मेरी यात्राओं का यादगार हिमाचल

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युवा लेखक-पत्रकार स्वतंत्र मिश्र हिमाचल यात्रा के संस्मरण लिख रहे हैं. उनकी रोमांचक यात्राओं की दूसरी क़िस्त आज प्रस्तुत है- मॉडरेटर 
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पाठक और पत्रकार मित्र के घर दो दिन

मैंने तहलका से इस्तीफा दे दिया था और शुक्रवार 1सितंबर 2012 से ज्वाइन करना था। तहलका छोड़ने और शुक्रवार ज्वाइन करने के बीच 8-10दिनों का अंतराल मैंने रखा था। मैं इस बार अकेले घूमने जाना चाहता था पर रीना और शब्द दोनों ही जिद करने लगे। अंततः यह तय हुआ कि मैं पहले देहरादून अपने पत्रकार मित्र भास्कर उप्रैती के यहां दो दिन के लिए चला जाऊं फिर दो दिन बाद रीना और शब्द मुझे चंडीगढ़ में मिल लें और फिर शिमला घूमने चला जाए। भास्कर और उनकी पत्नी सुनीता ने मेरा स्वागत बहुत गर्मजोशी के साथ किया। भास्कर और सुनीता दोनों उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के हैं। सुनीता पैदा गुजरात में हुई। राजस्थान में पली-बढ़ी और बाद के दिनों में इनका परिवार अल्मोढ़ा क्षेत्र में जा बसा। दोनों ने काॅलेज के दिनों में एक वामपंथी छात्र संगठन में साथ-साथ काम किया और प्रेम भी। बाद के दिनों में दोनों ने विवाह भी कर लिया। इनके घर अक्सर दोस्तों का तांता लगा रहता है। अभी छह महीने पहले उनके घर में एक नए मेहमान की आमद बेटी यात्राके तौर हुई है। सुनीता और भास्कर से मेरी दोस्ती फेसबुक के जरिए ही हुई। सुनीता फ्रीलांसिंग के दौराना संडे पोस्टमें मेरे लेख पढ़ा करती थी। सुनीता प्रगतिशील लेखों को पढ़ती और अपने दोस्तों को भी पढ़ाया करती थी। अब तो दोनों ही सज्जन लोग मेरे अच्छे मित्रों में से हैं। भास्कर के छोटे भाई के साथ दूसरे दिन देहरादून स्थित बौद्ध विहार घूमने गया। वे ही मुझे द दून स्कूलमें इन दिनों पढ़ा रहे मेरे काॅलेज के मित्र राशिद सफरुद्दीन से मिलवाने ले गए थे। सुनीता ने गढ़वाली व्यंजन कुछ-कुछ बिहार में तली हुई लिट्टी की तरह का बनाकर खिलाया। ये देहरादून में वरिष्ठ कवि वीरेन डंगवाल और उनके भाई-बहनों के साझा मकान में वर्षों से रह रहे हैं। अगले दिन भास्कर मुझे देहरादून से 80-85 किलोमीटर दूर डाक पत्थर बांध ले गए। यहां यमुना अपने पूरे शबाब पर दीखती है। यह अगस्त का महीना था इसलिए पानी मटमैली थी अन्यथा यहां यमुना का पानी साफ है। पोंटा साहिब गुरुद्वारे के पीछे भी यमुना स्वच्छ दिखती है अन्यथा दिल्ली और आगरा में तो वह बड़े नाले से ज्यादा का औकात नहीं रखती है।

सिद्धू के हाथ की रोटी और चंडीगढ़ की एक रात

