मनीषा कुलश्रेष्ठ की कहानी ‘रक्स की घाटी और शबे फितना’

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समकालीन हिंदी-लेखिकाओं में मनीषा कुलश्रेष्ठ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. अलग-अलग परिवेश को लेकर, स्त्री-मन के रहस्यों को लेकर उन्होंने कई यादगार कहानियां लिखी हैं. उमें स्त्री-लेखन का पारंपरिक ‘क्लीशे’ भी कभी-कभी दिख जाता है तो कई बार वह उस चौखटे को तोड़कर बाहर भी निकल आती हैं. जो लोग यह समझते हैं कि स्त्री-लेखन देह और गेह तक ही सिमटा हुआ है उनको मनीषा जी की यह नई कहानी पढनी चाहिए जिसमें स्वात घाटी के मौसम हैं और वहां के परिवेश का तनाव. निश्चय ही वे अपने लेखन से हिंदी में स्त्री-लेखन के एक ध्रुवांत की तरह हैं. कल हमने दूसरे ध्रुवांत की लेखिका की कहानी पढ़ी थी. ये सब हिंदी स्त्री-लेखन के अमिट रंग हैं- मॉडरेटर =================================================================== 
वे तीनों रात भर हल्के हरे पत्तों के बीच अपने सफेद चेहरे और गुलाबी से बैंगनी पड़े होंठ छिपाए रहीं, बैंगनों और शलगमों के इस खेत में वे तीनों अविचल खेत का ही हिस्सा लग रही थीं, उनके गहरे सलेटी लबादे उनके जिस्म पर मटमैली, बारूदी चाँदनी की तरह लिपटे थे, सबसे छोटी ग़ज़ाला के चेहरे पर बन्धा स्कार्फ खुल कर उड़ा जा रहा था, उसे अपने दिल की धड़कनें तक अज़ाब महसूस हो रही थीं, मानो कि सीने में फूटते कोई छोटे छोटे विस्फोट, अनवरत !
खेत की पानी भरी नालियाँ तक सहम गईं थीं. बहना बन्द कर चुकी थीं या कि सहम कर चुपचाप बह रही थीं. मौसम तक के लिए चौकन्नेपन का यह अभ्यास नया था, चचा और चचाज़ाद भाई और पिता के नए रवैय्ये…और राजनैतिक समीकरण…मौसमी थे कि स्थायी?  इनमें से कोई समझ नहीं पा रहा था.
खुदा जाने. अब्बू को क्या हुआ. नक़ाब के हिमायती…वो कब से हुए? गीले लबादे को निचोड़ते हुए एक गुलाबी से बैंगनी पड़ा होंठ खुला.
कभी तो चुप रहा करो, मुश्किल वक्त है, ग़ुज़ार जाओ.
दो सहमे गदराए बैंगनी होंठ हरी लताओं में हिलते हुए फुसफुसाए. आकाश में पीले सितारों के कुछ झुण्ड अजीब तरीक़े के आकार में बन बिगड़ रहे थे.
देख हिरण..कमसिन ग़जाला ने बहनों को बहलाने की नाक़मयाब – सी कोशिश की .
और अब देखो ज़रा ?” लुबना ने गहरी आँखों से आकाश में देखा.
बिच्छू..! ग़जाला सिहर गई.
जाने दे, इन सितारों का क्या है ये तो खेल – खेल में खंजर बन जाते हैं कभी सलीब…डर मत, घर चल, सुबह होने को है देख, वो भोर का तारा, इसे ही अंजुम कहते हैं.गुलवाशा ने कहा.
चलें?”
चले गए होंगे वो लोग?”
डर मत…सब ठीक कर लिया होगा अब्बू ने.
एक भारी और उदास मर्दाना आवाज़ और कुछ पतली खिली कमसिन आवाज़ों का कोरस बादलों से खाली रात में पहाड़ से टकरा कर एक तिलिस्म बुन रहा था. नीचे घास पर सफेद नन्हे फूल और आकाश में तारे  खिल रहे थे.
