रईस नहीं होता तो आज की  सियासत  नहीं होती

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‘रईस’ एक राजनीतिक फिल्म है लेकिन जो अहमदाबाद, गुजरात की राजनीति को नहीं समझते वे इसकी राजनीति को नहीं समझ सकते. राजनीति विज्ञानी, दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक प्रवीण प्रियदर्शी ने शाहरुख़ खान अभिनीत इस फिल्म और इसकी राजनीति पर बहुत अच्छा लेख लिखा है, जो मेरे जानते पहला ही लेख है जो इस फिल्म की राजनीति को इतनी गहराई से देखने समझने की कोशिश करता है. आप सब भी पढ़कर बताइए कि कैसा लगा रईस फिल्म का यह आकलन- मॉडरेटर

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रईस एक ऐसी फिल्म है जो निराश भी करती है और उम्मीद भी जगाती है। फिल्म उम्मीद जगाती है क्योंकि यह ऐसे मुद्दे उठाने की कोशिश करती है जो काफी गहरे रूप से राजनैतिक है। उम्मीद इसलिए भी क्योंकि शाहरुख़ खान जैसे स्टार जो राजनैतिक फिल्मों के लिए नहीं जाने जाते हैं, ऐसे मुद्दे पर फिल्म बना रहे हैं।  उम्मीद इसलिए भी कि पहली बार शाहरुख़ एक बायोपिक के हीरो हैं। हालाँकि ये बायोपिक स्टेल्थ (stealth) है.  डिस्क्लेमर्स के बावजूद यह एक खुला रहस्य है कि रईस अहमदाबाद के अब्दुल लतीफ़ की कहानी है। लेकिन फिल्म निराश करती है क्योंकि फिल्म इन मुद्दों को बस छू भर पाती है। ज्यादातर लोगों  को जिन्हें इन मुद्दों की ऐतिहासिस और राजनैतिक पृष्टभूमि का पता नहीं है, फिल्म काफी सतही लगती है। फिल्म निराश करती है क्योंकि इसमें न तो भावनाओं की चिकनी, ऊँची उड़ान है न ही ठोस यथार्थ का खुरदुरापन।

इस बात पर फिर लौटेंगे। आईये पहले देखते है  कि रईस की कहानी का क्या राजनैतिक महत्व आखिर है क्या?

इस बात पर सहमति है कि रईस की कहानी दरअसल अब्दुल लतीफ़ की कहानी है। अब्दुल लतीफ़ अहमदाबाद का एक माफिया सरगना था। 1980 के दशक में पुरानी अहमदाबाद की गलियों में लतीफ़ की तूती बोलती थी। ये दोनों ही कोई असाधारण घटना नहीं हैं. दुनिया भर के शहरों में माफिया सरगना होते हैं. लतीफ़ भी था. माफिया होने का मतलब ही है तूती का बोलना। सो लतीफ़ की भी बोलती थी. न ही  यह बात असाधारण है कि लतीफ़ की जिंदगी पर फिल्म बनायी गयी है. पहले भी माफिया सरगनाओं के ऊपर फिल्मे बनायीं जाती रही हैं. ये तो दरअसल पूरा का पूरा एक genre ही रहा है. लेकिन इन तीन बातों को एक साथ रख कर देखें तो रईस का बनना इतनी साधारण बात भी नहीं रह जाती. लतीफ़ 1980 के दशक के अहमदाबाद का डॉन था जिसकी जिंदगी पर शाहरुख़ खान ने आज के दौर में फिल्म बनाने का फैसला किया. अगर ये बात इतनी साधारण होती तो  फिल्म में लतीफ़ का नाम लतीफ़ ही रहता और अहमदाबाद का नाम  भी अहमदाबाद ही होता.  लेकिन ऐसा  है नहीं है. लतीफ़  एक साधारण माफिया डॉन था लेकिन उसकी कहानी साधारण नहीं है क्योंकि  अस्सी के दशक के अहमदाबाद में आज की भारत की राजनीति के जड़ें गड़ी हैं.