रीना को चंडीगढ़ रात में शताब्दी से पहुंचना था इसलिए दो दिन के प्रवास के बाद मैंने भास्कर और सुनीता से विदाई ली और देहरादून और पोंटा साहिब होते हुए हम दोपहर में जसपाल सिंह सिद्धू के चंडीगढ़ वाले मकान पर आ धमके। चंडीगढ़ वाला मकान इसलिए कह रहा हूं क्योंकि इनके पास भठिंडा, दिल्ली और पंजाब के पुहली गांव में भी मकान है। एक मकान ग्रेटर नोएडा वाला उन्होंने कुछ साल पहले ही बेचा। सिद्धू बहुत सादगी से रहते हैं और उनका जमाना भी इस सादगी को ही सलाम करता था। सिद्धू जी की पत्नी किसी काम से बाहर गई हुई थीं इसलिए उन्होंने अपने और मेरे खातिर रोटी पकाई। गप्पें मारते-मारते शताब्दी के आने का समय हो गया। मैं शब्द और रीना को लेने स्टेशन पहुंचा। शब्द रेन कोट में था। पता चला दिल्ली में घर से निकलने के बाद बारिश में दोने गीले हो गए थे। हमारे लिए रात में रूकने का इंतजाम एसजीपीसी (श्री तेग बहादुर प्रबंधन कमेटी) के गेस्ट हाउस में था। चंडीगढ़ में मूसलाधार बारिश हो रही थी। बारिश के रूकने के बाद हम पास ही एक ढाबे में खाने गए। दूसरे दिन सुबह होते ही हम शिमला के लिए निकल पड़े। चंडीगढ़-शिमला हाइवे पर गाड़ी को गति में आने में कोई दिक्कत पेश नहीं हो रही थी। कालका के बाद धीरे-धीरे हम ऊंचाई तय कर रहे थे। मैं पहली बार पहाड़ों में गाड़ी चला रहा था। रीना को थोड़ा डर भी लग रहा था कि पता नहीं कहीं चूक हो गई तो फिर सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बचेगी। लेकिन मुझे अनुभवी ड्राइवर की तरह गाड़ी चलाते देख कुछ ही देर में उसका यह डर काफूर भी हो गया था। पहाड़ों पर घने वन और उसके ऊपर उड़ते कहीं हल्के तो कहीं घने बादल रमणीयता प्रदान कर रहे थे। मेरी दाई ओर खाई थी जिसकी ओर देखकर एक बात महसूस हो रही थी कि मनुष्य कितना जीवट प्राणी होता है और जीवन कितना प्रेरणास्पद कि उसे ऐसे कठिन रास्तों को आसान करने के लिए हमेशा प्रेरित करता रहता है। हम पहाड़ों के इन रास्तों को देखते हैं तो लगता है कि हमारे बीच कितने दशरथ मांझी हैं, जिनके श्रम का हमारी शासन व्यवस्था में कोई सम्मान नहीं है। मैं लगातार गाड़ी चलाता रहा भूख लग रही थी इसलिए कहीं रुककर नाश्ता करने का ख्याल मन में आ रहा था। बद्दी में हमने नाश्ता किया। यहां की खूबसूरत वादियां फोटोग्राफी के लिए उकसा रही थी। शब्द ने खूब सारे तस्वीर उतारे। हम दोपहर में शिमला पहुंच गए। हरनोट जी नेे हिमानी होटल में कमरा बुक करवा दिया था। दस साल के दौरान हरनोट जी को मैंने पाया कि वे बड़े कहानीकार के साथ आदमी भी बड़े हैं।
शिमला में जाम अब आम है
शिमला में चुनावी रैलियां हो रही थीं इसलिए चंडीगढ़ से ढाई-तीन घंटे का समय लगने की बजाए हमें वहां पहुंचने में पांच घंटे लग गए। शिमला में 10 साल के दौरान निर्माण का काम बढ़ा था। मैंने अपनी गाड़ी पार्किंग में लगा दी और यह तय किया कि अब यहां का ड्राइवर और यहां की गाड़ी में ही घूमेंगे। होटल पहुंचकर कपड़े बदले और हरनोट जी के दफ्तर माॅल रोड पहुंच गए। हरनोट जी से उनके दफ्तर में मेरी यह आखिरी मुलाकात थी। अब हरनोट जी हिमाचल पर्यटन से रिटायर हो चुके हैं और पूरा समय साहित्य सेवा में लगा रहे हैं। उनके साथ चाय पी और अगले दिन के लिए नालदेहरा और तत्ता पानी जाने की योजना बना ली। झाखू मंदिर स्थानीय तौर पर चलने वाली