सांसद एक सामान्य व्यक्ति की तरह क्यों नहीं रह सकता- हरिवंश

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प्रसिद्ध पत्रकार हरिवंश को राज्यसभा में आये एक साल से अधिक हो गया है. उन्होंने अपने अनुभवों को साझा किया है. प्रस्तुति युवा पत्रकार निराला की है. आज उसकी पहली क़िस्त- मॉडरेटर 
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पत्रकार हरिवंश को पढ़ते रहनेवाले, करीब से जाननेवाले जानते रहे हैं कि राजनीति उनके रग-रग में है. झारखंड को केंद्र बनाकर करीब ढाई दशक तक प्रभात खबरके जरिये पत्रकारिता करते हुए और उसके पहले रविवारऔर धर्मयुगजैसी पत्रिकाओं में पत्रकारिता करते हुए उन्होंने राजनीति पर ही सबसे ज्यादा लिखा है. सिर्फ लिखा भर नहीं है, वे वैकल्पिक तरीके से राजनीतिक हस्तक्षेप करते भी रहे हैं. झारखंड के सुदूरवर्ती गांवों, जंगल में बसे एकांत इलाके में भी जाकर लोगों को बताते रहे हैं कि यह लोकतंत्र ही दुनिया में सबसे बेहतर विकल्प है और राजनीति ही है, जो चीजों को बदल सकती है. हरिवंश का राजनीति से इस तरह का रिश्ता कई वजहों से रहा है. जिसमें एक मजबूत वजह शायद जेपी की जन्मस्थली  सिताबदियारा जैसे गांव में पैदा होने बचपन से लेकर किशोरावस्था तक वहीं गुजारना भी है. अब वही पत्रकार हरिवंश खुद राजनेता भी हैं. राज्यसभा के सांसद. लेकिन वैसे वाले सांसद नहीं, जिनके चलने के पहले जिले से लेकर कस्बे तक में सूचना रहती है, अमला से लेकर माला तक का मुकम्मल इंतजाम रहता है और चमचमाती हुई गाड़ियों का काफिला उम्मीदों-आकांक्षाओं को रौंदते हुए रोज निकलता रहता है. वे राजनीति में जाकर राजनीति सीखने की कोशिश में लगे हुए हैं. संसद के हर सत्र में जाकर सीखने की कोशिश में हैं. फिर वहां से लौटने के बाद ग्रासरूट पत्रकार की तरह आमलोगों के बीच, सामान्य तरीके से जाकर नब्ज समझने की कोशिश कर के. एक जिद की तरह कि कोई सांसद विशिष्ट बनने की बजाय आम आदमी की तरह ही क्यों नहीं रह सकता! इस जिद को पूरा करने के लिए सांसद बन जाने के बाद की दिखावे की परंपराओं के निर्वहन और तमाम दबावों को झेलते हुए खुद से लड़ रहे हैं. इस लड़ाई में वे जीत जायेंगे या कि हार जायेंगे, अभी कहना मुश्किल है. वे सांसदी फंड को लेकर भी अपने तरीके का प्रयोग कर रहे हैं. लेकिन सबकुछ चुपचाप. बिना किसी शोर के. हरिवंशजी संसद के अनुभवों को बार-बार साझा करते हैं. राजनीति से निकली हुई चीजें स्थितियां बदलेंगी- राजनीति अब कोई बदलाव नहीं कर सकती जैसी बातों का कोलाज बनता है उनकी बातों से. उम्मीदी और नाउम्मीदी के बीच, आशा और निराशा के बीच लेकिन आखिरी में खुद के अंतर्द्वंद्व से जूझने के बाद जैसे खुद से, खुद को विजयी करार देकर, निष्कर्ष भी सुनाते रहते हैं कि चीजें बदलेंगी, हालात बदलेंगे, स्थितियों में बदलाव राजनीति ही लायेगा. धीरे-धीरे ही सही, दूसरे रास्ते से ही सही. लगातार आग्रह के बाद हरिवंशजी ने पत्रकार के बाद सक्रिय राजनीति में भूमिका निभाने की प्रक्रिया से गुजरने के अनुभव को लिखने की सहमति दी. वह भी संकोच और दुविधा का आवरण इतना रहा कि कभी हां-कभी नाहोता रहा. लेकिन अंततः कुछ टूटी हुई-कुछ बिखरी हुई बातों को मिलाकर उन्होंने कुछ लिखा. उस लिखे का ही संक्षिप्त और संपादित अंश यहां साझा किया जा रहा है. जो हरिवंशजी को लगातार पढ़ते रहे हैं और उनके नियमित पाठक रहे हैं, संभव है, उन्हें इस लेख में वह प्रवाह न मिले लेकिन ताजगी और सरोकारी पक्ष का मिलना तय है. राजनीति किस रास्ते पर है और संसद भवन, जिसे लोकतंत्र का लैंप हाउस कहते हैं, वहां क्या हाल हैं, उसे बहुत ही सहजता से और बिना किसी अगर-मगर के बताने की कोशिश है इसमें. यह एक पत्रकार के नया सफर पर निकलने का शुरूआती अनुभव भर है, सौंदर्यबोध और शब्दों के साज-सज्जा से भरा संस्मरणों का दस्तावेज नहीं….
