस्थागत रूप में विवाह, दंपति को समाज और परिवार के अनुरूप गढ़ता है और व्यक्तिगत रूप में वह स्त्री को पुरूष के मनोनुकूल ढालने का प्रयास करता है। लड़की विवाह के बाद अपने मित्रों और अपने निजी जीवन से इतनी सहजता से काट दी जाती है कि उसे पता ही नहीं चलता कि उसका कुछ निजी भी होता है या होता था। उसके लिए विवाह एक पैकेज की तरह होता है। 
  
किंतु यही विवाह अगर प्रेम विवाह हो तो?

तो प्रेम-विवाह से पहले ही स्त्री-पुरूष एक दूसरे को जानने लगते हैं। वे एक दूसरे की पसंद-नापसंद, जीवन, सपने ,बच्चे व कैरियर आदि के प्रति सचेत होते हैं। स्त्री के लिए पुरूष प्रेमी होता है, देवता नहीं क्योंकि वे बराबर के दोस्त की तरह हँस-खेल चुके हैं या हँस-खेल रहे हैं। वहीं पुरूष के लिए भी स्त्री किसी दूसरे ग्रह की प्राणी नहीं होती, उसी की तरह की हाड़-माँस की बनी होती है। उसकी भी आकांक्षाएँ होती हैं और सपने भी, जो जरूरी नहीं घर के इर्द-गिर्द हों। यह इसलिए कि अधिकांश  प्रेम स्कूल, कॉलेजों, कार्यस्थलों आदि में पनपते हैं। ये अक्सर दोस्तियाँ होती हैं, जो प्रेम में बदल जाती हैं और जीवन-मरण का प्रश्न बन जाती हैं।

इस तरह, प्रेम में वह ताकत है कि वह सामने वाले बराबर ला खड़ा करता है या फिर अपना सर ऊँचा करके आँखों में आँखें डाल कर बात करने का साहस पैदा करता है। और इसीलिए प्रेम के प्रति समाज में इतनी विरक्ति, इतनी घृणा है।

और जो संबंध जाति- धर्म के बंधनों को तोड़े, ऊँच-नीच की मर्यादाओं को धता बताए उसे समाज की यथास्थितिवादी ताकतें कैसे बरदाश्त कर सकती हैं। इसीलिए आमतौर से ऐसी सोच का निर्माण किया जाता है और अक्सर प्रेमविवाह के बारे में कयास लगाया जाता है कि यह विवाह चलेगा नहीं। यह इसलिए कि प्रेम किया जाता है बराबरी के स्तर पर और उसके विवाह में परिणत होते ही स्त्री या पुरूष किसी की भी ओर से, वैसे अधिकांशतः पुरूष की ओर से, वह संबंध संस्थागत दायरे में बंधना चाहने लगता है। पुरूष  पतिदेव बन जाता है और तद्नुरूप व्यवहार करने लगता है। स्त्री के लिए यह बदलाव तोड़ देने वाला होता है। वह खुद को धोखा खाई “व्यक्ति” के तौर पर देखती है क्योंकि अभी तक तो स्त्री-पुरूष होते हुए भी वे दोनों बराबरी पर खड़े थे और अचानक पति पुरूष भर बन जाता है और उसकी मांगे प्रेमी पुरूष की मांगे न होकर पति पुरूष की मांगे बन जाती हैं और वह प्रेमिका को पत्नी केवल पत्नी के तौर पर देखना चाहता है- बरतना चाहता है। और शुरू हो जाती हैं टकराहटें, सारे कयासों को सही करती हुई। चूंकि यह विवाह प्रेम-विवाह है अतः अधिकांशतः दोनों के घर वालों की तरफ से कुछ ऐसा भाव होता है- कि अब भुगतो…हम तो कह ही रहे थे…  

अधिकतर प्रेम-विवाह दूसरी जाति, धर्म या भाषाभाषी क्षेत्रों में होते हैं। चूंकि ये विवाह परिवार और समाज द्वारा खुद तय किए नहीं होते, अतः बहू या दामाद के प्रति वैसी सहज ग्राह्यता नहीं होती। एक दूरी बनी रहती है। मैं अपनी बात उत्तरी भारत की परंपरा तक सीमित रखूंगी। दामाद तो काफी हद तक मान्य हो भी जाता है, क्योंकि वह प्रायः घरजवांई नहीं होता पर कहीं कहीं यदि वह सामाजिक-आर्थिक रूप से हीनतर है तो उसे भी कई तरह के ताने आदि सुनने पड़ते हैं, उसे भी नीचा दिखाने की कोशिशे रहती हैं। अपनी मिथकीय परंपरा में ही देखें तो सती का किस्सा ऐसा ही है।  लेकिन लड़की के लिए स्थियाँ कुछ अधिक कठिन होती हैं।सच कहें तो उसका ‘अपना’ कोई घर कभी हो ही नहीं पाता। किसी ऐसे घर में जाकर बसना एक स्त्री के लिए काफी कठिन होता है, जहाँ उसको अपनाने में हिचक पहले से ही संस्थाबद्ध तरीके से मौजूद है। यह स्थिति तब भी आ सकती है जबकि स्त्री सामाजिक-आर्थिक रूप से मजबूत स्थिति की हो। क्योंकि स्त्री ही दरअसल विवाह नामक संस्था की आधारशिला है। यदि उसे वश में कर लिया गया तो पितृसत्ता और परिवार संस्था दोनों की यथास्थिति बनी रह सकती है।

