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  • स्त्री के अंतर्मन की परतों को उघाड़ती कहानियाँ

     

    विजयश्री तनवीर का कहानी संग्रह ‘सिस्टर लिसा की रान पर रुकी हुई रात’ प्रकाशित होने के साथ ही लगातार चर्चा में है। इसमें कोई संदेह नहीं कि विजयश्री की कहानियों का अपना मुहावरा है जो बहुत अलग है और ताज़ा है। हिंद युग्म से प्रकाशित उनके इस संग्रह पर युवा कवि देवेश पथ सारिया की यह टिप्पणी पढ़िए-

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    लेखिका विजयश्री तनवीर का दूसरा कहानी संग्रह ‘सिस्टर लिसा की रान पर रुकी हुई रात’ विश्व पुस्तक मेले के दौरान लोकार्पित किया गया। इस संग्रह में कुल सात कहानियाँ हैं।‌ ये सभी कहानियाँ स्त्रियों के संसार और मनोविज्ञान की पड़ताल करती हैं। इस पुस्तक की स्त्रियों द्वारा उठाए गए सवाल केवल पुरुषों को नहीं अपितु ईश्वर, समाज और अन्य स्त्रियों को भी संबोधित हैं।

    ‘गाँठ’ कहानी न केवल दलित विमर्श एवं स्त्री विमर्श के कई पहलुओं को स्पर्श करती है बल्कि शिक्षा तंत्र की कमियों को भी उजागर करती है। हमारी शिक्षा व्यवस्था छोटी कक्षाओं से ही कुछ विषयों को बच्चों के मन में हौआ बना देती है। गणित तो मानो दुश्मन ही हो जाता है। दलित समाज की ‘बंसरी’ जैसे बच्चों को सही मार्गदर्शन देने वाला कोई नहीं होता। ‘वनश्री’ और ‘धनश्री’ जैसे सुंदर नामों का अपभ्रंश कर दोनों बहनों का नाम ‘बंसरी’ और ‘धंसरी’ कर दिया जाता है। जिस सवर्ण लड़के से बंसरी कभी-कभार गणित पढ़ने जाती है, वह उसका शारीरिक शोषण करने की कोशिश करता है। बंसरी के घर का क्लेश, सवर्णों के उलाहने, शिक्षकों द्वारा किया गया भेदभाव आदि कड़वे अनुभव उस बच्ची के दिल पर कितने ही घाव छोड़ जाते हैं-

    “बंसरी ने सोचा कितना सीधा है ऐसा इकलंत खेल। अपनी शह, अपनी मात। कोई खिजाने वाला नहीं। कोई गिराने वाला नहीं।”

    सांप-सीढ़ी के खेल का प्रतीकात्मक प्रयोग कर विजयश्री वर्ण व्यवस्था के उस सांप की बात करती हैं जो बंसरी जैसे बच्चों को निन्यानबे पर पहुंचते ही डस कर नीचे, बहुत नीचे धकेल देता है। कुछ बच्चों को बचपन से ही अशिक्षित रह जाने के डर से आजीविका के विकल्पों के बारे में सोचना पड़ता है। माता-पिता के झगड़ों का निपटारा करना सीखना होता है।

    संग्रह की शीर्षक कहानी ‘सिस्टर लिसा की रान पर रुकी हुई रात’ मनोवैज्ञानिक स्तरों की जटिलता से रूबरू होती है। इस कहानी का शीर्षक प्रतीकात्मक है जहाँ ‘रात’ का अभिप्राय शरीर के एक हिस्से में छा गया अंधेरा है। मानसिक स्वास्थ्य का शरीर पर होने वाला असर इस कहानी की आधारवस्तु है। किस तरह ‘गिल्ट फीलिंग’ व्यक्ति की बीमारी बन जाती है। धर्म और आदर्श मनुष्य देह की ज़रूरतों को कैसे परिभाषित और नियंत्रित करते हैं। इस कहानी में लेखिका द्वारा नागा कबीलाई संस्कृति, ईसाई मिशनरियों द्वारा उनकी शिक्षा के प्रयासों और नागाओं के प्रतिरोध के बारे में कुछ इशारे किए गए हैं। इस बारे में अधिक लिखा गया होता तो कहानी और भी विस्तृत आयामों को स्पर्श करती। इस एक बिंदु के अतिरिक्त यह एक सुंदर और कसी हुई कहानी है जिसमें ईसाईयत और अपराध के द्वंद्व पर कई रोचक वाक्य हैं-