                                                         – निराला
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नये सफर की फुटकर बातें
हरिवंश

लगभग ग्यारह महीने हुए, राज्यसभा का सदस्य बने. लगातार मन में यह सवाल उठता रहा है कि यह अनुभव कैसा है? हालांकि यह शुरूआत के ही दिन हैं. दिसंबर, 2014 के अंत तक दिल्ली में घर नहीं मिला या छोटा आफिस नहीं बना सका था. बिना आफिस बने एक सार्थक भूमिका (बतौर एम.पी) संभव नहीं. प्रक्रिया ही ऐसी है. अप्रैल 10, 2014 से राज्यसभा सदस्य के तौर पर कार्यकाल की शुरूआत हुई. जून में शपथ ली. एक महीने का बजट सत्र था. उसमें शरीक रहा. फिर शीतकालीन सत्र में. इस सत्र में थोड़ा अनुपस्थित रहना पड़ा. राजनीतिक काम, अस्वस्थता व झारखंड चुनाव के कारण. कुछेक पार्लियामेंट्री कमेटी की बैठकों में शरीक हुआ. इस पद पर जाने का प्रस्ताव अचानक आया. वह रात अब भी स्मृति में हैं. तब पिछले कुछेक महीनों से रात दस से साढ़े दस के बीच खाना खाकर सोने का क्रम चल रहा था. पर उस दिन किसी राष्ट्रीय मुद्दे पर एक टीवी आयोजन की परिचर्चा में भाग लेना था. टीवी चैनल के लोग अपना ओवी वैन लेकर घर आये थे. उल्लेख कर दूं कि पिछले कुछेक वर्षों से टीवी चैनलों के डिबेट से भी बचता हूं. कम मौकों पर ऐसे आयोजनों में शरीक होता हूं. उस दिन इस डिबेट के कारण सोने में देर हुई. लगभग ग्यारह बजे रात में फोन आया कि आपको राज्यसभा जाना है. अगले दिन शाम में इसकी घोषणा हुई. पहली प्रतिक्रिया एक किस्म की आनंद की, खुशी की थी. क्योंकि इस व्यवस्था में राज्यसभा, लोकसभा जाना एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है. इसके पहले 1991 में जब चंद्रशेखर जी प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय में, प्रधानमंत्री के अतिरिक्त सूचना सलाहकार, संयुक्त सचिव भारत सरकार के रूप में, इसी तरह अचानक बुलाया. जब तक वह सरकार में रहे, रहा. जिस दिन उन्होंने इस्तीफा दिया, उसी दिन प्रधानमंत्री कार्यालय के रिसेप्शन पर इस्तीफा, गाड़ी, घर की चाबी, सबको छोड़ कर रांची लौट आया था. उस वक्त भी पहली बार खबर पाकर एक उल्लास हुआ था कि व्यवस्था की अंदरूनी दुनिया देखने का अवसर मिलेगा. तब युवा था. उत्सुकता थी कि देखूं कि सरकार चलती कैसे है? सही भूमिका की कितनी गुंजाइश है? इससे अधिक न तब कोई कामना थी, न अब कोई कामना है. यह व्यवस्था अंदर से कैसे चलती है? इसके महत्व क्या हैं? इसी क्रम में राज्यसभा जाने का यह अवसर आया. याद आया कि प्रभात खबर में आना एक बदलाव का प्रतीक था. निजी जीवन में. कोलकाता में आनंद बाजार पत्रिका (रविवार) और मुंबई, टाइम्स आफ इंडिया समूह के धर्मयुग में काम करने के बाद. यानी दो सबसे बड़े अखबार घरानों के दो सबसे महत्वपूर्ण हिंदी प्रकाशनों में काम करने के बाद एक बंदप्राय अखबार प्रभात खबर में आना. उसको खड़ा करनेवाली टीम के सदस्य के रूप में होना. पिछले 25 वर्षों तक इससे जुड़े रहने के बाद एक ठहराव का एहसास होना. उस दौर या मनःस्थिति में राज्यसभा जाने का यह प्रस्ताव, निजी जीवन में एक बदलाव का प्रतीक लगा. यह बदलाव कैसा रहेगा? पिछले कुछेक महीनों से यह सवाल मन में उठता रहा है? अंतर्द्वंद्व के रूप में यह सवाल उठता रहा कि क्यों इस पद के लिए लोग 100-200 करोड़ रुपये खर्च करते हैं?