सवारी गाड़ी क्वालिस में दस-दस रुपये प्रति सवारी देकर पहुंचे। यहां के ड्राइवर गाड़ी नहीं चला रहे थे मानों वे कोई जादू कर रहे हों। जरा सी जगह में गाड़ी बहुत रफ्तार के साथ घुमा लेना और सामने की गाड़ी को निकालने के लिए खुद की गाड़ी को पीछे करने में उनकी कलाइयां मानों माहिर हो चुकी थीं। इस बार झाखू मंदिर में जमा सैकड़ों में से कुछ बंदर हमारी ओर आए और हमारे हाथ की प्लास्टिक की थैली किसी सीआइएसएफ के जवान की तरह टटोलने लगे। उन्हें खाने को कुछ नहीं दिखा तो वे शराफत से अपनी जगह लौट गए। भक्त इन्हें यहां भरपूर खाने खिला देते हैं इसलिए ये यहां ही बस गए हैं। अगर इन बंदर का हेल्थ चेकअप करवाया जाए तो पता चले कि ये किन-किन बीमारियों से ग्रसित हैं? बगैर श्रम के भोजन की खुराक कितनी लेनी है इसका अंदाजा जाता रहता है और उसे पचाने में शरीर की क्षमता भी जाती रहती है और नतीजा यह होता है कि कई तरह की बीमारियां ऐसे सुस्त शरीर को घेरने लगती हैं। यहां से लौटकर हम माल रोड पर सुस्ताने के लिए घंटों बैठे रहे। शाम घिर आई। बरसात की इस शाम का आलम क्या कहिए, कभी बादल हमारे करीब से गुजरकर चले जा रहे थे तो कभी हल्की-हल्की बारिश की फुहारें मुझे अंदर तक गीला कर रही थी। होटल पहुंचकर दूसरे दिन सुबह के लिए टैक्सी तय कर ली और हम टीवी देखते हुए ऊंघने लगे। अब सोने के अलावा कोई रास्ता नहीं था।
ठंडा नालदेहरा और तपता पानी
सुबह आठ-नौ बजे हम तैयार थे। टैक्सी वाले ने आने में थोड़ी देर लगा दी। मिलने पर देरी का कारण पूछा तो उसने बताया कि रैलियों की वजह से देर हो गया। खैर हम नालदेहरा के लिए चल पड़े। रास्ते में भूख लगी तो टैक्सी वाले से कहा कि खाने की ढंग की किसी जगह पर रोक देना। उसने ढंग की जगह से महंगी जगह से लगा ली। वहां अलग से एक छोटी सी पूरी के 25 रुपये चुकाने पड़े। मैं होटल वाले से थोड़ा तर्क-वितर्क करने लगा। रीना जी ने बीचबचाव किया और समझाया लड़ा-झगड़ा मत करो। उसकी बात सच ही थी कि महंगाई बढ़ाने के लिए देश के वजीर-ए-आला या वित्त मंत्री कौन सा सुगढ़ तर्क देते हैं। वे भी महंगाई बढ़ने के पीछे अजीबोगरीब तर्क ही देते हैं और आम जनता को इस कठिनाई से निपटने के लिए तैयार रहने को कहते हैं। महंगाई बढ़ाने की छूट देने का मतलब माल कूटने का अवसर देना ही तो है तो फिर ये छोटे-छोटे फुटकर वाले क्यों इससे परहेज करें? थोड़ी दूर निकल आने पर मेरा गुस्सा भी दूर जा चुका था। हम गोल-गोल घूमते हुए नालदेहरा गोल्फ कोर्स पहुंच गए। यहां घोड़े और उसे खींचने वाले नेपालियों की हालत में कोई सुधार नहीं दिखा। बरसात की वजह से रास्ता बेहद कीचड़मय हो गया था। रीना जी ने रास्तों की भयावहता को देखकर सरैंडर कर दिया। मैं और शब्द अलग-अलग घोड़ों पर चलते रहे। शब्द मम्मी के भय का मजाक उड़ाता रहा। घोड़ेवाला हमें दूर-दूर से नौ प्वाइंट (साइडसीन)  दिखाता रहा। शब्द ने घोड़ेवाले से घोड़े का नाम पूछ लिया और अब वह घोड़ों को नाम से बुलाता रहा और पुचकारता