सैराट: दृश्यों में गुंथे रक्त डूबे सवाल

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‘सैराट’ फिल्म जब से आई है उस पर कई लेख पढ़ चुका, लेकिन फिल्म नहीं देखी थी. सुदीप्ति के इस लेख को पढने के बाद  लगता है कि फिल्म देखने की अब जरूरत नहीं है. हिंदी में इतनी सूक्ष्मता और इतनी संलग्नता से फिल्म पर कम ही लोग लिखते हैं. हम आभारी हैं सुदीप्ति के, भाई अरुण देव जी और उनके ब्लॉग समालोचन के कि उन्होंने उदारतापूर्वक हमें यह लेख जानकी पुल पर पहले शाया करने दिया. अब मैं लेख और आपके बीच ज्यादा बाधा नहीं बनना चाहता हूँ. आप इस लेख को पढ़ते हुए ‘सैराट’ को महसूस कीजिए- मॉडरेटर 
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सबसे पहले ‘सैराट’ देखेने के छतीस घंटों बाद तक की संक्षिप्त डायरी :
शनिवार : रात सोते-सोते पलकों के भीतरी पटल पर रात की स्याही की जगह डरावनी लालिमा छा गयी. मैं झटक कर भी न झटक पाई. मेरे भीतर की व्याकुल माँ ने हाथ बढ़ा कर पोंछ डालने चाहे उन नन्हे मासूम पांवों की रंगत. खून की बू नथुनों में भर गयी और एसी की ठंडी हवा के नीचे पसीने से तर-बदर करवटें लेते हुए सुबह हुई.
इतवार : यह दिन मेहमानों और मेहमाननवाज़ी से भरा रहा. इतना कि सोते वक़्त करवट बदलना भी याद नहीं रहा. पर बीच-बीच में मैं कहीं कुछ सोचने लगती, लोग जो बोल रहे थे उसकी जगह शून्य ले रहा था.  
सोमवार : सब काम पर गए और मैं घर के कामों से निबट एक पाण्डुलिपि पढ़ने में डूबने की कोशिश करने लगी. कुछ डूबी कुछ तिरी और फिर ‘सैराट’ गाना चलाया. भीतर की वेदना बाहर के एकांत से मिल गयी. सहसा फूट-फूट कर रोने लगी, यों जैसे अपने अजन्मे बच्चे की याद में माएँ रोती हैं.
मंगलवार : सोच रही हूँ, क्या किसी फिल्म का असर इतना गहरा होता है कि आप तीसरे दिन भी रो पड़ें? क्या था/है इस फिल्म में? क्यों स्क्रीन पर क्रेडिट्स आने पर भी दर्शक अपनी जगह से हिल नहीं पाए? आखिर ऐसी बात क्या है ‘सैराट’ में? एक त्रासद प्रेम कहानी ही तो है यह भी! क्या प्रौढ़ता की ओर बढ़ने पर भावुकता भी बढ़ने लगती है? मुझसे अपनी वेदना और आंसुओं का रहस्य नहीं सुलझ रहा? क्या करूँ कि बाहर आऊँ इससे? लिखूँ?
अपने अनुभव के आधार पर कहूं तो सैराटएक ऐसी फ़िल्म है जो देखने वाले के भीतर उल्लास, बेचैनी, स्तब्धता और वेदना भर देती है। दृश्य दिमाग में ऐसे तिरते-उतराते  हैं कि सोना मुश्किल हो जाता है। सवालों में बींधे मन को यातना से बाहर निकलने के लिए आगे कुछ और बातें विस्तार में.
[ डिस्क्लेमर :तो जो बातें हैं, वे ‘सैराट’ पर लिखे कई आलेखों की कड़ी में नहीं हैं. अपने भीतर जड़ जमाते दुःख को पिघलाने की कोशिश है, इसे रिव्यू तो कतई न मानें. वैसे भी रिलीज से लेकर अब तक जाने कितनी बातें लिखी जा चुकी हैं. ईमानदारी से कहूँ तो सबसे पहले मैंने अविनाश दास का फेसबुक स्टेटस पढ़ा था, फिर राजशेखर द्वारा किया गया ज़िक्र. कैलाश जी ने जब समालोचन पर लिखा तो उनको पढ़ने के बाद विष्णु खरे को भी पढ़ लिया. हाँ, प्रमोद सिंह के रिव्यू से इसे देखने का मन दृढ़ हुआ. शुक्र था कि किसी ने अंत नहीं लिखा पर त्रासदी की बाबत जानकारी तो थी. ]