ऎसे मुश्किल वक़्त में महफिल? किस की शामत आई है?
लुबना, तू हमेशा ग़लत ही सोचेगी, लगता यह कोई मजहबी मजलिस है.गुलावाशा ने आश्वस्त किया और मन ही मन महफिल की सलामती की दुआ की.
उस हरे – जामुनी खेत के साथ बकरियों का एक बाड़ा था, जिसके तीन तरफ कच्चे मकानों की दीवारें और सामने की ओर आड़ी-तिरछी लकड़ियों और काँटेदार झाड़ियों का ऊँचा-नीचा जंगल था। जंगल के रास्ते से बाहर आकर वे शहर के सबसे अँधियारे कोने पर खड़ी थीं. गली दर गली वे दोनों संगीत गली के मुहाने पर पहुँची,  वहाँ सन्नाटा ओढ़े, संजीदा खड़ी उनकी सँकरे गलियारों वाली हवेली थी,  हवेली की नीचे की मंज़िल पर कोई नहीं था, महज कुछ नौकर और बूढ़ी मामा देर रात के उन अनचाहे मेहमानों की रसोई निपटा करके ज़रा सोए ही थे.  दूसरी मंजिल पर भी अब्बू के कमरे में चाय की प्यालियाँ तकरीबन दस – बारह प्यालियाँ रखी थीं. तीसरी मंजिल पर मरहूम दादी अम्मां के कमरे में अब्बू – अम्मी नमाज़ से उठ कर बैठे ही थे, जब वे तीनों वहाँ पहुँची तो, अब्बू बड़बड़ा रहे थे.
बीबी, ज़िन्दगी का हर उजाला छिनता जा रहा है, मगर मुझे फिर भी अँधेरे से प्यार नहीं हो पाता, न जाने क्यूं?”
अँधेरे से किसे प्यार हो सकता है जी, ऎसी अजीब बातें क्यों? “
हो जाता है, देखो न ज़्यादातर चले गए, रक़्स की ये घाटी छोड़ कर अपने गीत और फन छोड़ कर. हमारे खुद अपने सगे ये हवेली छोड़ गए. जो बचे उन्होंने अपने इस पेशे को खुद ही छोड़ दिया. ये बर्बादी इतनी आहिस्ता से होती है कि हमें इसकी आदत पड़ जाती है. इस घाटी की असल रूह तो यहीं भटकती है, शलगम के खेतों में. ……..अहा…देखा, ये देखो आ गईं मेरी रूह की तीन परियाँ.. अब्बू ने तीनों को अपने चौड़े सीने में भर लिया, तीन फाख़्ताओं की तरह. अब्बू के बदलते सुर को तीनों पहचान गईं, और उस बेसाख़्ता प्यार पर उदासीन रहीं. अपने लबादे उतार कर खूंटियों पर टाँगने लगीं, लुबना ने अपनी साटिन की सफेद सलवार पर से घास के हरेपन को झाड़ते हुए पूछा,
वो लोग चले गए अब्बू?”
……….” 
अबके बार क्या फरमान छोड़ा?’’ 
 वही कि….बता तो चुके हैं. बार बार क्या बताना, इस बार तो वो बस भूखे थे, ढंग का खाना खाना चाहते थे.
फिर भी, कुछ तो कहा ही होगा.
हाँ कहा तो है,  कि वे इस शर्त पर हमारी हवेली नहीं जला रहे कि हमारा परिवार और हमारे लोग जो कभी बेहूदा फिल्मी गाना – बजाना नहीं करते, न हमारी लड़कियाँ नए चलन के कपडे पहन कर नाचती हैं, मगर जो हमारी हवेली और गली का पारम्परिक नाचना-गाना और बजाना है, अब वह भी बंद कर दें. ग़ज़ाला का स्कूल भी बन्द हो रहा है, टीचरों को भगा दिया जाएगा. हरे शाक की टोकरी सँभालती अम्मी बोलीं.
स्कूल भी? टीचर भी!!!
