इतिहास के अध्याय में छिपी प्रेम कहानी की कहानी

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त्रिलोकीनाथ पाण्डेय गृह मंत्रालय में उच्च अधिकारी हैं और अंग्रेजी में लिखते रहे हैं. पहली बार उन्होंने एक उपन्यास हिंदी में लिखा है जिसकी पृष्ठभूमि ऐतिहासिक है. रीतिकाल के आचार्य कवि पंडितराज जगन्नाथ और शाहजहाँ की छोटी बेटी लौंगी की प्रेम-कहानी. उपन्यास शीघ्र हिंदी के किसी बड़े प्रकाशन से छपने वाला है. उसका एक अंश पहली बार जानकी पुल पर- मॉडरेटर 
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मिले सुर मेरा तुम्हारा 
बात बहुत पहले की है. गर्मियों के दिन थे. आगरे में आग बरस रही थी. गर्मी से बचने के लिए बादशाह कश्मीर के दौरे पर थे. साथ में था पूरा परिवार और शाही दरबार.
एक दिन बादशाह शाहजादे दाराशिकोह को लेकर कादरिया सिलसिले के सुप्रसिद्ध संत मुल्ला शाह बदख्शी से मिलने तख्ते सुलेमान नाम के पहाड़ पर पहुंचे. पहाड़ की एक कन्दरा में मुल्ला शाह एकांत साधना करते थे. कन्दरे के द्वार पर मुल्ला ने अपने शागिर्दों का पहरा लगा रखा था ताकि उनकी अनुमति के बिना कोई आकर उन्हें हलकान न करे. तदनुसार, बादशाह को भी दरवाजे पर ही रोक लिया गया और उन्हें प्रवेश तभी मिला जब मुल्ला ने अनुमति दी. तब तक बादशाह को दरवाजे पर रुक कर इंतजार करना पड़ा. यह बात बादशाह को नागवार गुजरी. मुल्ला से मिलते ही उन्होंने सवाल किया, “फ़क़ीर के दरवाजे पर पहरा क्यों?”
मुल्ला ने झट जवाब दिया, “ताकि दुनियावी लोग न घुस आयें.”
“फिर, इजाजत कैसे मिली?” बादशाह ने जिज्ञासा व्यक्त की.
“क्योंकि बादशाह के साथ एक रूहानी जुस्तजू वाला बन्दा भी है,” कहते हुए मुल्ला ने शाहजादे दाराशिकोह की ओर इशारा किया.
दाराशिकोह का झुकाव बचपन से ही रूहानियत की ओर था. कहते हैं शाहजहाँ ने अजमेर में हजरत मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर मिन्नत की थी कि उसे एक बेटा बख्शें और उसीके परिणामस्वरूप दाराशिकोह का जन्म हुआ था.
मुल्ला शाह दाराशिकोह की रूहानी रुझान और लगन से बहुत प्रभावित हुए. उन्होंने उसे लाहौर में अपने गुरु मियां मीर से मिलवाया. यद्यपि दाराशिकोह कादरिया सिलसिले के कई और फकीरों जैसे शाह मुहिबुल्लाह, शाह दिलरुबा, शाह मुहम्मद लिसानुल्लाह रोस्तकी के संपर्क में भी था, लेकिन मुल्ला शाह और मियां मीर की उच्च साधना और पवित्रता से वह अभिभूत था. उनकी प्रशंसा में उसने ‘सकीनत-उल औलिया’ नाम से एक किताब भी लिखा.
इससे काफी पहले, कोई पच्चीस साल की उम्र में ही दाराशिकोह ने ‘सफिनत-उल-औलिया’ लिखा था जिसमे उसने कोई चार सौ पीरों, फकीरों, औलियों, पैगम्बर मुहम्मद, उनकी बीवियों और अनुयायियों की चर्चा की. इसके अलावा उसने और भी कई किताबें फारसी में लिखीं जिसमें इस्लाम के सूफी पक्ष को बड़ी नफासत से उभारा और मुल्लाओं के कठमुल्लेपन की हँसी उड़ाई.