    “हर वक़्त मसीह को ही क्यों सोचना! शैतान को सोचना मसीह को सोचने से ज़्यादा सरल है।”

    ‘डाई अलोन’ कहानी के मूल में मनुष्यगत स्वार्थ और उसके दुष्परिणाम से उपजी आत्म-भर्त्सना है। कोरोना काल और उस दौर में व्याप्त डर की पड़ताल भी यह कहानी करती है। वह समय जिसे मनुष्य ने प्रलय की तरह झेला। मनुष्य स्वभाव के कई स्वरूप उस समय सामने आए। कुछ लोगों ने ऑक्सीजन सिलेंडर और रेमडेसिवीर की कालाबाजारी की। वहीं कुछ लोगों ने नितांत अजनबी लोगों की मदद के लिए दिल खोलकर दान किया, अस्पताल में बेड की व्यवस्था करवाई। प्लाज्मा के लिए अपना खून देने निकल पड़े। कुछ लोग इतने डर गए कि उन्होंने बहुत अजीब हरकतें की। कहानी की नायिका तारा भी इसी वायरस के डर की शिकार होकर एक ग़लती कर बैठी है। कहानी का एक गौण किरदार जो एक टैक्सी ड्राइवर है, कोराना समय का हाल बताती एक सटीक पंक्ति कहता है-

    “सोचता हूँ कुछ दिन एंबुलेंस की ड्राइवरी कर लूँ। आजकल इनकी चाँदी है।”

    इस कहानी में तलाकशुदा जीवन जीती दो स्त्रियों (तारा और उसकी माँ) का पक्ष प्रस्तुत किया गया है। कोरोना समय में तारा द्वारा लिए गए निर्णय के पीछे उसका अकेलापन भी एक कारण प्रतीत होता है जिसने उसकी बनावट को असुरक्षा से पोषित किया। उत्तराखंड की बोली भी कहानी के कुछ संवादों में प्रयुक्त की गई है। इस कहानी में रहस्यात्मकता भी है जो कुछ पाठकों के लिए कथ्य को अस्फुट बना सकती है। यह कहानी एक सतर्क पाठ की मांग करती है।

    ‘धीरा’ और ‘अज़ाब’ कहानियों का विषय उन समस्याओं से जुड़ा है जिनसे स्त्रियां कई दशकों से, बल्कि सदियों से जूझ रही हैं। प्रस्तुतीकरण इन कहानियों को मार्मिक बनाता है। धीरा एक ऐसी स्त्री है जो हर लादे गए बंधन से मुक्त होना चाहती है। जब उसे मुक्ति मिलती है तो अपनी देह ही से। धीरा के अपराधियों की कालांतर में जो दशा होती है, उसे धीरा के सास की जर्जर देह के अतिरिक्त घर के बारे में लिखे गए इस वाक्य से समझा जा सकता है-

    “गणपति का दो साल पुराना कैलेंडर दीवार पर घड़ी के पेंडुलम की तरह दोलन करता अपने काल का हाल कह रहा था।”

    ‘अज़ाब’ कहानी देह व्यवसाय एवं दैनिक मजदूरी करने वाले श्रमिकों की दुर्दशा पर आधारित है। कहानी में एक स्त्री (सजीली/गुल्लन), दूसरी स्त्री (शरबरी) द्वारा प्रदर्शित ममता का क़र्ज़ उतारती है। शरबरी और सजीली के तर्क ईश्वर की अवधारणा को कटघरे में खड़ा करते हैं-

    “यह दुनिया ही जहन्नम है। और इस जहन्नम में इस कोठे जैसे सत्तर हज़ार जहन्नम हैं। ये जो कोठरियाँ है न, यही वो बिल हैं जहाँ साँप रहते हैं जो ‌हर रात हमें खाते हैं।”

