‘लव इन द टाईम ऑफ कॉलरा’ से एक संपादित अंश

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आधी सदी की प्रेमकहानी




जहां तक फ्लोरेंतीनो एरिज़ा की बात है तो उसने उस दिन से एक पल भी उसके बारे में बिना सोचे नहीं बिताया था जब लंबे और तकलीफदेह प्रेम संबंध के बाद आज से 51 साल 9 महीने 4 दिन पहले फरमीना डाज़ा ने उसका प्यार ठुकरा दिया था। वह कमरे की दीवार पर हर दिन के लिए एक लकीर खींचकर इसका कोई हिसाब नहीं रखता था क्योंकि ऐसा कोई दिन गुजरा ही नहीं जिस दिन कुछ न कुछ ऐसा घटित न हुआ हो जिसने उसे उसकी याद न दिलाई हो। जिस समय वे अलग हुए थे उस समय फ्लोरेंतीनो एरिज़ा अपनी मां के साथ खिड़कियों वाली गली के एक मकान के छोटे-से हिस्से में किराए पर रहता था। उसकी मां की वहां किराने की दुकान उस समय से थी जब वह जवान हुआ करती थीं, वह फटे-पुराने कपड़े भी रखती थीं जो युद्ध में घायल हुए सैनिकों के मरहम-पट्टी के काम आ जाती। वह अपनी मां की वैध संतान नहीं था, एक मशहूर जहाज कंपनी के मालिक डॉन पीयस के साथ उसकी मां के मेल-मुलाकातों का नतीज़ा था वह।
डॉन पीयस की जब मृत्यु हुई उस समय उसके बेटे की उम्र 10 साल थी। वह गुपचुप तरीके से वह अपने बेटे के खर्चे का ध्यान तो रखता था लेकिन उसने न तो कभी उसे कानूनन अपने बेटे की तरह माना न ही उसके भविष्य को सुरक्षित करने के लिए कुछ किया, इसलिए फ्लोरेंतीनो एरिज़ा अपने मां के उपनाम का ही उपयोग करता था। हालांकि उसके पिता के बारे में सभी जानते थे। अपने पिता की मौत के बाद फ्लोरेंतीनो एरिज़ा को पढ़ाई छोड़कर डाक-तार विभाग में प्रशिक्षु के तौर पर काम करना पड़ा। वहां उसे शुरु में चिट्ठी का बंडल खोलकर उनकी छंटाई का काम दिया गया, वही लोगों को चिट्ठी आने की सूचना ऑफिस के दरवाजे पर जिस देश से चिट्ठी आई हो उसका झंडा हिलाकर देने लगा।
उसके स्वाभाव से वहां का टेलिग्राफ ऑपरेटर उससे प्रभावित हो गया। वह जर्मन मूल का था। वह खास मौकों पर शहर के गिरिजाघर में बाजा बजाया करता तथा घर में संगीत की शिक्षा दिया करता था। उसने फ्लोरेंतीनो एरिज़ा को टेलिग्राम का कोड सिखाया तथा उसकी मशीन पर काम करना भी। थोड़े दिनों की संगीत शिक्षा के बाद फ्लोरेंतीनो एरिज़ा सुनकर वायलिन ऐसे बजाने लगा जैसे पेशेवर बजाते हैं। जब वह फरमीना डाज़ा से मिला तो उस समय शहर के समाज में उस नौजवान की बड़ी मांग थी। वह नए से नए डांस को बखूबी कर लेता था तथा प्रेम की कविताएं गाकर सुना सकता था, अपने दोस्तों की प्रेमिकाओं के लिए वह हर समय वायलिन बजाने के लिए तैयार रहता था। वह दुबला-पतला था, आंखों पर नज़र का चश्मा लगाता था जिससे वह कुछ और बेचारा लगने लगता था। कमजोर नजर के अलावा उसे कब्ज की शिकायत भी रहती थी और जिसके कारण ताउम्र उसे एनिमा लेना पड़ा। उसके पास काले रंग का एक सूट था जो उसे अपने मृत पिता से विरासत में मिला था, लेकिन उसकी मां उसे इतने एहतियात से रखतीं कि हर इतवार को वह नया लगने लगता था। इसके बावजूद कि वह कमजोर दिखता था, उसके कपड़े साधारण होते थे, उसको जाननेवाली लड़कियां यह तय करने के लिए गुप्त रूप से लॉटरी निकालती थीं कि उसके साथ कौन समय बिताएगा और वह उन लड़कियों के साथ समय बिताने के मजे उस दिन तक लेता रहा जिस दिन उसकी मुलाकात फरमीना डाज़ा से हुई और उसकी मासूमियत का अंत हुआ।
