गंभीर और लोकप्रिय साहित्य के बीच कोई अंतर नहीं होता है!

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हिंदी में लोकप्रिय और गंभीर साहित्य के अंतर्संबंधों को लेकर मेरा यह लेख ‘पाखी’ पत्रिका के नए अंक में प्रकाशित हुआ है- प्रभात रंजन 
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‘जोशीजी ने जमकर लिखने का मूड बनाने के लिए फ़ॉर्मूला 99 आजमाने की सोची. इसके अंतर्गत जोशीजी एक आध्यात्मिक, एक किसी शास्त्र-विज्ञान सम्बन्धी और एक हलकी और अश्लील, तीन पुस्तकों का लगभग समान्तर पारायण करते हैं.’
(कुरु-कुरु-स्वाहा; लेखक मनोहर श्याम जोशी)

मुझे मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास का यह उद्धरण इसलिए याद आया क्योंकि वे हिंदी एक ऐसे लेखक थे जिन्होंने लोकप्रिय और गंभीर साहित्य के बीच पुल बनाने का काम किया. उनके उपन्यास उच्च कला-प्रयोगों के उदाहरण तो हैं ही उनमें मनोरंजन का भी पुट है. दूसरी तरफ, उन्होंने ‘हमलोग’ और ‘बुनियाद’ जैसे धारावाहिकों में यथासंभव साहित्यिकता का पुट देने की कोशिश की.

हम जिस दौर में बड़े हो रहे थे उस दौर में साहित्यिक और लोकप्रिय साहित्य के बीच कोई विभाजन होता है यह बात समझ में नहीं आती थी. उस दौर में मेरे लिए किताबों का एकमात्र स्रोत शहर सीतामढ़ी के सार्वजनिक पुस्तकालय ‘सनातन धर्म पुस्तकालय’ में एक ही रैक में आचार्य चतुरसेन, गुरुदत्त के उपन्यासों के साथ-साथ प्रेमचंद, यशपाल और जैनेन्द्र कुमार के उपन्यास भी मिल जाते थे. यह कहीं निर्देशित नहीं होता था कि फलां उपन्यास गंभीर है और फलां लोकप्रिय.

मेरा अपना अध्ययन यही बताता है कि हिंदी में लोकप्रिय और गंभीर साहित्य की साझी विरासत रही है. यह कहना अतिशयोक्ति न समझा जाए तो 20 वीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में हिंदी को लोकप्रिय बनाने में जितना योगदान देवकीनंदन खत्री का रहा है उतना शायद ही किसी और लेखक का रहा हो. कहते हैं उनके उपन्यास ‘चन्द्रकान्ता’ को पढने के लिए न जाने कितने लोगों ने हिंदी सीखी. लेकिन हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने वालों ने लोकप्रिय साहित्य की सुदीर्घ परम्परा को सिरे से गायब कर दिया.

मैं यह नहीं मानता कि जो आरम्भ में लोकप्रिय साहित्य पढता है वह बाद में गंभीर साहित्य का पाठक बन जाता है. असल में दोनों धाराएँ समान्तर रही हैं. लोकप्रिय धारा के साहित्य की पहुँच गाँवों-कस्बों तक रही है जबकि तथाकथित गंभीर साहित्य की धारा धीरे धीरे सिमटती चली गई. यह दुर्भाग्य है कि हम गंभीर लेखकों ने पाठकों से अधिक आलोचकों को ध्यान में रखकर लेखन किया है. हम गंभीर लेखक पाठकों को नहीं उन आलोचकों को ध्यान में रखकर लिखते रहे जिनकी नजर में आ जाना ही हिंदी में श्रेष्ठ लेखन का पैमाना बन गया. ईनाम-इकराम मिलना, लघु पत्र-पत्रिकाओं में छपना-छपाना उससे तय होने लगा. मैं अपने अनुभव से यह कहना चाहता हूँ कि युवाओं के लिए लेखन में इससे बड़ी चुनौती कोई रही ही नहीं. हम इसलिए लोकप्रिय साहित्य को हीनतर मानते रहे क्योंकि हम उनकी तरह ‘उच्चतर’ बनने का साहस नहीं कर पाए. हम पाठकों की कसौटी से इसलिए भागते रहे क्योंकि हमें यह डर रहता था कि अगर पाठकों की लोकप्रियता की कसौटी पर हम विफल रह गए तो? हमने सफलता की आसान राह चुनना स्वीकार किया, लोकपियता के उस रास्ते से हम बचते रहे जिसमें असफलता की खाइयाँ भी मिल सकती थी.

