‘रंगून’ फिल्म नहीं एक अतुकांत कविता है

'रंगून' फिल्म की एक अलग रीडिंग

1

सोशल मीडिया के वर्चस्व के इस दौर में हम जजमेंटल होने की जल्दबाजी में रहते हैं. एक वाक्य में फैसला सुनाकर अगले फैसले की तरफ बढ़ जाते हैं. ‘रंगून’ फिल्म के साथ यही हुआ है. उस फिल्म की आज एक और डिफरेंट रीडिंग दिव्या विजय ने की है- मॉडरेटर

============

रंगून एक अतुकांत कविता है। कविता जिसमें लय तो है परंतु पंक्तियों के अंत मुक्त हैं। कविता जो छंदमुक्त होकर अपनी परिधि तोड़ देना चाहती है परंतु सफलता न पाकर अपनी सीमाओं में ही तेज़ी से चक्कर काटती रह जाती है।

मुंबई के सिनेमा हॉल में कई दिनों की थकान के कारण शुरू के दस मिनट झपकी में निकल गए पर कंगना ऊर्जा से भरी हुईं थी तो लाज़िम है कि सोना नामुमकिन था। कंगना स्क्रीन को कैप्चर करना जानती हैं, उन्हें इसके लिए अतिरिक्त चेष्टा नहीं करनी होती। उनकी ऊर्जा सहजता से उनसे होती हुई दर्शकों तक जा पहुँचती है।

फ़िल्म दूसरे विश्व-युद्ध की पृष्ठभूमि पर है। उन दिनों जब भारतीय, ब्रिटिश आर्मी की ओर से जर्मनी और जापानियों के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे और हिंदुस्तान की आज़ादी की आग भी भीतर सुलग रही थी तब देश के भीतर गाँधी और बोस के नाम पर बँटे दो गुटों को तो निर्देशक ने इंगित किया ही है साथ ही रूसी जैसे टोडी बच्चे की राज-भक्ति को भी दिखाया है जिन्हें बस अपनी व्यावसायिक सफलता और अंग्रेज़ों से मिल रहे सम्मान से ही मतलब था। दूसरी ओर हिंदुस्तान को आज़ाद देखना चाहने वाले नवाब मलिक हैं। इनको जोड़ने वाली कड़ी हिंदुस्तान के साथ-साथ जूलिया भी है। जूलिया जो पहले रूसी के नक़्शे-क़दम पर चलती है मगर फिर अपने प्रेम की ख़ातिर बाक़ी सब भूल जाती है।

निस्सन्देह यह पॉलिटिकल ड्रामा है… यहाँ प्रेम भी है पर धीरे-धीरे दोनों की ही सहजता खो जाती है और उसकी स्थान पर जबरन थोपी हुई कृत्रिमता हावी हो जाती है। पॉलिटिकल रोमैन्स विशाल का क्षेत्र है। ‘मक़बूल’, ‘ओमकारा’ से लेकर ‘हैदर’ तक में हमने यह देखा है। शेक्सपियर से प्रेरित विशाल भारद्वाज का ट्रैजडी की ओर हमेशा ही झुकाव रहा है। शेक्सपीयर की ही तरह विशाल दृश्यों का तनाव तोड़ने के लिए ‘कॉमिक रिलीफ़’ का इस्तेमाल करते हैं। मसलन चर्चिल और हिटलर को उसका कुत्ता बना देने वाला प्रहसन। नायक के सहायक/ख़ास मित्र ज़ुल्फ़ी के रूप में विशाल ने ‘साइडकिक’ का उपयोग किया है जो शेक्सपीयर की विशिष्टता है। इस संदर्भ में हैमलेट के मित्र हरेशीओ को भला कौन भूल सकता है।

