नवरात्र, बांगला संस्कृति और ‘अंधी छलांग’

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नवरात्र के दौरान बांगला समाज के जीवन, उनकी संस्कृति और एक स्त्री के निजी जीवन की त्रासदी को लेकर बांगला भाषा की नई दौर की चर्चित लेखिका मंदाक्रान्ता सेन का उपन्यास है ‘अंधी छलांग’. आज महानवमी है. आज इस उपन्यास पर लिखा यह लेख. लिखा है हिंदी लेखिका शर्मिला बोहरा जालान ने. पढ़िए और हो सके तो इस उपन्यास को भी पढ़िए. राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है- मॉडरेटर 
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कभी-कभी अँधेरे में भी रखना, देवी माँ 
कि देख लें आता कोई प्रकाश” 
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देवी स्तुति
                                     —
गगन गिल
महालया- माँ दुर्गा का आह्वान। बीरेंद्र कृष्ण ने महालया के श्लोकों का न जाने कितने सालों पहले पाठ किया था लेकिन आज भी यह शरीर में एक अजीब सी सिहरन पैदा करता है। यह पुराना लगता ही नहीं। अंधी छलाँग‘(झांँप ताल) की नायिका तिथि को लगता है यह भी एक धर्माचरण है। एक संस्कार। वरना आज के दिन हर बंगाली इसी धुनों को सुनने के लिए क्यों बेचैन हो उठते हैं?
महालया के दिन धूप में पूजा की गंध है। कानों में कभी सुनी ढाकी के ढाक बजाने की आवाज है। 

आँखें में धूपदानी में मुट्ठी-मुट्ठी जलती धुनो की आभा है। 

उससे उठनेवाले धुएँ से पूजा की वेदी और चबूतरे पर छाए धुँधलके से माहौल पवित्र और अद्भुत हो गया है।

यह कथा बीते दिनों से शुरू होकर 

रुपम् देहि, जयम् देहि के उच्चार में जीवन में  बत्तीस महालया गुजर जाने के बाद किसी महालया की स्मृति है। यह कथा नवरात्र के नौ दिनों के क्रिया-कलाप की ही कथा नहीं है। यह एक तरफ बंगाल के उस बाहरी दुनिया की कथा है जिसके जीवन में धार्मिक कर्म-कांड का उत्सव है, और इसकी जकड़न है तो दूसरी तरफ आंतरिक जगत का हाहाकार है। यह तिथि की कथा है। पर यह सिर्फ तिथि की ही कथा नहीं है। भारतीय समाज की हर युवती की कथा है जो तिथि जैसी है और जो तिथि जैसी नहीं है।

कटवा- आजिमगंज लाइन की ट्रेन छूट रही थी। कोयले का इंजन चमक रहा था।तिथि विवाह के बाद पार्थ और अपने ससुरालवालों के साथ अपने कुटुम्ब के बाकी सदस्यों से मिलने जा रही थी। गाँव में किसी को पार्थ की शादी के बारे में जानकारी नहीं। बेहाला के मकान में तिथि को एक तरह से छिपाकर ही रखा गया था।

उड़ जहाज का पंछी, पुनि पुनि जहाज पर आवेइस पूरे उपन्यास को समझने का सूत्र है।

तिथि मित्र अपने माता-पिता का घर छोड़ पार्थ मल्लिक से विवाह कर वापस मायके लौटती है। मां ही आश्रय है।

अंधी छलांगकी कथा, दुखद स्मृतियों का पुंज है। पीड़ा का ज्वार है।

तिथि ने मां के घर से निकलने से मां के घर लौटने तक एक तरह से कहा जाए निर्वासन झेला। उसने सही जीवन नहीं जिया।

उसने प्रेम किया पर उस उम्र में यह नहीं समझा कि प्रेम भंगुर है। जिस तरह जीवन के हर्ष व शोक। बच्चे के हाथ में खिलौने की तरह।

तिथि मित्रा पार्थ मल्लिक को पाने की कोशिश करती है और वहीं वह उसे खो देती है। पाना ही खोना है।

जिस पार्थ से तिथि ने प्रेम किया था वह महान फिल्मकारों की फिल्मों में डूबता उतरता परिष्कृत मन था। जो उड़ान भरता था। 

