स्वप्निल तिवारी की ग़ज़लें

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कुछ लोग बंधे बंधाये मीटर में ग़ज़लें लिखते हैं, कुछ उस मीटर में भाषा को बदल कर उसे ताज़ा बना देते हैं. स्वप्निल तिवारी की ग़ज़लें ऐसी ही हैं. उनका एक ग़ज़ल संग्रह है ‘चाँद डिनर पर बैठा है‘. कुछ ग़ज़लें उसी संग्रह से से. उम्मीद करता हूँ कि आपको पसंद आएँगी- मॉडरेटर 
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1-
ऐसी अच्छी सूरत निकली पानी की
आँखें पीछे छूट गयीं सैलानी की
कैरम हो, शतरंज हो या फिर इश्क़ ही हो
खेल कोई हो हमने बेईमानी की
क़ैद हुई हैं आँखें ख़ाब-जज़ीरे पर
पा कर एक सज़ा-सी काले पानी की
दीवारों पर चाँद सितारे रौशन हैं
बच्चों ने देखो तो क्या शैतानी की
चाँद की गोली रात ने खा ही ली आख़िर
पहले तो शैतान ने आनाकानी की
जलते दिये सा इक बोसा रख कर उसने
चमक बढा दी है मेरी पेशानी की
मैं उसकी आँखों के पीछे भागा था
जब अफ़वाह उड़ी थी उनमें पानी की
2-
अजब नक़्शा है देखो मेरे घर का
हर इक खिड़की पे मंज़र है सहर का
मिरे सामान में शामिल है मिटटी
इरादा है समन्दर के सफ़र का
मिरे हालात बेहतर हो चले हैं
भरोसा कर लिया था इस ख़बर का
 
खड़ी थी वादियों में एक लडकी
पहन कर कोट इक यादों के फ़र का
परिंदा शाख़ पे माज़ी के बैठा
किसी की याद है कोटर शजर का
कोई जिग्सा पज़ल है दुनिया सारी
मैं इक टुकड़ा हूँ
, पर जाने किधर का
हरी कालीन सी इक लॉन में थी
और उसपे फूल था इक गुलमोहर का
 
बुझी आख़िर में सारी आग आतिश
भले ही दोष था बस इक शरर का
3-
उदासी से सजे रहिये
कोई रुत हो हरे रहिये
सभी के सामने रहिये
मगर जैसे छिपे रहिये
जो डूबी है सराबों में
वो कश्ती ढूंढते रहिये
वो पहलू जैसे साहिल है
तो साहिल से लगे रहिये
पड़े रहना भी अच्छा है
मुहब्बत में पड़े रहिये
भंवर कितने भी प्यारे हों
किनारे पर टिके रहिये
समय है गश्त पर हर पल
जहां भी हों छिपे रहिये
ख़ुदा गुज़रे न जाने कब
ख़ला में देखते रहिये
रज़ाई खींचिए सर तक
सहर को टालते रहिये
कटेगा ये पतंगों सा
फ़लक को देखते रहिये
वो ऐसे होंट हैं के बस
हमेशा चूमते रहिये
यही करता है जी आतिश
कि अब तो बस बुझे रहिये
4-
किरन इक मोजज़ा सा कर गयी है
धनक कमरे में मेरे भर गयी है
उचक कर देखती थी नींद तुमको 
लो ये आँखों से गिर कर मर गयी है
 
ख़मोशी छिप रही है अब सदा से
ये बच्ची अजनबी से डर गयी है
खुले मिलते हैं मुझको दर हमेशा
मिरे हाथों में दस्तक भर गयी है.
उसे कुछ अश्क लाने को कहा था 
कहाँ जा कर उदासी मर गयी है..
?
उजालों में छिपी थी एक लड़की
फ़लक का रंग-रोगन कर गयी है
अभी उभरेगी वो इक सांस भरने
नदी में लह्र जो अन्दर गयी है
 
5-
चलेगा वही शख्स बाज़ार में
कोई पेंच हो जिसके किरदार में
सुना है जलाये गये शह्र कल
धुंआ तक नहीं लेकिन अख़बार में
हवा आयेगी आग पहने हुए
समा जायेगी घर की दीवार में
सिमटती हुई शाम-सी लड़कियां
शफ़क़ हैं छिपे उनके रुख़सार में
कहानी वहाँ हैं जहाँ मौत ही
नई जान डालेगी किरदार में
अब इनके लिये आँखें पैदा करो
नये ख़ाब आये हैं बाज़ार में
संभल कर मिरी नींद को छू सहर
हैं सपने इसी कांच के जार में
मेरे पाँव की आहटें खो गयीं
इन्ही ज़र्द पत्तों के अम्बार में
ढही तो ये जाना सहर थी चिनी
हर इक सर्द कुहरे की दीवार में
क़रीब आयीं यादें जो आतिशतिरे
लगी आग काग़ज़ के अम्बार में
6-
चारों ओर समंदर है
मछली होना बेहतर है
हैं महफ़ूज़ अलफ़ाज़ जहां 
सन्नाटा वो लॉकर है
 