ज्ञान की खोज में दाराशिकोह हिन्दू धर्म की ओर आकृष्ट हुआ. हिन्दू धर्मग्रंथों की भाषा संस्कृत उसने बड़ी मेहनत से सीखी. इसी दौरान उसका संपर्क उस समय के सुप्रसिद्ध संत बाबा लाल बैरागी, साहित्यकार एवं धर्मशास्त्री पंडितराज जगन्नाथ और उनके गुरु कवीन्द्राचार्य सरस्वती से हुआ. उपनिषदों ने उसे खासा आकर्षित किया. उसने पाया कि पवित्र कुरआन में जिस गुप्तज्ञान की ओर इशारा किया गया है वह तो उपनिषदों में ही उजागर किया गया है. उसे यह जानकर दुःख हुआ कि बहुत से हिन्दुओं को भी इसकी जानकारी नहीं थी. हिन्दू मुसलमान दोनों इस अद्भुत ज्ञान का लाभ उठा सकें यह सोच कर उसने जगन्नाथ के साथ कई बार बनारस की यात्रा की और वहां पंडितों की मदद से उपनिषदों का फारसी अनुवाद ‘सिर्र-ए-अकबर’ नाम से कराया.
पंडितराज जगन्नाथ की देख-रेख में दाराशिकोह ने गीता का भी गहन अध्ययन किया. गीता के महान ज्ञान से विभोर हो कर उसने इसका भी तर्जुमा फारसी में किया.
दाराशिकोह ने सूफी साधना और हिन्दू धर्मज्ञान का मिलान करके देखा तो वह आश्चर्यचकित रह गया. यह वैसा ही था जैसे दो महासागरों का मिलन हो. उसने पाया कि इस्लाम का आधारभूत सिद्धांत तौहीद अर्थात् एकेश्वरवाद हिन्दुओं के महान धर्मग्रंथों में पूरी तरह छाया हुआ है. इसी बात को आधार  बनाकर उसने ‘मजमा-उल-बहरीन’ अर्थात् दो महासागरों  का मिलन नामक एकदम नए और मौलिक ग्रन्थ की रचना की. उसने हिन्दू-मुस्लिम समन्वय की एक नयी संस्कृति विकसित करने की शुरुआत की.
भये प्रकट कृपाला
दूर क्षितिज के धुधलके से दो व्यक्ति आते नजर आ रहे थे. नजदीक आने पर दिखा कि उनमें से जो आगे-आगे चल रहा था वह श्वेत जटा-जूट वाला, गौर वर्ण का, अत्यंत वृद्ध व्यक्ति था. दूसरा व्यक्ति, जो पहले वाले के पीछे-पीछे चल रहा था, श्यामल वर्ण का नौजवान था. बाएं कंधे पर धनुष और दांयें कंधे पर तूणीर धारण किये हुए उस युवक पर अलौकिक ईश्वरीय प्रभामंडल छाया हुआ था.
दोनों ठीक मेरे सामने आकर रुके. मेरे अंतःकरण में प्रकाश की एक किरण उठी कि यह वृद्ध व्यक्ति तो वशिष्ठ मुनि हैं जिनके अद्भुत ग्रन्थ योगवाशिष्ठ के फारसी अनुवाद में मैं आजकल ­रात-दिन डूबा रहता हूँ.
लगता है वशिष्ठ मुनि ने मेरे मन की बात भांप ली तभी तो अत्यंत करुणभाव से उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा और पीछे मुड़कर उस धनुर्धारी युवक से बोला, “राम! यह अपना ही आदमी है. तुम्हारी तरह यह भी सत्य की साधना में लगा हुआ है. जो ज्ञान तुम्हे मैंने योगवाशिष्ठ में दिया था उसी ज्ञान का यह भी हक़दार है. लो, यह मिठाई इसे खिलाओ जिसमें योगवाशिष्ठ के ज्ञान का सारतत्व भरा हुआ है.”
