गाँव-घर के कवि मिथिलेश कुमार राय की कविताएँ

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मिथिलेश कुमार राय की कविताएँ पढता हूँ तो गाँव-घर याद आ जाता है. कुछ आप भी पढ़िए- मॉडरेटर

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 सूखना

खेतों में हरे धान की बालियाँ सूख रही हैं
बिछी दूब पर जूट सूख रहे हैं
गड्ढे में जमा सावन का पानी सूख रहा है

धूप में चलते-चलते चेहरे सूख रहे हैं
मारे प्यास के गला सूख रहा है
कोई कहता है कि आँखों का पानी सूख रहा है
पेट काटने के कारण जवानी सूख रही है

क्यों मेरे यार
अभी क्या सूखने का मौसम चल रहा है
——–

 मारना

मैं किसी की हत्या करूंगा तो
उस दिन बड़ी चहल-पहल रहेगी
घटना-स्थल पर दुनिया भर की भीड़ जमा होगी
अखबार में यह खबर छपेगी
संभव है कि खबर मेरे फोटो के साथ छपे
कि मैंने किसी को मार दिया है
मैं कहीं भाग जाउंगा तब भी
एक दिन पुलिस आकर मुझे दबोच लेगी

मैं गुनाह कबूलने से मुकर जाउंगा तब
मुझे बेतहाशा पीटा जाएगा
साक्ष्य और गवाहों का बयान लेकर
अदालत मुझे फाँसी की सजा सुनाएगी
या नहीं तो जिंदगी भर के लिए मैं
काल-कोठरी में धकेल दिया जाऊँगा

मगर मैं तो किसी की उम्मीद मार रहा हूँ
और कहीं कोई शोरगुल नहीं है
मैं अखबारवाले से रोज मिलता हूँ बतियाता हूँ
पुलिस को तो इसकी जरा भी भनक नहीं है
मैं कहीं नहीं भाग रहा हूं छुप रहा हूँ

बस आत्मा धिक्कारती रहती है हमेशा
और वही मरती रहती है
——-

खेल

मैं कांचे खेलता था
थोड़ा बड़ा होने पर
गिल्ली-डंडा खेलता था
नहर पर
अपने साथी चरवाहों के साथ
मैं चुक्का खेलता था
कबड्डी खेलता था

जवान हुआ तो
फैक्ट्री से लौटकर
मैं ताश खेलता था

मैं गड्ढे के कीचड़ में उतरकर
माछ मारता था
गाछ पर चढ़कर जामुन तोड़ता था
मैं नदी में उतरकर
बड़ी देर तक
और बड़ी दूर तक
बस तैरता रहता था

फैक्ट्री में
बिना नाक ढंके
मैं रुई धुनता था

क्रिकेट कौन खेलता था
और फुटबॉल
मैं नहीं जानता
कि शतरंज कौन खेलता था
कैरम कौन खेलता था
लूडो कौन खेलता था

स्कूल कौन जाता था
नहीं पता
ट्यूशन में क्या होता था
नहीं जानता

दफ्तर कौन जाता था
क्या पता
——

पिता हरियाली सोचते थे

पिता हमेशा खेत सोचते थे
फसल सोचते थे
वे मौसम सोचते थे
बारिश सोचते थे
और धूप सोचते थे

पिता असल में हरियाली सोचते थे
ऐसी हरियाली जिसे देखकर
चेहरे फूल हो जाया करे और
चिड़ियों के गीत सुनने में मन
खो सा जाया करे

लेकिन पिता बाद में
कर्ज सोचने लगे
कमजोरी सोचने लगे
बीमारी सोचने लगे

एक दिन के बाद से वे
खांसी सोचने लगे
मृत्यु तक सोचने लगे
मैं उनके पास खिला हुआ फूल लेकर जाता तो
वे मुरझाना सोचने लगते
कोई बुलबुल गाता
तो वे उसे रोना सोचने लगते
——-

बूझो तो जाने

सुदूर देहात के दुरूह रास्ते पर
पैदल चलने में किस तरह का आनंद आता होगा
कि पीड़ा जैसा कुछ होता होगा
पगडंडी पर दुलक चलते पैरों को चला रहे सिर पर जब
सूरज की तेज चमक पड़ती होगी तो
मन में किस तरह का भाव जनमता होगा
आँखों के आगे किन रंगों के तारे चमकते होंगे

चलो मान लिया कि इस तरह की जिंदगी के दिन
धूप के हवाले हो गई है फिर भी
नाक से टपक कर जब पसीने की बूँदें जीभ से स्पर्श करती होगी
स्वाद कैसा बुझाता होगा
चेहरे की आकृति किस तरह की बन जाती होगी
—–

छोटे लोग

छोटे लोगों को तो बैठने तक का शऊर नहीं होता
रह-रह के वे पालथी मारने लगते हैं
जैसे कुरसी पर नहीं जमीन पर बैठे हों
वे पेंट पहनते हैं तो
बेल्ट को कमीज के नीचे कर लेते हैं
कहीं निकलने से पहले
सिर में तेल चुपड़ लेते हैं

छोटे लोग बात-बात में हाथ जोड़ लेते हैं
मुंह को सी कर रखते हैं और
खींसे ज्यादा निपोरते हैं