जो कहता- चलो, हम दीवानों की तरह एक दूसरे को चाहें

जो कहता- ओह तिथि, मेरी छोटी सी तिथि

मैं भी तुमसे बहुत प्यार करता हूँ।

जिस पार्थ से तिथि ने विवाह किया वह परम्परा व रुढियों में जकड़ा रुग्ण और डरा हुआ मन है। तभी तो पार्थ उस पर हाथ ही नहीं उठाता तलाक के कागज भी भेजता है।
एक घिसी पिटी बात से अपनी बात बढ़ाने के लिए विवश हूँ कि हजारों साल से चली आ रही इस पितृव्यवस्था ने, परिवार संस्था ने मनुष्य को  तमाम तथााकथित सुरक्षा के बाद भी बहुत असंवेदनशील और अमानवीय जीवन जीने के लिए अभिशप्त किया है और इस जीवन से जो साहित्य प्रसूत हुआ उससे गुजरते हुए पाठक को पीड़ा, कष्ट और संताप होता है।
इस व्यवस्था में दुख का जो संसार रचा जाता है वह इसी कारण कि दो लोग स्त्री और पुरुष संग रहना वरणकरते हैं। और यह संगसारी अपेक्षा को जगाता है। एक व्यवस्था जन्म लेती है और उसमें शोषण होता है।

प्रेमी जन शोषण करवाते चलते हैं और फिर बगावत पर उतर आते हैं।

उपन्यास को समझने के लिए और कथा के साथ बने रहने के लिए कथा के प्रमुख चरित्रों की पृष्ठभूमि समझना अनिवार्य हो जाता है।
पाठक को यह कथासार बताना भी लग सकता है। जो पुरानी बात हो गई। जिसके दिन लद गए हैं। और यह इस समीक्षा की सीमा मानी जा सकती है, पर जो इसकी शक्ति भी हो सकती है।
तिथि मित्रा मध्यवित्त परिवार की लड़की है।

जिसकी मां अदिति रमा दत्त की बेटी हैं जो खुलना (बांग्ला देश) पश्चिम बंगाल से आए थे। वह सुंदरवन इलाके के सातदेलिया द्वीप के एस्टेट मैनेजर थे।

तिथि के पिता विश्वनाथ मित्र ने सरकारी ऑफिस में क्लर्क की नौकरी पाने के बाद अपना घर बनाने की कसम खाई। रोज चार ट्यूशन और नौकरी के बल पर अपने खून पसीने की कमाई से उन्होंने सैंतीस साल की उम्र में दो तल्ले का मकान बनाया। उन्होंने किसी से एक पैसा भी मुफ्त में नहीं लिया। और न ही किसी गलत काम से रुपये कमाये।

साठ साल की उम्र में बैंक में उनके जमा किये काफी रुपये थे। ये रुपये सरकारी नौकरी और ट्यूशन करके नहीं मकान के किराये से जमा किये रुपये थे। इतना सब होने के बाद भी जीवन की शुरुआत में हर परिस्थिति का सामना करने के लिए खुद को काफी कड़ा बनाया था और ऐसा करते हुए खुद को कंजूस बना लिया था। और इसके इतने अभ्यस्त हो गए थे कि वर्तमान में उस कंजूसी की जरूरत न होने पर भी वे खुद को इस आदत से निजात नहीं दिला पाए।

तिथि पार्थ केे चाचा की लड़की मौसमी की सहेली है। मौसमी के पिता अरूप मल्लिक की आर्थिक स्थिति अच्छी है। अरूप मल्लिक ने डॉक्टरी पास करने के बाद पिता की मर्जी के बगैर शादी की और ससुर के पैसे पर विदेश चले गए।
पार्थ के पिता सात भाई थे। आलोक मल्लिक सबसे बड़े। उनकी आर्थिक स्थिति साधारण थी। वे लोग गाँव का मकान छोड़कर पिछले छब्बीस सालों से कोलकाता में किराये के मकान में रह रहे थे। जिस नौकरी के लिए पार्थ के पिताजी शहर आए थे वह भी बेहद साधारण थी। उस नौकरी को छोड़ उन्होंने दूसरी नौकरी कर ली लेकिन वह भी अच्छी नहीं थी। दरअसल उसके पिता नौकरी करने या पैसा कमाने के बारे में कभी गंभीरता से सोचते ही नहीं थे।
पार्थ ने ग्रेजुएशन पूरी नहीं की। जब वह बेलुड़ के विद्यामंदिर में केमिस्ट्री लेकर पढ़ रहा था, फर्स्ट इयर में ही फिल्म इंस्टीच्यूट में भर्ती होने के लिए पुणे भाग गया और बिना कुछ जानकारी के वह जैसे गया था वैसे ही लौट आया।

कलकत्ता में ही वह यहाँ-वहाँ जानकारी ले एडिटिंग करना और यूमेटिक वीडियो का काम सीख गया व फ्री लांसिंग का काम करने लगा