हैमलेट के ज़िक्र से एक और बात याद आती है। उन दिनों हैमलेट पढ़ने के बाद कई दिनों तक एक बात को लेकर उलझी रही थी। यह उलझन हैमलेट और उसकी माँ के सम्बन्धों के बाबत थी। हैदर में विशाल ने हू-ब-हू उनके सम्बन्धों की उलझन परदे पर रच दी थी लेकिन रंगून में सम्बन्धों की गहराई उस तरह उभर कर नहीं आ पायी। सैफ़ पहले हावी हो जाने वाले मेंटॉर के रूप में, फिर शिकस्त खाए प्रेमी के रूप में और अंत में अपने प्रेम को खो देने वाले व्यक्ति के रूप में प्रेम का परचम ऊँचा रखते हैं। मगर फिर भी सैफ़ का प्रेम शाहिद और कंगना के प्रखर प्रेम के बीच नकारात्मकता ग्रहण कर लेता है। किरदारों के किनारे नुकीले होकर भीतर धँस जाने चाहिए, भोथरे किरदार रपट कर कहीं छूट जाते हैं। उनके किरदार के सिरों को थोड़े और फ़ाइन ट्यून किया जा सकता था। फ़िल्म एक साथ इतनी बातों को पॉइंट-आउट करती है कि सब गड्डमड्ड हो जाता है। कैन्वस इतना बड़ा है कि सब कुछ जल्दी-जल्दी बता देने की चाह में बहुत कुछ आधा छुआ रह जाता है। जिसको इतिहास की जानकारी नहीं उसके लिए कई स्थानों पर फ़िल्म से सम्बद्ध होना कठिन हो सकता है।

लेकिन विशाल ने इतने ख़ूबसूरत कांट्रैस्ट  जेनरेट किए हैं कि वे आपको छुए बग़ैर नहीं रह सकते। मसलन अपने समूह से बिछड़ी जूलिया दुश्मन सैनिकों के सामने नाचती है। यहाँ एक दृश्य में विशाल कितनी बातों को इंगित कर जाते  हैं। प्रसिद्धि परेशानियों के आगे गौण हो जाती है। मुश्किल आने पर मशहूर व्यक्ति भी आम इंसान हो जाता है जो अपने अस्तित्व के लिए कुछ भी कर गुज़रने को तैयार होता है। ये दृश्य सिद्ध करता है कि स्त्री हर काल में मनोरंजन का साधन रही है जिसे देख आनंदित हुआ जाता रहा है। मनोरंजन मनुष्य की इतनी बुनियादी ज़रूरत है कि बॉर्डर पर खड़े सैनिक अपने हवास खोकर अचानक प्राप्त हुए दिल्लगी के साधन में व्यस्त हो जाते हैं। इस दृश्य में तनाव और हास्य का ज़बरदस्त संतुलन है। दृश्यों की भाँति पूरी फ़िल्म सधी होती तो यह एक मास्टर-पीस होता।

विशाल के कौशल की एक और बानगी हम उस दृश्य में देख पाते हैं जब जापानी सैनिक और जूलिया बातचीत में व्यस्त हैं। दोनों एक दूसरे की भाषा नहीं जानने के बावजूद अपनी बातें कह रहे हैं…अपने बचपन की, ख़्वाबों  की, मुहब्बत की बातें। दोनों की बातचीत में कोई तारतम्य नहीं है पर यह दृश्य परदे पर विरल आत्मीयता के क्षण सिरज देता है। इस दृश्य में जो सबसे प्रभावित करते हैं वो शाहिद हैं। दोनों भाषा जानने वाले शाहिद बग़ैर कुछ बोले सिर्फ़ मुस्कुराते हैं। मुस्कुराहट की मिक़दार यहाँ बोलती है और दर्शक सोचता है कि नवाब मलिक के मन में क्या चल रहा होगा!

कोमल हृदय की स्वामिनी, सरलमना जूलिया अपने हाथों से अपने शत्रु को खिलाती है। इस दृश्य के उसका मनुष्यत्व हम सबको क्या बाँध नहीं लेता? जापानी सैनिक का गीत  एक अजानी भाषा में होते हुए भी युद्ध की विभीषिकाओं के बीच फ़िज़ां में मिठास घोलता है। युद्ध बंदियों की हूक कलेजा बींधती है। शब्द-शब्द ख़ून से सने चुप्पे पाँवों के निशाँ अपनी परछाईं से सिहर जाते हैं।  बंदी इधर के हों या उधर के…समान पीड़ा से गुज़रते हैं। विशाल भारद्वाज  इस सैनिक को रचते हुए इतनी चतुराई बरतते हैं कि हमारे नायक-नायिका के लिए ख़तरा होते हुए भी हम उस से सहानुभूति रखते हैं।