यह एक ऐसी फिल्म थी जिसे भय के संवेग के साथ देखा गया. जब आर्ची पर्श्या को सरेआम पिटने से  बचा लेती है, उसके बाद के प्रेम-दृश्यों में भी मुझे राहत नहीं थी. दूसरे दर्शकों का पता नहीं, लेकिन जिस मित्र के साथ देखा, उनका भी यही कहना था कि हर पल एक खटका रहा कि जाने अब क्या होने वाला है. हम अक्सर प्रेम-कथाओं को पढ़ते-देखते हुए कठिनाईयों के बाद सोचते हैं- आगे अच्छा होगा/होने वाला है. त्रासदी बीते जमाने की बात लगने लगी थी और हैप्पी एंडिंग हकीक़त. लेकिन यहाँ उल्टा था. ख़ुशी, उल्लास और प्रेम के मिलन में पात्र मगन रहे और मुझ पर आशंका, संदेह, भय के बादल मंडराते रहे. और मैंने पहली बार यह जाना कि भय के संवेग के लिए सिर्फ हॉरर या सायिकोपैथ फिल्मों की जरुरत नहीं.
ऐसा नहीं कि स्क्रीन पर ऑनर-किलिंग पहली बार देखा या प्रेम की त्रासद परिणति को भी पहली बार देखा. ऐसा भी नहीं था कि जाति की क्रूरता नहीं जानती हूँ. यह भी पता है कि जानना और भोगना दो बातें हैं. फिर भी, इस  फिल्म में ऐसा क्या है जो देखे जाने को भोगे जाने जितना दुखद बना रहा है? कुछ लोगों के सवाल हैं कि यह फिल्म इतनी हिट कैसे हो गयी? सरोकारी सिनेमा हिट भी होता है कहीं? कुछ लोगों को लगता है- इसमें बचकाने किशोर रोमांस का उत्सव भर है, जात तो बस नाटकीय अंत के लिए इस्तेमाल हुआ है. सवाल तो सही ही है कि झिन्गाट गाने में कहाँ है वेदना का वह स्वर? सुना कि कहीं-कहीं लोग फिल्म के अंत के बाद ‘झिन्गाट’ पर नृत्य भी किए हैं? जाने कैसे लोग होंगे? क्या इस बात को जान कर नागराज मंजुले को दुःख हुआ होगा?
मुझे इन सब सवालो से क्या मतलब? मैंने क्यों देखी ‘सैराट’? मराठी आती नहीं, भारतीय भाषाओँ की फिल्मों का कोई खास शौक नहीं. फिर क्यों इतनी उत्सुक हो गयी थी? लोगों से तारीफ सुन कर क्या? मुझे देखने के लिए मजबूर करने के लिए एक सूचना भर काफी थी- नागराज मंजुले को हिंदी सिनेमा के कई ऑफ़र मिले, पर उन्होंने अपनी मातृभाषा में फिल्म बनाते रहना चुना. मैं ऐसे व्यक्ति का सिनेमा देखने के लिए सहज उत्सुक थी, जिसकी जिद्द है कि मेरा काम देखने के लिए तुम मेरी मातृभाषा में आओ. और जब ‘सैराट’ मुझ पर इतनी छा ही गयी तो लिखती हूँ कि क्या देखा.
‘सैराट’ को जो लोग प्रेम-कहानी भर मान रहे हैं दरअसल वे उसके सवालों से बचना चाह रहे हैं, उसकी समाजशास्त्रीय व्याख्या से नज़रें चुरा रहे हैं. यह घोर राजनीतिक फिल्म है. फिल्म बताती है कि बोलना और चीखना जरुरी नहीं होता, सादगी और भोलेपन से दिखा देना भी गज़ब असरकारी होता है. यह फिल्म जाति और पितृसत्ता की जकड़बंदी की भयावहता की दास्तान है. क्रिकेट मैच जीते पर्श्या को प्रदीप (लंगड़ा दोस्त) चिढ़ाता है, ‘ट्रॉफी के बदले बेटी’ जैसी बात पर. बस पता चल जाता है कि जिस बंगले के आगे चापाकल से पानी भरवाता नायक