रहा। ऊंचाई से नीचे की ओर देखने पर सारे घर एक जैसे दिख रहे थे। यहां से हम अब तत्तापानी यानी तपता पानीगए। नालदेहरा एक ओर जहां ऊंचाई पर था तो तत्तापानी इसके ठीक उलट निचले हिस्से में। यह ब्यास नदी में स्थित था। गर्म पानी वाले जगह में पाइप लगाकर कृत्रिम हौज में पानी भर लिया जाता है। पानी इतना गर्म कि सीधे बदन पर नहीं डाला जा सकता है। हमने हौज में ठंडे और गर्म पानी को मिलाकर भर लिया। हम तीनों इस हौज में घुस-घुसकर बहुत देर तक डुबकियां लगाते रहे। थोड़ी दूरी पर बह रही नदी में पानी से बाहर की ओर निकले पत्थर पर बैठी एक उदास लड़की को देखकर हम इस आशंका से भरे रहे कि कहीं वह आत्महत्या करने तो नहीं आई है। कुछ घंटे निकल जाने के बाद हमने होटल वालों से अपनी आशंका साझा की। मेरी एक आशंका यह भी थी कि बरसात में पहाड़ों में नदियों में कब जल का स्तर बढ़ जाए, इसके बारे में कोई नहीं बता सकता। हमें हरनोट जी के नाम से यहां भी बिल पर राहत मिल गई। हमने खाना भी यहीं खाया। रेत पर शब्द ने आई लव यू पापा, आई लव यू मम्मी लिखा और मिटाया।हमने शब्द को रेत के घरौंदे बनाना भी सिखाया। हम आनंदित होकर शिमला के लिए रवाना हुए। रात में मेरे खाने की इच्छा नहीं हो रही थी इसलिए बटर टोस्ट और वेजिटेबल सूप पीकर काम चलाया। सुबह-सुबह दिल्ली के लिए रवाना होने के लिए पार्किंग में गाड़ी लेने गए तो वहां लाख ढूंढने के बाद भी केयरटेकर नहीं मिला। तीन दिन की पार्किंग का छह सौ रुपये हम मजबूरन वापिस साथ ले आए।
बुजुर्ग अंग्रेजीदां सेब व्यापारी
रास्ते में एक 55-60 साल का बुजुर्ग सेब लिए खड़ा था। वे शानदार हिंदी-अंग्रेजी में बात कर रहे थे। हमने खूब सारे सेब खरीदे। बद्दी के उसी रेस्तरां में हमने दोबारा नाश्ता किया जहां चंडीगढ़ से शिमला आते वक्त किया था। मैं नाश्ता करने के बाद इस मूड में था कि अब सीधे दिल्ली घर पर गाड़ी रोकी जाए। मैं लगातार गाड़ी चला रहा था। कालका-चंडीगढ़-करनाल-पानीपत गुजरने के बाद शब्द ने जोर से कहा- पापा अब तो रोक दो, सूसू आ रही है।मैंने एक पेट्रोल पंप पर गाड़ी रोकी और 10-15 मिनट आराम करने के बाद फिर से चल पड़ा। शाम को कोई आठ घंटे गाड़ी चलाने के बाद हम अपने घर पहुंचे तो गाड़ी की मीटर बता रही थी कि मैंने पांच-छह दिन में कुल 1100किलोमीटर से ज्यादा गाड़ी चला ली है। थके-मांदे हमने खिचड़ी खाई और बिस्तर पर बदहवास सोने चले गए। दूसरे दिन सब अपने-अपने काम में जुट गए।

                                  (4)
                   विस्थापित तिब्बतियों का धर्मशाला