तभी बूढ़ी मामा फिर्दौस का पोता सुहैल भीतर आया हाँफता हुआ…और वह जो बोल रहा था उसका मतलब जो भी हो, सबके कानों तक बस यही पहुँचा.
टूटे रबाब, सारंगियाँ, ज़मीन पर लिथड़ते साफ़े..झुके मर्दाना सिर  हेयरपिंस, जूड़ा पिन और टूटे बाल…टूटे गजरे….नुचे और नीले पड़े जनाना जिस्म. अभी जहाँ शादी का जश्न था, संगीत गली की नर्तकियाँ समूह में अपने गोरे रंग और दहकते अनार गालों के साथ, दो लम्बी चोटियाँ आगे डाले, सुर्ख लबादे और स्कार्फ मे सर बाँधे, चाँदी के झाले लटकाए नाच रही थीं..कि अभी जैसे किसी नरभक्षियों के समूह ने तबाही मचा दी हो.
ओह! जिसका डर था, वही हुआ लुबना.
हाँ….मुझे डर नहीं इस होनी का यकीन था.
क्या नई बात? जब फरमान है तो क्यों चोरी से नाचना गाना? शहला की चौक में औंधी पड़ी लाश सब भूल क्यों गईं? और उस घर के मर्द? मुझे तो नाच गाना शुरु से ही पसन्द नहीं.माँ के साथ जहेज़ में आई , मामा फिर्दोस अब्बू के लिहाज़ में दुप्पट्टे की आड़ करके बोली   
फिर्दोस नन्ना, न आपको न आपकी प्यारी ‘बिटिया’ हमारी मम्मी को  नाच – गाना आता भी तो नहीं…ग़जाला चहकी.
आने को इसमें कौनसा…ख़ास…है? यह भी कोई कशीदाकारी कि नक्काशी का काम है?मामा फिर्दोस बुरी तरह कुढ़ गई. 

सही कहती है फिर्दोस, यह नाच – गाना जब जान की अज़ाब बन गया है तो बन्द क्यों न हो ही जाए पूरी तरहा…यूँ भी हमारा तो हमारे मज़हबी कानून में यकीन रहा है मैदान के इलाके से ब्याह कर लाई गईं, ‘अम्मी’ ने भी उन्हीं लोगों की तरह फरमान सुना दिया.
बीबी, तुमने साबित कर दिया न….कि ये बर्बादी इतनी आहिस्ता से होती है कि हमें इसकी आदत पड़ जाती है. तुम जब हमारे साथ आईं थीं तो हैरां थीं कि हम वादी के लोग बाकि ज़मीन के लोगों से ज़्यादा खुले दिमाग़ और ज़िन्दादिल हैं, हमारी औरतें, घुटन में नहीं रहतीं, न नक़ाब पहनती हैं. तुम ही थीं जो फिदा हुई थीं, हमारे गीतों पर और कहा करती थीं कि इन गीतों में दर्दमन्दी है, मगर इन पर नाचती हुई औरतें, मस्ती में नाचती हैं कि ये गीत जश्न के गीत हों. आज तुम इस कला को मज़हबी जंजीर में बाँधने लगीं…  है ना अजीब बात! अब्बू की इस जहन कुरेद देने वाली बात पर अम्मी आह भर कर चुप हो गईं.
चलो! नीचे चलें.वह बेइरादा उठ खड़े हुए। अम्मी और अब्बू दोनों सीढ़ियाँ उतरने लगे। पीछे पीछे वे तीनों. उतरते-उतरते पहले मोड़ पे अब्बू ठिठके और अँधेरे जीने से बाहर उस रोशनदान में देखने लगे जिसमें से नजर आने वाला रोशनदान और उससे परे फैले हुए दरख्त एक विचित्र दुनिया-सी लगते थे।
अब्बू की दहशतजदा आँखें जीने के अँधेरे में कुछ और ज्यादा दहशतजदा लग रही थीं। माँ डर गईं जब पिता ने हार कर कहा तुम ठीक ही समझती हो इस सियासत को बीबी, अब रक्स – घाटी की इस संगीत गली में बची हुई औरतों को समझाना तुम्हारा काम…देखो दुबारा संगीत गली से प्रायवेट शादी ब्याहों में कोई न जाए तो बेहतर. बस कुछ दिन की बात…फिर वही दिन लौटेंगे.