खड़ा है वह बंगला पाटिल साहब का है जो अगले चुनाव में प्रत्याशी होने जा रहे हैं. वही पाटिल साहेब मंच से कहते हैं- “वो (विरोधी) क्या ताल्लुका संभालेगा, पहले अपने घर की लुगायियों को संभाल ले.” गरजते पाटिल साहब की धजा देखी आपने? चमकदार कलफ लगे कपड़े, दमकता चेहरा! और यही बेटी के भाग जाने के बाद? वो बढ़ी हुई दाढ़ी के साथ मलिन और निस्तेज चेहरा लिए बीमारू से मन पर बैठे हैं, लुटे-पिटे-से! तो क्या इस नियति के लिए सिर्फ एक या कई पाटिल जिम्मेदार हैं? क्या हमारा बृहत्तर समाज नहीं, जिसे किसी की बेटी-बहन का प्रेम उसके पौरुष का हत्यारा लगता है? यह फिल्म एक पाटिल के आत्मसम्मान की झूठी दास्तान नहीं दिखा रही, बल्कि समाज, समुदाय, बिरादरी के भयावह ढांचे को सामने लाती है. भागा तो पर्श्या है, पर शादी बहन की नहीं हो रही. क्या बहन को किसी पाटिल से शादी करनी है? नहीं. फिर भी भाई के इस दुस्साहसी कदम को बहन को भुगतना है क्योंकि पाटिलों के डर से मछुआरों की समूची बिरादरी में से कोई भी उससे शादी के लिए तैयार नहीं. हकीकत यही है कि हर जाति-समुदाय में बिरादरी का बंधन ऐसा ही क्रूर है जिसे भुगतना अंतत: कमज़ोर वर्ग को होता है. और स्त्रियाँ पारिवारिक और सामाजिक श्रेणीक्रम में सबसे कमज़ोर पायदान पर आती हैं तो सबसे ज्यादा उनको.
आपको किशोर प्रेम की छिछोरी हरकतों पर हँसी आती है! आप देखते हैं कि खिलाड़ी, कवि और बहत्तर  प्रतिशत लाने वाला छात्र संभावित प्रेमिका को मुग्ध निहारता तो है, पर पूछे जाने पर हकलाने लगता है. क्या यहाँ सिर्फ प्रेम में पकडे जाने का डर है? जब मंग्या अपनी ममेरी बहन को बचाने के नाम पर पर्श्या से मार-पीट करता है तो नायक क्या सिनेमा का नायक लगता है? क्या उसकी दयनीयता का दृश्य जाति की ‘हीनता’ से उपजी कमजोरी को नहीं उभारता? आखिर प्रेम में आर्ची को पर्श्या की जात, उसकी बर्तन माँजती माँ और मछली पकड़ते पिता क्यों नहीं दिखे? जब ये बातें हमें साफ़ दिखती हैं तब यों ही बेसबब झूम उठने वाले पर्श्या और आर्ची को किसी की नज़रों की परवाह क्यों नहीं भला? दरअसल, प्रेम किसी भी उम्र में हो, प्रेम करने वालों को कुछ और नहीं दिखता. यहाँ तो किशोर उम्र का उफान भी है. प्रेम में हमारी नज़र उसी में उलझी रहती है जिसे नज़रें हर वक़्त खोजती रहती हैं; वर्ना कोई क्योंकर ऐसा सोच लेता कि उसे कोई नहीं देख रहा. प्रेम में डूबे प्रेमी अपने दिल से मजबूर, तमाम तरह के उपाय कर, इशारों-इशारों में बातें करते, मिलते हुए सोचते हैं कि उनको कोई नहीं देख रहा. क्या वाकई? होता तो यों है कि उनकी हरकते ऐसी हो जाती हैं कि जो न भी देखना चाहे उसे भी दिख जाए. यों ही थोड़े कहा गया है- ‘इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते’.