भांजे की शादी से लौटने के बाद रीना और शब्द के हमले मुझे बाहर घुमाने ले जाने को लेकर बढ़ गए। मैंने इन्हें अपनी मनःस्थिति और व्यस्तताओं से वाकिफ कराया और मां-बेटों को अकेले घूमने जाने को प्रेरित भी किया। पहले एक-दो मौकों पर वे दोनों अकेले घूमने गए भी लेकिन उनका मन मेरे बगैर नहीं लगता। कई बार रीना जी अपने भाई, बहन या मां के साथ घूमने गईं लेकिन उनका कहना है कि वे मेरे साथ ज्यादा अच्छा महसूस करती हैं। बाहर घूमने जाने का मतलब अपने कार्यालय की पस्त हो चुकी मानसिकता से भी बाहर आना था। मैंने उनसे कहा कि हम सप्ताह के आखिरी दिन यानी 23 जून 2014 को दफ्तर का काम करके और शाम की बस से धर्मशाला निकल जाएंगे। हमने हिमाचल पर्यटन की बस में तीन सीटें जाने और तीन सीटें आने की बुक करा ली। मंडी हाउस स्थित हिमाचल भवन से रात आठ बजे की बस थी। इस बार मेरे पास स्मार्टफोन था और उसमें इंटरनेट भी। मैंने दिल्ली से ही फेसबुक की दुनिया के मित्रों को फोटो डाल-डालकर आतंकित करना शुरू कर दिया था लेकिन उन्हें क्या पता कि मेरे बगल वाली सीट पर बैठे भारी-भरकम कदकाठी वाले अंकल जी ने रास्ते भर मुझे कितना आतंकित किया था? वे रातभर टायर से बाहर निकल गए टयूब की तरह मेरे शरीर पर बार-बार पसर जाते थे। बस ऊना में लगभग चार बजे रुकी तो मैंने अंकल जी से शिकायत दर्ज की और कहा कि अब थोड़ा अपने शरीर को नियंत्रण में रख लें तो मैं भी थोड़ी देर सो जाऊं। मोटा आदमी अपना बोझ चाहकर भी लंबे समय तक अपने नियंत्रण में नहीं रख सकता, नतीजा यह हुआ कि वे फिर उसी मुद्रा में मेरे ऊपर लुढ़क गए। सड़के धीरे-धीरे ऊंचाई की ओर बढ़ रही थीं। सड़कें इतनी अच्छी कि मेरे मन में यह खयाल आने लगा कि काश! मैं अपनी गाड़ी से ही चला आता। रास्ते में कजरिया टाइल्स, मैक्डोनाॅल्ड, अलग-अलग बैंकों के एटीएम इस बात की गवाही दे रहे थे कि पूंजीवादी व्यवस्था मुनाफा के लिए हर यत्न करती है। वह पहाड़ और मैदान में कोई भेद नहीं करती। बैंकों के एटीएम इस बात के प्रति पर्यटकों को विश्वस्त कर रहा था कि यदि तुम्हारे खाते में पैसे हांे, यदि तुम्हारे पास क्रेडिट कार्ड हो तो मैं हमेशा तुम्हारे लिए तैयार हूं। सुबह सात बजे हम हिमाचल पर्यटन के होटल कुणाल में पहुंच गए थे। इस भीड़ वाले मौसम में हरनोट जी की कृपा से ही मुझे यहां कमरा मिल पाया था। निचले धर्मशाला में कोतवाली बाजार स्थित होटल कुणाल में जो कमरा हमें मिला था उसकी लोकेशन बहुत शानदार थी। कमरे में लगे शीशों के पार धौलाधर पर्वतमाला पर कायनात पसरी हुई थी और हम नंगी आंखों से देख पा रहे थे। पहाड़ों की चोटियों पर प्रचुर मात्रा में बर्फ यहां से वहां तक पसरी हुई थी। हम वहां जाना चाह रहे थे लेकिन होटल मैनेजर ने बताया कि वहां जाने के लिए पूरे दिन ट्रैकिंग करनी होगी। शब्द उत्साह दिखा रहा था पर हम दोनों को अपनी हैसियत का पता है सो दूर से ही कुदरत की चित्रकारी का आनंद लेते रहे।

बैल से कानाफूसी, चाय बगान और न्यूग्ल कैफे