इतना सुनते ही धनुर्धारी राम ने आगे बढ़ कर मुझे गले से लगा लिया और बड़े प्रेम से मुझे मिठाई खिलाने लगे. राम का आलिंगन इतना आह्लादक और मिठाई की मिठास इतना अलौकिक थी कि मारे आनन्द के मेरी आँख खुल गयी.
मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा. रामचन्द्रजी की करुणापूर्ण आलिंगन की अनुभूति और मिठाई की मिठास का आभास मुझे अभी भी हो रहा था. उस सुख को फिर से पाने के लिए मै तुरन्त ही पद्मासन में बैठकर ध्यान करने लगा और वशिष्ठ मुनि और रामचन्द्रजी का आह्वान करने लगा, किन्तु वे फिर न प्रकट हुए.
सुबह यह सपना शहजादे दाराशिकोह ने अपने अब्बा हुजूर बादशाह शाहजहाँ को सुनाया तो उन्होंने हँसते हुए कहा कि वह रात-दिन ‘जगबसिस्ट’ के तर्जुमा में लगा रहता है इसीलिये ऐसे सपने आते हैं. शाहजादे के मित्र और शिक्षक पंडितराज जगन्नाथ, जो शाहजादे से उम्र में काफी कम थे, ने जब सुना तो आश्चर्य से शहजादे की ओर ताकते ही रह गए और श्रद्धा से हाथ जोड़ते हुए बोले कि शाहजादे में दैवीय अंश का अवतरण हुआ है.
शाहजादे के सपने की बात चारों ओर फ़ैल गयी. लोगों में इस पर तरह-तरह की प्रतिक्रिया हुई. ज्यादातर लोगों, जिनमें अधिकांश हिन्दू थे, ने माना कि शाहजादे को ईश्वरीय कृपा प्राप्त हुई है. मुल्लाओं ने नाराज होकर इसे शाहजादे की एक और काफिराना हरकत करार दिया. औरंगजेब ने इसे अपने बड़े भाई की सनक मानते हुए उपेक्षा से ख़ारिज कर दिया. लगभग यही हाल शाहजादे के दो अन्य छोटे भाइयों – शुजा और मुराद – का था, जिन्होंने ख्वाब की बात पर ध्यान ही नहीं दिया. हाँ, बड़ी बहन जहाँआरा ने कुछ दिलचस्पी दिखाई, लेकिन छोटी बहन रोशनआरा ने शाहजादे पर तिरस्कारपूर्वक आरोप लगाया कि वह पूरी तरह काफिर हो गए हैं. सबसे छोटी बहन लौंगी की प्रतिक्रिया अनोखी थी. उसने हँसते हुए कहा कि बेहतर होगा कि भाईजान अपनी ख्वाबों की दुनिया से बाहर आकर असल दुनिया के मुद्दे सुलझाने की कोशिश करें.
प्रतिक्रियाओं से बेपरवाह दाराशिकोह योगवाशिष्ठ के अनुवाद में जुटा रहा. पंडितराज जगन्नाथ पहले संस्कृत से हिन्दवी में अनुवाद करके सुनाते और फिर दाराशिकोह उसे फारसी में अनुवाद करते. दाराशिकोह ने यद्यपि अब तक पर्याप्त संस्कृत सीख ली थी पर अभी भी जगन्नाथ की सहायता के बिना स्वतंत्र रूप से उसका प्रयोग न कर पाते थे. मुंशी चन्दर भान बरहमन भी इसमें काफी मदद कर रहे थे – खास कर संस्कृत में लिखे गूढ़ भावों को फारसी में ठीक-ठीक व्यक्त करने में.
पहलवानी की तलब