कभी कभी बहुत मानीखेज स्थितियाँ भी उत्पन्न हो जाती हैं। यूँ तो माना जाता है कि बेटी बड़े घर दो और बहू अपने से कमजोर घर की लाओ। यह भी इसीलिए कि लड़की दब के, सिर झुका के रहे। इसी तरह यदि लड़की की शादी किसी ऐसे घर में हो जाती है जिसका रुतबा समाज में किसी भी अर्थ में बड़ा हो तो इसे उचित ही माना जाता है। पर प्रेम विवाह के एक प्रसंग  में यह देखा गया कि लड़के वालों ने तो अपने से तथाकथित कमतर सामाजिक स्तर की होने के बावजूद लड़की को स्वीकार कर लिया पर लड़की के घर वाले इस शादी को ‘सोने के अंडे देने वाली लड़की’ को भगा ले जाने के मुहावरे में सोच रहे थे। हुआ यह था कि लड़की वाले चाहते ही न थे कि लड़की की शादी हो। उन्हें यह भनक लग गई थी कि लड़की प्रेम के चक्कर में पड़ गई है और किसी भी दिन वह शादी कर सकती है। इसे होने देने से रोकने के लिए लड़की के भाई दिल्ली से रवाना हो चुके थे, क्योंकि उन दिनों हमारी मित्र नागपुर में ट्रेनिंग कर रही थी। वे उसे अपनी निगरानी में रखने के चक्कर में थे। हमें इसका डर था ही। सो हम मित्रों ने तय किया कि इससे पहले कि उसके घरवाले नागपुर में डेरा डाल लें, हम अपनी मित्र को ही दिल्ली बुला लेंगे और तुरत-फ़ुरत उसकी शादी करवा देंगे। अब लगा कि कम से कम लड़के के घर वालों को तो सूचना दे दी जाए कि उनका बेटा कैसा धमाका करने जा रहा है। हमें उन पर भरोसा था। अंकल न केवल लेखक-कथाकार थे बल्कि कम्युनिस्ट पार्टी के कार्ड-होल्डर भी थे। हमें पता था कि वे रोज शाम को घर जाने से पहले कॉफी हाऊस आते हैं। तो शाम को पुरूषोत्तम और हमारे दूसरे मित्र नीलांजन अंकल को सूचना देने कॉफी हाउस पहुँचे। पुरुषोत्तम ने उन्हें बताया कि अगली रोज सुबह उनके बेटे की शादी है। अंकल सिगरेट पी रहे थे..सुनकर सिगरेट उनके होठों से गिरते-गिरते बची। वे चकित भाव से सामने बैठे दोनों नौजवानो को देखते रह गए। फिर एक के बाद एक चार सिगरेटें पीं..थोड़ी देर खामोश रहे। फिर बोले, ‘ठीक है तुम लोगों ने एक दिन पहले ही सही,  बता तो दिया…न भी बताते तो हम क्या कर लेते…जाकर बताता हूँ … की माँ को..पता नहीं उसकी माँ क्या कहेगी। ठीक है तो कल है शादी…ठीक है..?” अभी लिखते हुए मैं सोच रही हूँ कि क्या लड़के वालों के मन में भी लड़की का एक बड़े पद पर होना काम कर रहा था, या उस परिवार के मुखिया और स्वयं लड़के की लोकतांत्रिक सोच के कारण उस लड़की को स्वीकृति मिली। मैं दावे से कह सकती हूँ कि इस स्वीकृति में उस पल लड़की का पद कोई मायने न रखता था, यह उस व्यक्ति और परिवार के लोकतांत्रिक मानस का ही रेखांकन था। वैसे यह भी सच है कि लड़की ने ससुरालवालों को अपने अनुकूल करने के लिए व्यवहार के धरातल पर ढेरों पापड़ बेले थे। पर मुझे यकीन है कि उसे जातिवादी गाली सुनने को न मिली होगी, अन्यथा इसका भी जिक्र उसने मुझसे किया ही होता। । लेकिन अपने माता-पिता आदि के लिए वह दुश्मन नंबर एक हो गई और उसे इतनी प्रताड़ना झेलनी पड़ी कि पहले प्रसव के दौरान उसे मृत जुड़वाँ लड़कियाँ हुई थीं। यही नहीं बल्कि उसे नौकरी में भी कष्ट झेलना पड़ा क्योंकि स्वयं परिवार वालों ने उसके खिलाफ़ गलत कमाई की शिकायतें दर्ज कर दी थीं और कसम खाई थी कि वे उसे सड़क पर लाकर ही दम लेंगे। 
इस केस में जातिवादी सोच और अर्थसत्ता से जुड़े लाभों का एक नया ही घालमेल था। जाति-व्यवस्था के हाशिए पर स्थित एक परिवार को उस लड़की के माध्यम से समाज में जो उच्चतर स्थिति हासिल हुई थी, उसे वह किसी भी हाल में छोड़ना नहीं चाहता था। स्त्री को वश में इस हद तक वे रखने को तैयार थे, कि वे उसकी शादी ही नहीं करना चाहते थे। क्योंकि वह किसी से भी शादी करती तो भी वह उस घर से विदा हो जाती। उसकी शादी के बाद यह भी कहते सुना गया कि “इससे तो बेहतर था कि वह अपनी जात में शादी कर लेती, अपनी जात का ही मान बढ़ जाता…” प्रेम विवाह कर लेने से तो सोने की अंडा देने वाली लड़की दूसरी जाति में चली गई और इस तरह पूरी तरह से हाथ से निकल गई।