पर्श्या और आर्ची जब उस कसबेनुमा गाँव में मिलते हैं तो उनको लगता है कि कोई नहीं देख रहा, लेकिन क्या आपको भी यह भ्रम होता है? मुझे तो बिलकुल नहीं. ट्रैक्टर से पर्श्या के घर के बाहर रुकी आर्ची को पानी पीते क्या आस-पास की दूसरी औरतें नहीं देखतीं? क्या उसका भाई क्लास में यों ही आया होगा? क्या झील के खंडहरों पर एक-दूसरे का साथ पाकर विह्वल हुए दोनों को किसी ने ढूंढा नहीं होगा? क्या होली के रंग में डूबे लोगों को पाटिल के बंगले और पर्श्या के घर के बीच का फासला नज़र नहीं आया होगा? कुएँ की सीढ़ियों में बारिश की रिमझिम में उतरते आर्ची और पर्श्या जब किनारे बैठे अपने उजले सपने बुन रहे थे तो मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था. लेकिन कठिन वक़्त तब आया जब हम थोड़े आश्वस्त हो चुके थे. दिन के उजाले में वे पकडे नहीं गए, रात के अंधियारे में पहरा देते साथी के बावजूद पकड़ लिए गए. पकड़ लिए गए क्योंकि जिस बेटी के नाम से घर का नाम सुशोभित हो रहा था, वही कुल के नाम पर कालिख पोते दे रही थी! वह भी एक ऐसे लड़के के साथ जिसका छुआ पानी तक नहीं पिया जा सके. क्या यह अनदेखा करने वाली बात थी? आपको ऐसा लगा? दरअसल, यह फिल्म सपाटबयानी नहीं करती. अपने दर्शकों पर भरोसा करते हुए कुछ जरूरी सवाल शब्दों में ढालने के बजाय जहाँ-तहाँ यों भी दृश्यों में गूंथ देती है.
हीरो बनी दबंग आर्ची तभी तक सशक्त है जब तक पाटिल पिता का साया सर पर है. पिता से लड़ने की दम तक वह हिम्मती है, पर ज़िन्दगी की हकीकतों के सामने उसकी सारी मजबूती धरी रह जाती है. पुलिस थाने में एफ़आईआर फाड़ देने से लेकर रिवाल्वर चलाने तक आर्ची एक हीरो है. बदलते समय की प्रतिमान जैसी लड़की. उसके बाद? सपनों की तरह ज़िन्दगी भी उज्ज्वल-धवल हो, जरुरी तो नहीं. उसे कभी इस ज़िन्दगी के दु:स्वप्न तक नहीं आये. जिस कूड़े और कीच की बू से गुजर कर वह जाती है, आपको खटकता है? उसकी बू आर्ची को आती है, पर्श्या को नहीं, यह ‘दिखता’ है? नालों के आरपार कचरों के ढेर की तरह दूर से दीखते ये घर हमारे बड़े शहरों की ‘नव-दलित’ बस्तियां हैं- जाति-मिश्रित, वर्ग-पतित. जाने कहाँ की हिम्मत और आत्मविश्वास है नागराज मंजुले में कि वे आभिजात्य दृष्टि को इतनी चुनौती देते हैं! लंगड़े-बौने पात्र, गंदगी और बेतरतीबी- कुरूपता का सौन्दर्य दिखाने की कला भी. इतने बोलते दृश्य मैंने किसी फिल्म में देखे ही नहीं. शब्दों की जरुरत ही नहीं, दृश्य ही सब कह दे. सिर्फ दृश्यों के लिए भी सही, यह फिल्म देखनी चाहिए. कमाल की सिनेमेटोग्राफी. आसमान उड़ते पक्षियों के साथ कहानी में बदलते भाव.
पहली बार कुएँ में कूद आर्ची से एक संवाद स्थापित करते पर्श्या के झूले पर मगन डोलने के साथ आसमान में मुक्त उड़ते पक्षियों का नृत्य. असंख्य पक्षी मानो अपनी ख़ुशी में झूम तरह-तरह के करतब कर रहे हों. जब झील के भीतर के खंडहरों पर साँझ उतरने लगती है और सूरज का लाल प्रतिबिम्ब उसमें समाने लगता है तो उन पुराने पत्थरों की दीवार पर बैठा नया प्रेमी कहता है- “मुझे यकीन नहीं कि तुम यहाँ मेरे साथ हो और मैं तुमसे बातें कर रहा हूँ.” पीछे पक्षी चक्कर काट-काट कर नीचे उतरते बेचैन से घूमते हैं. मानो कह रहे हों अब