मैं वेद प्रकाश शर्मा बनना चाहता था!

यादें लेखन के संघर्ष दिनों की

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साल 1994 का था। इम्तियाज़ को मुम्बई गए एक साल हो गया था। एक दिन महाशय(राकेश रंजन कुमार) मेरे पास आया और बोला मैं मुम्बई जा रहा हूँ। वह चला गया। मैं अकेला रह गया। बीच बीच में कभी वह किसी धारावाहिक में दिख जाता था, कभी यह पता चलता कि वह कोई धारावाहिक, कोई फिल्म लिख रहा है। वह इम्तियाज़ की तरह चिट्ठी नहीं लिखता था। फोन उस समय बड़ी बात थी। एक साल बाद मेरे मानसरोवर होस्टल में महाशय फिर प्रकट हो गया। बोला कि अब यूपीएससी दूंगा। टेलीविजन में कुछ रखा नहीं है, फिल्म में ब्रेक नहीं मिल रहा है। मैं तब तक दिल्ली की टीवी इंडस्ट्री में एकाध साल तक कुछ छोटे मोटे काम करके यह समझ चुका था कि बेहतर है पढ़ाई-लिखाई की दुनिया में लौट जाया जाये। फेलोशिप मिलती थी। लेकिन वह न तो यूपीएससी के लिए पढ़ाई कर पा रहा था न मैं एकेडेमिक्स में नौकरी का जुगाड़ कर पा रहा था। हम रोज़ योजनायें बनाते थे। उन दिनों वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यास ‘वर्दी वाला गुंडा’ की असाधारण सफलता ने लोकप्रिय उपन्यास लिखकर पैसे और शोहरत कमाने की उम्मीद मुझे जैसे न जाने कितनों के दिल में जगा दी थी। उस दौर में हिंदी पढने वालों के लिए मौके बहुत सीमित होते थे। हम दोनों ने यह तय किया कि अब रंजन-कुमार नाम से जासूसी उपन्यास लिखे जाएँ। दोनों मिलकर लिखेंगे और नाम-पैसा दोनों कमाएंगे। भाड़ में जाए मुंबई यहीं रहेंगे लेखक की शान से जियेंगे। उस समय दिल्ली में बुराड़ी में राजा पॉकेट बुक्स का नाम नया-नया चमका था। मैंने यह तय किया कि एक उपन्यास की योजना लेकर राजा पॉकेट बुक्स के दफ्तर में जाया जाए। मैं सीनियर था इसलिए मैंने फैसला सुनाया कि महाशय प्रकाशक से जाकर डील करे और मैं कमरे में बैठकर लिखूंगा। आखिर वह मुम्बई रिटर्न था। उसके पास एक बायोडाटा था जिसमें महेश भट्ट से लेकर रामगोपाल वर्मा से लेकर न जाने कितने फिल्म निर्माताओं-निर्देशकों की कभी न बन पाई फिल्मों-धारावाहिकों के नामा दर्ज थे, जिनका वह लेखक होता था।

पंचांग देखकर मैंने बुधवार का समय शुभ पाया और महाशय को राजा पॉकेट बुक्स, बुराड़ी के लिए रवाना किया। कमरे में बैठकर उसका इन्तजार करने लगा। तीन-चार घंटे बाद महाशय आया तो बहुत गुस्से में था। कहने लगा कि ये पॉकेट बुक्स वाले बहुत बदमाश होते हैं, आपको इस बात का पता था इसीलिए आपने मुझे भेजा, खुद नहीं गए। उसके बाद कूलर का ठंढा पानी पीने के बाद उसने कहानी बयान की। जैसे ही उसने राजा पॉकेट बुक्स के मालिक को अपना बायोडाटा दिखाया और उपन्यास लिखने की पेशकश की तो मालिक बायोडाटा में महेश भट्ट का नाम देखकर चिढ गया, उसने महाशय के लिखे बड़े बड़े धारावाहिकों के नाम देखे और उसके चेहरे को देखा, जिस पर संघर्ष की गहरी खराशें थीं, कपड़ों में पुरानापन था। मालिक गुस्से में आ गया। बोला तूने महेश भट्ट के साथ काम किया है तो यहाँ क्यों आ गया है। सच सच बता तुझे भेजा किसने है? यहाँ से कोई मक्खी भी निकल कर नहीं जा सकती तू तो इंसान है। महाशय ने घबराते हुए कहा कि किसी ने नहीं भेजा है, मैं दिल्ली आया था तो सोचा कि एक उपन्यास ही लिख लूं। इसीलिए आया। असल में उन दिनों पॉकेट बुक्स की दुनिया में एक दूसरे के आइडिया को चुराने का खेल खूब होता था और राजा पॉकेट बुक्स के मालिक को यह लगा कि महाशय कोई जासूस है। जब उसे यकीन हो गया कि वह सच में लेखक ही है तो उसने कहा कि देख, आजकल दिल्ली में कारों की चोरी खूब हो रही है। जा 10 दिन में एक उपन्यास कार चोरी पर लिखकर ला। दो हजार नकद दूंगा।

दो हजार- हमारे सपनों का महल धराशायी हो गया। हम कोसने लगे कि ये पोपुलर वाले बड़े ठग होते हैं। इतना बड़ा काम हम महज दो हजार रुपयों के लिए नहीं करेंगे। हमारे पास तब पैसे बिलकुल नहीं थे लेकिन दो हजार में एक उपन्यास लिखना हमें तौहीन लग रहा था।

रंजन-कुमार की जोड़ी बनने से पहले ही टूट गई।

बाद में महाशय(राकेश रंजन कुमार) ने एक फिल्म निर्देशित की ‘गांधी टू हिटलर’ और मैं साहित्यिक कहानियों के नाम पर महाशय के रोमांचक जीवन की कहानियां लिखने लगा।

आजकल मैं महाशय के दूसरी फिल्म का इन्तजार कर रहा हूँ और वह मेरे पहले उपन्यास का!

प्रभात रंजन 

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