मैं आज जब इस केस के बारे में सोच रही हूँ तो मेरी रीढ़ की हड्डी में ठंडक-सी दौड़ गई है। सोचिए कि यह मामला 1983 का न होकर 2013  का होता? उस हाल में क्या ये लड़का-लड़की बचते। क्या हम जैसे उनके मित्र जिन्होंने लड़की को “भगा”  कर शादी करवा दी, बच पाते। उस समय तो कोसने मिले थे (और दुर्भाग्य से मेरी माँ इस विवाह के दो महीने के भीतर ही ब्रेन हैमरेज़ से चल बसी थी तो लड़की वालों ने कहा था कि यह उन्हीं के जादू-टोने और कोसने का परिणाम था)। पर आज की स्थिति में तो खाप के फ़रमान पर लड़का-लड़की मार दिए गए होते और हम लोगों का क्या होता भगवान जाने। अस्मितावादी सोच और राजनीति के दुष्परिणामों में से एक यह भी है कि व्यक्ति की इयत्ता समाप्त हो गई है। प्रेम दरअसल कलेक्टिव के बरक्स इंडीविजुअल्टी का रेखांकन है। अस्मितावादी समझ इसी इंडीविजुअल्टी के विरुद्ध खड़ा होती है। उसके लिए एक कलेक्टिव शोषित है तो दूसरा शोषक। वह कलेक्टिव में इंडीविजुअल को देखने से बचता है। जाति एक सच है। निम्न जातियों का शोषण भी सच है, पर सच यह भी तो हो सकता है कि उसी निम्न जाति में भी कोई ऐसा हो जो शोषक हो। और यह भी कि निम्न जाति हो या उच्च जाति औरत की हालत में कोई खास अंतर कहीं नहीं है।  और अगर है तो वह इंडीविजुअल्स के स्तर पर है, कलेक्टिव के स्तर पर नहीं, न यथार्थ में न सोच में।   

विवाह के बारे में बात करते हुए मुझे अदबदा कर दो कहावते याद आ ही जाती हैं-
तुलसी गाय-बजाय के देत काठ में पाँव
और
शादी के लड्डू जो खाए वो पछताए  जो न खाय वो भी पछताए

यानी कि शादी- जिसका अर्थ ही है- आनंद! और अगर यह विवाह या शादी अपने मन से चुने साथी से हो जाए तो लगता है चतुर्फल की प्राप्ति हो गई है। और उसके बारे में ये बातें! इसे विडंबना ही कहेंगे। हमारी लोक कथाएँ, गीत, कहानियाँ, फिल्में सभी तो वहाँ पहुँचते ही खत्म हो जाती हैं जहाँ ‘दुलहा-दुलहिन मिली गए’ और स्वभावतः फिर ‘बरात फीकी पड़’ जाती है। पर सच तो यह है कि असली कहानी वहीं शुरू होती है कि दुलहा-दुलहिन के मिलने के बाद उनका जीवन कैसा रहा। अब तक तो संघर्ष थे, रोना था, तैयारी थी पर उसके बाद…उसके बाद क्या रोमांस रहा? अरे छोड़िए भी रोमांस, प्यार ही बचा क्या? संबंध बचे रहे क्या? और अगर रहे तो कैसे रहे?