जगन्नाथ को आगरे में अपनी पहलवानी का शौक पूरा करना मुश्किल हो रहा था. न तो कोई ढंग का अखाड़ा मिल रहा था और न शाही अखाड़े में जाना उन्हें पसंद था. वहां मुस्लिम पहलवानों की अकड़ उन्हें बर्दाश्त न थी. साथ ही, वह न चाहते थे कि उनकी पहलवानी आगरे में ज्यादा उजागर हो. वहां वह शायर ही बने रहना चाहते थे.
इन सब वजहों से जगन्नाथ घर पर ही दंड-बैठक कर लिया करते और गदा-मुगदर भांज लेते. जोर पूरा करने के लिए उन्होंने इन कसरतों को काफी बढ़ा लिया – एक हजार दण्ड और एक हजार बैठक करते, बड़ी-सी गदा दो सौ बार भांजते और भारी-भरकम मुगदरों की जोड़ी सौ बार फेरते. ये सारी कसरत घर पर अकेले ही करते. एकांत में ही प्राणायाम, योगासनों का अभ्यास और हनुमानजी की पूजा-आराधना करते.
एक दिन अल-सुबह जगन्नाथ जब दण्ड-बैठक करने के बाद भांजने के लिए गदा उठाने ही वाले थे कि देखा कि एक विचित्र स्त्रैण-सा व्यक्ति भड़कीले जनाने वेश में उनके सामने खड़ा है. उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा कि बंद फाटक से यह व्यक्ति कैसे भीतर आ गया. अपनी हैरानी छिपाते हुए जगन्नाथ ने पूछा, “आप कौन हैं और कैसे और क्यों यहाँ आये हैं?
इतने सारे सवालों को एक ही वाक्य में गुंथा पाकर आगंतुक मुस्कराने लगा और दाहिने आँख की पलक को भौड़े ढंग से मटका कर बोला, “मैं दिलावार हूँ शाहजादी रोशनआरा का खानसरा. मैं कैसे आयी हूँ इससे आप परेशान न हों. मै कहीं भी और कभी भी जा सकती हूँ. और मैं यहाँ आयी हूँ आपको बताने कि शाहजादी ने आपको बुलाया है.”
“क्यों?”
“यह तो वही बतायेंगी.”
“कहाँ मिलना है उनसे?”
“हरम में.”
“वहां मैं कैसे जा सकता हूँ? वहां तो परपुरुष का जाना वर्जित है.”
“आपको इसकी फ़िक्र करने की जरूरत नहीं. मैं लेकर वहां जाउंगी आपको चुपके से, बुर्का उढ़ा कर.”
“चुपके से? बुर्का उढ़ा कर?”
“हाँ, नहीं तो क्या? ऐसे मामलों में क्या सीना तान कर जाओगे?”
“ऐसे मामले? कैसा मामला?”
“यह तो तब पता लगेगा जब रोशनआरा बेगम तुम्हारा तेल निकालेंगी.”
दिलावर कामुक और कुटिल मुस्कान के साथ फुर्ती से वहां से निकल गया. जगन्नाथ भारी सोच में पड़ गए. कुछ समझे कुछ न समझे. जब समझे तब बहुत भयभीत हो गए. रोशनआरा की कामुकता और क्रूरता के बारे में वह कुछ-कुछ सुन चुके थे.
रोशनआरा के अप्रिय आमंत्रण से भयभीत जगन्नाथ को रात-भर नींद न आयी. दिलावर फिर न आ धमके यह सोचकर जगन्नाथ सुबह-सुबह ही घर से भाग लिए. भाग कर जमुना किनारे पहुंचे. कुछ देर चुप-चाप वहां खड़े विचारते रहे कि किधर जाऊं? हनुमानजी का स्मरण किया और राह सुझाने की विनती की. फिर, दौड़ पड़े मथुरा की ओर. लेकिन, सिकंदरा में अकबर के किले से थोड़ा आगे बढ़ते-बढ़ते थक गये. थोडा सुस्ता कर, फिर आगे बढ़े कि कम-से-कम राजसी विलास की सीमा से कुछ दूर चले जायं.