    ऐसा भी नहीं है कि संग्रह की सभी कहानियों में स्त्री पुरुष एक-दूसरे के विरुद्ध ही खड़े हों। ‘डाई अलोन’ कहानी में पुरुष अत्याचारी नहीं है। फिर भी स्त्री और पुरुष की जिस पारस्परिक पूरकता की बात की जाती है, वह ‘जो डूबा सो पार’ कहानी में मिलती है। इस कहानी में नायिका हंसा से एक लड़का केसर डूबकर प्रेम करता है। उसका प्रेम एकतरफ़ा है। वह एक ग़लती भी कर बैठता है। हंसा को दोषी ठहराने की अवसरवादिता न दिखाकर केसर अपनी ग़लती मानता है और उसके लिए सजा पाता है। केसर का प्रायश्चित हंसा का हृदय परिवर्तन कर देता है। पूरकता तक पहुँचने का यह मार्ग कहानी को रोचक बनाता है। इस कहानी के आधार पर साहचर्य की मूलभूत शर्त यह हुई कि व्यक्ति अपने साथी के प्रति प्रेम बनाए रखे और ग़लती होने पर उसे स्वीकार करने की हिम्मत दिखाए।

    ‘निर्वाण’ जीवन के अलग-अलग स्तरों पर जूझते सहयात्रियों की कथा है। इस कहानी की मुख्य पात्र के पास एक साधु से मिला हुआ सूत्र वाक्य है। वह कथन ही उसकी परिणति है और उसके अनुसार अन्य सहयात्रियों की भी। इस कहानी में साधु  और कथा नायिका के मध्य सुदृढ़ तर्क-वितर्क होने की दरकार मुझे महसूस हुई। साधु के कथन के पीछे का कारण उतना पुष्ट न हो सका जितना इस पुस्तक की अन्य कहानियों के स्तर को देखते हुए अपेक्षित था। इस कहानी के सभी पात्रों की व्यथा मार्मिक है। विशेष रुप से मुझे उस बदमिज़ाज हो गए मॉडल की आपबीती ने छुआ जिसे मुंबई मॉडलिंग इंडस्ट्री अपने डबल स्टैंडर्ड का शिकार बनाकर छोड़ देती है।

    विजयश्री तनवीर ने अपने पहले कहानी संग्रह से उम्मीद जगाई थी। उनकी इस दूसरी किताब की कहानियां उनके कथा कौशल में समृद्धि की गवाही देती हैं। भाषा का इस्तेमाल भी संतुलित तरीके से किया गया है। पिछली किताब तक उर्दू विजयश्री की ताकत रही थी। यहाँ उसे अधिक सजगता से बरता गया है। कुछ सेकेंडरी किरदारों ने भी पुस्तक में कई महत्वपूर्ण संवाद कहे हैं। उन्हें केवल फिलर की तरह इस्तेमाल न करना मुझे इस किताब का एक सकारात्मक पहलू लगा।

    ~ देवेश पथ सारिया

    पुस्तक: सिस्टर लिसा की रान पर रुकी हुई रात

    लेखिका: विजयश्री तनवीर

    प्रकाशक: हिंदयुग्म प्रकाशन

    वर्ष: 2023

    मूल्य: ₹249

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    समीक्षक- देवेश पथ सारिया

    सम्प्रति: ताइवान में खगोल शास्त्र में पोस्ट डाक्टरल शोधार्थी। मूल रूप से राजस्थान के राजगढ़ (अलवर) से सम्बन्ध।

    पुस्तकें:

    1. कविता संग्रह: ‘नूह की नाव’ (2022, साहित्य अकादेमी, दिल्ली)।
    2. कथेतर गद्य: ‘छोटी आँखों की पुतलियों में’ (2022, ताइवान डायरी, सेतु प्रकाशन)।
    3. अनुवाद: ‘हक़ीक़त के बीच दरार’ (2021, वरिष्ठ ताइवानी कवि ली मिन-युंग के कविता संग्रह का हिंदी अनुवाद)।

    फ़ोन: +886978064930 ईमेल: deveshpath@gmail.com

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