प्रेम विवाह की सारी मुसीबतें पार करने के बाद तो यह परीक्षा और कठिन हो जाती है, एक तो घर वालों के लिए प्रेमी जोड़ा कुछ संदिग्ध हो जाता है- ऐसा लगता है कि जैसे घरवाले किसी धोखे के शिकार हो गए हों और इन सब जद्दोजहद से गुजरते हुए, समाज की चौतरफा फटकार खाते हुए प्रेमीजन भी कुछ तिक्त कुछ “विरक्त”  हो उठते हैं- और तब जरा से आए बदलाव को ताड़ते ही दोनों ही पक्षों की ओर से एक वाक्य अक्सर ही ब्रह्मास्त्र की तरह छोड़ा जाता है- उस समय तो तुम…और अब देखो, कितना बदलाव आ गया है तुममें… !

शादी आनंद तो है ही, निरंतर पोषण का मांग करने वाली बेल भी है..जितना गुड़ डालो पकवान उतना ही मीठा होगा, कहते तो यही हैं, पर कभी कभी एक पक्ष गुड़ डालता रह जाता है और दूसरा पक्ष किए धरे पर पानी मिलाता चलता है- प्यार और विवाह दोनों ही दो हाथों से बजने वाली ताली है!

शादी के बाद रोमांस और संबंधों में प्यार तो तब तक ही रहता है जब तक कि इस रिश्ते को स्वस्थ- सार्थक बनाए रखने के लिए स्त्री-पुरूष दोनों ही निरंतर सचेत रहते हैं, सायास प्रयत्नशील-कर्मशील रहते हैं। किसी भी संबंध में नई ऊर्जा तभी आती है जब दोनों पक्षों में ऊर्ध्वोन्मुखी विकास हो। संबंध एक कालखंड या भावखंड में जम कर न रह गए हों। दोनों पक्ष एक दूसरे में विश्वास बनाए रख सके हों, दुख-सुख में साथ खड़े हों। अब भी एक दूसरे को बराबर मान और तदनुसार व्यवहार कर रहे हों। उनमें संवाद हो…संवादहीनता की स्थिति न  गई हो।

खैर ये बातें तो हैं ही पर अब मैं एक ऐसे प्रेम व विवाह संबंध के बारे में लिखना चाहती हूँ जो यूँ तो न केवल देश, धर्म, जाति, भाषा और वर्गीय स्थिति में लगभग एक था बल्कि जिसे दोनों परिवारों का सक्रिय समर्थन भी हासिल था.. 

हमारी कहानी…   
हमारा विवाह स्वजातीय प्रेमविवाह कहा जाएगा, क्योंकि हम दोनों यानी मैं और पुरुषोत्तम दोनों ही जाति से वैश्य हैं। पर क्या सचमुच? हम चूंकि बिहारी वैश्य हैं अतः मारवाड़ी वैश्य हमें बराबरी का बनिया नहीं मानते। पुरुषोत्तम के परिवार की बिरादरी तो, जीजी (यानि मेरी सास) के मुहाविरे में दिल्ली वाली  “बजती” है और इसलिए ग्वालियर के लोकल बनियों को भी अपने बराबर का नहीं मानती। वैसे भी,  पछांह में बनिए फ़ॉर्वर्ड हैं, जबकि बिहार में बनियों की गिनती ओ.बी.सी में होती है। बिहार सामाजिक ढाँचे में सामंती बनावट से आजतक नहीं निकल पाया है, वहाँ स्थानीय व्यापार भी कम है और स्वाभाविक रूप से व्यापारियों की सामाजिक स्थिति भी कमतर है।  हमारी शादी के समय मेरे जेठ जी ने पुरुषोत्तम से पूछा था कि मेरे घर में कौन-कौन से देवी-देवता पूजे जाते हैं? उन्हें मेरे माँसाहारी होने पर भी आपत्ति थी क्यों कि वैश्य मतलब निरामिष! ये कैसे बनिए हुए जो मांस-मछली खाते हैं।  मेरे ससुराल में माँस-मछली तो क्या लहसुन-प्याज तक वर्जित है। सो उन्होंने शादी के बाद इच्छा जाहिर की कि मैं अब पूरी तरह निरामिष हो जाऊँ। लहसुन-प्याज भले खा लूँ पर माँस-मछली एकदम छोड़ दूँ। पुरुषोत्तम को किसी के भी खान-पान, रहन-सहन, पढ़ाई-लिखाई, राजनीतिक सोच-विचार आदि में कोई दखलअंदाजी पसंद नहीं। इस अर्थ में वे सच्चे लोकतांत्रिक और हरेक के व्यक्तित्व का सम्मान करने वाले व्यक्ति हैं। उन्होंने उसी समय, बावज

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