कुछ तो बाहर है कश्ती
कुछ पानी के अन्दर है
नींद का रस्ता है छोटा
जिसमें ख़ाब की ठोकर है
मुझसे भंवर घबराते हैं
मेरे पाँव में चक्कर है
आँखों में चुभती है नींद
मेरी घात में बिस्तर है
मैं भी तो इक रात ही हूँ
चाँद मिरे भी अन्दर है
7-
जो इक पत्ता था मेरी ख़ामुशी का
वो आख़िर हो गया बहती नदी का
उजाले से महक उट्ठी हैं आँखें
खिला है फूल कोई रौशनी का
वहीं बैठी मिली आवाज़ मेरी
जहां तालाब है इक ख़ामुशी का
वो तकती ही नहीं है मुड़के वर्ना
बहुत सामान पीछे है नदी का
वहाँ से सरसरी कैसे गुज़रते
वो पूरा शह्र था तेरी हंसी का
ख़ुद इक तन्हाई के जंगल में हैं हम
किसे क़िस्सा सुनाएँ मोगली का  
जहां से हम सदायें दे रहे थे
कुआं था वो हमारी तिश्नगी का
तिरी यादों के सय्यारे पे जानां
कोई इम्काँ नहीं है ज़िन्दगी का
लगी है ख़ाब में सीलन की दीमक
करें तो क्या करें आँखें नमी का
पता जब से ख़ुशी का पा गया है
ठिकाना ही नहीं दिल की ख़ुशी का
जलाओ चाँद की वो शमआतिश
इलाक़ा आ चुका है तीरगी का
8-
नींद से आ कर बैठा है
ख़ाब मेरे घर बैठा है
अक्स मिरा आईने में
लेकर पत्थर बैठा है
 
पलकें झुकी हैं सहरा की
जिसपे समंदर बैठा है
एक बगूला यादों का 
खा कर चक्कर बैठा है
उसकी नींदों पर इक ख़ाब
तितली बन कर बैठा है
रात की टेबल बुक करके 
चाँद डिनर पर बैठा है
 
अँधियारा खामोशी से 
ओढ़ के चादर बैठा है
आतिशधूप गयी कब की 
घर में क्यूँ कर बैठा है
9-
बैठे बैठे थकन से भर आये
अब तो मंज़िल ही चल के
 घर आये
उससे कहना की नींद में हूँ मैं
रोके रहना अगर सहर आये
सबमे आवाज़ के दिए रक्खे
राह में जो मिरी खंडर आये
सारी तसवीर में धुंधलका हो
और बस एक तू नज़र आये
मेरी ख़ातिर ही मील के पत्थर
रास्तों में खड़े नज़र आये …
जिस्म को छोड़ दूं वहीं पर क्या ?
जब तिरे लम्स का नगर आये
तीरगी के सफ़र में छाँव मिली
राह में धूप के शजर आये
तेरे हमराह चल के हम जानां
सातवें आसमान पर आये
उसकी यादों की आग से आतिश
इक लपट  में कई शरर आये
10-
रौशनी करने को ये पर्दा हटाने के लिए 
घर में कोई भी नहीं मुझको जगाने के लिए  
अपनी ही लय से भटक कर हो गयीं ख़ामोश सब
लोरियां आयीं बहुत मुझको सुलाने के लिए
 
कौन आया था भंवर में एक साहिल की तरह 
मैं तो उतरा था नदी में डूब जाने के लिए
खेल क्या है रूह का कोई तो बतलाये हमें
कोई आये जिस्म का परदा उठाने के लिए
 
एक लड़की मुझको अपनी छत से तकती रह गयी 
पास इक बोसा न था उस तक उड़ाने के लिए
फ़ुरसतें चलती थीं बाहें डाल कर बाहों में तब
जेब में रखते थे हम क़िस्से
, सुनाने के लिए
उसको आता देख कर साहिल पे वापस आ गयी 
शाम जाने को थी बस सूरज बुझाने के लिए
पहले तो उसने मुझे जुगनू बनाया और फिर
कर गयी शब के हवाले जगमगाने के लिए
एक दिन आतिशरहे ख़ाली बहुत हम आग़ से 
पास माचिस तक न थी सिगरेट जलाने के लिए
‘चाँद डिनर पर बैठा है’ ग़ज़ल-संग्रह से

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7 COMMENTS

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  2. बहुत खूबसूरत गजल प्रस्तुत की है आपने। .
    निश्चित ही "चाँद डिनर पर बैठा है’ ग़ज़ल-संग्रह" को पढ़ने के बाद एक नई ताजगी का अनुभव होगा।

  3. विष्णु खरे सर भी मौक़े पर चौके लगाने की वर्सेटाइल भाषा-हुनर रखते हैं, पता न था। प्रस्तुति तो लाजवाब है ही गजल की, मुदा, खरे साहब की टिप्पणी के साथ उन्हें पढ़ने का मज़ा ही कुछ और है।
    ब्लॉगों पर जाने से अमूमन मैं कतराता रहा हूँ। अब तो इस अंजुमन में आना है बार बार…

  4. भाई,आपके कुछ अशआर में वाक़ई शेरियत है,लिहाज़ा गज़लियत भी दाखिल हुई है.उर्दू में भी ऐसे तेवर कम हो चले हैं,लेकिन जिस मजलूम ज़ुबान को गुलज़ार,जावेद अख्तर और बशीर बद्र हरचंद बर्बाद करने पर आमादा हैं,उस बेआसरा से आप उम्मीद भी क्या कर सकते है ? हिंदी में कुछ ऐसे नए दस्तखत लिख रहे हैं कि बाज़ औकात लगता है नागरी रस्मुल-ख़त की शायरी ही अब शाना-ब-शाना उर्दू जैसी अज़ीम ज़ुबान को नई ज़िन्दगी और सहारा दे सकती है.दुष्यंत कुमार की रूह,अगर उसे वाँ बादाख़ारी और हूरबाज़ी से फ़ुर्सत मिलती होगी तो, अपने सिलसिले को इस तरह आगे बढ़ता देखकर सुकून पा रही होगी.

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