उसने उसे पहले-पहल एक दोपहर तब देखा था जब टेलिग्राफ ऑपरेटर ने टेलिग्राम देते हुए कहा था इसे किसी लौरेंजो डाज़ा को दे आए, जिसके घर का पता किसी को मालूम नहीं था। उसने शहर के सबसे पुराने मकानो में से एक में उसे ढूंढ लिया था, जो खंडहर की तरह लग रहा था। घर में मरम्मत का काम चल रहा था और एरिज़ा जब नंगे पैर चल रही कामवाली के पीछे-पीछे उस घर के गलियारे से गुजर रहा था तो उसे कोई इंसानी आवाज सुनाई नहीं दी। आंगन के दूसरे सिरे एक कामचलाऊ ऑफिस जैसा था उसमें मेज के पीछे बैठा एक बहुत मोटा आदमी दोपहर की नींद में था। वह लौरेंज़ो डाज़ा था, शहर में लोग उसे नहीं जानते थे क्योंकि वह करीब दो साल पहले ही आया था और शहर में उसके अधिक दोस्त नहीं थे।
उसने टेलिग्राम ऐसे लिया जैसे वह किसी बुरे ख्वाब की तरह हो। फ्लोरेंतीनो एरिज़ा करुणा के साथ देख रहा था, देख रहा था कि उसकी उंगलियां सील खोलने का प्रयास कर रही थीं, उस डर के साथ जो उसने उन बहुत सारे लोगों के चेहरे पर टेलिग्राम खोलते समय देखा था जो टेलिग्राम के आने का मतलब यही समझते थे जैसे मौत की कोई खबर आई हो। पढ़ने के बाद वह कुछ सहज हुआ। अच्छी खबर है, वह बोला, फिर उसने आम तौर पर टेलिग्राम लाने वाले को दी जानेवाली छोटी सी राशि फ्लोरेंतीनो एरिज़ा के हाथ में रख दी इस संतोष भरी सांस के साथ मानो खबर खराब हुई होती तो उसने उसे कुछ नहीं दिया होता। फिर उसने हाथ मिलाते हुए उसे विदा किया, जो सामान्य तौर पर टेलिग्राम लानेवाले डाकिए के साथ किया जानेवाल व्यवहार नहीं था, फिर वही कामवाली उसे दरवाजे तक छोड़ने आई, जिसका उद्देश्य रास्ता दिखाना उतना नहीं था जितना कि उसके ऊपर नजर रखना। वे गलियारे में चल रहे थे कि फ्लोरेंतीनो एरिज़ा को पता चल गया कि उस घर में कोई और भी था क्योंकि उस आंगन की रोशनी एक स्त्री की आवाज से चमक उर्ठी जो रट-रट कर कुछ याद कर रही थी। जब वह सिलाई वाले कमरे के सामने से गुजर रहा था उसने खिड़की से देखा कि एक उम्रदराज औरत और एक लड़की दो कुर्सियों पर बहुत पास-पास बैठी थीं। उस औरत की गोद में किताब खुली थी और लड़की उसमें से कुछ पढ़कर उसे समझा रह थी। उसे बड़ी हैरत हुईः बेटी अपनी मां को पढ़ना सिखा रही थी। यहां समझने में उससे थोड़ी सी गलती हो गई थी क्योंकि वह औरत उस लड़की की मां नहीं बुआ थी, हालांकि उसने उसे बेटी की ही तरह पाला था। उसकी पढ़ाई में किसी तरह की बाधा तो नहीं आई लेकिन लड़की ने आंखें उठाईं यह देखने के लिए आखिर खिड़की के पास से कौन गुजर रहा था, और वही देखादेखी उस भीषण प्यार की शुरुआत थी आधी शताब्दी बाद भी जिसकी तीव्रता कम नहीं हुई थी।