थोड़ी ही देर दौड़े होंगे कि पहुँच गए एक निर्जन स्थान में जिसके कुछ आगे चलने पर एक छोटी-सी कुटिया दिखी. कुटिया के चारों ओर एक व्यवस्थित हरा-भरा बाग़ दिखा और उसमे दिखा एक वृद्ध साधू जो मात्र कौपीन पहने फावड़ा चला कर जमीन की खुदाई कर रहा था. धीरे-धीरे चलते हुए जगन्नाथ उसके पास पहुंचे और उसकी आभा-मंडल से अत्यंत प्रभावित होकर सादर प्रणाम किया, किन्तु वृद्ध साधू ने कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि बगल में पड़ी कुदाल की ओर इशारा किया.
जगन्नाथ साधू के इशारे को समझ गए और साधू के साथ-साथ वह भी जमीन की खुदाई करने लगे. काफी देर बाद जब साधू के हाथ रुके तो जगन्नाथ भी रुक गए. जगन्नाथ साधू के प्रभा-मंडल से इतने अभिभूत थे कि उससे कुछ बात करना चाहते थे, लेकिन साधू ने चुप रहने और चले जाने का इशारा किया. जगन्नाथ साधू के सान्निध्य से हटना नहीं चाहते थे, लेकिन उसके आदेश की अवहेलना करने की उनकी हिम्मत न हुई.
यह क्रम कोई नौ दिन चला. साधू के आकर्षण में फंसे जगन्नाथ रोज सुबह-सुबह उसके पास पहुँच जाते, कुदाल से जमीन की खुदाई करते और चुपचाप लौट आते. दसवें दिन साधू उनसे मुखातिब हुआ और प्रशंसा करते हुए बोला कि तुम परीक्षा में उत्तीर्ण हुए हो. जगन्नाथ आश्चर्यचकित होते हुए पूछे, “कौन-सी परीक्षा?” साधू ने संक्षिप्त-सा जवाब दिया, “वही जिसमें ज्यादातर लोग असफल होकर भाग जाते हैं.” जगन्नाथ को हैरानी से एकटक ताकता देखकर साधू ने खुलासा किया, “यहाँ बहुत-से लोग आते हैं बड़ी-बड़ी बाते करने, बड़ा दर्शन समझने-समझाने, बहस करने और शास्त्रार्थ करने. मैं उनकी वाचालता और पाखण्ड को पहले ही पहचान जाता हूँ और उनकी गंभीरता और धैर्य को परखने के लिए उन्हें जमीन खोदने के काम में लगाता हूँ. लोग घबड़ा कर भाग खड़े होते हैं. लोग नहीं जानते कि मन और शरीर के संतुलन के लिए श्रम बहुत जरूरी है और श्रमदान सबसे बड़ा दान. एक तुम्ही हो जो इस कठिन परीक्षा में सफल हुए हो. अब बताओ तुम कौन हो और क्या चाहते हो?”
जगन्नाथ ने अपना संक्षिप्त परिचय दिया और अपनी समस्या सुनायी. समस्या सुनकर साधू बहुत हंसा और आश्वस्त किया कि रोशनआरा तुम्हारा कुछ न बिगड़ पाएगी. लेकिन तुम देर-सबेर जरूर किसी शाहजादी के चक्कर में फंस जाओगे, हालाँकि वह मिलन दिव्य और मांगलिक होगा.
साधू की बातों से उत्पन्न आश्चर्य से जगन्नाथ अभी उबरे भी न थे कि साधू ने टोका, “तुम्हारे शारीरिक लक्षणों से लगता है तुम्हें पहलवानी का शौक है. आओ अखाड़े में ज़रा जोर-आजमाइश करें. एक जमाना गुजर गया कुश्ती लड़ने के लिए कोई साथी न मिला.”
जब जगन्नाथ ने साधू के बारे में जानना चाहा तो उसने सिर्फ इतना कहा कि मेरे बीते जीवन को जानकर कोई फायदा नहीं. वैसे भी, साधुओं को अपना अतीत भुला देना चाहिए. वर्तमान ही सब क