राज्यसभा में किस प्रभाव के लोग पहुंचते हैं, इसकी चर्चा पढ़ी थी. आज केंद्र में जो रक्षा राज्यमंत्री हैं, वीरेंद्र सिंह. वह हरियाणा की राजनीति में असरदार व्यक्ति रहे हैं. लंबे समय तक कांग्रेस में रहे. कद्दावर व्यक्ति. कांग्रेस छोड़ने से पहले उनका बयान आया कि सौ करोड़ में हमारे यहां से लोग राज्यसभा जा रहे हैं. इन सब बातों से परे रहकर ही बात की जाये, तो जिस झारखंड में 22 विधायक कम से कम ऐसे हैं, जो राज्यसभा चुनावों में संदेहास्पद मतदान या पक्षपतापूर्ण मतदान के घेरे में आये. सीबीआइ जांच के प्रभावों में. विजय माल्या, जो किंगफिशर के मालिक रहे हैं, और जिनकी कही खबरें सुर्खियां बनती रही हैं, वह भी राज्यसभा में हैं. कुछ ही महीनों पहले एच.डी.कुमारस्वामी, जो कर्नाटक में मुख्यमंत्री रहे, उनका एक टेपरिकार्डेड बयान, देश के सारे अखबारों की सुर्खियों में रहा. उन्होंने अपने यहां एक व्यक्ति को एमएलसी का टिकट देने के लिए पांच करोड़ रुपये की मांग की. जब यह खबर सार्वजनिक हुई, तब उन्होंने कहा कि हां, पार्टी के लिए हमलोगों ने चंदा मांगा. झारखंड से कैसे-कैसे लोग राज्यसभा पहुंचे, यह सब जानते हैं. इसी राजनीतिक माहौल या दौर से मैं राज्यसभा गया. जदयू पार्टी ने सब कुछ किया. चुनाव निर्विरोध हुआ, बिहार में. चुनाव परिणाम आने के बाद वो दस हजार रुपये भी वापस हो गये. चुनाव पूर्व डिपाजिट में यह जमा होता है. इस दौर में जब राजनीति व्यवसाय हो रही है, तब सामान्य लोगों को चुन कर राज्यसभा भेजना, चुनाव का निर्विरोध होना, कैसे संभव हुआ. बिहार पिछड़ा हो सकता है, पर बिहार की राजनीति में आज भी मूल्य व नैतिक सत्व हैं. नीतीश कुमार ने इसी राजनीतिक धारा को बिहार-देश में मजबूत किया. इस चलन से यह निजी धारणा पुष्ट हुई कि आज भी राजनीति में कुछेक लोग ऐसे हैं, जिनके अंदर मूल्य, आस्था और वैचारिक राजनीति है.