फ्लोरेंतीनो एरिज़ा को लौरेंज़ो डाज़ा के बारे में जो पता चल पाया था वह यह कि सान जुआन नामक शहर से वह अपनी इकलौती बेटी और कुंवारी बहन के साथ आए थे क्योंकि वहां हैजा फैल गया था। जो उनको जानते थे उनके अनुसार वह वहां बसने के इरादे से आए थे क्योंकि उसने घर की जरूरत का हर सामान खरीद लिया था। जब उसकी बेटी बहुत छोटी थी तभी उसकी पत्नी का देहांत हो गया था। अब लड़की की उम्र 13 साल हो चुकी थी और उसका नाम भी वही था जो उसकी मृत मां का नाम था- फरमीना।
ऐसा लगता था कि लौरेंज़ो डाज़् साधनसंपन्न व्यक्ति थे, क्योंकि वह कोई काम-धाम नहीं करते थे लेकिन फिर भी उन्होंने इस घर के लिए बड़ी कीमत नगद चुकाई थी और उसको रहने लायक बनाने में उससे भी अधिक पैसे खर्च कर रहा था। उसकी बेटी शहर के उसी मशहूर स्कूल में पढ़ती थी पिछले 200 सालों से जहां उच्च वर्ग की लड़कियां आज्ञाकारी और विनम्र पत्नी बनने की तकनीक सीख रही थीं। औपनिवेशिक काल और आजादी के आरंभिक वर्षों में उसमें ऊँचे खानदान की लड़कियों को ही पढ़ने का मौका दिया जाता था, लेकिन आजादी के बाद जैसे-जैसे ऊँचे घराने बर्बाद होते गए स्कूल ने अपने दरवाजे उनके लिए भी खोल दिया जो स्कूल की फीस चुकाने की हैसियत रखते हों तथा जिनका जन्म वैध कैथोलिक रिश्ते से हुआ हो। इस सबके बावजूद वह एक महंगा स्कूल था, फरमीना डाज़ा का वहां पढ़ना अपने आप में यह बताने के लिए काफी था कि उसकी आर्थिक हालत अच्छी थी, सामाजिक हैसियत जैसी रही हो। इस सूचना ने फ्लोरेंतीनो एरिजा का उत्साह बढ़ाया क्योंकि इससे उसे संकेत मिला कि बादामी आंखोंवाली वह अल्हड़ सुंदरी उसके सपनों की ज़द में थी। लेकिन उसके पिता के सख्त कायदों ने उसके लिए बड़ी मुश्किल खड़ी कर दी। दूसरी लड़कियों की तरह वह न तो बाकी लड़कियों के साथ झुंड में स्कूल जाती थी न ही उसे कोई बूढ़ा नौकर छोड़ने आता था, फरमीना डाज़ा हमेशा अपनी कुंवारी बुआ के साथ चलती थी, उसके व्यवहार से लगता था कि उसे इधर-उधर देखने तक की अनुमति नहीं थी।
फ्लोरेंतीनो एरिज़ा ने किसी एकाकी शिकरी की तरह अपने गुप्त जीवन की शुरुआत इस मासूम तरीके से की। सात बजे सुबह से वह छोटे पार्क के एक लगभग न दिखाई देने वाली बेंच पर बैठ जाता, बादाम के पेड़ की छाया मे कविता की किताब पढ़ने का अभिनय करता, तब तक बैठा रहता जब तक कि उसे नीली स्कूल ड्रेस में वह असंभव सी लड़की दिखाई न दे जाती। वह स्वाभाविक रूप से तनकर चलती, सिर ऊपर उठाए, स्थिर आंखें, सधे कदमों से चलती थी, नाक सामने की ओर तनी रहती, किताबों का बक्सा छाती से चिपकाए हुए चलती जाती। बगल में बुआ सेंट फ्रांसिस का चोगा पहने उसके कदमों से कदम मिलाने का प्रयास करती रहती, उस तक पहुंचने का बिल्कुल अवसर नहीं होता था। फ्लोरेंतीनो एरिज़ा उसे इसी तरह दिन में चार बार आते-जाते देखता और इतवार के दिन एक बार जब वे चर्च से बाहर निकलते थे, उसके लिए लड़की को देख भर लेना ही काफी होता था। धीरे-धीरे वह उसके मन में बसने लगी, मन ही मन वह उसे तरह-तरह की उपमाएं देता, तरह-तरह की काल्पनिक भावनाएं उसके लिए प्रकट करता, अगले दो सप्ताह तक उसने उसके अलावा कुछ और नहीं सोचा। आखिरकार उसने