जाओ, लौट जाओ तुम भी घर आपने. ऊपर से नीचे आते पक्षियों में जो व्याकुलता है वो इन आश्वस्त प्रेमियों को नहीं दिखाती पर दर्शको पर असर डालती है. सलीम ने इस प्रेम के खतरे देखते हुए आगाह किया था पर ऐसा कभी होता है कि खतरों से सच्चा प्रेम डर जाए. और हाँ, आखिर में घर के आगे आटे से शुभ रंगोली बनाती आर्ची के ऊपर जो मंडरा कर गया, उसके मंडराने से नहीं समझ पाए आप कि क्या है वो? शिकार पर झपटने से पहले की चील देखी है? मुझे वैसी छाया ही लगी.
अंत से पहले का दृश्य चरम तनाव का है. क्या हम एक क्षण को भी आर्ची की तरह खुश हो सकते थे? क्या हमें तमाम चित्रों में पर्श्या-आर्ची की ख़ुशी को घूरती नज़रें, बेचैन पाँव और मुश्किल से चाय उठाते हाथ नहीं दिखे? क्या आपने भी सोच लिया कि नानी ने सौगात भेजी है? सौगात नानी के यहाँ से ही आई, पर भेजी किसने? नाना, मामा और तमाम किस्म के मर्दों ने. उसे, जिसकी वजह से उनकी नाक कट गयी, उनकी ज़िन्दगी में भूचाल आ गया, इतना खुश देख उनकी नसें फड़कने लगती हैं. जो हम देख रहे थे, काश! माँ के भेजे सौगातों की जगह आर्ची उसे देख पाती. कितनी बार मन किया कि चिल्ला उठें- भागो, जाओ. पर कैसे देखती वो? उसके लिए तो उस दिन रिवोल्वर चला भागने के बाद के दिनों का सबसे भावुक और आश्वस्ति देने वाला क्षण था न? जैसे ही दोनों इस भरम में गले मिले कि अब जीवन में सब सहज और ठीक है सब ख़त्म हो गया.  
इस आखिरी दृश्य में सबसे प्रभावी है, किसी भी किस्म के शब्द और ध्वनि से परहेज. अगर उनको खींचकर गाँव ले जाया जाता, गालियों, मार-पीट का तेज़ शोर होता तो फिल्म ऐसा प्रभाव हरगिज नहीं छोड़ पाती. जैसे ही हम देखते हैं कि आर्ची और पर्श्या की ज़िन्दगी अब राह पर आ पड़ी है, सब कुछ अब ठीक-सा होने लगा है, वैसे ही ये तीन-चार यमदूत टपक पड़ते हैं. आशंकित और हिंसा से घबराया दर्शक बिना किसी प्रोलॉन्ग खींचतान के अंत देखता है तो सदमे में आ जाता है. मुझे याद नहीं कि हाल के वर्षों में मैंने किसी फिल्म का इतना प्रभावी कोई अंत देखा है. वह अंत आपकी आँखों में घुस कर आपको भी जिम्मेदार ठहराता है और सवाल से बींध देता है- देख कैसे रहे हैं आप? ऐसा होते हुए आप कब से देख-सुन रहे हैं, क्या सच में आप जिंदा भी हैं?
बच्चे के घर में जाने के साथ शुरू हुआ असह्य सन्नाटा मन को आशंकाओं से भर गया… पर बच्चे की नज़र से वह दृश्य देखना जितना भयावह था! अबोध आँखों में खून से सने धरती पर गिरे माँ-बाप की स्याह परछाई उतर आती है. रक्त सने पैरों के साथ बेआवाज़ बिलखता, बाहर भागता बच्चा मानों ज़मीन पर नहीं हमारे पत्थर हुए दिलों पर उसी स्याह इबारत को उकेर रहा है. कहाँ भाग रहा है वह बच्चा? किसके पास जाएगा? नियति क्या है उसकी? किसी चौराहे पर आपको भीख मांगता दिखे तो झल्लाईएगा मत. ऐसे बच्चो को बनाने में हमारी-आपकी भी भूमिका कम नहीं है. हमारी आत्मा उन खून सने पैरों का भार महसूस नहीं कर रही हो तो कुछ नहीं कहा जा सकता. हमारी निरपेक्षता हमें मुबारक!