लोकप्रिय साहित्य की धारा जहाँ पाठकों की जनतांत्रिकता के मजबूत आधार पर टिकी रही वहीं गंभीर साहित्य आलोचकों के फतवों का सहारा ढूंढती रही. मैं यह बात पूरे साहस के साथ लिखना चाहता हूँ ‘जन’ वादी होने का दावा करने वाले हम लेखक लगातार जनता से दूर होते गए. क्या इसके ऊपर हमने कभी विचार करने की जरूरत समझी कि हम जिस जनता के हक़ में लगातार लेखन किया उसको अपना पाठक भी बनाया जाए? वह हमारे साहित्य को अपने जीवन से जोड़ सके. हमें ईमानदारी से उसके लिए कभी कोशिश ही नहीं की.

दूसरी तरफ, लोकप्रिय साहित्य जनता की भाषा में जनता से संवाद करती रही है. लगातार संवाद करती रही. जब मैं सीतामढ़ी जिले के अपने गाँव मधुवन में रहता था तब मैंने लेखक बनने का सपना देखा था तो उसके पीछे वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों का बहुत बड़ा हाथ था. मैं तब तक न किसी बड़े साहित्यकार के संपर्क में आया था न ही यह जानता था कि बड़ा लेखक कौन होता है. हम लोग वेद प्रकाश शर्मा के हर उपन्यास का बेसब्री से इन्तजार करते थे और उसके पीछे एक लम्बी सी गाडी पर हाथ टिकाकर खड़े वेद प्रकाश शर्मा की तस्वीर को देखते थे और उनके जैसा लोकप्रिय बनने का ख्वाब देखते थे.

अब सोचता हूँ क्यों? क्या कारण था कि उदिस्ठ मास्टर साहब ट्यूशन पढ़ाने के बाद रात में लालटेन जलाकर तेल जला जला कर कॉपियां भरा करते थे. कहते थे कि देखना, किसी दिन किसी किसी प्रकाशक की नजर पड़ गई तो ये उपन्यास वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों से ज्यादा पढ़े जायेंगे. एक दिन उन्होंने बताया था कि ऐसे ऐसे करीब 21 उपन्यास उन्होंने लिख रखे थे. खुद वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों पर भी एक प्रकाशक की ऐसे ही तो नजर पड़ी थी. बहरहाल, उनके उपन्यास छपे या नहीं पता नहीं. बाद में उदिस्ठ मास्टर साहब से मिलना भी नहीं हुआ.

लेकिन मैं अक्सर इस बात को सोचता हूँ कि क्या था वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों में, उनके जासूसी किरदारों में कि गाँव-देहातों में लोग उनके उपन्यासों को पढने के लिए राशन की ढिबरी का तेल जलाते थे? इंटरनेट विहीन उस युग में भी उनके उपन्यासों के प्रकाशन की तिथि का पता रखते थे? आज भले हार्पर कॉलिन्स द्वारा छपने के बाद, अंग्रेजी अनुवादों के बाद सुरेन्द्र मोहन पाठक का लेखकीय कद बड़ा लगने लगा हो लेकिन अखिल भारतीय लोकप्रियता में वे वेदप्रकाश जी के सामने बौने ही रहे.

असल में इसके कारण थे.

मुझे अब यह बात शिद्दत से लगने लगी है कि हिंदी के आम पाठकों के अधिक करीब वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यास थे. वह बहुत तैयारी के साथ उस हिंदी भाषी समाज के लिए लेखन करते थे जो मध्यवर्गीय संभ्रांत तबके का नहीं माना जाता था, जो छोटे-छोटे काम करता था, जो जो गुमटी लगाता था, जो वस्त्र भण्डार, किराना स्टोर चलाता था, सीताराम भोजनालय चलाता था. मुझे लगता है कि यह बहुत बड़ी बात है. हम ‘जनवादी’ कहलाने वाले लेखक अपने साहित्य में मजदूरों-किसानों की बात तो करते हैं, शोषण के खिलाफ आवाज उठाते हैं लेकिन कभी भी हम उन तक पहुँचने की कोशिश नहीं करते हैं.