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12 COMMENTS

  1. यह प्रेमकथा मुझे छू गई, वाकई। मुझे भी पंडित जगरनाथ और लौंगी के प्रेम के बारे में पता नहीं था। बधाई और शुभकामनाएं।

  2. First of all, I express my regret that I am unable to give my comments in Hindi due to technical problems, though I would have love to. The novel has been woven on a historical canvas depicting the inter- mingling of two cultures – Mughal and Hindu – with picturesque description of life of Dara Shikoh ( elder son of Shahjahan and scholar of Persian and Sanskrit scriptures ) and ' akhad' Sufi sants, and Acharya Pt Jagannath ( a poet and scholar of Sanskrit scriptures ) and ' mastmaula ' enlightened sadhus. It is more an inter – course of the two cultures than a love story of two persons – Pt Jagannath and Laungi, youngest daughter of Shahjahan. The love between the two blossoms at the end of the novel and ends rather abruptly. The writer has a good command over Urdu and Hindi. He has skilfully used Persianised chaste Urdu and Sankritised sambhrant Hindi for the description of the conversation among the people of the two cultures with the use of Hindi of common parlance in between, lending authenticity to the historical background of the story. But , sometimes, the swtch-over from one language to another creates pebble – like obstruction in the natural flow of the confluence of the two languages. The love story of Pt Jagannath and Laungi is not much known. Hence the writer has ample scope to play the magic of his imagination without bothering for historical facts. The writer's venture to write a novel on such a new theme is appreciable and rightfully deserves our congratuulations. We shall be eagerly awaiting for the complete novel. Bahut- bahut sadhuwad !

  3. सरस,रोचक और पठनीय रचना। सम्पूर्ण उपन्यास शीघ्र ही पाठको तक पहुंचे। बधाई और शुभकामना।

  4. बहुत ही रोचक शैली में लिखा गया उपन्यास । ऐतिहासिक विषयवस्तु पर लिखी पुस्तकें अक्सर नीरस ही होती हैं पर यह अंश पढ़ कर सम्पूर्ण उपन्यास पढने को मन लालायित है । इतनी अच्छी हिन्दी इतने उम्दे उर्दू के साथ, सच पढ़ कर मजा आ गया ।

  5. बहुत ही रोचक शैली में लिखा गया उपन्यास । ऐतिहासिक विषयवस्तु पर लिखी पुस्तकें अक्सर नीरस ही होती हैं पर यह अंश पढ़ कर सम्पूर्ण उपन्यास पढने को मन लालायित है । इतनी अच्छी हिन्दी इतने उम्दे उर्दू के साथ, सच पढ़ कर मजा आ गया ।

  6. धन्यवाद रंगनाथ जी। हिन्दी मे मेरा विनम्र प्रयास है। प्रोत्साहन के लिए आभारी हूँ।

  7. कवि जगन्नाथ का एक कवि के रूप में हमें पता था लेकिन लौंगी के साथ उनके प्रेम प्रसंग था यह मालूम न था। . निश्चित ही बहुत रोचक उपन्यास पढ़ने को मिलेगा.
    प्रस्तुति हेतु आपका आभार

  8. बहुत सुंदर….इतनी सुथरी हुई हिन्दी में बिल्कुल अनछुए विषय पर लिखने के लिए साधुवाद…

  9. धन्यवाद. हौसला अफजाई के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

  10. ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में, रसखान और मीराबाई के शब्दों द्वारा एक प्रेम-कथा निर्मित करना, तथा उसे पठनीय बनाना, स्वयं में एक चुनौती है।
    लेखक यह करने में सफल रहे। बधाई एवं शुभकामनायें।

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