                                   
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14 COMMENTS

  1. sudipti bahut sarthk likha aapne. maine yeh film dekhi pune me . Talkies me lagte hi doosre hi din . meri ek mitra surekha ke saath. Uske hi Gaon ka hai NAGRAJ MANJULE ..iss liye vishesh aagrah aur garv ke saath wo raste bhar kahti gayee ki aapko audience bhi dalit class ka hi milega dekhana ..sachmuch kya crowd tha wahaan ..film shuru hote hi seetiyon ki goonj aur taliyon ki gadgadahat thi wahaan ..aajkal aeisa darshak hamm kahaan dekhte hain jo kisi director ke pradarshan par iss tarah umad pade.. jo unkte hi biradari ka ho ..mai Marathi bhashi hoon (aab bangali hoon ) ,lekin film ki bhasha grameen thi , excent bhi , mujhe theek se samazna mushkil ho raha tha..meri mitra surekha ki help se thoda aasaan hua. Darshak poori tanmayta se drishyon par react kar rahe thhe.. Ek drishya me jab parshya ko maar padana shuroo hoti hai kisi darshak ne clap kar diya..haal me do Dabang YUVA bahut tez naarazgi se Dahade ..!!! bahar karo saale ko..!!! is tara ka excietment aan kahaan dikhta hai..Aakhri wale drishya me toa saannata eisa tha ki 15 minut takk koi aapani jagah se uthha hi nahi…… film bahut hi aasarkarak thi ….hero heroin n cast ka chayan bhi anjaan yuwa warg se tha ..fir bhi kaheen bhi karina yaa vidya balan ki raad nahi aaien.. wo Archi jaissi kuen (welle) me schallang nahi laga sakti thee.. aapki lekhni ne film ki gaharai ko poora poora chua hai ..badhai…. MANJUSHA GANGULY

  2. hindi jagat main sairat ke bare main itna khuch likha gaya,uski tulna main marathi main is film ko samiksha ke tor per neglect kiya gaya.deep samikhsa marathi main kisne nahi ki. sanjay pawar ka punyanagri main jo articel tha wo bhi is film ke virodhi soor main tha ki film koi hal nai dhundti

  3. badhiyaa..

    फिल्मकार 'नागराज मंजुले' की कविताओं का हिन्दी में अनुवाद.

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    धूप की साज़िश के खिलाफ़

    इस सनातन
    बेवफ़ा धूप
    से घबराकर
    क्यों हो जाती हो तुम
    एक सुरक्षित खिड़की की
    सुशोभित बोन्साई!
    और
    बेबसी से… मांगती हो छाया.

    इस अनैतिक संस्कृति में
    नैतिक होने की हठ की खातिर……
    क्यों दे रही हो
    एक आकाशमयी
    मनस्वी विस्तार को
    पूर्ण विराम…

    तुम क्यों
    खिल नहीं जाती
    आवेश से
    गुलमोहर की तरह…..
    धूप की साज़िश के ख़िलाफ़.

    ______________________________________

    दोस्त

    एक ही स्वभाव के
    हम दो दोस्त

    एक दुसरे के अजीज़
    एक ही ध्येय
    एक ही स्वप्न लेकर जीने वाले

    कालांतर में
    उसने आत्महत्या की
    और मैंने कविता लिखी.

    ______________________________________

    मेरे हाथो में न होती लेखनी

    मेरे हाथो में न होती लेखनी

    तो….

    तो होती छीनी

    सितार…बांसुरी

    या फ़िर कूंची

    मैं किसी भी ज़रिये

    उलीच रहा होता

    मन के भीतर का

    लबालब कोलाहल.

    ——————————————–
    ‘क’ और ‘ख’

    क.

    इश्तिहार में देने के लिए

    खो गये व्यक्ति की

    घर पर

    नहीं होती

    एक भी ढंग की तस्वीर.

