मंजरी श्रीवास्तव की प्रेम कविताएं

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प्रेम कविताएं लिखना सबके वश में नहीं होता है, लिखते हुए उच्छल भावुकता से खुद को बचा पाना बहुत मुश्किल होता है. मंजरी श्रीवास्तव की प्रेम कविताएं बहुत अलग हटकर हैं. उसकी ऐन्द्रिकता उसे विशिष्ट बनाती है और कहन में उसका निजपन है. आज मंजरी की कुछ प्रेम कविताएं- मॉडरेटर 
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1
प्रेम ने अपनी जादुई किरणों से मेरी आँखें खोलीं और
अपनी जोशीली उँगलियों से मेरी रूह को छुआ
तब….जब उठ गया था प्रेम या प्रेम जैसे किसी शब्द पर से मेरा विश्वास
प्रेम ने दुबारा मेरी ज़िन्दगी के अनसुलझे रहस्यों को खोलने का सिलसिला शुरू किया
फिर से उन अनोखे पलों को जीना सिखाने की कोशिश करने लगा
जिसमें शामिल हो मेरा पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा और न जाने कई-कई बार किया गया प्यार     
जिसकी यादें मन की गहरी भावनाओं को धुंधलके और कड़वाहट से भर देती हैं और बावजूद इसके
ख़ुशी दे जाती हैं छटांक-भर.
वो यादें
अब भी मेरी रातों के सन्नाटे को संगीत से भर देती हैं और एकांत को
ख़ुशी के पलों में बदल देती हैं
वो सारे के सारे प्रेम एक-एक कर अब भी अपने पपड़ाए होंठों से फुसफुसाते रहते हैं मेरे कानों में
और स्वर्ग के आदम-से, मेरे अर्द्धविराम और शून्य युक्त जीवन में
खड़ी करते रहते हैं गहन अंधेरों के बीच रोशनी की मीनारें भी
ये रहस्यमयी और चमत्कारी मीनारें
समझाती रहती हैं मुझे गाहे-बगाहे जीवन के अर्थ
यादों के फड़फड़ाते हुए अदृश्य पंख
हवा करते हैं मेरे प्रेम की क़ब्र पर
और सोख लेते हैं उस क़ब्र पर गिरते मेरे आंसू
उसके होने के गवाह हैं
ये पंख…ये मीनारें…ये क़ब्र और मेरी आँखों से गिरते शबनम के क़तरे.
क़ब्र की निगरानी करता हुआ मातमी सन्नाटा
और मेरे दिल से निकलती दर्द भरी जिंदा आहें
क़ब्र के भेदों को बेशक़ न खोल पाती हों…
पर, अब भी मेरे बदन में  लिपटी…मेरा ख़ून चूसती प्रेम की शाखाओं और
प्रेम से हुई मौत की कहानी बयान करती हैं. 
उम्मीदें दफ़न हैं उस जगह मेरी
वहीँ सूखे हैं मेरे आंसू
खुशियाँ भी वहीँ लुटी हैं मेरी
मुस्कुराना भी वहीँ भूली मैं
जहाँ सबसे ज़्यादा प्रेम था.  
प्रेम की उसी क़ब्र के सिरहाने खड़े दरख़्तों के पास ज़मींदोज़ है मेरा ग़म और उसकी यादें
दरख़्तों के पत्ते उसे याद कर कांपते हैं
बर्फ़ीली तूफ़ानी हवाएं शोर मचाती हैं भटकती रूहों-सी और
नृत्य करती हैं मातम का.
2
प्रेम जैसे किसी शब्द में अविश्वास के बावजूद
हरपल एक दस्तक होती रहती है मेरे दिल पर
और रोशन रहता है उसका कोना-कोना
किसी की मासूम सरगोशियों की गवाह
जादू से भरी शानदार वादियाँ
मायूसी का जाल तोड़कर
और निखर-निखर जाती हैं…
उस दस्तक को सुनकर
उन रोशनियों में नहाकर
सलेटी आसमान-सा सिकुड़कर
बार-बार धक् से रह जाता है मेरा दिल
हवा से काँपता भी है
उसके थपेड़े भी सहता है
मेरी रूह कई-कई बार ख़ाली भी हो जाती है…
ज़िन्दगी की किताब कोरी रह जाती है
धरती की तरह मैं आसमान के सामने अपने सब राज खोल देती हूँ
और इस राज के खुलते ही
न जाने कब अनायास प्रेम
झरने में भीगी किसी जलपरी-सा 
उपस्थित होता है मेरे सामने
जो अपनी नर्म त्वचा को
सूरज की किरणों-सी मेरी तपिश में सुखा रहा हो
और मैं उस परिंदे की तरह उसकी तरफ फिर-फिर खिंचती चली जाती हूँ
जो तूफ़ान से पहले सहज भाव से अपने घोंसले की ओर जाता है.
जैसे कोई अजनबी आतुर भाव से अपने देश की ओर जाता है और
अपने देशवासियों को दूसरे देश की अतीत की कहानियां सुनाता है.
उस परी में
उस परिंदे में
उस अजनबी में
मैं अपने प्रेम की समस्या का समाधान लगातार तलाश कर रही हूँ.
3
प्रेम की अपनी एक भाषा होती है
अलौकिक भाषा…
जो अधिक मुखर होती है होंठों से…ज़ुबान से.
समयातीत यह भाषा
सम्पूर्ण सृष्टि में एक-सी होती है
और होती है एक शांत झील-सी
जो गाती हुई नदियों को अपनी गहराई में समेटकर उन्हें शांत कर देती है.
प्रेम पवित्रतम रूहों के इर्द-गिर्द फैले प्रभामंडल से फूटनेवाली किरणों से शरीर को आलोकित करता है
और छोड़ जाता है शरीर के पहाड़ों पर डूबते सूर्य के पीले चुम्बनों के निशान.
एक स्वर्गिक गीत है प्रेम
जो हर्ष से शुरू होकर विषाद पर ख़त्म होता है.
आत्माओं से ऊंची-ऊंची लपटें उठने लगती हैं
जब हम होते हैं प्रेम में.
प्रेम एक प्याला है
जो पिलाता है ख़ुशी और ग़म दोनों के घूँट.  
4.
कितना रहस्यमय, सम्मोहक और जादुई है तुम्हारा प्रेम
बिल्कुल किसी स्त्री के रूप और सौंदर्य की तरह
जो कभी खुलकर सामने आ जाता है
और कभी सौ परदों के पीछे छुप जाता है.
जिसे केवल छुआ भर जा सकता है
प्यार से…पवित्रता से…
उसे व्याख्यायित करने की कोशिश के साथ ही
वह भाप की बूँद-सा ग़ायब हो जाता है.
कभी-कभी मृत्यु से अधिक दर्दभरे मौन की तरह महसूस हुआ है मुझे तुम्हारा प्यार
मैं उसकी मौन वेदना की अनुगूंज सुनती रही हूँ लम्बी अवधि तक
वैसे ही
जैसे चेतन में मृत और अवचेतन में जीवित कोई व्यक्ति
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8 COMMENTS