जबकि वेद प्रकाश शर्मा जैसे लेखकों ने न सिर्फ उनकी जैसी भाषा में साहित्य लिखा बल्कि उनके उपन्यासों में कई किरदार ऐसे हैं जो उस वर्ग के हैं जो समाज के संभ्रांत तबके में अपनी जगह नहीं बना पाए, जो सामाजिक मानकों से असफल रह गए. ऐसे लोगों में जीवन के प्रति विश्वास पैदा करने का बड़ा काम उनके उपन्यासों ने किया. मुझे उनका एक किरदार केशव पंडित इस सन्दर्भ में याद आता है जिसने वकालत की पढ़ाई नहीं की मगर बड़े बड़े वकीलों को नाकों चने चबवा देता था, जिन अपराधियों को बड़े बड़े वकील सजा नहीं दिलवा पाते थे वे उसके अकाट्य तर्कों के सामने पानी भरते थे. 1980 के दशक में मुझे नहीं लगता कि हिंदी के औपन्यासिक संसार में ऐसा लोकप्रिय कोई दूसरा किरदार भी हुआ. वह एक ऐसा किरदार था जो समाज में हाशिये पर रह गए लोगों में आत्मविश्वास पैदा करता था. उनके अंदर यह भाव पैदा करता था कि दुनियावी मानकों पर असफल रहने के बावजूद वे अपने जाती हुनर से कामयाबी हासिल कर सकते थे. मुझे लगता है कि उस दौर में जब देश में निजीकरण शुरू नहीं हुआ था, उदारीकरण ने युवाओं के सामने नए नए अवसरों के दरवाजे नहीं खोले थे तब उनके उपन्यासों के होने के कुछ मानी थे. जब सरकारी नौकरियों के अलावा बेहतर भविष्य के लिए कोई विकल्प नहीं होता था केशव पंडित जैसे किरदार नाकामयाब समझे गए लोगों को उम्मीद की किरण दिखाते थे.

दुःख की बात है कि हमने इस धारा को समझने की कभी कोशिश ही नहीं की. हम साहित्य के उच्च मूल्य बनाते रहे और हिंदी में बड़े पैमाने पर पाठकों को पहले पहल पुस्तकों से जोड़ने वाले साहित्य को मूल्यहीन बनाकर खारिज करते रहे. जबकि उनका भी अपना एक मूल्य था. मैं यहाँ दो प्रसंग साझा करना चाहता हूँ.

पहला प्रसंग उर्दू-हिंदी में जासूसी कथा धारा के सबसे बड़े उपन्यासकार इब्ने सफी, बी.ए. से जुड़ा है. वे तरक्कीपसंद शायर थे और उनकी शायरी को अच्छे अच्छे विद्वानों की दाद मिल चुकी थी. वे इलाहाबाद में निकहत पब्लिकेशन में संपादक थे. एक दिन एक बुजुर्गवार ने कहा कि उर्दू में सिर्फ फ़ोहश(अश्लील) साहित्य ही बिक सकता है. उन दिनों अंग्रेजी से अनूदित ‘बोल्ड’ साहित्य की उर्दू में बहार थी. उन्होंने इस बात का प्रतिवाद करते हुए कहा कि ऐसा नहीं है कि उर्दू के पाठक अश्लील साहित्य पढ़ते हैं बल्कि वे इसलिए अश्लील साहित्य पढ़ते हैं क्योंकि उनके सामने कोई विकल्प नहीं है. तो उस सज्जन ने हँसते हुआ कहा कि विकल्प नहीं है विकल्प पैदा कीजिए. इब्ने सफी ने इस चुनौती को स्वीकार किया. कहते हैं कि उन्होंने ‘तिलिस्मे-होशरुबा’ की शैली में ‘जासूसी दुनिया’ सीरिज की शुरुआत की. उसके बाद सिर्फ फ़ोहश साहित्य को ही लोग पढना नहीं भूले बल्कि कहते हैं उसने बहुत सारे लोगों और कुछ भी पढना भुलवा दिया और बहुत लोगों को उसने पढना सिखाया भी. उनके सामने यह बहुत बड़ा मूल्य था. कहते हैं कि विभाजन के आरंभिक दौर में सिर्फ इब्ने सफी के मामले में भारत पाकिस्तान के लोग एकमत रहते थे.