आईये देखते हैं की रइस हमें उस अहमदाबाद  के बारे में क्या बताता है, क्या नहीं बताता है. फिल्म हमें बताती है कि लतीफ़ ने शराब के लोकल प्रोडक्शन के बदले विदेशी शराब बाहर से मंगवाने की शुरुआत की।  फिल्म हमें बताती है कि लतीफ़ ने अपने ingenuity से शराब के अवैद्य बिक्री को स्ट्रीमलाइन कर दिया। फिल्म हमें बताती है की लतीफ़ ने एक कारोबारी नेटवर्क बनाया जिसे प्रशासनिक और राजनैतिक संरक्षण प्राप्त था. फिल्म हमें बताती  है कि लतीफ़  ने रियल एस्टेट बिज़नस में कदम ज़माने की असफल कोशिश की. फिल्म हमें ये बताती है की लतीफ़ ने जेल में रहते हुए चुनाव लड़ा और जीता।

लेकिन फिल्म हमें  ये नहीं बताती है कि लतीफ़ का कारोबार केवल शराब का अवैध व्यापार नहीं था. लतीफ़ रियल एस्टेट बिज़नस की भी उतनी ही महत्वपूर्ण कड़ी था जितना कि शराब वितरण का. दरअसल अस्सी के दशक में पूरे भारत में शहरी जमीन के व्यापार और उसके ऊपर स्वामित्व का चरित्र बदल रहा था. इस बदलाव के पीछे 1976 में लाया गया अरबन लैंड सीलिंग एक्ट था. सीलिंग की वजह से अहमदाबाद में बड़ी मात्रा में जमीन का बेनामीकरण हुआ और जमीन के अनौपचारिक बाजार की भूमिका बढ़ी. इस अंडरग्राउंड बाजार को चलाने और नियंत्रित करने  के लिए अंडरवर्ल्ड  के ताकत की जरूरत थी. लतीफ़ उस ताकत के रूप में उभरा जिसकी जरूरत इस बाजार और उसको नियंत्रित करने वाले लोगों को थी. लतीफ़ का काम इन जमीनों के अनौपचारिक स्वामित्व को कायम रखना, उन पर बने मकानों से किराये की उगाही, जरूरत पड़ने पर इन जमीनों और मकानों को खाली करवाना वगैरह था. फिल्म हमें  ये भी नहीं बताता की लतीफ़ ने जो चुनाव लड़ा था वह म्युनिसिपल कौंसिल का था. 1987 में लतीफ़  एक नहीं, दो नहीं बल्कि पांच वार्डों से चुनाव लड़ा और जीता। उसका म्युनिसिपल चुनाव लड़ना जमीन की इस राजनीति के  सन्दर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है.

अस्सी  के दशक के अहमदाबाद में अगर जमीन  की राजनीति बदल रही थी, तो राजनीति की जमीन भी बदल रही थी. कांग्रेस का KHAM (क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी, मुस्लिम) समीकरण  असफल हो रहा था. टेक्सटाइल मिल्स बंद हो रहे थे, मजदूर बेरोजगार हो रहे थे, मुहल्लों की जमीनों की कीमतें बढ़ रही थी. इन जमीनों का रियल एस्टेट मार्किट में वापस लौटना शहरी विकास के लिए आवश्यक था. यह वही दौर था जिसमे की अहमदाबाद में दंगे लगभग सालाना घटना बन गयी. अहमदाबाद के लोग इसे ‘धमाल’ कहने लगे. ये दौर था जब हर बात पर, बात बात पर अहमदाबाद में धमाल हुए. पतंग लूटने  के झगडे पर धमाल, पड़ोसियो के झगड़ों पर धमाल. और हर धमाल के बाद कुछ लोगों  की मौत, कुछ जले हुए घर और हाँ, कुछ जमीनें खाली. लतीफ़ डॉन उस दौर के अहमदाबाद की जरूरत था.