यह पद पा लेने के बाद अनुभव करता हूं कि एक नया सांसद, अगर वह समृद्ध पृष्ठभूमि से नहीं आता, अगर उसके पास अपना कोई व्यवसाय नहीं, बड़ी पूंजी की आमद नहीं है, उसके घर से कोई सपोर्ट नहीं है, तो वह दिल्ली में मंहगी गाड़ियां कैसे रख सकता है और उसका रखरखाव कर सकता है? यही नहीं अपने क्षेत्र में मंहगी गाड़ियां रखने के साथ-साथ, अन्य चार-पांच न्यूनतम गाड़ियां लेकर वह कैसे चलता है? मैं एक नये सांसद की बात कर रहा हूं. पिछले 10-11 महीनों से मेरे मन में एक सवाल बार-बार उठ रहा है कि अगर मैं प्रभात खबर से जुड़ा नहीं होता, तो एक सांसद के रूप में जो चीजें मुझे उपलब्ध हैं, उसकी बदौलत एक गाड़ी से अधिक मेंटेन करना असंभव है. गाड़ियों का काफिला लेकर चलने की बात दूर छोड़ दें. इस पृष्ठभूमि में मैं कई राजनेताओं को देखता हूं. वे एक-दो टर्म ही विधायक या सांसद रहे, पर खुद मंहगी गाड़ियों पर चढ़ते ही हैं, उनके आगे-पीछे कई गाड़ियां चलती हैं. सांसद हैं, तो दिल्ली में गाड़ी रखते हैं. जिस राज्य से सांसद हैं, उस राज्य की राजधानी में रखते हैं. फिर अपने क्षेत्र में रखते हैं. यह कैसे संभव है? स्पष्ट नहीं होता. सांसद बना. फिर लोकसभा चुनाव आ गये. इसमें व्यस्त रहने के कारण तत्काल शपथ नहीं ली. बाकी लोगों में शपथ लेने की जल्दी थी, ताकि सांसद के रूप में मिलनेवाली सुविधाएं शुरू हो जायें. विलंब से, जब पहले दिन संसद पहुंचा, अपना प्रमाणपत्र लेने, अपना परिचयपत्र बनवाने, तो एक अजीब अनुभव हुआ. वह स्मृति में है. अपना चुनाव प्रमाणपत्र देने के साथ, परिचयपत्र बनवाना था. सांसदों के डिप्लोमेटिक पासपोर्ट बनते हैं, वह बनवाना था. उसके लिए एक स्टेटमेंट देना होता है कि आपके खिलाफ मुकदमे या मामले नहीं हैं. जब ऐसा स्टेटमेंट देने का फार्मेट मेरे सामने आया. मैंने कहा कि नहीं, मेरे खिलाफ कोई निजी मामला नहीं है, पर मैं एक अखबार के संपादक के रूप में काम करता रहा हूं, वहां मानहानि के जो मुकदमे होते हैं, उसमें कुछेक मेरे खिलाफ भी हैं. क्योंकि जब भी किसी खबर के खिलाफ मामला या शिकायत होती है या मानहानि का मुकदमा होता है, तो वह संपादक, मुद्रक, प्रकाशक आदि सब पर होता है. नियमतः मैं इस दायरे में हूं. यह सब विवरण चुनाव आयोग को दे रखा है. इसलिए डिप्लोमेटिक पासपोर्ट बनाने के लिए मैं कैसे कह सकता हूं कि मेरे खिलाफ मामले नहीं हैं. मुझे पता चला कि नहीं, आमतौर पर लोग ऐसा करते हैं. मैंने मना कर दिया. इसलिए तत्काल मुझे पासपोर्ट नहीं मिला. मैंने स्पष्टतः उसमें उल्लेख किया कि मेरे खिलाफ मानहानि के मामले हैं. उसमें विमर्श के बाद फिर पासपोर्ट बना. उसी तरह सांसदों को सेक्रेटेरियेट काम के लिए भत्ता रूप में लगभग 30 हजार रुपये मिलते हैं. यह तब मिलता है, जब आप अपने सहायक के नाम दे दें. चूंकि सांसद के रूप में मैं दिल्ली गया था, मेरा कोई ठौर-ठिकाना नहीं था. मेरा कोई सहायक नहीं था, इसलिए मैं किसी का नाम नहीं दिया. मुझे पता चला कि नहीं यहां अपने घर के परिचित लोगों के, सगे-संबंधियों के नाम दें दे, ताकि यह भत्ता प्रतिमाह मिलने लगे. मैंने मना कर दिया. मैंने कहा कि जब तब ऐसे लोग मेरे साथ कामकाज के तौर पर नहीं जुड़ जाते, दिल्ली में घर नहीं मिल जाता, मैं ऐसे लोगों को रख नहीं लेता
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