उसकेे पास कोई स्थायी नौकरी नहीं है। जब उसके दोस्तों, रिश्तेदारों के बच्चों ने डॉक्टर, इंजीनियर, सीए बनने का ख्वाब देखा उसने  सत्यजीत राय की तरह निर्देशक बनने का सपना देखा। वह बार्गमैन की साइलेंस‘,  बुनुयेल की विरिडियाना‘, कुफ्रो की कुलेजीम‘, रित्विक की कोमाल गांधारजैसी फिल्में बनाना चाहता था।   
   पार्थ तिथि से बारह साल बड़ा है। दोनों में प्रेम हुआ और रजिस्टरी विवाह कर तिथि अपने माँ पिता को बताए बिना उसके साथ रहने चल पड़ी। उस मल्लिक परिवार से रिश्ता जोड़ा जिसके लिए कहबत है आधा कोलकाता मल्लिक का बचा हुआ खल्लिकों का। तिथि पार्थ के साथ विवाह के बाद दुर्गा पूजा के अवसर पर गाँव जाती है तो कहती है-

किसी जमाने में इस शहर की सारी ऊँची और बड़ी इमारतें मल्लिक परिवार की ही थी।  कुछेक पुश्तों से वे लोग लोहा- लक्कड़, बालू – सीमेंट का कारोबार करने लगे थे। पूरे शहर में उनकी कई दुकानें थी। मगर उनमें से अधिकतर मकान और दुकान अब उनके हाथों से निकल चुके थे। मल्लिक परिवार की हालत अब बेहद खराब हो चुकी थी।

वह इसी मल्लिक परिवार के खस्ता हाल जीवन के पार्थ मल्लिक से रजिस्टरी मैरज करती है।

उसकी माँ अदिति को इस पर आपत्ति है। वह क्यों सशंकित है? 

जबकि अदिति ने स्वयं बड़े बाप की बेटी होने के बावजूद गरीब पिता से प्यार करने के बाद शादी की है ।

मन में यह बात आती है कि आखिर यह प्रेम होता क्या है? दो लोग एक दूसरे को दिवानों की हद तक प्रेम करते हैंवहां तक तो ठीक है पर साथ रहने घर छोड़कर क्यों चल पड़ते हैं? ‘परइसलिए लिखा कि जैसे ही साथ रहने लगते हैं एक व्यवस्था जन्म लेती है। जो शोषण करती है। 

प्रेम का मनोविज्ञान क्या है? प्रेम करने के कई कारणों में तिथि के सन्दर्भ में जो काऱण समझ में आता है वह यह कि वह सुऩ्दर नहीं है। वह लम्बी है काली है सामने झुककर चलती है तो माँ कहती है वह कुबड़ी है। …दूसरी बार जब उसके दाँत उगे तब ऊपर के दाँत कुछ ऊँचे हो गए। बहुत खराब लगता था। डॉक्टर ने कहा ऐसे दाँत रह गए तो लड़की की शादी कैसे होगी।

सिलीगुड़ी से कक्षा-आठ में एक बेहद खूबसूरत  लड़की मौसमी आई है। जिसका नया फ्लैट तिथि के मकान के पास है। मौसमी जब तिथि के बगल में बैठती है तब मॉनिटर सुदीप्ता कहती है- राम के बगल में राम प्यारी। तभी किसी और ने टिप्पणी की नहीं-नहीं, ब्यूटी एंड द बीस्ट

सुदर्शन न होना लड़का हो या लड़की क्या उनमें तनाव पैदा नहीं  करता है? वे अकेले हो जाते हैं और यह भाव उनमें अवसाद की सृष्टि करता है। ग्रन्थी पैदा करता है। उस हीन भावना से आहत मन स्नेह की तालाश में अपने जीवन में आए व्यक्ति से लगाव महसूस करता है। किसी का किसी के प्रति लगावसुन्दर भाव है पर यही सच जो सुंदर था तिलिस्म में परिणत होता है और विवाह के बाद टूट जाता है।

यहीं वह अँधी छलांग अर्थात् झाँप यानी कूद है। प्रेमी जन जिसे प्रेम कहते हैं वह तिलिस्म की तरह टूट जाता है। क्या यह वह क्षतिपूर्ति नहीं है जो बचपन व किशोरावस्था व युवा दिनों की हीन भावना की ग्रंथी से पैदा हुई थी! 

यह लगाव या प्रेम नहीं ही था। होता तो उसका हश्र ऐसा कैसे होता। पार्थ तिथि को पत्नी बना उससे सहवास तो करना चाहता पर यह एक बार भी नहीं सोचता कि उसके परिवारवालों ने तिथि को सामाजिक विधि विधान से विवाह न होने के कारण उसे अपनाया नहीं है बल्कि उसकी अनदेखी की है। पार्थ से विवाह करने का निर्णय लेने से लेकर उसके निहायत निम्नवर्गिय परिवेशवाले घर में रुढ़िवादी माहौल में आकर रहने तक तिथि ने अनवरत मानसिक तनाव झेला है। वह अशांत व क्लांत है।