दूसरा प्रसंग है ‘जनप्रिय लेखक’ के रूप में जाने जाने वाले ओमप्रकाश शर्मा से जुड़ा हुआ. दिल्ली क्लॉथ मिल में मजदूरी करने वाले ओम प्रकाश शर्मा लाल सलाम करके मिल में मजदूरों की लड़ाई भी लड़ते थे. जनवादी विचारों को मानने वाला यह जासूसी लेखक बड़ी शिद्दत से इस बात में यकीन करता था कि ऐसे साहित्य की निरंतर रचना होनी चाहिए जिसकी कीमत कम हो तथा समाज के निचले तबके के मनोरंजन का उसमें पूरा ध्यान रखा गया हो. शायद इसी संकल्प के साथ वे जीवन भर सस्तासाहित्य लिखते रहे लेकिन अपने नाम के आगे सदा जनप्रिय लिखते रहे. इसीलिए अपने उपन्यासों में झीना ही सही लेकिन नैतिकता का एक आवरण बनाते रहे. मजदूर वर्ग का कि आवाज़ उनके उपन्यासों में बुलंद बनकर उभरती थी. सर्वहारा वर्ग के प्रति उनके लेखन में गहरी सहानुभूति का एक भाव निरंतर बना रहा. हम जिस साहित्य को ‘सस्ता साहित्य’ कहकर हीनतर ठहराते रहे उसका लेखन भी एक तरह का मूल्य था, उसका एक निश्चित उद्देश्य था.

हम हिंदी वाले इस बात का रोना रोते हैं कि हिंदी में पाठक नहीं हैं, हिंदी की किताबें बिकती नहीं हैं. अगर हम लोकप्रिय धारा के साहित्य की व्याप्ति का विश्लेषण करें तो यह बात समझ में आती है कि एक बड़ा पाठक वर्ग है. असली बात यह है कि उसे लक्ष्य करके लेखन हो. यह एक ऐसा दौर है जब सारे मूल्य, सारे आदर्श फ़ॉर्मूला लगने लगे हैं, क्या पता फार्मूला समझे जाने वाले, कमतर समझे जाने वाले साहित्य से ही कुछ ऐसी नई राह निकले जो पठनीयता और श्रेष्ठता के नए मानदंड बनाए. यह मानी हुई बात है कि जिस भाषा का अपना कोई समृद्ध लोकप्रिय साहित्य नहीं होता है उस भाषा का कोई उल्लेखनीय साहित्य नहीं होता.   
प्रभात रंजन 

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10 COMMENTS

  1. आलेख के लेखक का इस संदर्भ में पहले भी कई बार लिखा हुआ देख चुका हूँ अंतरजाल पर | यह आलेख थोड़ा सा बैलेंस नहीं लग रहा अपने पर्सपेक्टिव में | मैं खुद वेद प्रकाश शर्मा और सुर्न्द्र मोहन पाठक का बहुत बड़ा फैन हूँ और शायद ही कोई किताब छूटी होगी मुझसे पढ़ने में | गंभीर साहित्य के लेखकों की लिखी हुई कितनी ही कहानियाँ या उपन्यास कथित रूप से गंभीर प्रकाशकों जैसे कि वाणी, राजकलम, ज्ञानपीठ आदि से ना निकल कर यदि राज पॉकेट बुक्स वगैरह से निकले तो यही लेखन लोकप्रिय साहित्य के "कठघरे" में आन खड़ा होगा | यदि ऐसा नहीं है तो क्या कारण है कि इन्हीं तथाकथित गंभीर लेखकों की कहानियाँ जो हंस, वागर्थ आदि पत्रिकाओं में छपती है तो उतने ही चाव से पढ़ी जाती है पाठकों द्वारा और ये सर्वविदित है कि हंस का सर्कुलेशन बिहार यूपी में सबसे ज्यादा है, जहाँ पर इन लोकप्रिय साहित्य की भी बिक्री सर्वाधिक है |