    ख.

    जिनकी

    घर पर

    एक भी

    ढंग की तस्वीर नहीं होती

    ऐसे ही लोग

    अक्सर खो जाते हैं.
    _____________________________________

    जनगणना के लिए

    जनगणना के लिए

    ‘स्त्री / पुरुष’

    ऐसे वर्गीकरण युक्त
    कागज़ लेकर
    हम
    घूमते रहे गाँव भर
    और गाँव के एक

    असामान्य से मोड़ पर
    मिला चार हिजड़ो का
    एक घर.
    ______________________________________

    कवि : नागराज मंजुले
    अनुवाद : कवि टीकम शेखावत, पुणे (tikamhr@gmail.com , 97654040985 )

  4. सुदीप्तीजी…..हम तो नागराज मंजुळे,रविश कुमारजी के फॅन थे ही अब इस समीक्षा के पढने बाद आप के भी फॅन हो गये हैं..बहूतही प्रभावशाली लिखा है आपने..धन्यवाद.

  5. मार्मिक फिल्म की उतनी ही मार्मिक समीक्षा… दोनों ही भीतर तक उतर जाती हैं।

  6. शुक्रिया.दरअसल इस बाबत मैंने किसी प्रत्यक्षदर्शी का लिखा कहीं पढ़ा. और कल कार्यक्रम में रवीश ने नागराज से ऐसा सवाल भी पूछा. उन्होंने भी कहा कि हाँ ऐसा सुनने में आया है. और बहुत प्रभावशाली जवाब भी दिया.

  7. बहुत अच्‍छा लिखा है सुदीप्ति आपने। और झिंगाट गाना मुंबई में आजकल हर जगह बजता हुआ मिलता है। लोग नाचते हुए दिखते हैं। लेकिन फिल्‍म के अंत के बाद इस गाने पर नाचने का एक भी समाचार नहीं है। हां, सैैराट में जब ये गाना आता है, तब लोग ज़रूर उठ कर नाचने लगते हैं।

  8. बहुत गहरी और सुन्दर समीक्षा जो फिल्म की मार्मिकता व भयावहता को पूरी तरह शब्दांकित करती है . मैंने फिल्म नही देखी लेकिन बालिका-वधू धारावाहिक में भी एक दृश्य ऐसा था जिसने मुझे हफ्तों तक आन्दोलित किया जब अखिराज सिंह ने बेटी कमली के प्रेमी गोपाल को मारा . बेहद मार्मिक व भयावह दृश्य था वह .

  9. Gyasu Shaikh said:

    सैराट: दृश्यों में गुंथे रक्त डूबे सवाल
    सुदीप्ति जी ने मना किया है तो हम भी इसे रिव्यू नहीं कहेंगे…
    इस आलेख में भय व्याप्त है तो फिल्म में अगम्य सा व्याप्त
    भय क्यूंकर सहज सहय हो…! शायद प्रभात रंजन जी ने सही कहा
    है कि इस समीक्षा को पढ़ने के बाद फिल्म देखने की शायद ही ज़रुरत
    हो। बहुत बारीकी है समीक्षा में। जैसे एक समानांतर स्क्रिप्ट ही लिखी
    जा रही हो फिल्म की। जागरूक नागरिकों की संवेदनाएं तो आंदोलित होती ही
    है… पर शायद इस फिल्म के प्रभाव से संलग्न लोगों का भी दिल कुछ
    तो पसीजेगा ! और उनकी 'हां में हां' मिलाने वालों का भी जो देखेंगे इस
    फिल्म को। प्रेम के अगाध विश्वास में रत प्रेमियों का खून से सना अंत…!
    अतिक्रूरता की कहीं कुछ तो सुगबुगाहट होगी ही जो दूर तक जाएगी !
    सच कहा है कि संवाद से ज़्यादा दृश्यों की असर होती है। फिल्म की टोटल
    सम्प्रेषणीयता और उसकी असर ही है कि संवेदनशील प्रगल्भ फिल्म अवलोकक
    (लेखिका) को प्रेरित किया इस सांस-दर-सांस संवेदनापूर्ण प्रस्तुतिकरण को !

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