उसका त्याग और समर्पण बन्दी के विवश कर्तव्य हो गए हैं।

पार्थ के घर में उसकी स्थिति विचित्र व हास्यास्पद है। यह सब कुछ पार्थ से अलक्षित कैसे रहता है?
इस तरह कथा का ताना-बाना अतिपरिचित पारम्परिक शिल्प में फ्लैश बैक पद्धति द्वारा  झिनी झिनी बीनी चदरिया है। 

जिसमें बंगाल के परिवारों की कथा तिथि व पार्थ के परिवार के सन्दर्भ में समानांतर चलती रहती है और बंगाली संस्कृति का वर्णन करती है।

बंगाल में पूजा के उत्सव उसके आनंद किशोरों व युवा में उसके उत्साह को सरल सुबोध गद्य  में लिखा गया है जिसमें पद्य का भी स्वाद पाठक को मिलता चलता है।

पार्थ के दादाजी अघोर मल्लिक तीन भाई थे। गाँव के मकान में तीनों भाइयों पर बारी-बारी से पूजा कराने की जिम्मेवारी पड़ती। इस बार पूजा की जिम्मेदारी आलोक मल्लिक के कंधे पर है। पर सारा काम पार्थ के कंधों पर है।

पूजा घर के सामने बरामदे में तिथि तांबा और पीतल के बर्तनों को इमली से घिसकर माँज रही थी।पूजा के माहौल में कई प्रकार के काम में लोग व्यस्त रहते हैं।

पूजा-घर में दीपक जलाने की बाती बना रही है। मिट्टी के दीपक को धोकर सुखाने रखना है। पार्थ नये कपड़े खरीद कर लाया है उसे गंगाजल में धोकर सुखाना होगा तभी माँ को वह पहनाये जाएंगे। फूलों को धोकर भीगे कपड़े में रखना। अल्पना बनाना। फल काटना, चावल धोना, थालियों में पान सजाना, एक सौ आठ बेलपत्र सजाना। प्रकाश की व्यवस्था करना। छोटे-छोटे कागज व कपड़े के झंडे बनाना और बंदनवार की तरह लटकाना। 

पूजा घर बहुत पुराना था मल्लिक परिवार के पूर्व पुरुषों के जमाने का। हमेशा रँगाई-पुताई होने के बाद भी इसकी प्राचीनता कम नहीं हुई।

इन छोटे-छोटे सारगर्भित विवरण के द्वारा लेखक यह बताती हैं कि लाख कोशिश करने के बाद भी तिथि पार्थ और उसके परिवारवालों के असंवेदनशील व्यवहार व वातारण में तालमेल नहीं बैठा पाती और मां के पास लौट जाती है।
इस उपन्यास के माध्यम से लेखक मंदाक्रान्ता  सेन ने घर से निकल घर की यात्रा तक एक स्त्री की सामाजिक स्थिति के छिलके उतारे हैं कि समाज में बदला आज कुछ भी नहीं है। रुढ़ियों में, अपेक्षाओं में, मान्यताओं में हम और भी पीछे जाते गये हैं। खुलने के बजाए हमारी खिड़कियाँ और बंद और जाम हुईं हैं।
परम्परा जो तिथि का रास्ता रोक रही थी, अब वह उसके बंधन खोल देती है। वह हाथ में पहनी शांखा-पॉला, लोहे की चूड़ियाँ खोल देती है। ताबीज पहनने से इंकार करती है।
वह जो शंकित थी जीवन का क्रांतिकारी निर्णय लेती है। पारिवारिक ढाँचे से बाहर आती है। मायका सम्बल बनता है।
तिथि में यह आत्मविश्वास उसकी स्वयं की पहचान से आया है। अर्थपूर्ण , गरिमामय जीवन, सच्ची स्वतंत्र नारी का जीवन जीने का साहस आया है।
उसके सामने उद्देश्य भरा जीवन है। प्रतिसंसार है। मित्र अनिंद्य है।

ध्रुपद के शाश्वत संगीत की तरह दुर्गापूजा का आनंद तिथि के जीवन में फिर आ गया है। तिथि अपनी माँ से लाड़ करती कहती है- माँ जरा वह गीत सुना दो…झूठे सपने कहीं खो गए, बात गई वह रात अँधेरी..।

शर्मिला बोहरा जालान 

अन्त में जाते-जाते चौखट से एक दो बात ; ‘अंधी छलांगका शिल्प नया नहीं ही है। लेखक ने कोई प्रयोग नहीं किया है। यह इस उपन्यास की सीमा है और यही इसकी शक्ति भी कि पारम्परिक शिल्प में वह हमें एक ऐसे अन्त:पुर के भीतर ले जाती हैं जिसकी विदीर्णता का हम अनुमान भी नहीं लगा पाते क्योंकि हमें जो दिखाई पड़ता है उसी को हम देख रहे होते हैं। पर जो नहीं दिखता उसके नीचे गहराई और डूब है।


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