तय किया कि एक कागज के दोनों ओर सुंदर लिखावट में अपनी भावनाएं लिखकर उसे देगा। लेकिन कई दिनों तक वह उसकी जेब में ही पड़ा रहा, वह सोचता रहा कि किस तरह से यह चिट्ठी उसे दी जाए, वह सोचता जाता और इस क्रम में रोज सोने से पहले और-और पन्ने भरता जाता, इस तरह वह चिट्ठी उपमाओं का कोश बन गई, जिनमें उन किताबों से प्रेरणाएं ली गई होती थीं जिन्हें पार्क में बैठ-बैठकर वह इतनी बार पढ़ चुका था कि वे उसे याद हो चुकी थीं।
चिट्ठी देने के तरीकों के बारे में सोचते हुए उसने उस स्कूल की कुछ दूसरी लड़कियों से जान-पहचान करने की कोशिश की, लेकिन वे सभी उसकी दुनिया से बहुत दूर की जान पड़ती थीं। इसके अलावा, उसे काफी सोचने पर यह भी लगा कि यह अच्छा नहीं होगा कि किसी को उसके इरादों के बारे में पता चल जाए। फिर, उसे यह भी पता चला कि जब उसका परिवार शहर में आया-आया था तो फरमीना डाज़ा को शनिवार को आयोजित होनवाली एक डांस पार्टी में आमंत्रित किया गया था लेकिन उसके पिता ने यह कहते हुए मना कर दिया था कि कुछ समय बाद में जाना। इस बीच वह चिट्ठी करीब 60 पन्नों की हो चुकी थी, वह उस राज़ के बोझ को उठा नहीं पाया तो उसने एक दिन अपने मां के सामने बोलकर खुद को हल्का कर लिया, केवल वही एक थी जिसे वह अपने राज बताता था। मां ट्रांजितो एरिज़ा प्यार को लेकर अपने बेटे के बहाए गए मासूम आंसुओं से पिघल गईं, उन्होंने अपने ज्ञान के आधार पर उसके मार्गदर्शन की सोची। सबसे पहले उन्होंने उसे समझाया कि वह उस लड़की को कागजों का यह पुलिंदा न दे क्योंकि हो सकता है उसके सपनों की लड़की इससे डर जाए, उनको यह लग गया था कि प्यार के मामले में वह लड़की भी उनके बेटे की तरह ही भोली होगी। पहला कदम, उन्होंने कहा, यह होना चाहिए कि उसे पता चले कि तुम्हारी उसमें दिलचस्पी है जिससे जब यह बात उस पर खुले तो उसे किसी तरह की हैरानी न हो और इस बीच उसे सोचने का मौका भी मिल जाए।
लेकिन सबसे बढ़कर, उन्होंने कहा, पहले तुमको जिसका दिल जीतना है वह वह लड़की नहीं उसकी बुआ है।

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8 COMMENTS

  1. बहुत बढ़िया अनुवाद l हिंदी जगत के लिए एक और उपहार l धन्यवाद् l

  2. jaisa k chandan ne kaha, saras hai! mujhe yah bhi yaad aa gaya k yah novel mujhe apne dost se vaapas lena hai jo maine use paanch saal chaar mahine aur teen din pahle padhne ko diya tha! aur vah dost bahut pyaara kavi bhi hai!

  3. नमस्कार प्रभात रंजन जी, मार्खेज के इस उपन्यास बड़ा ही लाजवाब अनुवाद किया है आपने. इसके पूरे होकर पाठकों के हाथों में आने का बड़ा ही बेसब्री से इंतजार रहेगा. पुखराज जांगिड़

  4. ravaan anuvaad…marques ka yah upanyas abhi haal me hi padh paya…hindi me bhi vahi ras aapne barqarar rakha hai

  5. bahut badhiya hai. aapki marques waali kitab ka main besabri se intjar kar raha hun. kaash wah jaldi aa jaye.

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