    दूसरा पहलू ये है कि वेद प्रकाश शर्मा अपनी लोकप्रियता के उफान पर अपने पाठकों को बेवकूफ़ बनाने लग गए है कि हाल में ही निकले उनके कई उपन्यास हूबहू हॉलीवुड फिल्मों की कॉपी हैं, जिस में उन्होंने लेखकीय चतुराई बस इतनी दिखाई है कि परिवेश भारतीय कर दिया है | अभी अभी पढ़ी हुई एक किताब "रामबाण" बिलकुल ही हॉलीवुड फिल्म "पे चेक" की नकल है और उससे पहले "मिशन इम्पॉसिबल" और "मायनोरिटी चेक" की नकल पर आधारित उनके दो उपन्यास भी पढ़ चुका हूँ, जिनके नाम फिल वक़्त याद नहीं आ रहे | क्या गंभीर साहित्य के लेखक इस तरह लिबर्टी ले सकते हैं ?

  2. जिसे पढ़कर आनन्द/प्रेरणा की प्राप्ति हो,सच्चे अर्थों में वही साहित्य है …………..?

  3. बिल्कुल सही लिखा है सर आपने कि… हम गंभीर लेखक पाठकों को नहीं उन आलोचकों को ध्यान में रखकर लिखते रहे जिनकी नजर में आ जाना ही हिंदी में श्रेष्ठ लेखन का पैमाना बन गया.
    लेकिन मुझे लग रहा है कि अब कुछ लेखक भी पुरस्कारो से दूर पाठको के लिए लिख रहे है .पिछले दिनो आई कुछ किताबों ने इसे प्रमाणित भी किया है .चाहे वो बनारस टाॅकीज हो या इशक मे शहर होना.

    आपके लेखनी का कायल रहा हूं जब से आपकी किताब जानकीपुल पढी तभीसे . बीच बीच मे अनुवाद की किताबे भी. मेरी इक जिज्ञासा है कि आपका नया किताब कब पढने को मिलेगा ?

  4. आपकी बात से सहमत हूँ ………… साहित्य आलोचकों के लिए नहीं पाठकों के लिए लिखा जाना चाहिए ,गंभीर बात को सरलता से कह देना एक कला है ……… और लोकप्रियता का पैमाना भी

  5. मैंने भी सुरेन्द्र मोहन पाठक और वेद प्रकाश शर्मा के बहुत से उपन्यास पढ़े हैं,और मुझे ये कहने में ज़रा भी संकोच नही कि उनके किरदारों ने उस उठती उम्र में कई बार आंदोलित किया। यहां तक कि देशभक्ति का जज़्बा भी कूट कूट के इन किरदारों ने गहरे तक पहुँचाया।
    गंभीर लेखन से कभी कम न लगे वो किरदार ,आज भी कहि विद्यमान हैं अन्तर में

  6. लेख की वैचारिकी से असहमत…बावजूद लेख अच्छा लगा ।

  7. गंभीर और लोकप्रिय साहित्य के मध्य के अन्दर को बखूबी उल्लखित किया है . आज ऐसे बाजार की जरूरत है जहाँ गंभीर साहित्य भी लोकप्रिय हो सके और मठाधीशों और आलोचकों के चंगुल से बाहर आ अपनी पहचान बना सके जिसके लिए जरूरी है लेखक का सिर्फ साहित्यिक आलोचकों के लिए न लिखकर आम जनता की पसंद को ध्यान में रखकर लिखना जिसकी भाषा सहज और सरल हो न कि इतनी संलिष्ट कि पाठक को शब्दकोष खोलकर बैठना पड़े तो ऐसे में आम पाठक उससे विमुख होता है क्योंकि वो रोजमर्रा के जीवन में ऐसी भाषा का प्रयोग नहीं करता वो सिर्फ आम बोलचाल की भाषा में जीता है और उसे ही पढना चाहता है ये समझना बहुत जरूरी है तभी गंभीर साहित्य और लेखक खुद को आम जनता से जोड़ पायेंगे .

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