हमने नहा-धोकर कमरे में ही वेज कटलेट, ब्रेड और चाय मंगवाई। खाना बहुत साफ-सुथरा और जायकेदार भी था। होटल के मैनेजर से कहकर अपने लिए एक प्राइवेट कार दो दिनों के लिए बुक करा ली। आज के दिन हमने तय किया कि हम धर्मशाला के बाहर घूमने जाएंगे और कल धर्मशाला और कांगड़ा। हम नौ बजे सुबह निकल पड़े। यहां भी ठीक-ठाक गर्मी हो रही थी। हम पालमपुर होते हुए करीब 35-40किलोमीटर दूर बैजनाथ मंदिर गए। रास्ते में चाय के यहां-वहां पसरे बगान देखकर हम कई बार रुके। चाय की पत्तियों को छुआ। फोटोग्राफी की। यहां भूगोल की किताब में पढ़ी जानकारी थोड़ी गलत या आधी-अधूरी लगने लगी थी। मैंने यह पढ़ रखा था कि चाय की पत्तियां को तोड़ने के लिए छोटे बच्चे या महिलाओं को लगाया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि चाय की पत्तियां बहुत कोमल होती है। हमने चाय की पत्तियों को खूब छुआ और उसकी कोमलता को महसूस करने की कई असफल कोशिश की। यह संभव हो कि दार्जिलिंग के चाय बगान की पत्तियां कांगड़ा के चाय की पत्तियों की तुलना में ज्यादा कोमल होती हों। बिहार के स्कूल टेक्स्ट बुक में दार्जिलिंग के चाय बगान का ही वर्णन संभव है क्योंकि दार्जिलिंग बिहार की सीमा से लगभग लगता हुआ है। जो भी हो मैंने कांगड़ा की हरी और काली चाय अपने लिए खरीदी।

बैजनाथ मंदिर से पहले सड़क के साथ बहुत छोटी-छोटी धारा वाली बैजनाथ नदी बह रही थी और बारिश के इंतजार में थकी हुई सी मालूम पड़ रही थी। किसानों की तरह, परदेस गए पिया को ढूंढती प्रेमिका की आंखों की तरह इस नदी को भी सावन के बरसने का इंतजार था। आखिरकार हम बैजनाथ मंदिर पहुंचे। यह मंदिर पत्थरों को काटकर बनाया गया है। मंदिर की शैली आकर्षित करती है। यहां शिव की सवारी नंदी बैल के कान में महिलाएं और लड़कियां अपनी मांग सूची डाल रही थीं। मैंने एक लड़की से पूछा-क्या कह रही इनके कान में?’ उसने थोड़ा शर्माकर कहा- अपनी मन की बात।मैंने पूछा- क्या किसी की मुराद पूरी भी हुई है?’ इस सवाल का जवाब न ही उसने दिया और न ही कभी किसी लड़की के कान में कुछ भी मांगने पर नंदी ने भी सहमति में सिर हिलाया था। बाहर आकर गन्ने का रस पीने पर थोड़ी ताजगी महसूस हुई। चामुण्डा देवी मंदिर में भक्तों की लंबी भीड़ और गर्मी की वजह से रीना ने बाहर से चलने का प्रस्ताव दिया और हम सदा की तरह मान गए। वहां से हम न्यूगल कैफेगए। इस कैफे में पीछे से आ रहे बांदला गांव की ओर से सरकती हुई न्यूग्ल  नदिका के पानी को कैंपस के अंदर से रास्ता दिया गया था। इसके दोनों ओर सीढि़या थीं। पानी कम पर ठंडी थी। थकान मिटाने के लिए हमने भी खुद को इसके हवाले कर दिया। शब्द को पानी में मजे करना बहुत छुटपन से ही अच्छा लगता है। उसने खूब धमाचैकड़ी की। एक किनारे पर बंदरों का एक झुंड गर्मी से राहत पाने के लिए एक-दूसरे की गर्दन पकड़कर पानी में डुबोने का खेल रच रहा था। यहीं हमने तवे की रोटी के साथ स्वादिष्ट सब्जी, दाल और चावल भी छककर खायी। अब हम धर्मशाला की ओर वापसी के लिए मुड़ गए थे। रास्ते में सरदार सोभा सिंह के नाम पर स्थापित आर्ट गैलरी है जिसे अंग्रेजी के प्रसिद्ध स्तंभकार लेखक खुशवंत सिंह के पिता सर शोभा सिंह की आर्ट गैलरी के रूप में भी कई बार बता दिया जाता है. गोपालपुर स्थित चिडि़याघर में भालू, हिरण, तेंदुआ, शेर के अलावा कई सार

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