सबसे गहरा प्रेम मृत्यु और डर के बीच पनपता है। जीवन रहेगा या नहीं…जब यह शंका हो तब प्रेम बचे हुए जीवन को अपने आग़ोश में भर लेता है। दो नए प्रेमी जब झिझक, आमंत्रण और खोए के रास्तों के बीच अपने प्रेम की तहें खोल रहे थे ठीक उसी वक़्त एक बंदी खिड़की से उन्हें देखते हुए अपनी क़ैद से त्रस्त हो अपनी मुक्ति का आह्वान कर रहा था।  एक ओर प्रेम…दूसरी ओर मुक्ति की कामना। सैनिक की आँखों में प्रत्यक्षतः ईर्ष्या थी…उनके खुले जीवन के प्रति। ललक थी…वैसा जीवन जी पाने की।

सैफ़ का अपनी जंघा पर हाथ मारना और कंगना का अपने सारे संशयों को छोड़ उसके पास आ जाना मानसिक ग़ुलामी का अभूतपूर्व उदाहरण है। अपने व्यक्तित्व को नकार अपने प्रेमी को ओढ़ कर समर्पण कर चुकी जूलिया की सोच अपने नए प्रेमी से मिल चुकने के बाद आत्मनिर्भर होने लगती है जिसे अनुभवी रूसी जल्द ही चीह्न लेता है। जूलिया का एक प्रेमी उसे ‘स्पूनफ़ीड’ करता हुआ उसका सरपरस्त है तो वहीं दूसरा प्रेमी ज़िंदगी के फ़ल्सफ़ों की चौपड़ उसके सामने बिछा उसकी बारी आने पर पासे उसके हवाले कर देता है। कंगना और सैफ़ का प्रेम ‘आइडल वर्शिपिंग’  जैसा है जबकि शाहिद और कंगना का ‘वर्जित फल’ चख लेने जैसा।

अधिकतर हिंदी फ़िल्मों की तरह अंत नाटकीयता से भरपूर है। अंतिम दृश्य में तीनों की आँखों में अलग भाव हैं।  देश के लिए कुछ और कर पाने की तृष्णा लिए शाहिद की अतृप्त आँखें, अपने प्रेमी से किसी दूसरी दुनिया में मिल पाने की उत्कंठा लिए कंगना के तृषित नेत्र और जूलिया की अंतिम इच्छा को पूरा करने के जुनून और उसे खो देने की पीड़ा के बीच झूलते सैफ़ की सनकी आँखें मिलकर त्रिभुज रचती हैं। दर्शक इस त्रिभुज को अपने मन में फ़्रीज़ किए उठता है। मगर विशाल युद्ध और प्रेम के बीच ऑसिलेट करते हुए अक्सर ऊहापोह में घिर जाते हैं। चौहद्दियाँ धुँधली हो सकती हैं लेकिन निर्देशक के सामने तस्वीर इतनी स्पष्ट  होनी चाहिए कि वो दर्शकों तक अपनी सोच सम्प्रेषित कर सके। फ़िल्म की अव्यवस्था फ़िल्म के उन चुनिंदा ख़ूबसूरत टुकड़ों पर भारी पड़ती है और दर्शकों के मन में फ़्रीज़ फ़्रेम जल्द ही पिघलने लगता है।

1 COMMENT

  1. बहुत सुन्दर और सटीक समीक्षा. मुझे भी यह फिल्म सम्मोहक लगी. सिनेमा हॉल में चुप्पी छाई हुई थी. इतना एक्शन, इमोशन और ड्रामा है कि फिल्म भागती रेल सी तेजी से खत्म हो जाती है.प्रेम, भय और ब्रिटिश काल का चित्रण अद्भुत है. नायिका-नायकों का अभिनय कमाल का है.

LEAVE A REPLY

16 + 9 =