बनारस टॉकिज : पुरानी बोतल में नयी शराब

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अंग्रेजी में पिछले साल कैम्पस नॉवेल ट्रेंड करता रहा. चेतन भगत का उपन्यास ‘हाफ गर्लफ्रेंड’, रविंदर सिंह का उपन्यास ‘योर ड्रीम्स आर माइन नाऊ’ दोनों कैम्पस उपन्यास थे. सत्य व्यास का उपन्यास हिंदी युग्म से प्रकाशित हुआ है ‘बनारस टॉकीज’ वह भी एक हल्का फुल्का कैम्पस उपन्यास है. इसकी मीडिया में चर्चा भी है लेकिन यह कोई ट्रेंडसेटर उपन्यास नहीं है. बहरहाल, इस उपन्यास पर एक सम्यक टिप्पणी की है युवा संपादक, लेखक वैभव मणि त्रिपाठी ने- मॉडरेटर.
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अंग्रेजी में चेतन भगत ने फाइव प्वाईन्ट समवन नाम से एक उपन्यास लिखा. यह उपन्यास बेस्ट सेलर था और इस उपन्यास को इस मामले में हम लोग मील का पत्थर मान सकते हैं कि रूपा, दृष्टि जैसे प्रकाशकों ने इसके बाद अंग्रेजी में इस उपन्यास की तर्ज़ पर तमाम ऐसे उपन्यास प्रकाशित किये जो दिल्ली और आसपास के कॉलेज कैम्पसों की कहानी, युवा मन के सपनों और सुनहरे भविष्य वाले सुखांतों की कहानियाँ खुद में समेटे रहते थे. धीरे धीरे कैम्पस कथा की ये धारा हिंदी उपन्यासों के संसार में भी दाखिल हुई. इस धारा के पाठक शुरूआती दौर में चर्चित अंग्रेजी बेस्ट सेलर्स के अनुवादों से रूबरू हुए.

इस कैम्पस कथा धारा का बनारस टाकीज़ प्रतिनिधि उपन्यास माना जा सकता है. इस उपन्यास में बनारस है, बी डी हॉस्टल है और पूरी मस्ती करते भावी वकील लोग हैं जो सामान्य जीवन में भी अक्सर दुरूह हो जाया करते हैं. चीज़ों को कॉम्प्लीकेटेड बनाने में महारथी, ऐसे वकीलों की सीधी सरल कहानी… इस सादगी पे कौन न मर जाए ए खुदा!! कहानी में कुछ अपने झोल झाल हैं, बनारस की आत्मा उपन्यास में उस रूप में  मौजूद नहीं है बनारस टाकीज़ नाम होने से जैसी हम अपेक्षा रखते, पर बनारस की आत्मा उस रूप में मौजूद है जैसी इस उपन्यास में होनी चाहिए थी. एक सीमा के बाद अगर उपन्यास बनारस पर फोकस करता तो परकाया प्रवेश जैसी अनुभूति आ सकती थी. बनारस एक सम्मोहन है, पत्थर – पत्थर, रोड़े – रोड़े में पूरा उपन्यास छुपा बैठा है और बनारस से जुडा  उपन्यास लिखने वाले लेखक की असली परीक्षा यही होती है की वो बनारस के सम्मोहन से किस हद तक खुद को दूर रख पाता है. लेखकीय कौशल की इस परीक्षा में सत्य व्यास को सफल माना जा सकता है कि बनारस के सम्मोहन को उन्होंने उपन्यास पर हावी नहीं होने दिया. बनारस सिर्फ प्रेरक तत्व के रूप में उपन्यास में मौजूद है. जो एक चीज़ इस उपन्यास में खटकती है वो है उपन्यास का अंत. यहाँ पर आकर उपन्यास थोडा लडखडाता है पर बनारस तो बनारस है उसने संभाल ही लिया.

उपन्यास कुल मिलाजुला कर बढ़िया लिखा गया है और रोचक है. कहानी में लय है, घटनाओ के हिसाब से देखें तो हॉस्टल का जीवन घटना प्रधान होता है कुछ और घटनाएं तथा कुछ रोचक प्रसंग बढ़ने से उपन्यास की पठनीयता बढ़ जाती. हाँ इससे अगर उपन्यास का आकार कुछ बढ़ता तो उपन्यास का फॉण्ट साइज़ घटा कर पन्नो की संख्या स्थिर रख लेना एक बढ़िया कदम हो सकता था क्योंकि जिस आयु वर्ग के पाठकों पर उपन्यास केन्द्रित है उस पाठक वर्ग के ज्यादातर सदस्यों की आँखें थोडा छोटा फॉण्ट भी आसानी से पढ़ सकती हैं. और थोडा कम मूल्य होने से बेहिचक उपन्यास खरीद लेती हैं.

सत्य व्यास को इस बात के लिए बधाई दी जा सकती है कि उन्होंने एक पठनीय उपन्यास लिखा है, एक ऐसी कम्पनी में काम करना जहाँ अंग्रेजीदां माहौल और अंग्रेजीदां लोग ही नज़र आते हों वहां रह कर हिंदी में लिखना और अच्छा लिखना मायने रखता है. अपनी कुछ-एक कमियों के बाद भी बनारस टाकीज़ पठनीय है और साहब मांग के नहीं खरीद के पढने लायक पैसावसूल उपन्यास है.

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5 COMMENTS

  1. बचपन से लेकर आज तक कभी बनारस जाना नहीं हुआ ..सिर्फ किस्से कहानियों से ही बनारस से परिचय रहा है . वैभव जी ने बनारस को लेकर उत्सुकता और बढ़ा दी है . जल्दी ही किसी न किसी रूप में बनारस से एक मुलाकात जरूर होगी …वैभव जी को बधाई और आभार..

  2. अच्छी कसी समीक्षा, उपन्यास के साथ न्याय करती है. हिन्दी भाष मे कैंपस नावेल की कैटेगरी में रिक्त स्थान की पूर्ति करता है.ठेहै.ये बनारसी रंग में तीन हास्टलर दोस्तों की दास्तां की कीमत भी बाजिब.

  3. आपकी समीक्षा उत्सुकता का उत्स रही है …इस समीक्षा ने आपको और प्रामाणिक बनाया है …बधाई !!!

  4. बढिया समीक्षा वैभव ! पढूँगी अब यह किताब। शुक्रिया।

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