  1. Bahut sundar . Laukik hote hue bhi Kisi alaukik sansaar mein le jaati hain ye kavitayen . Prem ko paas se ,door se , upar se neeche se , bheetar bahar se dekhti dikhati saadhaaran kavitayen

  2. प्रेम की परतों को लिखना तभी संभव है जब प्रेम की कंदराओं में विचरण करने का फुरसतिया वक़्त मिला हो, क्योंकि प्रेम को पढ़कर लिख देना सम्भव नही. कविताओं की भाषा, उनके महीन विश्लेषण, बताते हैं कि कवि मन कितना सह्रदय करुणा और अनुभूतियों से सरोबार है…मंजरी जी को साधुवाद प्रेम की रचनात्मकता को रेखांकित करने के लिए

  3. बेहद ख़ूबसूरत कविताएँ। ज्यों-ज्यों मंजरी की कविताएँ पढ़ता हूँ, लगता है, हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ कवियों में वे अपनी जगह बनाती जा रही हैं।

  4. Achchhi Kavitain. Bahut bahut Badhai va Shubhkaamna Manjari Ji ko …Bhai Ji ek post mein Paanch se adhik Kavitain na diya Karen. Dhanyavaad!
    – Kamal Jeet Choudhary ( J&K )

  5. वाकई उम्दा …. मंजरी जी के साथ साथ जानकीपुल को भी बधाई….

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