तुम तो ख्वाब की सी बातें कर रहे हो,”  अब्बू के पीछे आती अम्मी ने हताश हो कर कहा।
वक्त की मनहूस चाल के चलते वैसे ही इस हवेली के रंगीन काँच की खिड़कियों वाले हॉल, जालों से भर गए थे. चचा की सारंगी और उनके नवजवान बेटों के नाज़ुक गलों की अनुपस्थिति से हवेली मनहूस हो गई. शाम से ही रेवन कव्वों का शोर इसे मनहूस बना देता था. फिर रात के ढलते सन्नाटे में गोलियाँ चलने की फट फट आवाज़ आती थी. मरते हुए गले उस ऊपर आसमान में बैठे किसी काल्पनिक खुदा और जन्नत का नाम लेते और न जाने किस भाषा में गोली मारने वाले कोई लोग शोर उठाते उसी क्रूर मालिक के नाम का. एक दिन फिर ऎसा हुआ, ग़जाला ने खुद सुना…बस उस रात के बाद अब्बू लौटे ही नहीं…
ग़जाला ने उन दिनों स्कूल की कॉपी में जो लिखा, वही बस बच रहा…..
1.
ये आवाज़ें पेट में बवंडर उठाती हैं और दिमाग में ख़ला जम कर बैठ जाती…जिस्म मर जाता है. पूरे वज़ूद में हवेली का सा सन्नाटा पसर जाता. तब इस हवेली के भरे पूरे जवान दिन याद आते. बचपन के दिन जब नींद ही अब्बू और उनके भाईयों के रबाब और दिलरुबा की जुगलबन्दी से खुला करती थी…जब दूधिया मकई के खेतों और जलते पलाशों का मौसम हमारे लिए हुआ करता था….हम बच्चे स्कूल जाते और स्कूल से लगे धान के खेतों में उड़ते  ड्रेगन फ्लाई की पूँछ में धागा बाँध कर हैलीकॉप्टर बनाते थे, अब धुँआ उगलते हैलीकॉप्टर रॉकेट लाँचर के साथ वादी के स्कूलों को तबाह करने आते हैं.
बीते हफ्ते मसहबा को उन लोगों ने मार के कब्रिस्तान में फेंक दिया, वह अपनी स्कूल ड्रेस पहने थी. ….बेवकूफ थी क्या? स्कूल तो कबके बन्द हुए थे, स्कूल टीचर कब की मैदान की तरफ चली गई, इमारत उधड़ी पड़ी है. मेरा टीचर बनने का ख्वाब भी…….
अब्बू तो कहते थे कि सरकार सिनेमाघर बचाये न बचाए हमारे स्कूल बचाएगी, अब्बू मर गए, अब किस से ज़िरह करूँ?
2.
मेरी दोनों बड़ी बहनें बहुत अलग थीं, गुलवाशा जैतूनी और लुबना खुबानी की रंगत की थीं, उनकी तीखी नाक और बड़ी आँखें उन्हें बेइन्तहाँ खूबसूरत बनाती थी, मैं ही घर भर में अलग थी, सादा और पढ़ाकू जिसका ताना अब्बू अकसर अम्मी को अकसर दिया करते…
गुलवाशा की… यह जैतूनी रंगत ही उसका ख़ासमखास लिबास थी, और जिस्म की लचक उसका बेशकीमती गहना…अंग अंग में कम्पन भरा था, संजीदगी ऎसी कि मैदानी इलाकों की ख़ानदानी औरतें पानी भरें. माथे पर मोती जड़ी लैस का दुपट्टा बाँध, लम्बा घेरदार रंगीन धागों से कढ़ा लाल कुर्ता और शरारा पहन वह घूमती, मर्द तो मर्द औरतों की आह निकल जाती, लय और ताल का ऎ

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