लेकिन जैसा कि होता है, लतीफ़ जल्दी ही उस जरूरत  से बड़ा बोझ बन गया. लोग परेशान भी होने लगे और उन्हें यह खेल भी समझ में आने लगा. राजनीति को एक बार फिर लतीफ़ की जरूरत थी. लेकिन लतीफ़ डॉन की नहीं, लतीफ़ मियां भाई की.  उस लतीफ़  की नहीं जो जमीन खाली करवाता था. बल्कि उस लतीफ़ की जिसे सारी समस्याओं की जड़ बताया जा सके. वह लतीफ़ जिसकी बुराई उसके डॉन होने में कम और उसके मुसलमान होने में ज्यादा हो. लतीफ़ के मुसलमान होने की बुनियाद पर अहमदाबाद में सफल राजनीति की नयी जमीन तैयार हुई.  हम सब जानते  हैं  इस राजनैतिक जमीन का फैलाव आज अहमदाबाद तक सीमित नहीं है.

रईस उर्फ़ लतीफ़ नहीं होता तो हमारी आज की सियासत नहीं होती। केओस (chaos) थ्योरी की भाषा में कहें तो अब्दुल लतीफ़ वह तितली है जिसके पंखों की फरफरहट ने भारतीय राजनीति रुपी ब्रह्माण्ड की दिशा बदल दी।  रईस की कहानी आज  की राजनीति  के जड़ों की कहानी है. लेकिन रईस का सिनेमाई व्याकरण उन जड़ों को ढूंढ पाने में विफल है.और जैसा कि शाहरुख़ खान की फिल्मों के साथ होता है, निराशा और उम्मीद दोनों की जिम्मेदारी शाहरुख़ खान की है।  शाहरुख़ खान की फिल्में भव्य (grand) होती हैं, सेट के स्तर पर नहीं तो भावनाओं की अभिव्यक्ति के स्तर पर। शाहरुख़ खान के चाहने वाले उनकी फिल्में भावनाओं और कल्पनाओं की इसी उड़ान को ढूंढते हुए जाते हैं। इक्का दुक्का अपवादों को छोड़ दें तो शाहरुख़ खान  की सिनेमा का व्याकरण इसी भावनात्मक भव्यता को ध्यान में रख कर गढ़ा गया है जिसके केंद्र में हमेशा शाहरुख़ का ‘परसोना’ है।  चाहे वह डर और बाजीगर जैसी फिल्मों में भय और घृणा की भव्यता हो चाहे उनकी बाकी की फिल्मों में रोमांस की भव्यता। यही शाहरुख़ के फिल्मों की पहचान भी है और खासियत भी। लेकिन यही व्याकरण रईस जैसी फिल्म के लिए उसकी कमजोरी बन जाती है।  फिर भी, उम्मीद इस बात में है कि हमारे दौर के रोमांटिक मेगास्टार ने राजनीति के इन जड़ों में झाँकने की, नाकाम ही सही,  कोशिश और हिम्मत की है.

6 COMMENTS

  1. मैंने सिनेमा तो नहीं देखी है अबतक पर, यह आलेख बहुत उम्दा है। प्रवीण अहमदाबाद पर बहुत दिनों से काम कर रहे है । इस लेख में बहुत कुछ है।

  2. बहुत अच्छा विश्ले षण है । राजनीती सामाजिक पृष्ठ्भूमि एवं वर्तमान में इसकी प्रासंगिकता। waiting for more writing like this other than academics.

  3. इस परदे पर से परदा बख़ूबी से गिराया है प्रवीण जी ने ।। कल ही रईस को देखा और यह समझ में आया कि कहानी बहुत कुछ कहने से बचना चाहती हो, commercial सिनेमा की मजबूरी कहें या आज की राजनीतिक परिस्थिति जो भी हो यह कुछ चुनिंदा फ़िल्मों की तरह उस गंदगी को परोस रही है जिसे हमारी राजनीति और समाज साफ़ करने में असफल है।। कितने रईस चले गये और कितने अभी उभरेंगे, पहले बनाये जायेंगे फिर मिटाये जायेंगे।।

  4. भारतीय राजनीति में 1980 के दशक को परिवर्तन का दशक के तौर पर भी देखा जाता रहा है, इसी परिवर्तन के चक्र में रईस का अहमदाबाद में दबंग/डॉन/ बाहुबली राजनीतिकरण का उभरना और उसे राजनीतिक चश्में से देखने/दिखाने की दृष्टि के लिए प्रवीन सर को बधाई ..

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