छोटे लोगों के पास बड़ी-बड़ी चिन्ताएं होती हैं
एक बोरी खाद की
आलू-प्याज की
और अकाल-बाढ़ की

छोटे लोगों का कंठ
बहुत जल्दी सूख जाता है
और हाथ-पाँव फूलने लगता है
कभी-कभी तो छोटे लोग
छोटी-छोटी बात पर भी
इस तरह हताश हो जाते हैं
कि उनकी आँखों के आगे अंधेरा छा जाता है
और वे गश खाकर गिर पड़ते हैं

छोटे लोग इस क्रम में
मर भी जाते हैं
——

भूत से नहीं

भूत से डर नहीं लगता साहेब
कई तो मंतर याद हैं
फिर मौलाना साहेब का जंतर भी रहता है कमर में हमेशा
सुनते हैं कि लाठी पकड़े रहो हाथ में तो
भूत पास नहीं फटकता
यह भी सच है साहेब
कि आप डर जाते हो तभी
भूत आपको लपेटे में ले लेता है

धूप से डर नहीं लगता साहेब
जाड़े से भी नहीं
बरसात में तो आनंद ही आता है
रात से डर नहीं लगता
और सांढ़ से भी नहीं
उसे तो पुचकार कर हरी घास खिला आता हूँ
साँप से डर नहीं लगता साहेब
हाथ में सोंटा देखकर
वह खुद ही रास्ता बदल लेता है
नदी से डर नहीं लगता
बाढ़ हरेक बरस आती है
तैर कर बच जाता हूँ

कभी कोई पुलिस का दरोगा आता है गाँव में
या कि कोई अफसर तो
रूह काँपने लगती है
प्रधान से बड़ा डर लगता है साहेब
ये लोग झूठ-मूठ का फंसाकर
दौड़ा-दौड़ाकर मार डालते हैं
——–

चैन

फुरसत मिलती है तो
दिन को सोने में अच्छा लगता है

रात को नींद नहीं आती
डर लगता है

दरवाजे पर एक गाय बंधी है
पत्नी पाँव में पायल पहनती हैं
परसों बेटी लौटेगी ससुराल
साड़ी के लिए बक्से में कुछ पैसे रखे हैं

जब-जब कुत्ता भौंकता है
कलेजा काँप-काँप उठता है
सुनते हैं कि हल्ला करने पर
बीच सीने में
चाकू उतार दिया जाता है

दिन फुरसत किसको देता है
अपना तो यह
रात के कौर के नाम पर
उड़ जाता है
——–

मजाक 

दूसरे के हिस्से की रोटी का स्वाद
कैसा होता है

क्या यह एक सवाल है

नहीं-नहीं मजाक है

तब तो लाजवाब है!
——-

गाँव

वे प्रार्थना में
कौन सा मंत्र बुदबुदाते होंगे
जिस गाँव में नहर नहीं होता होगा
वहाँ के किसान
पानी के बारे में किस तरह से सोचते होंगे

उस गाँव की यात्रा कैसी रहेगी
जहाँ बड़े लोगों की बड़ी आबादी से कुछ दूर
छोटे लोगों की छोटी सी आबादी बसी होगी
वहाँ कुछ दिन ठहरना कैसा रहेगा
वहाँ मैं क्या-क्या देख सकता हूँ

ऐसा एक गाँव जहाँ सिर्फ
छोटे लोग बसे हो
वहाँ की सड़कें कैसी होगी
क्या अब भी वहाँ लालटेन से भेंट होगी
मैं जाउंगा तो यह भी देखूंगा कि
स्कूल के समय में वहाँ के बच्चे
कहाँ जाते हैं

वे गाँव जो
नदी में बसे हुए हैं
वहाँ धान की फसल किस तरह लहलहाती होगी
वहाँ के लोगों को भागना पड़ता होगा तो वे
किस तरफ भागते होंगे

मैं कुछ दिन
शहर से सटे गाँव में बीताना चाहता हूँ
मैं वहाँ की गालियों पर गौर करना चाहता हूँ कि
वे शहरी हो गए हैं या
उनमें कुछ अब भी शेष है

शहर से दूर के गाँव
रौशनी देखकर क्या विचार करते होंगे
कुछ दिन वहाँ ठहरकर
मैं यह भी पढ़ना चाहता हूँ

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मिथिलेश कुमार राय

24 अक्टूबर,1982 ई0 को बिहार राज्य के सुपौल जिले के छातापुर प्रखण्ड के लालपुर गांव में जन्म

हिंदी साहित्य में स्नातक

सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं व वेब पत्रिकाओं में कविताएं व (कुछ) कहानियाँ प्रकाशित

वागर्थ व साहित्य अमृत की ओर से क्रमशः पद्य व गद्य लेखन के लिए पुरस्कृत

कहानी स्वरटोन पर ‘द इंडियन पोस्ट ग्रेजुएट’ नाम से फीचर फिल्म का निर्माण

कुछेक साल पत्रकारिता करने के बाद फिलवक्त ग्रामीण क्षेत्र में अध्यापन

संपर्क
ग्राम व पोस्ट- लालपुर
वाया- सुरपत गंज
जिला- सुपौल (बिहार)
पिन-852 137

फोन-9473050546, 9546906392

ईमेल- mithileshray82@gmail. com

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